कक्षा 10 हिंदी एनसीईआरटी समाधान स्पर्श अध्याय 1 कबीर – साखी

कक्षा 10 हिंदी एनसीईआरटी समाधान स्पर्श भाग 2 पद्य खंड अध्याय 1 कबीर – साखी के प्रश्न उत्तर, प्रश्न-अभ्यास में दिए गए लिखित प्रश्नों के उत्तर, भाव स्पष्ट करना, तथा एक वाक्य में उत्तर यहाँ दिए गए हैं। कक्षा 10 हिंदी के सभी पाठों के समाधान सत्र 2022-2023 के अनुसार संशोधित किए गए हैं। मोबाइल से पढने वाले विद्यार्थी कक्षा 10 समाधान ऐप मुफ़्त डाउनलोड करें।

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श पद्य खंड अध्याय 1 के लिए एनसीईआरटी समाधान

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श अध्याय 1 के अतिरिक्त प्रश्न उत्तर

कबीर जी की साखी की व्यख्या क्या है?

कबीर जी कहते हैं मनुष्य को ऐसी भाषा का उपयोग करना चाहिए जो सभी का मन मोह ले और अपने अंदर के अहंकार को मिटा दे। मन को शांत व शीतल रख सके। इससे आप के अंदर द्या की भावना जागृत होती है जो लोगों की भलाई करने लिए तैयार रहता हैं तथा दूसरों के हितों के लिए तत्पर रहता है।

कबीर का जन्म कब और कहाँ हुआ और वे किसके शिष्य थे?

कबीर का जन्म 1398 में काशी में हुआ था, वे गुरु रामानंद के शिष्य थे।

आपकी मीठी वाणी से दूसरों को कैसे लाभ होता है?

मीठी वाणी बोलने से सभी लोग आपको चाहने व प्रिय लगने लगते है। आप के अंदर सभी के प्रति द्या और प्रेम की भावना जागृत होती हैं। जब मनुष्य दूसरों के हितों की रक्षा करता हैं तो अपने आप लोगों को उसका लाभ मिलने लगता हैं।

कबीर जी ने अपनी दूसरी साखी में क्या बतलाया है?

जिस प्रकार कस्तुरी मृग की नाभि में कस्तुरी छिपी होती हैं और वह उसकी सुगंध को ढूंड्ती रहती है, उसी प्रकार हर कण-कण में भगवान बसे हुए है परंतु मनुष्य अपने अज्ञान के कारण उसे देख नहीं पाते हैं और मंदिरों व धार्मिक स्थलों में ढूंढते रहते है।

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श अध्याय 1 के मुख्य प्रश्न उत्तर

कबीर जी ने अपनी तीसरी साखी में क्या कहा हैं?

कबीर जी ने कहा है जब मेरे अंदर अहम, अभिमान और घमंड रहता था तब में भगवान से दूर था, और जब मेंने अंदर का अहम, घमंड नहीं रहा तब उसमें भगवान बस्ते है। जब मन भगवान नाम का दीपक जलता हैं तो अहंकार के रूप में बसने वाले अभिमान और घमंड जैसे अँधेरे मिट जाते है।

कस्तुरी मृग और मनुष्य को कबीर जी ने अपनी साखी में किस कारण एक समान बताया हैं?

कबीर जी ने अज्ञानता के कारण अपनी साखी में कस्तुरी मृग और मनुष्य को एक समान बताया हैं।

कबीर जी की चौथी साखी की व्यख्या कीजिए।

कबीर जी ने अपनी चौथी साखी में कहा है कि संसार के लोग अज्ञान रूपी अंधकार में डूबे हुए हैं। अपनी मृत्यु आदि से भी अंजान सोये हुए हैं, ये सब देख कर कबीर दुखी है, और वे रो रहे हैं। वे प्रभु को पाने कि आशा में चिंता में जागते रहते है।

कबीर जी की पाँचवी साखी की व्यख्या कीजिए।

कबीर जी ने कहा हैं जब मनुष्य के मन में अपनों के बिछड्ने का गम सांप बन कर लौटने लगता हैं। उस पर न कोई मंत्र असर करता हैं और नहीं कोई दवा असर करती हैं। अर्थात ईश्वर के वियोंग में मनुष्य जीवित नहीं रह सकता और यदि वह जीवित रहता भी है तो उसकी स्थिति पागलों जैसी हो जाती हैं।

    • कबीर जी की छटी साखी की व्यख्या कीजिए।
      व्याख्या:
      कबीर जी कहते है कि हमें हमेशा निंदा करने वाले व्यक्तियों को अपने निकट रखना चाहिए हो सके तो अपने आँगन में ही उनके लिए घर बनवा लेना चाहिए। अर्थात उन्हें हमेशा अपने आस-पास ही रखना चाहिए, ताकि उनके दुवारा बताई गई हमारी गलतियों को सुधार सके इसे हमारा स्वभाव बिना साबुन और पानी कि मदद के ही साफ़ हो जाता हैं।
    • कबीर जी कि सातवीं साखी कि व्यख्या कीजिए।
      व्याख्या:
      कबीर जी कहते हैं कि इस संसार में मोटी-मोटी पुस्तकें पढ़ कर मनुष्य मर गए परंतु कोई भी मनुष्य ज्ञानी नहीं बन सका। यदि किसी व्यक्ति ने ईश्वर प्रेम का एक भी अक्षर पढ़ लिया होता तो वह पंडित बन जाता हैं। अर्थात ईश्वर प्रेम ही एक सच है इसे जानने वाला ही वास्तविक ज्ञानी है।

कबीर जी की अंतिम आठवीं साखी की व्यख्या कीजिए।

कबीर जी कहते है कि उन्होंनें अपने हाथों से अपने घर जला दिए है अर्थात उन्होंनें मोह-माया रूपी घर को जला कर ज्ञान प्राप्त कर लिया हैं। अब उनके हाथों में जलती हुई मशाल व लकड़ी है, यानि ज्ञान है। अब वे उनका घर जलाएंगे जो उनके साथ है अर्थात उसे भी मोह-माया के बंधन से मुक्त होना होगा जो ज्ञान प्राप्त करना चाहता हैं।

कक्षा 10 हिंदी स्पर्श अध्याय 1 के प्रश्न उत्तर