एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 कल्पतरु:

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 कल्पतरु: शेमुषी भाग एक में अभ्यास के प्रश्न उत्तर और अन्य प्रश्नों के उत्तर सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ से निशुल्क प्राप्त किए जा सकते हैं। संस्कृत के हिंदी अनुवाद से छात्रों को पूरे पाठ को समझने में आसानी होती है इसलिए 9वीं कक्षा के पाठ 4 के हल के साथ साथ अध्याय का हिंदी अनुवाद सरल भाषा में यहाँ दिया गया है। पठन सामग्री को प्राप्त करने के लिए किसी लॉग इन की कोई आवश्यकता नहीं है।

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 के लिए एनसीईआरटी समाधान

एनसीईआरटी कक्षा 9 समाधान

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संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
अस्ति हिमवान्‌ नाम सर्वरत्नभूमि: नगेन्द्र:। सब रत्नों की भूमि, पर्वतों में श्रेष्ठ हिमालय नामक पर्वत है।
तस्य सानो: उपरि विभाति कञ्चनपुरं नाम नगरम्‌।उसके शिखर (चोटी) पर कंचनपुर नामक नगर सुशोभित है।
तत्र जीमूतकेतु: इति श्रीमान्‌ विद्याधरपति: वसति स्म। वहाँ विद्याधरों के राजा श्रीमान जीमूतकेतु रहते थे।
तस्य गृहोद्याने कुलक्रमागत: कल्पतरु: स्थित:। उनके घर (महल) के बगीचे में वंश परंपरा से आ रहा कल्पवृक्ष था।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
स राजा जीमूतकेतु: तं कल्पतरुम्‌ आराध्य तत्प्रसादात्‌ च बोधिसत्वांशसम्भवं जीमूतवाहनं नाम पुत्रं प्राप्नोत्‌। उस राजा ने उस कल्पवृक्ष की आराधना करके और उसकी कृपा से बोधिसत्व के अंश से उत्पन्न जीमूतवाहन नामक पुत्र को प्राप्त किया।
स: जीमूतवाहन: महान्‌ दानवीर: सर्वभूतानुकम्पी च अभवत्‌।वह महान, दानवीर और सभी प्राणियों पर कृपा करने वाला हुआ।
तस्य गुणै: प्रसन्न: स्वसचिवैश्च प्रेरित: राजा कालेन सम्प्राप्तयौवनं तं यौवराज्ये अभिषिक्तवान्‌।उसके गुणों से प्रसन्न और अपने मंत्रियों से प्रेरित राजा ने समय पर जवानी को प्राप्त उसे (राजकुमार को) युवराज के पद पर अभिषिक्त किया।
कदाचित्‌ हितैषिण: पितृमन्त्रिण: यौवराज्ये स्थितं तं जीमूतवाहनम्‌ उक्तवन्त:- युवराज पद पर बैठे हुए उस जीमूतवाहन को (एक बार) किसी समय हितकारी पिता के मंत्रियों ने कहा
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
“युवराज! योऽयं सर्वकामद: कल्पतरु: तवोद्याने तिष्ठति स तव सदा पूज्य:। जो यह सब कामनाओं को पूरा करने वाला कल्पवृक्ष आपके बगीचे में खड़ा है, वह आपके लिए सदैव पूज्य है।
अस्मिन्‌ अनुकूले स्थिते सति शक्रोऽपि अस्मान्‌ बाधितुं न शक्नुयात्‌” इति।इसके अनुकूल होने पर इंद्र भी हमें दुखी नहीं कर सकता है”।
एतत्‌ आकर्ण्य जीमूतवाहन: अचिन्तयत्‌ यह सुनकर जीमूतवाहन ने मन में सोचा
“अहो ईदृशम्‌ अमरपादपं प्राप्यापि अस्माकं पूर्वै: पुरुषै: किमपि तादृशं फलं न प्राप्तम्‌। अरे ऐसे अमर पौधे को प्राप्त करके भी हमारे पूर्वजों के द्वारा वैसा कोई भी फल नहीं प्राप्त किया गया
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
