एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 लौहतुला

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 लौहतुला शेमुषी भाग एक के प्रश्न उत्तर और पाठ का सारांश, हिंदी अनुवाद सहित विद्यार्थी यहाँ से निशुल्क प्राप्त कर सकते हैं। पाठ को अच्छी तरह समझाने के लिए पूरे अध्याय का हिंदी में अनुवाद व्याख्या सहित दिया गया है ताकि किसी भी छात्र को कोई दिक्कत न हो। पाठ के संस्कृत हिंदी अनुवाद की मदद से कक्षा 9 के छात्र सभी प्रश्नों के उत्तर अपने शब्दों में सरलता से बना सकते हैं।

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 8 के लिए एनसीईआरटी समाधान

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संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
आसीत्‌ कस्मश्चिद्‌ अधिष्ठाने जीर्णधनो नाम वणिक्पुत्र:। किसी स्थान पर जीर्णधन नामक एक बनिए का पुत्र था।
स च विभवक्षयात्‌ देशान्तरं गन्तुमिच्छन्‌ व्यचिन्तयत्‌धन की कमी के कारण विदेश जाने की इच्छा से उसने सोचा
यत्र देशेऽथवा स्थाने भोगा भुक्ता: स्ववीर्यत:।जिस देश अथवा स्थान पर अपने पराक्रम से भोग भोगे जाते हैं
तस्मिन्‌ विभवहीनो यो वसेत्‌ स पुरुषाधम:॥वहाँ धन-ऐश्वर्य से हीन रहने वाला मनुष्य नीच पुरुष होता है।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तस्य च गृहे लौहघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुला आसीत्‌। उसके घर पर उसके पूर्वजों द्वारा खरीदी गई लोहे से बनी हुई एक तराजू थी।
तां च कस्यचित्‌ श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थित:। उसे किसी सेठ के घर धरोहर के रूप में रखकर वह दूसरे देश को चला गया।
तत: सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुन: स्वपुरम्‌तब लंबे समय तक इच्छानुसार दूसरे देश में घूमकर वापस अपने देश
आगत्य तं श्रेष्ठिनम्‌ अवदत्‌-‘‘भो: श्रेष्ठिन्‌! दीयतां मे सा निक्षेपतुला।’’ आकर उसने सेठ से कहा- “हे सेठ ! धरोहर के रूप मे रखी मेरी वह तराजू दे दो।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
सोऽवदत्‌-‘‘भो:! नास्ति सा, त्वदीया तुला मूषकै: भक्षिता’’ इति।उसने कहा- “अरे! वह तो नहीं है, तुम्हारी तराजू को चूहे खा गए।
जीर्णधन: अवदत्‌-‘‘भो: श्रेष्ठिन्‌! नास्ति दोषस्ते, यदि मूषकै: भक्षिता। जीर्णधन ने कहा- “हे सेठ! यदि उसको चूहे खा गए तो इसमें तुम्हारा दोष नहीं है।
ईदृश: एव अयं संसार:। यह संसार ही ऐसा है।
न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति।यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं है।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
परमहं नद्यां स्नानार्थं गमिष्यामि। किंतु मैं नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ।
तत्‌ त्वम्‌ आत्मीयं एनं शिशुं धनदेवनामानं मया सह स्नानोपकरणहस्तं प्रेषय” इति।खैर, तुम धनदेव नामक अपने इस पुत्र को स्नान की वस्तुएँ हाथ में लेकर मेरे साथ भेज दो।”
स श्रेष्ठी स्वपुत्रम्‌ अवदत्‌-‘‘वत्स! पितृव्योऽयं तव, स्नानार्थं यास्यति, तद्‌ अनेन साकं गच्छ’’ इति।उस सेठ ने अपने पुत्र से कहा- “पुत्र! ये तुम्हारे चाचा हैं, स्नान के लिए जा रहे हैं, तुम इनके साथ जाओ।
