कक्षा 6 विज्ञान अध्याय 3 एनसीईआरटी समाधान – तंतु से वस्त्र तक

कक्षा 6 विज्ञान अध्याय 3 तंतु से वस्त्र तक एनसीईआरटी समाधान – सॉल्यूशंस ऑनलाइन अध्ययन सामाग्री से पढ़ें, विडियो देखकर समझें या पीडीएफ़ में डाउनलोड करके इसे ऑफलाइन प्रयोग करें। वर्ग 6 विज्ञान अध्याय 3 के लिए एनसीईआरटी समाधान को परिभाषाओं के माध्यम से विस्तृत रूप से समझाया गया है। विडियो में पाठ को समझते हुए एनसीईआरटी के प्रत्येक प्रश्न को ही हल किया गया है। आप कक्षा 6 विज्ञान के प्रश्न उत्तर तिवारी अकादमी कक्षा 6 विज्ञान ऐप से भी प्राप्त कर सकते हैं।

कक्षा 6 विज्ञान अध्याय 3 एनसीईआरटी समाधान

तंतु क्या होते है?

तंतु एक प्रकार के रेशे होते हैं जिससे तंतु या धागे बनाए जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं। जो तंतु पादपों या जंतुओं से प्राप्त होते हैं, उन्हें प्राकृतिक तंतु कहते हैं। जैसे कपास, रुई, जूट, रेशम तथा ऊन आदि।
जंतुओं से प्राप्त तंतु – रेशम तथा ऊन आदि।
पादपों से प्राप्त तंतु – रुई, कपास, जूट, पटसन आदि।

तंतु किसे कहते हैं?
तागे (धागे) जिन पतली इकाईयों (लड़ियों) से मिलकर बने होते हैं, उन्हें तंतु कहते हैं। कुछ वस्त्रों, जैसे सूती, जूट, रेशमी तथा ऊनी के तंतु पादपों तथा जंतुओं से प्राप्त होते हैं। इन्हें प्राकृतिक तंतु कहते हैं। रुई तथा जूट (पटसन) पादपों से प्राप्त होने वाले तंतुओं के उदाहरण हैं। ऊन तथा रेशम जंतुओं से प्राप्त होते हैं। ऊन, भेड़ अथवा बकरी की कर्तित ऊन से प्राप्त होती है। इसे खरगोश, याक तथा ऊँटों के बालों से भी प्राप्त किया जाता है। रेशमी तंतु रेशम-कीट कोकून से खींचा जाता है।

संश्लिष्ट तंतु किसे कहते हैं?
ऐसे तंतु जिनका स्रोत पादप अथवा जंतु नहीं हैं, बल्कि कुछ रासायनिक पदार्थ हो, संश्लिष्ट तंतु कहलाते हैं। पॉलिएस्टर, नायलानॅ आरै एक्रिलिक, संश्लिष्ट तंतुओं के कुछ उदाहरण हैं।

कक्षा 6 विज्ञान अध्याय 3 का अध्ययन तथा प्रश्न उत्तर

कपास – एक उपयोगी तंतु

कपास एक उपयोगी तंतु हैं जिसकी खेती में निम्नलिखित पदों का समावेश होता है:

    • (क) हमारे देश में कपास गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, हरियाणा और मध्य प्रदेश में उगाई जाती है।
    • (ख) फूलने पर, पीले-श्वेत रंग के फूल दिखाई देते हैं जो कुछ दिन पश्चात लाल रंग के प्रतीत होने लगते हैं और फिर वे अखरोट के आकार के हो जाते हैं जिन्हें ‘कपास का डोडा’ भी कहते हैं।
    • (ग) परिपक्व होने पर ये कपास के डोडे फट जाते हैं और श्वेत धागे बाहर निकल आते हैं।
    • (घ) श्वेत धागे, सूर्य के ताप से सूख जाते हैं और मुलायम रोंयेदार हो जाते हैं जिन्हें पौधे से सरलता से हाथों द्वारा उठाया जा सकता है।
    • (ङ) कपास धुनने की प्रक्रिया द्वारा; मशीनों की सहायता से या हाथों द्वारा कपास के धागों से बीजों को अलग कर दिया जाता है।
    • (च) धुनी हुई कपास को द्रवचालित दबाव डालने वाली मशीन द्वारा दबाकर बड़े गोलों में परिवर्तित किया जाता है जिन्हें फिर उद्योगों में भेज दिया जाता है।

