एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 2 दुर्बुद्धि: विनश्यति

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 2 दुर्बुद्धि: विनश्यति – द्वितीय: पाठ: दुर्बुद्धि: विनश्यति अभ्यास के प्रश्न उत्तर सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए संशोधित किए गए हैं। पाठ 2 का हिंदी मीडियम अनुवाद भी प्रश्नोंत्तर के साथ साथ दिए गए हैं जिससे पाठ को समझने में आसानी होगी। कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 2 के प्रश्न उत्तर बिना किसी पंजीकरण अथवा लॉग इन के प्रयोग किए जा सकते हैं। सभी विषयों के एनसीईआरटी समाधान मुफ़्त में प्रयोग किए जा सकते हैं।

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 संस्कृत द्वितीय: पाठ: दुर्बुद्धि: विनश्यति

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कक्षा 7 संस्कृत अध्याय 2 दुर्बुद्धि: विनश्यति का हिंदी अनुवाद

संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
अस्ति मगधदेशे फुल्लोत्पलनाम सर:।मगध प्रदेश में फुल्लोत्पल नामक तालाब था।
तत्र संकटविकटौ हंसौ निवसत:।वहाँ संकट और विकट नामक दो हंस रहते थे।
कम्बुग्रीवनामक: तयो: मित्रम्‌ एक: कूर्म: अपि तत्रैव प्रतिवसति स्म।कम्बुग्रीव नामक उन दोनों का मित्र एक कछुआ भी वहीं रहता था।
अथ एकदा धीवरा: तत्र आगच्छन्‌।एक बार कुछ मछुआरे वहाँ आए।
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
ते अकथयन्‌ -“वयं श्व: मत्स्यकूर्मादीन्‌ मारयिष्याम:।”उन्होंने कहा – कल हम सब मछली, कछुए आदि को मरेंगे।
एतत्‌ श्रुत्वा कूर्म: अवदत्‌ मित्रे! किं युवाभ्यां धीवराणां वार्ता श्रुता?यह सुनकर कछुआ अपने मित्र से बोला – क्या तुमने मछुआरों की बातचीत सुनी?
अधुना किम्‌ अहं करोमि?अब मैं क्या करूँ?
हंसौ अवदताम्‌ – “प्रात: यद्‌ उचितं तत्कार्ताव्यम्‌।दोनों हंस बोले – सुबह जो उचित हो, वह करना चाहिए।
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
कूर्म : अवदत्‌- ‘‘मैवम्‌। कछुआ बोला- “ऐसा मत करो,
तद्‌ यथाऽहम्‌ अन्यं ह्रदं गच्छामि तथा कुरुतम।‌’’ जिससे मैं दुसरे तालाब पर जा सकूँ, वैसा करो|”
हंसौ अवदताम्‌-‘‘आवां किं करवाव?दोनों हंस बोले “हम दोनों क्या करे|”
’’कूर्म: अवदत्‌- ‘‘अहं युवाभ्यां सह आकाशमार्गेण अन्यत्र गन्तुम्‌ इच्छामि।’’कछुआ बोला मैं तुम दोनों के साथ आकाश-मार्ग से दुसरे स्थान पर जाने की इच्छा करता हूँ ।”
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
हंसौ अवदताम्‌- ‘‘अत्र क: उपाय:?’’हंस बोले- “ यहाँ क्या उपाय है?”
कच्छप: वदति-‘‘युवां काष्ठदण्डम्‌ एकं चञ्च्वा धारयताम्‌। कछुआ बोला: तुम दोनों एक लकड़ी के डंडे को चोंच से पकड़ों |
अहं काष्ठदण्डमध्ये अवलम्ब्य युवयो: पक्षबलेन सुखेन गमिष्यामि।’’ मैं लकड़ी के डंडे के बीच में लटककर तुम दोनों के पंखों के बल से सुखपूर्वक आराम से जाउँगा |”
हंसौ अकथयताम्‌- ‘‘सम्भवति एष: उपाय:। हंस बोले- “ यह उपाय हो सकता है |
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
किन्तु अत्र एक: अपायोऽपि वर्तते। परन्तु यहाँ एक हानि भी है।
आवाभ्यां नीयमानं त्वामवलोक्य जना: किञ्चिद्‌ वदिष्यन्ति एव। हम दोनों के द्वारा ले जाए जाते हुए तुन्हें देखकर लोग कुछ बोलेंगे ही।
यदि त्वमुत्तरं दास्यसि तदा तव मरणं निश्चितम्‌।यदि तुम उत्तर दोगे तब तुम्हारा मरना निश्चित ही है।
अत: त्वम्‌ अत्रैव वस।’’इसलिए तुम यहीं रहों !”
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
तत्‌ श्रुत्वा क्रुद्ध: कूर्म: अवदत्‌- ‘‘किमहं मूर्ख:? उत्तरं न दास्यामि। वह सुनकर क्रोधित कछुआ बोला- “क्या मैं मुर्ख हूँ? उत्तर नहीं दूँगा।
किञ्चिदपि न वदिष्यामि।’’ अत: अहं यथा वदामि तथा युवां कुरुतम्‌।कुछ भी नहीं बोलूँगा |” इसलिए जैसा कहता हूँ वैसा तुम दोनों करों।
एवं काष्ठदण्डे लम्बमानं कूर्मं पौरा: अपश्यन्‌। पश्चाद्‌ अधावन्‌ अवदन्‌ च- ‘‘हंहो! महदाश्चर्यम्‌।इस प्रकार लकड़ी के डंडे पर लटके हुए कछुए को देखकर ग्वाले पीछे दोड़े और बोले- “अहा ! बहुत अचम्भा है !
हंसाभ्यां सह कूर्मोऽपि उड्‌डीयते।’’ हंसों के साथ कछुआ भी उड़ रहा है।’’
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
कश्चिद्‌ वदति- ‘‘यद्ययं कूर्म: कथमपि निपतति तदा अत्रैव पक्त्वा खादिष्यामि।’’ कोई बोला- “ यदि यह कछुआ किसी भी तरह गिरता है, तब यहीं पकाकर खाऊँगा।’’
अपर: अवदत्‌- ‘‘सरस्तीरे दग्ध्वा खादिष्यामि।’’ दूसरा बोला- “ तालाब के किनारे पर पकाकर खाऊँगा।’’
अन्य: अकथयत्‌- ‘‘गृहं नीत्वा भक्षयिष्यामि’’ इति। अन्य ने कहा- “ घर ले जाकर खाऊँगा।’’
तेषां तद्‌ वचनं श्रुत्वा कूर्म: क्रुद्ध: जात:। उनके उस वचन सुनकर कछुआ क्रोधित हो गया।
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
मित्राभ्यां दत्तं वचनं विस्मृत्य स: अवदत्‌- ‘‘यूयं भस्म खादत।’’ मित्रों को दिए गए वचन को भूलकर, वह बोला- “ तुम सब राख खाओ।’’
तत्क्षणमेव कूर्म: दण्डात्‌ भूमौ पतित:। पौरै: स: मारित:। उसी क्षण कछुआ डंडे से भूमि पर गिर गया और ग्वालों के द्वारा मार दिया गया।
अत एवोक्तम्‌- इसलिए कहा गया है-
सुहृदां हितकामानां वाक्यं यो नाभिनन्दति।कल्याण की इच्छा रखनेवाले मित्रों के वचन को जो प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार नहीं करता हैं।
स कूर्म इव दुर्बुद्धि: काष्ठाद्‌ भ्रष्टो विनश्यति॥वह लकड़ी से गिरे हुए दुष्टबुद्धि कछुए के समान नष्ट होता है।
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