अथासौ श्रेष्ठिपुत्र: धनदेव: स्नानोपकरणमादाय प्रहृष्टमना: तेन अभ्यागतेन सह प्रस्थित:।इस तरह वह बनिए का पुत्र धनदेव स्नान की वस्तुएँ लेकर प्रसन्न मन से उस अतिथि के साथ चला गया।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तथानुष्ठिते स वणिव्‌ स्नात्वा तं शिशुं गिरिगुहायां प्रक्षिप्य, तद्‌द्वारं बृहत्‌शिलया पिधाय सत्त्वरं गृहमागत:।तब वहाँ पुहँचकर और स्नान करके उस शिशु को पर्वत की गुफा में रखकर उसने गुफा के द्वार को एक बड़े पत्थर से ढक कर जल्दी से घर आ गया।
स: श्रेष्ठी पृष्टवान्‌-‘‘भो:! अभ्यागत! कथ्यतां कुत्र मे शिशु: य: त्वया सह नदीं गत:’’? इति।और उस सेठ ने पूछा- हे अतिथि! बताओ कहाँ है मेरा पुत्र, तुम्हारे साथ नदी पर गया था।
स अवदत्‌-‘‘तव पुत्र: नदीतटात्‌ श्येनेन हृत:’ इति। वह बोला- “तुम्हारे बेटे को नदी के किनारे से बाज उठाकर ले गया है”।
श्रेष्ठी अवदत्‌ – ‘‘मिथ्यावादिन्‌! किं क्वचित्‌ श्येनो बालं हर्तुं शक्नोति?सेठ ने कहा- “हे झूठे! क्या कहीं बाज बालक को ले जा सकता है?
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तत्‌ समर्पय मे सुतम्‌ अन्यथा राजकुले निवेदयिष्यामि।’’ इति।तो मेरा पुत्र लौटा दो अन्यथा मैं राजा से शिकायत करूँगा।”
सोऽकथयत्‌-‘‘भो: सत्यवादिन्‌! यथा श्येनो बालं न नयति, तथा मूषका अपि लौहघटितां तुलां न भक्षयन्ति। उसने कहा- “हे सत्य बोलने वाले! जैसे बाज बालक को नहीं ले जा सकता, वैसे ही चूहे भी लोहे की बनी हुई तराजू नहीं खाते हैं।
तदर्पय मे तुलाम्‌, यदि दारकेण प्रयोजनम्‌।’’ इति।यदि पुत्र को पाना चाहते हो तो मेरी तराजू लौटा दो।
एवं विवदमानौ तौ द्वावपि राजकुलं गतौ। इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों राजा के पास गए।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तत्र श्रेष्ठी तारस्वरेण अवदत्‌-“भो:! वञ्चितोऽहम्‌! वञ्चितोऽहम्‌! अब्रह्मण्यम्‌! अनेन चौरेण मम शिशु: अपहृत:’ इति।वहाँ सेठ ने जोर से कहा- “अरे! अनुचित हो गया! मेरे पुत्र को इस चोर ने चुरा लिया”
अथ धर्माधिकारिण: तम्‌ अवदन्‌ -‘‘भो:! समर्प्यतां श्रेष्ठिसुत:’’।इसके बाद न्यायकर्त्ताओं ने उनसे कहा- “अरे! सेठ का पुत्र लोटा दो।
सोऽवदत्‌-‘‘किं करोमि? उसने कहा- “ मैं क्या करूँ?
पश्यतो मे नदीतटात्‌ श्येनेन शिशु: अपहृत:’’। इति।मेरे देखते-देखते बाज बालक को नदी के तट (किनारे) से ले गया।“
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तच्छ्रुत्वा ते अवदन्‌- भो: ! भवता सत्यं नाभिहितम्‌- किं श्यने: शिशुं हर्तुं समर्थो भवति?यह सुनकर सब बोले- अरे! आपने सच नहीं कहा- क्या बाज बालक को ले जा सकता है?
सोऽवदत्‌-भो: भो:! श्रूयतां मद्‌वच:-उसने कहा- अरे, अरे! मेरी बात सुनिए-
तुलां लौहसहस्रस्य यत्र खादन्ति मूषका:।हे राजन्! जहाँ लोहे से बनी तराजू को चूहे खा जाते हैं।
राजन्तत्र हरेच्छ्‌येनो बालकं, नात्र संशय:॥वहाँ बाज बालक को उठाकर ले जा सकता है. इसमें संदेह नहीं।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
ते अपृच्छन्‌-‘‘कथमेतत्‌’’।उन्होंने कहा-“यह कैसे हो सकता है।
तत: स श्रेष्ठी सभ्यानामग्रे आदित: सर्वं वृत्तान्तं न्यवेदयत्‌। इसके बाद उस सेठ ने सभासदों के सामाने शुरू से ही सारी घटना कह दी।
तत:, न्यायाधिकारिण: विहस्य, तौ द्वावपि सम्बोध्य तुला-शिशुप्रदानेन तोषितवन्त:।तब हँसकर उन्होंने दोनों को समझा बुझाकर तराजू तथा बालक का आदान-प्रदान करके उन दोनों को प्रसन्न किया।
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