एनसीईआरटी समाधान कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत पुस्तक भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग 2 के सवाल जवाब शैक्षणिक सत्र 2023-24 के लिए यहाँ दिए गए हैं। कक्षा 12 इतिहास पाठ 9 के अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर हिंदी मीडियम में यहाँ सरल भाषा में दिए गए हैं।

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9

मुगल दरबार में पांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

पांडुलिपि तैयार करने की प्रक्रिया:

    • पांडुलिपियों की रचना में अलग-अलग प्रकार के कार्य करने वाले बहुत लोग शामिल होते थे।
    • मुगल भारत की सभी पुस्तकें पांडुलिपियों के रूप में थीं अर्थात् वे हाथ से लिखी होती थी।
    • पांडुलिपि रचना का मुख्य केंद्र शाही किताबख़ाना था। हालाँकि किताबख़ाना शब्द पुस्तकालय केरूप में अनुवादित किया जा सकता है अर्थात ऐसी जगह जहाँ बादशाह की पांडुलिपियों का संग्रहरखा जाता तथा नयी पांडुलिपियों की रचना की जाती थी।
    • कागज बनाने वाला की पांडुलिपि के पन्ने तैयार करने सुलेखकों की पाठ की नकल तैयार करने कोफ्तरों की पृष्ठों को चमकाने के लिए, चित्रकारों की पाठ से दृश्यों को चित्रित करने के लिए और जिल्दसाज़ों की प्रत्येक पन्ने को इकट्ठा कर उसे अलंकृत आवरण में बैठाने के लिए आवश्यकता होती थी।
    • तैयार पांडुलिपि को एक बहुमूल्य वस्तु, बौद्धिक संपदा और सौंदर्य के कार्य के रूप में देखा जाता था।
    • इस तरह के सौंदर्य को अस्तित्व में लाकर इन पांडुलिपियों के संरक्षक मुगल बादशाह अपनी शक्ति को दर्शा रहे थे।
    • इसी तरह इन पांडुलिपियों की वास्तविक रचना में शामिल कुछ लोगों को भी पदवियों और पुरस्कारों के रूप में पहचान मिली।

मुग़ल दरबार से जुड़े दैनिक-कर्म और विशेष उत्सवों के दिनों ने किस तरह से बादशाह की सत्ता के भाव को प्रतिपादित किया होगा?

    1. मुगल दरबार से जुड़े दैनिक कार्यों तथा विशेष उत्सवों के दिनों में मुख्य केंद्र बादशाह ही होता था।
    2. बादशाह के अनुमति के बिना कोई दरबार से बाहर नहीं जा सकता था। दरबार के नियमों का उल्लंघन करने वालों को दंडित किया जाता था।
    3. दरबार में सभी दरबारियों का स्थान बादशाह द्वारा ही निर्धारित किया जाता था।
    4. अभिवादन का सर्वश्रेष्ट रूप सिजदा माना जाता था। शाहजहाँ के शासनकाल में इन तरीकों के स्थान पर चार तसलीम और जमींबोसी के तरीके अपनाए जाते थे।
    5. मुगल दरबार के लिए विवाह के अवसर विशेष महत्व रखते थे। इन अवसरों पर सज्जा-धाज्जा और व्यय की गई धनराजि बादशाह की प्रतिष्ठा को चार चाँद लगा देती थी।
    6. बादशाह का दरबार और राजसिंहासन मुगल शक्ति का मूल आधार था।
    7. झरोखा दर्शन की प्रथा अकबर ने प्रारंभ की थी। इसके अनुसार बादशाह अपने दिन की शुरूआत सूर्योंदय के समय कुछ धार्मिक प्रार्थनाओं से करता था। इसके बाद वह पूर्व की ओर मुँह किए झरोखा दर्शन के लिए आता था।
    8. सिंहासन आरोहण की वर्षर्गाठ, ईद, शब-ए-बारात और होली जैसे विशेष अवसरों पर दरबार का वातावरण सजीव हो उठता था।
    9. सजी हुए सुगंधित मोमबत्तियाँ और महलों की दीवारों पर लटके हुए रंग-बिरंगे बंदनवान आने वालों पर अद्भुत छाप छोड़ते थे। ये सभी बादशाह की शक्ति, सत्ता तथा प्रतिष्ठा को दर्शाते थे।

