एनसीईआरटी समाधान कक्षा 4 हिंदी अध्याय 7 दान का हिसाब

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 4 हिंदी रिमझिम अध्याय 7 दान का हिसाब के प्रश्न उत्तर तथा रिक्त स्थानों की पूर्ति आदि प्रश्नों के उत्तर सीबीएसई सत्र 2024-25 के लिए यहाँ से प्राप्त किए जा सकते हैं। कक्षा 4 हिंदी रिमझिम पाठ 7 में एक ऐसे राजा की कहानी दी गई है जो बहुत कंजूस था परन्तु एक संयासी से अपनी होशियारी से जनता के लिए 50 हजार का दान करने के लिए मजबूर कर दिया। कहानी शुरू से अंत तक बच्चों को बहुत अच्छी लगती है।

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 4 हिंदी रिमझिम अध्याय 7

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कक्षा 4 हिंदी अध्याय 7: कहानी का सारांश

यह कहानी एक कंजूस राजा की है। राजा अपने एशो आराम पर खूब पैसे खर्च करता था लेकिन दान पुन्य के नाम पर उसकी मुठी बंद हो जाती थी। राजा के पास कभी कोई याचक, विद्वान, भिखारी आदि नहीं आते थे क्योंकि उन्हें पता था कि राजा से कुछ भी नहीं मिलेगा। एक बार राज्य के एक भाग में अकाल पड़ गया जिससे प्रजाजनों के भूखे मरने की नौबत आ गयी। राजा के पास आकार उन्होंने अपनी व्यथा सुनाई पर राजा उनकी सहायता के लिए तैयार नहीं हुआ। तब लोगों की दुर्दशा देखकर एक दिन एक सन्यासी राजा के पास और उसकी दानवीरता की झूठी प्रशंसा करते हुए राजा से दान देने के लिए कहा। क्योंकि राजा कंजूस था इसलिए सन्यासी से पहले ही पूछ लिया कि थोड़ा दान चाहिए तो मिल सकता है। सन्यासी ने राजा से कहा कि मुझे ज्यादा की जरुरत नहीं है मुझे केवल बीस दिन तक इस तरह से दान दीजिये जैसे आज एक रुपये कल उसका दोगुना, तीसरे दिन दूसरे दिन का दोगुना और बीसवें दिन, उन्नीसीवें दिन का दो गुना। राजा इसके लिए तुरंत तैयार हो गया। दो हप्ते तक तो सब ठीक चलता रहा लेकिन जैसे-जैसे दिन बढ़ते गए दान की रकम बढ़ती जा रही थी।

भंडारी की चिंता बढ़ती जा रही थी उसने पूरा हिसाब लगाया तो हक्का-बक्का रह गया दौड़ा हुआ तुरंत मंत्री के पास गया। मंत्री ने सारी बात सुनी तो वह भी परेशान हो गया क्योंकि बीस दिन का पूरा हिसाब दस लाख अड़तालीस हजार पांच सौ पिछ्तर रुपये। जो राजा अकाल से परेशान प्रजाजनों को दस हजार भी देने को तैयार नहीं था उसके खजाने से दस लाख से ज्यादा की धनराशी दान में जाने वाली थी। मंत्री ने जब हिसाब का कागज राजा को दिखाया तो राजा बेहोश हो गया। होश में आने पर राजा ने सन्यासी को बुलवा लिया, सन्यासी के आते ही राजा सन्यासी के पैरों पर गिर पड़ा और कहने लगा कि कृपया मुझे मेरे वचन से मुक्त कीजिये। सन्यासी ने कहा राजन मुझे अकाल पीड़ितों के लिए पचास हजार रुपये चाहिए उसके बाद मैं समझूंगा कि मेरा पूरा दान मुझे मिल गया। राजा को प्रजाजनों की पुरानी बात याद आई जब वो लोग दस हजार रुपये मांग रहे थे। राजा ने यही प्रार्थना सन्यासी से की क्या दस हजार से बात नहीं बनेगी पर सन्यासी अपनी बात पर अड़ा रहा अंत में राजा को पचास हजार रुपये सन्यासी को देने पड़े। पूरे राज्य में खबर फ़ैल गयी कि राजा ने पचास हजार अकाल पीड़ितों के लिए दिए हैं। सभी ने राजा के दानवीरता की जय-जयकार की।

राजा किसी को भी दान क्यों नहीं देना चाहता था?

उत्तर:
राजा कंजूस था अपने ऐशो आराम के अलावा वो पैसे खर्च नहीं करना चाहता था।

संन्यासी ने सीधे-सीधे शब्दों में भिक्षा क्यों नहीं माँग ली?

उत्तर:
सन्यासी को पत्ता था कि राजा सीधे बड़ी रकम नहीं देगा इसलिए सन्यासी को ये तरकीब इस्तेमाल करनी पड़ी।

राजा को संन्यासी के आगे गिड़गिड़ाने की ज़रूरत क्यों पड़ी?

उत्तर:
राजा को जब दान की पूरी रकम का पता चला तो उसके होश उड़ गए थे इतनी बड़ी रकम देने में अपनी असमर्थता जताते हुए राजा ने सन्यासी के पैर पकड़ लिए थे।

कक्षा 4 हिन्दी का अध्याय 7 को छात्र कितने समय में तैयार कर सकते हैं?

कहानी थोड़ी सी लम्बी है इसलिए इस अध्याय को अच्छी तरह से तैयार करने के लिए दो दिन का समय पर्याप्त रहेगा।

कक्षा 4 हिन्दी अध्याय 7 को छात्र आसानी से तैयार कर सकते हैं?

कहानी अच्छी है लेकिन लम्बी होने की वजह से ध्यान से पढ़ना पढ़ेगा तथा समय भी अधिक लगेगा। कह सकते हैं कि पाठ न तो ज्यादा मुश्किल है और न आसन कह सकते हैं।

क्या हिन्दी कक्षा 4 के अध्याय 7 छात्रों के लिए रुचिकर है?

कहानी अच्छी और ज्ञानवर्धक है तथा सभी के कुछ अच्छे सन्देश भी लेकर आती है। लम्बी होने के बावजूद कहानी को पूरा पढ़ने का अवश्य मन करेगा।

हिन्दी कक्षा 4 के अध्याय 7 को पढ़ते समय किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए है?

सारी कहानी को एक बार में ही रट लेना शायद मुश्किल होगा लेकिन अगर इसको छोटे हिस्सों में तोड़कर पढेंगे तो याद करने में आसानी होगी तथा कठिन शब्दों के अर्थ अवश्य लिखें।