कक्षा 6 विज्ञान अध्याय 3 के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

निम्नलिखित तंतुओं को प्राकृतिक तथा संश्लिष्ट में वर्गीकृत कीजिए। नायलॉन, ऊन, रुई, रेशम, पॉलिएस्टर, पटसन।

प्राकृतिक तंतु: ऊन, रुई, रेशम और पटसन।
संश्लिष्ट तंतु: नायलॉन और पॉलिएस्टर।

रुई तथा जूट (पटसन) पादप के किन भागों से प्राप्त होते हैं?

कपास के फलों से कपास प्राप्त की जाती है, जिसे कपास गोलक भी कहा जाता है। जूट का तंतु जूट के पौधे के तने से प्राप्त होता है।

नारियल तंतु से बनने वाली दो वस्तुओं के नाम लिखिए।

चटाई और रस्सियाँ।

तंतुओं से तागा निर्मित करने की प्रक्रिया स्पष्ट कीजिए।

तंतुओं से तागा बनाने की प्रक्रिया को कताई कहा जाता है। इस प्रक्रिया में, कपास के एक पुंज से रेशों को खींचकर ऐंठते हैं। ऐसा करने से रेशे पास-पास आ जाते हैं और तागा बन जाता है।
कताई के लिए तकली और चरखे जैसे सरल उपकरणों का उपयोग किया जाता है। बड़े पैमाने पर बड़ी कताई मशीनों का उपयोग किया जाता है।

रुई कहाँ से आती है?
कपास के पौधों को खेतों में उगाया जाता है उसी से रुई प्राप्त की जाती है। सामान्यतः कपास के पौधे वहाँ उगाए जाते हैं जहाँ की मृदा काली तथा जलवायु उष्ण होती है। कपास पादप के फल (कपास गोलक) लगभग नींबू की माप के होते हैं। पूर्ण परिपक्व होने पर बीज टूटकर खुल जाते हैं तथा अब कपास तंतुओं से ढके बिनौले (कपास बीज) दिखाई देने लगते हैं। इस समय खेत कपास के परिफुल्लों (रोवों) से इतना श्वेत हो जाता है जैसे हिम ने ढक लिया हो।

ओटना किसे कहते हैं?
साधारणतया कपास बॉलों से कपास को हस्त चयन द्वारा प्राप्त किया जाता है। इसके पश्चात कपास से बीजों को कंकतन द्वारा पृथक किया जाता है। इस प्रक्रिया को कपास ओटना कहते हैं। पारंपरिक ढंग से कपास हाथों से ओटी जाती थी। आजकल कपास ओटने के लिए मशीनों का उपयोग भी किया जाता है।

सिल्क – जंतुओं से प्राप्त होने वाला एक उपयोगी रेशा

एक अन्य प्राकृतिक धागा, रेशम का धागा है, जो रेशम के कीड़े ‘कोये’ से प्राप्त होता है। रेशमी कीड़ा अपने जीवन चक्र को चार चरणों में संपूर्ण करता है-अंडा, डिंभ, कीट-कोष एवं वयस्क डिंभ। डिंभ शहतूत के वृक्ष की पत्तियों को अपने भोजन के रूप में खाता है। जब डिंभ अपने अगले चरण कीट-कोष में प्रवेश करता है, तब वह रेशमी ग्रंथियों द्वारा उत्पन्न चिपचिपे द्रव्य द्वज्ञरा निर्मित लंबे धागों से अपने संपूर्ण शरीर को ढक लेता है। बाद में यह सख्त आवरण, जिसे कोया कहते हैं, में परिवर्तित हो जाता है। कोयों को एकत्रित किया जाता है और रेशमी धागों को प्राप्त कर लिया जाता है।

