एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 3 स्वावलम्बनम्‌

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 3 स्वावलम्बनम्‌ – तृतीय: पाठ: स्वावलम्बनम्‌ के प्रश्न उत्तर तथा अन्य छोटे बड़े प्रश्नों के उत्तर विद्यार्थी सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को विस्तार से पीडीएफ तथा विडियो के रूप में दिया गया है। साथ ही पाठ का हिंदी रूपांतरण – संस्कृत हिंदी अनुवाद भी दिया गया है ताकि पूरे पाठ को कहानी की तरह हिंदी में भी समझा जा सके।

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एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 संस्कृत तृतीय: पाठ: स्वावलम्बनम्‌

कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 3 स्वावलम्बनम्‌ का हिंदी अनुवाद

संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
कृष्णमूर्ति: श्रीकण्ठश्च मित्रे आस्ताम्‌।कृष्णमूर्ति और श्रीकण्ठ दो मित्र थे।
श्रीकण्ठस्य पिता समृद्ध: आसीत्‌।श्रीकण्ठ के पिता धनवान् थे।
अत: तस्य भवने सर्वविधानि सुख-साधनानि आसन्‌।इसलिए उसके घर में सब प्रकार सुख-साधन थे।
तस्मिन्‌ विशाले भवने चत्वारिंशत्‌ स्तम्भा: आसन्‌।उस बड़े घर में चालीस खम्भे थे।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
तस्य अष्टादश-प्रकोष्ठेषु पञ्चाशत्‌ गवाक्षा:,वहाँ अठारह कमरों में पचास खिड़कियाँ
चतुश्चत्वारिंशत्‌ द्वाराणि, षट्‌त्रिंशत्‌ विद्युत्‌-व्यजनानि च आसन्‌।चवालीस वाजे और छत्तीस पंखे थे।
तत्र दश सेवका: निरन्तरं कार्यं कुर्वन्ति स्म।वहाँ दस नौकर हमेशा (लगातार) काम करते रहते थे
परं कृष्णमूर्ते: माता पिता च निर्धनौ कृषकदम्पती।परन्तु कृष्णमूर्ति के माता और पिता जी किसान पति-पत्नी थे।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
तस्य गृहम्‌ आडम्बरविहीनं साधारणञ्च आसीत्‌।उसका घर आडम्बर (दिखावा) रहित और साधारण था।
एकदा श्रीकण्ठ: तेन सह प्रात: नववादने तस्य गृहम्‌ अगच्छत्‌।एक बार श्रीकण्ठ उसके साथ सवेरे नौ बजे उसके घर गया।
तत्र कृष्णमूर्ति: तस्य माता पिता च स्वशक्त्या श्रीकण्ठस्य आतिथ्यम्‌ अकुर्वन्‌।वहाँ कृष्णमूर्ति और उसके माता पिता जी ने अपने सामर्थ्य से श्रीकण्ठ का अतिथि सत्कार किया।
एतत्‌ दृष्ट्‌वा श्रीकण्ठ: अकथयत्‌- ‘‘मित्र! अहं भवतां सत्कारेण सन्तुष्टोऽस्मि।यह देखकर श्रीकण्ठ ने कहा-“मित्र! मैं तुम्हारे सत्कार से सन्तुष्ट हूँ।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
केवलम्‌ इदमेव मम दु:खं यत्‌ तव गृहे एकोऽपि भृत्य: नास्ति।केवल यह बात मुझे दुःखी कर रही है कि तुम्हारे घर में एक भी सेवक नहीं है।
मम सत्काराय भवतां बहु कष्टं जातम्‌।मम सत्काराय भवतां बहु कष्टं जातम्‌।
मम गृहे तु बहव: कर्मकरा: सन्ति।’’मेरे घर में तो बहुत से सेवक हैं।”
तदा कृष्णमूर्ति: अवदत्‌-‘‘मित्र! ममापि अष्टौ कर्मकरा: सन्ति।तब कृष्णमूर्ति बोला- “मित्र! मेरे भी आठ नौकर हैं।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
ते च द्वौ पादौ, द्वौ हस्तौ, द्वे नेत्रे, द्वे श्रोत्रे इति।और वे दो पैर, दो हाथ, दो आँखें और दो कान हैं।
एते प्रतिक्षणं मम सहायका:।ये हर पल मेरे सहायक हैं।
किन्तु तव भृत्या: सदैव सर्वत्र च उपस्थिता: भवितुं न शक्नुवन्ति।परन्तु तुम्हारे नौकर सदा सब जगह उपस्थित नहीं हो सकते।
त्वं तु स्वकार्याय भृत्याधीन:।तुम तो अपने कार्य के लिए अपने सेवकों के अधीन हो।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
यदा यदा ते अनुपस्थिता:, तदा तदा त्वं कष्टम्‌ अनुभवसि।जब-जब वे अनुपस्थित होते हैं, तब तब तुम कष्ट का अनुभव करते हो।
स्वावलम्बने तु सर्वदा सुखमेव, न कदापि कष्टं भवति।’’स्वावलम्बन से तो हमेशा सुख ही है, कभी कष्ट नहीं होता है।“
श्रीकण्ठ: अवदत्‌-‘‘मित्र! तव वचनानि श्रुत्वा मम मनसि महती प्रसन्नता जाता।श्रीकण्ठ बोला—”मित्र! तुम्हारे वचनों को सुनकर मेरे मन में बहुत प्रसन्नता हुई।
अधुना अहमपि स्वकार्याणि स्वयमेव कर्तुम्‌ इच्छामि।’’अब मैं भी अपनाकाम स्वयं ही करूँगा ।”
भवतु, सार्धद्वादशवादनमिदम्‌। साम्प्रतं गृहं चलामि।काम ठीक है। अब साढ़े बारह बजे हैं। मैं अब घर चलता हूँ।
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