एनसीईआरटी समाधान कक्षा 11 इतिहास अध्याय 4 इस्लाम का उदय और विस्तार

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 11 इतिहास अध्याय 4 इस्लाम का उदय और विस्तार-लगभग 570-1200 ई. के प्रश्न उत्तर अभ्यास के सवाल जवाब सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ दिए गए हैं। कक्षा 11 इतिहास पाठ 4 के अभ्यास के सभी प्रश्न हिंदी में समझाए गए हैं जिसके माध्यम से छात्र लगभग 100 ई. पूर्व से 1300 ईसवी तक के बारे में छात्र जान पाएँगे।

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 11 इतिहास अध्याय 4

सातवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में बेदुइओं के जीवन की क्या विशेषताएँ थीं?

बहुत से अरब कबीले खानाबदोश या बद्दू अर्थात् बेदूइनी होते थे। ये लोग साधारणतः भोजन के खाद्य पदार्थ के रूप में खजूर तथा अपने ऊँटों के लिए चारे की तलाश में रेगिस्तान में सूखे क्षेत्रों से हरे-भरे क्षेत्रों (नखलिस्तान) की ओर जाते रहते थे। सातवीं शताब्दी में अरब का समाज अनेक कबीलों में बँटा था। प्रत्येक कबीले का नेतृत्व एक शेख द्वारा किया जाता था, वह कुछ सीमा तक पारिवारिक संबंधों के आधार पर और व्यक्तिगत साहस, बुद्धिमत्ता, उदारता के आधार पर चुना जाता था। प्रत्येक कबीले के स्वयं के अलग-अलग देवी-देवता होते थे जो बुतों के रूप में मस्जिदों में पूजे जाते थे। नखलिस्तानों में पानी के नश्मे (झील) और खजूर के पेड़ों के झुंड पाए जाते हैं।

अरब कबीलों में राजनीतिक विस्तार तथा सांस्कृतिक समानता लाना आसान काम नहीं था। उनमें परस्पर अपने-अपने कबीलों के वर्चस्व को कायम रखने के लिए प्रायः झगड़े होते रहते थे। ऊँट उनके परिवहन का मुख्य साधान तथा सुख-दुख का साथी था। ऊँट के बिना रेगिस्तान में उनका जीवित रहना असंभव था। इसके अतिरिक्त बदूइओं का जीवन रेगिस्तान की शुष्क रेत के समान ही शुष्क बन गया था। निःसंदेह रेगिस्तान की जलवायु ने उन्हें कठोर तथा बर्बर बना दिया था। मक्का कबीलों का प्रसिद्ध स्थान था।

अब्बासी क्रांति से आपका क्या तात्पर्य है?

अब्बासी क्रांति: मुस्लिम राजनैतिक व्यवस्था के केंद्रीकरण की सफ़लता के लिए उमय्यद वंश को भारी कीमत चुकानी पड़ी। दवा नामक एक सुनियोजित आंदोलन ने उमय्यद वंज को उखाड़ फ़ेंका। 750 ई. में इस वंज की जगह अब्बासियों ने ले ली जो मक्का के ही थे। अब्बासियों ने उमय्यद शासन को दुष्ट बताया और यह दावा किया कि ये पैगम्बर मुहम्मद के मलू इस्लाम की पुनर्स्थापना करेंगे। इस क्रांति से केवल वंश का ही परिवर्तन नहीं हुआ बल्कि इस्लाम के राजनैतिक ढाँचे तथा उसकी सस्ंकृति में भी बदलाव आए। अब्बासियों का विद्रोह खुरासान के बहुत दूर स्थित क्षेत्र में प्रारंभ हुआ, जहाँ पर दमिश्क से बहुत तेज़ दौड़ने वाले घोड़े से 20 दिन में पहुँचा जा सकता था।

खुरासान में अरब ईरानियों की मिली जुली आबादी थी, जिसे विभिन्न कारणों से एकजुट किया जा सका। यहाँ पर अरब सैनिक अधिकांशतः इराक से आए थे एवं वे सीरियाई लोगों के प्रभुत्व से नाराज़ थे. खुरासान के अरब नागरिक उमय्यद शासन को इसलिए नापसंद करते थे कि उन्होंने करों में रियायतें और विशेषाधिकार देने के जो वादे किए थे वे पूरे नहीं किए गए थे। जहाँ तक ईरानी मुसलमानों का संबंध है, उन्हें अपनी जातीय चेतना से ग्रस्त अरबों के तिरस्कार का शिकार होना पड़ा था और वे उमय्यदों को बाहर निकालने के किसी भी अभियान में सम्मिलित होने के इच्छुक थे। अब्बासियों ने जो पैगम्बर के चाचा अब्बास के वंशज थे, विभिन्न असहमत समूहों का समर्थन प्राप्त कर लिया तथा यह वचन देकर कि पैगम्बर के परिवार का कोई मसीहा उन्हें उमय्यदों के दमनकारी शासन से मुक्त कराएगा, सत्ता प्राप्त करने के अपने प्रयत्न को वैध बताया।

उनकी सेना का नेतृत्व एक ईरानी गुलाम अबू मुस्लिम ने किया, जिसने अंतिम उमय्यद खलीफ़ा, मारवान को ज़ब नदी पर हुई लड़ाई में हराया। अब्बासी शासन के तहत, अरबों के प्रभाव में गिरावट आई, जबकि ईरानी संस्कृति का महत्व अधिक हो गया। अब्बासियों ने अपनी राजधानी प्राचीन ईरानी महानगर टेसीफ़ोन के खंडहरों के निकट, बगदाद में स्थापित की। अब्बासी शासकों ने खिलाफ़त की धार्मिक स्थिति तथा कार्यों को मजबूत बनाया तथा इस्लामी संस्थाओं और विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। परंतु सरकार और साम्राज्य की ज़रूरतों ने उन्हें राज्य के केंद्रीय स्वरूप को बनाए रखने के लिए मजबूर किया। उन्होंने उमय्यदों के शानदार शाही वास्तुकला और राजदरबार बनाए रखा। जिस शासन को पहले इस बात पर गर्व था कि उसने राजतंत्र को समाप्त कर दिया है उसे ही राजतंत्र को फि़र से स्थापित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।

अरबों, ईरानियों व तुर्कों द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृतियों के उदाहरण दीजिए?

अरबों, ईरानियों व तुर्कों द्वारा स्थापित राज्यों की बहुसंस्कृतियों के उदाहरण:
अब्बासियों ने अपनी राजधानी प्राचीन ईरानी महानगर टेसीफ़ोन के खंडहरों के पास बगदाद में स्थापित की। अब्बासी शासकों ने खि़लाफ़त की धार्मिक स्थिति तथा कार्यप्रणाली को सुदृढ़ बनाया तथा इस्लामी संस्थाओं तथा विद्वानों को संरक्षण प्रदान किया। उन्होंने उमय्यदों की उत्कृष्ट शाही वास्तुकला तथा राजदरबार के व्यापक समारोहों की परंपरा को बनाए रखा। इस्लाम धर्म के प्रचार-प्रसार में अरबों, ईरानियों तथा तुर्कों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।

अरबों का वर्चस्व अरब व सीरिया, ईरानियों का इराक और ईरान व तुर्की का खुरासान तथा ऑक्सस आदि पर था। प्रत्येक राज्य में गैर-मुस्लिम लोगों से कर प्राप्त कर लेने के पश्चात आचरण किया जाता था। उनको अपनी संपत्ति रखने तथा आर्थिक कार्यों की पूर्ति के लिए अधिकार प्राप्त थे।
इस्लामी समाज सन् 950 से 1200 के बीच किसी एकल राजनीतिक व्यवस्था तथा संस्कृति की एकल भाषा से एकजुट नहीं रहा, बल्कि सामान्य आर्थिक और सांस्कृतिक प्रतिरूपों द्वारा उनमें एकजुटता बनी रही। फ़ारसी का विकास इस्लामी संस्कृति की उच्च भाषा के रूप में किया गया। इस एकता के निर्माण में बौद्धिक परम्पराओं के बीच संवाद की परिपक्वता ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तुर्की तुर्किस्तान के बीच एशियाई घास के क्षेत्रों के खानाबदोज कबीलाई थे तथा इन लोगों द्वारा शनैः शनै इस्लाम धर्म कबूल कर लिया गया। तुर्की साम्राज्य में मिस्त्री ईरानी, सीरियाई तथा भारतीय संस्कृतियों का विकास हुआ।

यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का क्या प्रभाव पड़ा?

यूरोप व एशिया पर धर्मयुद्धों का निम्नलिखित प्रभाव पड़ा:

    • युद्धों के फ़लस्वरूप यूरोपीय सभ्यता तथा संस्कृति का विकास हुआ।
    • अनेक नवीन भौगोलिक खोजें हुई।
    • मुस्लिम सत्ता की बहाली के बाद भी पूर्व तथा पश्चिम के बीच इटली के व्यापारिक समुदायों का अपेक्षाकृत अधिक प्रभाव था।
    • मुस्लिम राज्यों ने अपने ईसाई प्रजाजनों के प्रति कठोर व्यवहार को अपनाया। विशेषतः यह स्थिति लड़ाड़ियों में देखी गयी।
    • प्रथम धर्मयुद्ध में फ्रांस तथा इटली के सैनिकों ने सीरिया में एंटीआफ़े और जेरूसलम पर कब्जा कर लिया। इस युद्ध के दौरान मुसलमानों तथा यहूदियों की निर्मम हत्याएँ हुई।
    • धर्मयुद्ध के कारण व्यापक रूप से जन-धन की हानि हुई।
    • ईसाइयों की कमजोरी सिद्ध हुई तथा पोप के सम्मान में भी अधिक हानि हुई।
    • यूरोपवासियों ने रेशम, चीनी, कपास, सीसे के बर्तनों, गरम मसालों तथा दवाओं आदि से परिचय प्राप्त किया।
रास्ते पर पड़ने वाले नगरों का उल्लेख करते हुए समरकंद से दमिश्क तक की यात्रा का वर्णन कीजिए।

समरकंद से दमिश्क की यात्रा के दौरान अनेक देशों से उदाहरण के लिए – ईरान, इराक, सीरिया, अज़रबैजान तथा तुर्कमेनिस्तान आदि से होकर जाना पड़ेगा। समरकंद से दमिश्क के मार्ग पर मर्व खुरसान, निजापुर दायलाम, इसफ़ाइन, मारा, कुफा, अमरा, जेरूसलम, बगदाद, कुसायुर आदि शहर स्थित हैं। यात्री दो रास्तों लाल सागर तथा फ़ारस की खाड़ी से होकर जाते थे। लम्बी दूरी के व्यापार के लिए उपयुक्त तथा उच्च मूल्य वाली वस्तुओं, यथा- मसालों, कपड़ों, चीनी मिट्टी के सामान तथा बारूद को भारत तथा चीन से लाल सागर के अदप और ऐधाव तक तथा फ़ारस की खाड़ी के पत्तन सिराफ़ और बसरा तक जहाज़ पर लाया जाता था। वहाँ से माल को ज़मीन पर ऊँटों के काफि़लों द्वारा दमिश्क, समरकंद तथा बगदाद तक भेजा जाता था।

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