कताई किसे कहते हैं? इसकी विभिन्न युक्तियाँ क्या हैं?
रेशों से तागा बनाने की प्रक्रिया को कताई कहते हैं। इस प्रक्रिया में, रुई के एक पुंज से रेशों को खींचकर ऐंठते हैं। ऐसा करने से रेशे पास-पास आ जाते हैं और तागा बन जाता है। कताई के लिए एक सरल युक्ति ‘हस्त तकुआ’ का उपयोग किया जाता है जिसे तकली कहते हैं। हाथ से प्रचालित कताई में उपयोग होने वाली एक अन्य युक्ति चरखा है। वृहत्‌ पैमाने पर तागों की कताई का कार्य कताई मशीनों की सहायता से किया जाता है। कताई के पश्चात तागों का उपयोग वस्त्र बनाने में किया जाता है।

तागे से वस्त्र बनाने की प्रमुख विधियाँ कौन-कौन सी हैं?
तागे से वस्त्र बनाने की कई विधियाँ हैं। इनमें दो प्रमुख विधियाँ बुनाई तथा बंधाई हैं।

बुनाई किसे कहते हैं?
वस्त्र तागों के दो सेटों, जिन्हें एक साथ व्यवस्थित किया जाता है, से मिलकर बनते हैं। तागों के दो सेटों को आपस में व्यवस्थित करके वस्त्र बनाने की प्रक्रिया को बुनाई (वीविंग) कहते हैं। तागे बहुत पतले होते हैं इसलिए वस्त्रों की बुनाई हस्तप्रचालित होते हैं अथवा विद्युतप्रचालित करघों पर की जाती है।

पटसन तंतु कहाँ से प्राप्त किया जाता है? भारत में इसकी खेती कहाँ-कहाँ होती है?
पटसन तंतु को पटसन पादप के तने से प्राप्त किया जाता है। भारत में इसकी खेती वर्षा-ऋतु में की जाती है। भारत में पटसन को प्रमुख रूप से पश्चिम बंगाल, बिहार तथा असम में उगाया जाता है।

वस्त्र बनाने की लिए पटसन को किस प्रकार तैयार किया जाता है?
सामान्यत: पटसन पादप (फसल) को पुष्पन अवस्था में काटते हैं। फसल कटाई के पश्चात पादपों के तनों को कुछ दिनों तक जल में डुबाकर रखते हैं। ऐसा करने पर तने गल जाते हैं और उन्हें पटसन-तंतुओं से हाथों द्वारा पृथक कर दिया जाता है। वस्त्र बनाने से पहले इन सभी तंतुओं को तागों में परिवर्तित कर लिया जाता है।

रेशम की उपयोगिता

रेशमी कपड़ा एक महँगा वस्त्र बनाने का पदार्थ है जिसका मुख्यत: प्रयोग रेशमी साड़ियाँ और अन्य परिधान एवं वस्तुओं के निर्माण के लिए किया जाता है। दक्षिण भारतीय एवं ‘बनारसी साड़ियाँ’ अपने श्रेष्ठ एवं जटिल बुनावट कार्य के कारण ही बड़ी संख्या में निर्यात की जाती हैं। रेशम को अन्य धागों से मिश्रित करके विभिन्न प्रकार के वस्त्र-पदार्थ बनाए जाते हैं।

प्राचीन काल में लोग पहनने के लिए किस सामग्री का उपयोग किया करते थे?
पूर्व प्रमाणों के अनुसार प्रारंभ में लोग वृक्षों की छाल (वल्क), बड़ी-बड़ी पत्तियों अथवा जंतुओं की चर्म और समूर से अपने शरीर को ढकते थे। कृषि समुदाय में बसना आरंभ करने के पश्चात लोगों ने पतली-पतली टहनियों तथा घास को बुनकर चटाईयाँ तथा डलियाँ (टोकरी) बनाना सीखा। लताओं, जंतुओं की ऊन अथवा बालों को आपस में ऐंठन देकर लंबी लड़ियाँ बनार्इं। इनको बुनकर वस्त्र तैयार किए।