कक्षा 12 के लिए ऐप

iconicon

मुग़ल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका का मूल्यांकन कीजिए।

मुगल साम्राज्य में शाही परिवार की स्त्रियों द्वारा निभाई गई भूमिका:

    • मुगल परिवार में बादशाह की पत्नियाँ और उपपत्नियाँ, उसके करीबी और दरू के रिश्तेदार (माता, सौतेली व उपमाताएँ, बहन, पुत्री, बहू, चाची, मौसी वे बच्चे आदि) व महिला परिचारिकाएँ और गुलाम होते थे।
    • भारतीय उपमहाद्वीप में विशेषकर शासक वर्गों में बहुविवाह प्रथा प्रचलित थी। इससे मुगल सम्राटों को कुछ सीमा तक लाभ हुआ। मुगल सम्राटों ने राजपूत घरानों में शादियाँ की जिससे उन्हें राजपूतों का समर्थन मिला तथा अपने विशाल साम्राज्य की सुरक्षा की।
    • मुगल राजाओं की विभिन्न पत्नियों का दर्जा अलग-अलग था परंतु सभी ने एक अच्छी पत्नी होने की भूमिका निभाई।
    • मुगल साम्राज्य की स्त्रियों ने इमारतों और बागों के निर्माण में भी रूचि ली। जैसे कि चाँदनी चौक की रूपरेखा जहाँआरा ने बनाई थीं पत्नियों के अलावा मुगल परिवार में अनेक महिला और पुरुष गुलाम थे।
    • जहाँआरा ने शाहजहाँ की नयी राजधानी शाहजहाँनाबाद (दिल्ली) की कई वास्तुकलात्मक परियोजनाओं में हिस्सा लिया। इनमें से आँगन तथा बाग के साथ-साथ दोमंजिला भव्य कारवाँसराय था।
    • गुलबदन बेगम के द्वारा लिखित पुस्तक हुमायूँनामा से हमें मुगलों की घरेलु दुनिया की एक झलक प्राप्त होती है। गुलबदन बेगम तुर्की और फ़ारसी में धाराप्रवाह लिख सकती थी।
    • गुलबदन बेगम ने जो लिखा वह मुगल बादशाहों की प्रशस्ति नहीं थी अपितु उसने राजाओं तथा राजकुमारों के मध्य संघषों तथा तनावों के साथ ही इनमें से कुछ संघषों को सुलझाने में परिवार की उम्रदराज स्त्रियों की महत्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में विस्तार से लिखा।

वे कौन से मुद्दे थे जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुगल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान किया?

भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रों के प्रति मुगल नीतियों व विचारों को आकार प्रदान करने वाले मुद्दे निम्नलिखित थे:

    1. भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले सभी विशेषताओं को उत्तर भारत तक पहुँचने के लिए हिंदुकुश पर्वत को पार करना पड़ाता था।
    2. राजाओं और ईरान तथा तुरान के पड़ोसी देशों के मध्य राजनीतिक संबंध हिंदुकुश पर्वतों द्वारा निर्धारित सीमाओं पर नियंत्रण कर सकते थे।
    3. तीर्थयात्रा तथा व्यापार- ऑटोमन साम्राज्य के साथ मुगलों के संबध का उद्देश्य ऑटोमन नियंत्रण वाले क्षेत्र में व्यापारियों तथा तीर्थ यात्रियों के स्वतंत्र आवागमन को निर्बाध बनाए रखना चाहिए।
    4. मक्का तथा मदीना दो तीर्थस्थल है। मुगल बादशाह प्रायः यहाँ अपने धर्म तथा वाणिज्य के मामलों से जोड़ते थे।
    5. यूरोप को भारत के बारे में जानकारी जेसुइट धर्म प्रचारकों, यात्रियों, व्यापारियों आदि के विवरणों से हुई ।
    6. मुगल बादशाह देश की सीमाओं से परे भी अपने राजनैतिक दावे प्रस्तुत करते थे। अपने सम्राज्य की सीमाओं की स्थापना, धार्मिक तथा आर्थिक हितों की रक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों का भारतीय उपमहाद्वीप से बाहर क्षेत्रें के प्रति मुगल नीतियों को आकार प्रदान करने में महत्वपूर्ण स्थान था।
मुग़ल प्रांतीय प्रशासन के मुख्य अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए। केंद्र किस तरह से प्रांतों पर नियंत्रण रखता था?

