एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 4 शिशुलालनम्‌

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 4 – चतुर्थ: पाठ: शिशुलालनम्‌ शेमुषी भाग 2 के अभ्यास के प्रश्नों के विस्तार से उत्तर सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए विद्यार्थी यहाँ से मदद ले सकते हैं। कक्षा 10 संस्कृत पाठ 4 में हमें राम के साथ लव और कुश के संवाद तथा उनकी सुन्दरता का व्याख्यान देखने को मिलता है। पाठ का हिंदी अनुवाद दिया गया है ताकि प्रत्येक छात्र पूरे पाठ को आसानी से समझ सके।

कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 4 के लिए एनसीईआरटी समाधान

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संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
(सिंहासनस्थ: राम: । तत: प्रविशत: विदूषकेनोपदिश्यमानमार्गौ तापसौ कुशलवौ)(श्रीराम सिंहासन पर बैठे हैं। उसके बाद विदूषक से उपदेश दिए जाते हुए (बातचीत करते हुए तपस्वी कुश और लव प्रवेश करते हैं।)
विदूषक: – इत इत आर्यौ!विदूषक – हे आर्य! इधर से इधर से।
कुशलवौ – (रामम्‌ उपसृत्य प्रणम्य च) अपि कुशलं महाराजस्य?कुश-लव – (राम के पास जाकर और प्रणाम करके) क्या महाराजा की कुशलता है?
राम: – युष्मद्दर्शनात्‌ कुशलमिव। भवतो: किं वयमत्र कुशलप्रश्नस्य भाजनम्‌ एव, न पुनरतिथिजनसमुचितस्य कण्ठाश्लेषस्य। (परिष्वज्य) अहो हृदयग्राही स्पर्श:।राम – तुम्हारे दर्शन से कुशल जैसा हूँ। क्या दोनों के कुशलता के प्रश्न का ही मैं यहाँ पात्र हूँ, फिर अतिथि के गले लगाने का औचित्य नहीं है। (आलिंगन करके) अरे हृदय को ले लेने (छू लेने) वाला स्पर्श है। (आधे सिंहासन पर बैठा लेते हैं)
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
उभौ – राजासनं खल्वेतत्‌, न युक्तमध्यासितुम्‌।दोनों – निश्चय से यह राजा का सिंहासन है, यहाँ (हमारा) बैठना उचित नहीं है।
राम: – सव्यवधानं न चारित्रलोपाय। तस्मादङ्क – व्यवहितमध्यास्यतां सिंहासनम्‌। (अटमुपवेशयति)राम – रूकावट के साथ आचरण करना चरित्र के लोप का कारण नहीं होता तो हृदय के (गोद के) समीप होने के कारण सिंहासन पर बैठो। (गोद में बैठाते हैं)
उभौ – (अनिच्छां नाटयत:) राजन्‌! अलमतिदाक्षिण्येन।दोनों – (अनिच्छा को प्रकट करते हैं) महाराज! अधिक कुशलता (उदारता) न करें।
राम: – अलमतिशालीनतया।राम – बहुत अधिक शालीनता (शिष्टता) न करें।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
भवति शिशुजनो वयोऽनुरोधाद्‌ गुणमहतामपि लालनीय एव।बच्चा अपनी आयु के कारण से गुणों से महान लोगों के (में) भी लालन के योग्य ही तो है।
व्रजति हिमकरोऽपि बालभावात्‌ पशुपति-मस्तक-केतकच्छदत्वम्‌॥चन्द्रमा भी बालभाव की सुन्दरता के कारण से शिवजी के मस्तक के केतकी के पुष्पों से बने जूड़े का रूप धारण कर लेता है।
राम: – एष भवतो: सौन्दर्यावलोकजनितेन कौतूहलेन पृच्छामि-क्षत्रियकुल- पितामहयो: सूर्यचन्द्रयो: को वा भवतोर्वंशस्य कर्त्ता?राम – यह आप दोनों ही सुन्दरता को देखने से उत्पन्न कुतूहल के कारण पूछता हूँ-क्षत्रिय कुल के पितामह सूर्य अथवा चन्द्रमा में (से) कौन आपके वंश का कर्ता (पूर्वज) है?
लव: – भगवान्‌ सहस्रदीधिति:।लव – भगवान् सूर्य।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
राम: – कथमस्मत्समानाभिजनौ संवृत्तौ?राम – कैसे हम दोनों एक समान कुल (वंश) में पैदा होने वाले हो गए हैं?