पूर्व भारवासी किस प्रकार के कपड़े पहनते थे?
पूर्व में भारतवासी रुई से बने वस्त्र पहनते थे जो गंगा नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में उगाई जाती थी।

प्राचीन मिस्र में लोग किस प्रकार की वस्तुओं से वस्त्र बनाते थे?
प्राचीन मिस्र में वस्त्रों को बनाने के लिए रुई तथा फ्लैक्स (फ्लैक्स भी एक पादप है जिससे प्राकृतिक तंतु प्राप्त होता है) की कृषि नील नदी के निकटवर्ती क्षेत्रों में की जाती थी। उन दिनों में लोगों को सिलाई करना नहीं आता था। उस समय लोग अपने शरीर के विभिन्न भागों को वस्त्रों से आच्छादित कर लेते थे। वे शरीर को आच्छादित करने के लिए कई विभिन्न ढंगों का उपयोग करते थे।

कृत्रिम रेशे क्या होते हैं?

अत्यधिक बढ़ती हुई माँग तथा पसंद ने ही कृत्रिम रेशों की उत्पत्ति को अस्तित्व प्रदान किया है। इन्हें अपने गुणों के कारण ही अन्य रेशों की अपेक्षा अधिक प्राथमिकता प्राप्त हुई है। ये अधिक मजबूत, सलवट-रहित, लचीले, कवक द्वारा सुरक्षित होते हैं तथा साधारण विलयनों में घुलते नहीं हैं। कुछ कृत्रिम रेशा पदार्थ इस प्रकार हैं:

    1. रेयान रेशे की बुनावट रेशमी होती है तथा इसका उपयोग वस्त्र बनाने के लिए किया जाता है। कालीन, पटि्‌टयों तथा शल्य-ड्रैसिंग, रेयान द्वारा ही निर्मित होते हैं।
    2. नॉयलान का उपयोग टायर, रस्सियाँ, जाल, परिधान पदार्थ जैसे साड़ियाँ, मोजे, टाई, होजरी आदि के निर्माण में किया जाता है।
    3. पोलिएस्टर का उपयोग भी परिधान पदार्थों, पर्दे के कपड़े, नवों के पाल, मोजे, परिवहन बैल्ट आदि के निर्माण में भी किया जाता है। सामूान्य पोलिएस्टर-लैरिलीन तथा डैक्रान को कपास के साथ मिश्रित करने पर ‘टेरीवूल’ प्राप्त होता है जो पहनने में अधिक आरामदायक होता है।
    4. एकरालिक का उपयोग परिधान-पदार्थ, कंबल, कालीन आदि के निर्माण में किया जाता है।

कक्षा 6 विज्ञान अध्याय 3 के अतिरिक्त प्रश्न उत्तर

सिलाई की सुई के अविष्कार के बाद वस्त्रों में क्या बदलाव आया?

सिलाई की सुई के आविष्कार के साथ लोगों ने वस्त्रों की सिलाई करके पहनने के कपड़े तैयार किए। इस आविष्कार के पश्चात सिले कपड़ों में बहुत-सी विभिन्नताएँ आ गई हैं। जिस प्रकार समस्त देश में खाए जाने वाले भोजन में अत्यधिक विविधता देखने को मिलती है, ठीक उसी प्रकार वस्त्रों एवं पहनने की वस्तुओं में भी अत्यधिक विविधता पाई जाती है।

रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए: _____________ और __________ से पादप तंतु प्राप्त किए जाते हैं।

रुई और पटसन से पादप तंतु प्राप्त किए जाते हैं।

रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए: _____________ और __________ जांतव तंतु हैं।

रेशम और ऊन जांतव तंतु हैं।

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