किन्तु केवलं कैश्चिदेव कृपणै: कश्चिदेव अर्थ: अर्थित:। किंतु केवल कुछ ही कंजूसों ने ही कुछ धन प्राप्त किया।
तदहम्‌ अस्मात्‌ कल्पतरो: अभीष्टं साधयामि” इति। इस कल्पवृक्ष से तो मैं अपनी प्रिय इच्छा को पूरी करूँगा।
एवम्‌ आलोच्य स: पितु: अन्तिकम्‌ आगच्छत्‌। ऐसा सोचकर वह पिता के पास आया।
आगत्य च सुखमासीनं पितरम्‌ एकान्ते न्यवेदयत्‌- वहाँ आकर सुखपूर्वक बैठे हुए पिता को एकान्त में निवेदन किया
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
“तात! त्वं तु जानासि एव यदस्मिन्‌ संसारसागरे आशरीरम्‌ इदं सर्वं धनं वीचिवत्‌ चञ्चलम्‌। आप तो जानते ही हैं कि इस संसार रूपी सागर में इस शरीर से लेकर सारा धन लहरों की तरह चंचल है।
एक: परोपकार एव अस्मिन्‌ संसारे अनश्वर: यो युगान्तपर्यन्तं यश: प्रसूते। एक परोपकार ही इस संसार में अनश्वर (नष्ट नहीं होने वाला) है जो युगों तक यश पैदा करता (देता) है।
तद्‌ अस्माभि: ईदृश: कल्पतरु: किमर्थं रक्ष्यते? यैश्च पूर्वैरयं ‘मम मम’ इति आग्रहेण रक्षित:, ते इदानीं कुत्र गता:? तो हम ऐसे कल्पवृक्ष की किसलिए रक्षा करते हैं? और जिन पूर्वजों के द्वारा यह (मेरा-मेरा) इस आशा से रक्षा किया गया, वे (पूर्वज) इस समय कहाँ गए?
तेषां कस्यायम्‌?उनमें से किसका यह है?
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
अस्य वा के ते? अथवा इसके वे कौन हैं?
तस्मात्‌ परोपकारैकफलसिद्धये त्वदाज्ञया इमं कल्पपादपम्‌ आराधयामि।तो परोपकार के एकमात्र फल की सिद्धि (प्राप्ति) के लिए आपकी आज्ञा से इस कल्पवृक्ष की आराधना करता हूँ।
अथ पित्रा ‘तथा’ इति अभ्यनुज्ञात: स जीमूतवाहन: कल्पतरुम्‌ उपगम्य उवाच – इसके बाद पिता के द्वारा ‘वैसा ही करो’ ऐसी आज्ञा प्राप्त किया हुआ, वह जीमूतवाहन कल्पवृक्ष के पास आकर बोला
“देव! त्वया अस्मत्पूर्वेषाम्‌ अभीष्टा: कामा: पूरिता:, तन्ममैकं कामं पूरय। हे देव (भगवन्)। आपने हमारे पूर्वजों की सारी प्रिय कामनाएँ पूर्ण की हैं, तो मेरी एक कामना को पूर कीजिए।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
यथा पृथिवीम्‌ अदरिद्राम्‌ पश्यामि, तथा करोतु देव’’ इति। जैसे पृथ्वी पर गरीबों को न देखूँ वैसे आप भगवन् कीजिए”।
एवंवादिनि जीमूतवाहने ‘‘त्यक्तस्त्वया एषोऽहं यातोऽस्मि” इति वाव्‌ तस्मात्‌ तरो: उदभूत्‌।इस प्रकार जीमूतवाहन के कहने पर “दूसरे द्वारा छोड़ दिया गया यह मैं जा रहा हूँ” इस प्रकार की आवाज़ उस पेड़ से हुई।
क्षणेन च स कल्पतरु: दिवं समुत्पत्य भुवि तथा वसूनि अवर्षत्‌ यथा न कोऽपि दुर्गत आसीत्‌।और क्षण भर में वह कल्पवृक्ष आकाश में उठकर भूमि पर वैसे रत्नों को बरसाने लगा, जिससे कोई भी दुर्गत (गरीब) नहीं रह गया।
ततस्तस्य जीमूतवाहनस्य सर्वजीवानुकम्पया सर्वत्र यश: प्रथितम्‌।उसके बद उस जीमूतवाहन की सभी जीवों पर कृपा करने के बाद सब जगह यश फैल गया।
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 कल्पतरु:
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 कल्पतरु:
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 कल्पतरु: