एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8 विचित्र: साक्षी

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8 – अष्टम: पाठ: विचित्र: साक्षी शेमुषी भाग 2 के प्रश्न उत्तर और अभ्यास के हल सीबीएसई और राजकीय बोर्ड के सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ से मुफ़्त प्राप्त किए जा सकता है। कक्षा 10 संस्कृत पाठ 8 एक बहुत ही रोचक कहानी हैं जिसमें हम देखते हैं कि किस प्रकार न्यायधीश साक्ष्य के आभाव में भी सही और न्यायसंगत फैसला सुनते हैं। पाठ का हिंदी अनुवाद भी सरल भाषा में विस्तार से दिया गया है।

कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8 के लिए एनसीईआरटी समाधान

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संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
कश्चन निर्धनो जन: भूरि परिश्रम्य किञ्चिद्‌ वित्तमुपार्जितवान्‌। किसी ग़रीब आदमी ने जब खूब परिश्रम (मेहनत) करके कुछ धन कमाया।
तेन वित्तेन स्वपुत्रम्‌ एकस्मिन्‌ महाविद्यालये प्रवेशं दापयितुं सफलो जात:। उस धन से (वह) अपने पुत्र को एक महाविद्यालय (कॉलेज) में प्रवेश दिलाने में सफल हो गया।
तत्तनय: तत्रैव छात्रावासे निवसन्‌ अध्ययने संलग्न: समभूत्‌। उसका पुत्र वहीं छात्रावास में निवास करते हुए पढ़ाई में जुट गया।
एकदा स पिता तनूजस्य रुग्णतामाकर्ण्य व्याकुलो जात: पुत्रं द्रष्टुं च प्रस्थित:। एक बार वह पिता बेटे की बीमारी को सुनकर व्याकुल हो गया और पुत्र को देखने के लिए चल पड़ा।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
परमर्थकार्श्येन पीडित: स बसयानं विहाय पदातिरेव प्राचलत्‌।परन्तु धन की कमी से दुःखी वह बस को छोड़कर पैदल ही चला।
पदातिक्रमेण संचलन्‌ सायं समयेऽप्यसौ गन्तव्याद्‌ दूरे आसीत्‌। पैदल चलते हुए शाम के समय में भी वह अपने गन्तव्य (जाने के स्थान) से दूर ही था।
‘निशान्धकारे प्रसृते विजने प्रदेशे पदयात्रा न शुभावहा’, ‘रात के अँधेरे में फैले हुए (विस्तृत) निर्जन स्थान पर पदयात्रा उत्तम नहीं होती है।’
एवं विचार्य स पार्श्वस्थिते ग्रामे रात्रिनिवासं कर्त्तुं कञ्चिद्‌ गृहस्थमुपागत: । ऐसा सोचकर वह पास में स्थित गाँव में रात में रहने के लिए किसी गृहस्थी (गृहस्वामी) के घर पर आया।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
करुणापरो गृही तस्मै आश्रयं प्रायच्छत्‌।दयालु गृहस्वामी ने उसे आश्रय (सहारा) दे दिया।
विचित्रा दैवगति:। भाग्य की गति बड़ी अनोखी होती है।
तस्यामेव रात्रौ तस्मिन्‌ गृहे कश्चन चौर: गृहाभ्यन्तरं प्रविष्ट:।उसी रात में उस घर में कोई चोर घुस गया।
तत्र निहितामेकां मञ्जूषाम्‌ आदाय पलायित:। वहाँ रखी एक संदूक को लेकर भागा।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चौरस्य पादध्वनिना प्रबुद्धोऽतिथि: चौरशङ्कया तमन्वधावत्‌ अगृह्‌णाच्च, परं तदानीमेव किञ्चिद्‌ विचित्रमघटत। चोर के पैरों की आवाज से जगा अतिथि चोर के शक से उसके पीछे भागा और पकड़ लिया, परन्तु अनोखं घटना घटी।
चौर: एव उच्चै: क्रोशितुमारभत ‘‘चौरोऽयं चौरोऽयम्‌’’ इति। चोर ने ही जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया-“यह चोर है यह चोर है”।
तस्य तारस्वरेण प्रबुद्धा: ग्रामवासिन: स्वगृहाद्‌ निष्क्रम्य तत्रागच्छन्‌ वराकमतिथिमेव च चौरं मत्वाऽभर्त्सयन्‌।उसकी चिल्लाहट से जागे गाँव के निवासी अपने घर से निकलकर वहाँ आ गए और बेचारे अतिथि को ही चोर मानकर निन्दा करने लगे।
यद्यपि ग्रामस्य आरक्षी एव चौर आसीत्‌। जबकि गाँव का सिपाही ही चोर था।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तत्क्षणमेव रक्षापुरुष: तम्‌ अतिथिं चौरोऽयम्‌ इति प्रख्याप्य कारागृहे प्राक्षिपत्‌।उसी क्षण ही रक्षक (सिपाही) ने उस अतिथि को यह चोर है ऐसा मानकर (निश्चित करके) जेल में डाल दिया।
अग्रिमे दिने स आरक्षी चौर्याभियोगे तं न्यायालयं नीतवान्‌। अगले दिन वह सिपाही चोरी के अभियोग में उसको न्यायालय ले गया।
न्यायाधीशो बंकिमचन्द्र: उभाभ्यां पृथव्‌-पृथव्‌ विवरणं श्रुतवान्‌। न्यायाधीश (जज़) बंकिमचन्द्र ने दोनों से अलग-अलग विवरण सुना।
सर्वं वृत्तमवगत्य स तं निर्दोषम्‌ अमन्यत आरक्षिणं च दोषभाजनम्‌।सारा विवरण जानकर उन्होंने उसे निर्दोष (दोष रहित) माना और सिपाही को दोषी।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
किन्तु प्रमाणाभावात्‌ स निर्णेतुं नाशक्नोत्‌। परन्तु प्रमाण के अभाव से वे निर्णय नहीं कर सके।
ततोऽसौ तौ अग्रिमे दिने उपस्थातुम्‌ आदिष्टवान्‌। उसके बाद उन दोनों को उन्होंने अगले दिन हाज़िर होने का आदेश दिया।
अन्येद्यु: तौ न्यायालये स्व-स्व-पक्षं पुन: स्थापितवन्तौ। अन्य दिन उन दोनों ने न्यायालय में अपने-अपने पक्ष को पुनः (फिर) रखा।
तदैव कश्चित्‌ तत्रत्य: कर्मचारी समागत्य न्यवेदयत्‌ यत्‌ इत: क्रोशद्वयान्तराले कश्चिज्जन: केनापि हत:। तभी वहाँ किसी कर्मचारी ने आकर निवेदन किया कि यहाँ से दो कोस की दूरी पर कोई व्यक्ति किसी के द्वारा मार डाला गया है।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तस्य मृतशरीरं राजमार्गं निकषा वर्तते।उसकी लाश राजमार्ग (मुख्य सड़क) के पास पड़ी है।
आदिश्यतां किं करणीयमिति। आदेश दें कि क्या करना चाहिए।
न्यायाधीश: आरक्षिणम्‌ अभियुक्तं च तं शवं न्यायालये आनेतुमादिष्टवान्‌।न्यायाधीश ने सिपाही और कैदी को उस लाश को न्यायालय में लाने का आदेश दिया।
आदेशं प्राप्य उभौ प्राचलताम्‌। आज्ञा को पाकर दोनों चल पड़े।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तत्रोपेत्य काष्ठपटले निहितं पटाच्छादितं देहं स्कन्धेन वहन्तौ न्यायाधिकरणं प्रति प्रस्थितौ। वहाँ पहुँचकर के लकड़ी के तख़्ते पर रखे कपड़े से ढके शरीर को कंधे पर उठाए हुए न्यायालय की ओर चल पड़े।
आरक्षी सुपुष्टदेह आसीत्‌, अभियुक्तश्च अतीव कृशकाय:। सिपाही मोटे और शक्तिशाली शरीर वाला था और कैदी बहुत पतले शरीर वाला।
भारवत: शवस्य स्कन्धेन वहनं तत्कृते दुष्करम्‌ आसीत्‌। भारी शव को कंधे से उठाना उसके लिए बहुत कठिन था।
स भारवेदनया क्रन्दति स्म। वह बोझ उठाने के कष्ट से रो रहा था।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
तस्य क्रन्दनं निशम्य मुदित आरक्षी तमुवाच-‘रे दुष्ट! तस्मिन्‌ दिने त्वयाऽहं चोरिताया मञ्जूषाया ग्रहणाद्‌ वारित:। उसका रोना सुनकर प्रसन्न सिपाही उससे बोला- “अरे दुष्ट! उस दिन तूने मुझे चोरी की सन्दूक (पेटी) को लेने से रोका था।
इदानीं निजकृत्यस्य फलं भुङ्‌क्ष्व। अब अपने किए का फल भोग।
अस्मिन्‌ चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’’ इति प्रोच्य उच्चै: अहसत्‌। इस चोरी के इलज़ाम (अभियोग) में तू तीन वर्ष की जेल (का दण्ड) पाएगा।” ऐसा कहकर जोर से हँसने लगा।
यथाकथञ्चिद्‌ उभौ शवमानीय एकस्मिन्‌ चत्वरे स्थापितवन्तौ।जैसे-तैसे दोनों ने लाश को लाकर एक चौराहे पर रख दिया।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
न्यायाधीशेन पुनस्तौ घटनाया: विषये वक्तुमादिष्टौ। न्यायाधीश ने फिर उन दोनों की घटना के विषय में बोलने के लिए आदेश दिया।
आरक्षिणि निजपक्षं प्रस्तुतवति आश्चर्यमघटत्‌ स शव: प्रावारकमपसार्य न्यायाधीशमभिवाद्य निवेदितवान्‌- सिपाही द्वारा अपने पक्ष को रखने पर आश्चर्यजनक घटना घटी। वह शव (मुर्दा शरीर) कंबल ओढ़े गए कपड़े को हटाकर न्यायाधीश को प्रणाम करके बोला
मान्यवर! एतेन आरक्षिणा अध्वनि यदुक्तं तद्‌ वर्णयामि ‘त्वयाऽहं चोरिताया: मञ्जूषाया:माननीय (महोदय)! इस सिपाही ने रास्ते में जो कहा था उसको कह रहा हूँ ‘तुम्हारे द्वारा मुझे चोरी की गई मंजूषा (बक्से) को लेने से रोका गया था
ग्रहणाद्‌ वारित:, अत: निजकृत्यस्य फलं भुङ्‌क्ष्व। इसलिए अपने किए हुए कर्म का फल भोगो।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
अस्मिन्‌ चौर्याभियोगे त्वं वर्षत्रयस्य कारादण्डं लप्स्यसे’ इति।इस चोरी के अभियोग (जुर्म) में तुम तीन वर्ष की जेल का दंड पाओगे।’
न्यायाधीश: आरक्षिणे कारादण्डमादिश्य तं जनं ससम्मानं मुक्तवान्‌।न्यायाधीश ने सिपाही को जेल के दंड का आदेश देकर उस व्यक्ति को सम्मान के साथ छोड़ दिया।
अत एवोच्यते – दुष्कराण्यपि कर्माणि मतिवैभवशालिन:। इसलिए कहा जाता है बुद्धि की संपत्ति से युक्त लोग न
नीतिं युक्तिं समालम्ब्य लीलयैव प्रकुर्वते॥नीति और युक्ति का सहारा लेकर कठिन कामों को भी खेल-खेल में ही (आसानी से) करते हैं/ कर लेते हैं।
कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8 एनसीईआरटी समाधान
कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8 एनसीईआरटी के उत्तर
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कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8 समाधान
कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 8