मुगल प्रांतीय प्रशासन के मुख्य अभिलक्षण:
प्रांतीय शासन का प्रमुख सूबेदार होता था। जो सीधा बादशाह को प्रतिवेदन प्रस्तुत करता था।
प्रत्येक सूबा कई सरकारों में विभक्त था।
सर्वप्रथम अकबर ने ही प्रांतीय प्रशासन के लिए एक नया तथा विस्तृत आधार प्रस्तुत किया। अकबर ने 1580 ई. में अपने पूरे साम्राज्य को 12 सूबों में विभाजित किया। जहाँगीर के शासनकाल में 17, शाहजहाँ के शासनकाल में 22 तथा औरंगजेब के शासनकाल में 23 प्रांत थे।
प्रांतीय दीवान सूबे का वित्त अधिकारी होता था। वह ओहदे में सूबेदार से नीचे होता था। दीवान सूबे में वित्त तथा राजस्व का प्रमुख होता था जबकि सूबेदार कार्यकारिणी का प्रमुख होता था।
प्रांतीय खजाने की देखभाल करना, दीवानी मुकद्दमों का फ़ैसला करना, प्रांतीय आर्थिक स्थिति के संबंध में केंद्रीय दीवान को सूचित करना तथा प्रांत की आय-व्यय का हिसाब रखना दीवान की जिम्मेदारी थी।
प्रांतीय सैन्य विभाग का प्रमुख अधिकारी होता था। प्रांत में सैनिकों की भर्ती करना तथा उनमें अनुशासन बनाए रखने बख्शी का प्रमुख कार्य था।
कोतवाल प्रांत की राजधानी तथा महत्वपूर्ण नगरों की आंतरिक सुरक्षा, शांति, स्वास्थ्य की व्यवस्था का कार्य करता था।
सदर और काज़ी का पद प्रांत में एक ही व्यक्ति को दिया जाता था। सदर प्रजा के नैतिक चरित्र की देखभाल करता था तथा काज़ी प्रांत का मुख्य न्यायाधीश होता था।
वाकिया नविस प्रांत के गुप्तचर विभाग का मुख्य अधिकारी था। यह प्रांत की प्रत्येक सूचना को केंद्र सरकार को भेजता था।

प्रांतीय शासन व्यवस्था का आधार केंद्रीय शासन व्यवस्था थी। इस बारे में सद यदुनाथ ने लिखा है कि प्रांतीय शासन कंद्रीय सरकार के सदृश्य उसका ही एक छोटा रूप था।
प्रांतों पर केंद्र का नियंत्रण – प्रांतों के अधिकारी सूबेदार की नियुक्ति मुगल सम्राट द्वारा ही की जाती थी। सूबेदार मुगल सम्राट के लिए उत्तरदायी होता था।
मुगल सम्राट स्वयं प्रांतीय प्रशासन में रूचि लेता था।
सूबेदार की शक्तियों में असीमित वृद्धि को रोकने के उद्देश्य से तथा प्रशासनिक कार्यकुशलता बनाए रखने के लिए सामान्यतः तीन या पाँच वर्षों के बाद सूबेदार का एक प्रांत से दूसरे प्रांत में तबादला कर दिया जाता था।
मुगल सम्राट समय-समय पर स्वयं प्रांतों के भ्रमण के लिए जाते थे।

उदाहरण सहित मुग़ल इतिहास के विशिष्ट अभिलक्षणों की चर्चा कीजिए।

मुगल इतिहास के विशिष्ट अभिलक्षण:

    1. मुगल साम्राज्य एक इस्लामी तुर्की-मंगोल साम्राज्य था जो 1526 में आंरभ हुआ। 17वीं शताब्दी के आखिर में तथा 18वीं शताब्दी के आरंभ तक भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया।
    2. मुगल इतिवृतों के लेखक दरबार इतिहासकार थे। उन्होंने मुगल शासकों के संरक्षण में इतिवृतों की रचना की। अर्थात् शासकों पर केंद्रित घटनाएँ, दरबार तथा अभिजात वर्ग के लोग, युद्ध और प्रशासनिक व्यवस्थाएँ उनके द्वारा लिखे जाने वाले इतिहास के केंद्रीय विषय थे। अकबर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब की जीवन की कथाओं पर आधारित इतिवृत्तों के क्रमश अकबरनामा, शाहजहाँनामा, आलमगीरनामा जैसे शीर्षर्क इस बात के प्रतीक हैं कि इनके लेखकों की दृष्टि में बादशाह का इतिहास ही दरबार का तथा साम्राज्य का इतिहास था।
    3. मुगल इतिवृत्तों का मुख्य अभिलक्षण साम्राज्य के तहत आने वाले सभी लोगों के सामने एक शक्तिशाली तथा प्रबुद्ध राज्य की छवि को प्रस्तुत करना था।
    4. इतिवृत्तों का एक प्रमुख अभिलक्षण आने वाली पीढ़ी को शासन का विवरण उपलब्ध करवाना था।
    5. इतिवृत्तों का एक अन्य अभिलक्षण मुगल शासन का विरोध करने वाले लोगों को यह स्पष्ट रूप से बताना था कि साम्राज्य की शक्ति के सामने उनके सभी विरोधों का असफ़ल हो जाना सुनिश्चित था।
    6. मुगलकाल में सभी दरबारी फ़ारसी भाषा में लिखे गए थे। मुगलों की मातृभाषा तुर्की थी परंतु अकबर ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए फ़ारसी को राजदरबार की भाषा बनाया।
    7. फ़ारसी भाषा में अनेक स्थानीय मुहावरों का प्रवेश हो जाने से इसका भारतीयकरण होने लगा। फ़ारसी और हिंदवी के पारस्परिक संपर्क से एक नयी भाषा ʻउर्दूʼ का जन्म हुआ।
    8. भारतीय उपमहाद्वीप के लिए मुगलों का मुख्य योगदान उनकी अनूठी वास्तुकला थी।
इस अध्याय में दी गई दृश्य-सामग्री किस हद तक अबुल फ़ज़्ल द्वारा किए गए ʻतसवीरʼ के वर्णन सोत्र से मेल खाती है?

इस अध्याय में दी गई दृश्य-सामग्री काफ़ी हद तक अबुल फ़ज़्ल द्वारा किए गए तसवीर के वर्णन से मेल खाती है। ये चित्र मुगल बादशाहों की चित्रकला है। उन्होंने इस काल को बढ़ावा देने की कई कोशिशे की। दर्जाये गए चित्रों को देखकर यह कह जा सकता है कि उस समय सर्वाधिक उत्कृष्ट कलाकार होते थे। लगभग सभी मुगल सम्राट चित्रकारी के प्रेमी थे। प्रथम मुगल बादशाह बाबार ने चित्रकला को आश्रय दिया तथा अपनी आत्मकथा को कुछ भागों को चित्रित करवाया। फ़ारस के कई चित्रकार हुमायूँ के साथ भारत आए थे। इनमें से प्रसिद्ध थे- मीर सैय्यद अली, ख्वाजा अब्दुस्समद ने सुप्रसिद्ध फ़ारसी ग्रंथ दास्ताने अमीर-हमजा को चित्रित करन प्रारंभ किया। चित्रकला को बढ़ावा देने के लिए अकबर ने एक अलग चित्रकला विभाग बनवाया था।

जहाँगीर के शासनकाल में चित्रकला का विकास शीर्ष पर था। अकबरकालीन चित्रकला में किसी निर्जीव वस्तु को भी सजीव रूप में प्रस्तुत करने की शक्ति थीं। अबुल फ़ज़ल के विवरण ʻतसवीरʼ की प्रशंसा में से पता चलता है कि सम्राट अकबर की इस कला में विशेष अभिरूचि थी। अबुल फ़ज़्ल ने तसवीर की प्रशंसा में लिखा है कि, ʻब्यौरे की सूक्ष्मता, परिपूर्णता तथा प्रस्तुतीकरण की निर्भीकता जो अब चित्रों में दिखाई पड़ती है वह अतुलनीय है । यहाँ तक कि निर्जीव वस्तुएँ भी सजीव प्रतीत होती हैं।ʼ

कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 राजा और विभिन्न वृत्तांत
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9
कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 प्रश्न उत्तर
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 12 इतिहास अध्याय 9 सवाल जवाब