एनसीईआरटी समाधान कक्षा 6 हिंदी बाल रामकथा

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 6 हिंदी बाल रामकथा के सभी अध्यायों के प्रश्न उत्तर सत्र 2024-25 के लिए के लिए यहाँ दिए गए हैं। विद्यार्थी यहाँ दिए गए प्रश्न उत्तरों के माध्यम से बाल रामकथा के सभी प्रश्नों को आसानी से समझ सकते हैं।

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कक्षा 6 हिंदी बाल रामकथा सारांश

राम अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनकी माता का नाम कौशल्या था। वे सूर्यवंश के राजा रघु के वंशज थे। राजा दशरथ की दो और रानियाँ थी, जिनका नाम कैकेयी और सुमित्रा था। कैकेयी के पुत्र का नाम भरत था। सुमित्रा के दो पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न थे। चारों भाइयों में बड़ा प्रेम था। चारों राजकुमारों को शिक्षा-दीक्षा के लिए आश्रम भेजा गया। जहाँ उन्होने शस्त्र विद्या सीखी। राम अपने भाइयों में सर्वोपरि थे। वे चौदह कलाओं में परिपूर्ण थे।

राजकुमार जब बड़े हुए तो अयोध्या लौट आए। सभी उनकी उपस्थिती से प्रसन्नचित थे। तभी विश्वामित्र वहाँ आए और दशरथ से वचन में राम को माँग लिया। दशरथ अपना वचन पूरा नहीं करना चाहते थे, लेकिन मुनि वशिष्ठ ने उन्हें समझाते हुए इसे राम की उन्नति का मार्ग बताया। दशरथ ने राम का ध्यान रखने के लिए अपने छोटे पुत्र लक्ष्मण को भी उनके साथ भेज दिया। महर्षि विश्वामित्र से मिली शक्तियों के बल से राम ने ताड़का नाम राक्षसी का वध कर दिया। मुनि विश्वामित्र ने अपना अनुष्ठान पूरा करने के पश्चात राम और लक्ष्मण को राजा जनक की पुत्री सीता के स्वंयवर में रखे भगवान शंकर के धनुष के दर्शन करवाने के लिए चल दिए।

राम और सीता का विवाह

सीता के स्वंयवर का धनुष कोई न उठा सका। सभी राजकुमार प्रयास कर चुके थे। राजा जनक बहुत दुखी थे। विदेहराज का दुख देख कर महर्षि विश्वामित्र ने राम को धनुष उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने को कहा। राम ने विशाल धनुष सहज ही उठा लिया। सभा में बैठे सभी लोग हतप्रभ हुए। प्रत्यंचा चढ़ाने के दबाव में धनुष बीच से ही टूट गया। राम और सीता के विवाह का शुभ समाचार राजा दशरथ को भेजा दिया गया। बारात के स्वागत की तैयारी होने लगी। राम के साथ लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का विवाह भी रचा दिया गया। विवाह के पश्चात राम के राजतिलक की घोषणा की गई।

पूरी अयोध्या इस खुशी में झूम रही थी। तभी कैकेयी की दासी मंथरा ने कैकेयी की बुद्धि भष्ट कर राजा दशरथ से दो वरदान माँगने को कहे। एक वरदान में कैकेयी ने भरत के लिए राज्याभिषेक माँगा और दूसरे में राम को चौदह वर्ष का वनवास माँगा। राजा दशरथ राम की जुदाई सह न सके और छ्ह दिनों के पश्चात ही उनकी मृत्यु हो गई। तब तक राम, लक्ष्मण और सीता वनवास को जा चुके थे। यह समाचार उन्हें भरत के द्वारा मिला जब वे उन्हें अयोध्या वापस लाने का अनुरोध करने गए थे। राम ने उन्हें अपनी खड़ाऊँ दे कर अयोध्या राज्य की देखभाल का कार्य सौप दिया।

सीता हरण

राम, लक्ष्मण और सीता वन-गमन करते हुए आगे बढ़ते गए। उन्होने दंडक वन में दस वर्ष गुजारे। अगस्त्य ऋषि ने राम को पंचवटी में अपनी कुटिया बनाने को कहा। राम गोदावरी नदी के पास पंचवटी में अपनी कुटिया बना कर रहने लगे। कुछ दिनों बाद रावण की बहन सूर्पणखा वहाँ आई राम और लक्ष्मण से विवाह का प्रस्ताव रखा। दोनों भाइयों के मना करने पर सीता को खाने का प्रयास किया। यह देखकर लक्ष्मण ने उसके नाक-कान काट लिए। अपने भाइयों की दुहाई देती वह खर दूषण के पास गई। दोनों राक्षस भाई अपने चौदह राक्षसों के साथ राम और लक्ष्मण के हाथों मारे गए। जब रावण को अपनी बहन के अपमान का पता चला तो उसने ताड़का के पुत्र मारीच को सीता हरण के षड्यंत्र में शामिल कर लिया।

मारीच सोने का हिरण बन कर कुटीया के पास विचरण करने लगा। सीता उसे देख कर उसे जिंदा पकड़ कर लाने की हट करने लगी। मारीच हिरण के रूप में भागता रहा और राम को कुटिया से दूर ले गया। राम के बाण लगने से मायावी मारीच ने राम की आवाज़ में सीता और लक्ष्मण को कुछ इस प्रकार से आवाज़ लगाई जैसे कि वे उनकी मदद माँग रहे हों।

आवाज़ सुनकर सीता घबरा गई और लक्ष्मण को राम की मदद के लिए भेज दिया। दुष्ट रावण साधु के भेष में इस अवसर के लिए तैयार बैठा था। लक्ष्मण के जाते ही उसने सीता का हरण कर लिया। राम और लक्ष्मण सीता की खोज में निकल पड़े। रास्ते में हनुमान से भेंट हुई और सुग्रीव से मित्रता भी। सुग्रीव ने अपनी पूरी वानर सेना को सीता माता की खोज में लगा दिया। हनुमान ने सीता माता को लंका में खोज निकाला।

राम और रावण का युद्ध

सीता का पता चलते ही राम और लक्ष्मण ने सुग्रीव की पूरी वानर सेना को लेकर लंका पर आक्रमण कर दिया। रावण के भाई कुंभकर्ण और उसके पुत्र राम और लक्ष्मण के हाथों मारे गए। अंत में रावण भी राम के हाथों मारा गया। विभीषण को लंका का नया राजा बना कर सीता माता को अशोक वाटिका से लाया गया। तब तक चौदह वर्ष पूर्ण हो गए थे।

राम, सीता को लेकर अयोध्या वापस लौट आए। जहाँ उनका राजतिलक महर्षि वशिष्ठ ने किया। पूरी प्रजा राम के राजा बने पर प्रसन्न हुई। हर तरफ खुशी का उत्सव मनाया गया। अयोध्या में अब राम राज्य स्थापित हो गया था। हनुमान भी राम की सेवा के लिए अयोध्या में ही रहे। पूरा परिवार खुशी के सागर में डूब गया।