विदूषक: – किं द्वयोरप्येकमेव प्रतिवचनम्‌?विदूषक – क्या दोनों का एक ही उत्तर है?
लव: – भ्रातरावावां सोदर्यौ।लव – हम दोनों सगे भाई हैं?
राम: – समरूप: शरीरसन्निवेश:। वयसस्तु न किञ्चिदन्तरम्‌।राम – शरीर की बनावट एक जैसी है। आयु में भी कुछ अन्तर नहीं है।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
लव: – आवां यमलौ।लव – हम दोनों जुड़वे हैं।
राम: – सम्प्रति युज्यते। किं नामधेयम्‌?राम – अब ठीक है। क्या नाम है?
लव: – आयर्स् य वन्दनायां लव इत्यात्मानं श्रावयामि (कुशं निदिर्श्य) आर्योऽपि गुरुचरणवन्दनायाम्‌ _______लव – आर्य की वन्दना में लव इस प्रकार अपने आपको सुनाता हूँ (कुश को निर्देश करके) आर्य भी गुरुचरणों की वन्दना में _________
कुश: – अहमपि कुश इत्यात्मानं श्रावयामि।कुश – मैं भी कुश इस तरह अपने आपको सुनाता हूँ।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
राम: – अहो! उदात्तरम्य: समुदाचार:।राम- अरे! यह उदात्त और सुन्दर आचरण है।
किं नामधेयो भवतोर्गुरु:?आप दोनों के गुरु जी का क्या नाम है?
लव: – ननु भगवान्‌ वाल्मीकि:।लव – निश्चय से भगवान वाल्मीकि ।
राम: – केन सम्बन्धेन?राम – किस सम्बन्ध से? (किस नाते से)
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
लव: – उपनयनोपदेशेन।लव – उपनयन (यज्ञोपवीत/जनेऊ) के उपदेश के कारण से।
राम: – अहमत्र भवतो: जनकं नामतो वेदितुमिच्छामि।राम – मैं आप दोनों के पिता को नाम से जानना चाहता हूँ।
लव: – न हि जानाम्यस्य नामधेयम्‌। न कश्चिदस्मिन्‌ तपोवने तस्य नाम व्यवहरति।लव – मैं इनका नाम नहीं जानता हूँ। न कोई इस तपोवन में उनका नाम लेता है।
राम: – अहो माहात्म्यम्‌।राम – अरे! महानता।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
कुश: – जानाम्यहं तस्य नामधेयम्‌।कुश – उनका नाम जानता हूँ।
राम: – कथ्यताम्‌।राम – कहो।
कुश: – निरनुक्रोशो नाम….कुश – निर्दयी नाम ….
राम: – वयस्य, अपूर्वं खलु नामधेयम्‌।राम – मित्र, निश्चय से यह विचित्र नाम है।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
विदूषक: – (विचिन्त्य) एवं तावत्‌ पृच्छामि। निरनुक्रोश इति क एवं भणति?विदूषक – (सोचकर) तो ऐसे ही पूछता हूँ। निर्दयी यह कौन बोलता है?
कुश: – अम्बा।कुश – माँ।
विदूषक: – किं कुपिता एवं भणति, उत प्रकृतिस्था?विदूषक – क्या क्रोधित होकर ऐसा बोलती हैं अथवा स्वाभाविक रूप से?
कुश: – यद्यावयोर्बालभावजनितं किञ्चिदविनयं पश्यति तदा एवम्‌ अधिक्षिपति- निरनुक्रोशस्य पुत्रौ, मा चापलम्‌ इति।कुश – यदि हम दोनों के बालपन से उत्पन्न कुछ उद्दण्डता देखती हैं तो ऐसे फटकारती हैं निर्दयों के पुत्र चंचलता मत करो।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
विदूषक: – एतयोर्यदि पितुर्निरनुक्रोश इति नामधेयम्‌ एतयोर्जननी तेनावमानिता निर्वासिता एतेन वचनेन दारकौ निर्भर्त्सयति।विदूषक – यदि इन दोनों के पिता निर्दयी नाम वाले हैं तो इनकी माता उनेक द्वारा अपमानित एवं निकाल दी गई है। अतः इस वचन से बच्चों को धमकाती है।
राम: – (स्वगतम्‌) धिङ्‌ मामेवंभूतम्‌। सा तपस्विनी मत्कृतेनापराधेन स्वापत्यमेवं मन्युगर्भैरक्षरैर्निर्भर्त्सयति। (सवाष्पमवलोकयति)राम – (अपने मन में) ऐसे हुए (सीता को निकालने से) मुझको धिक्कार है। वह तपस्विनी (सीता) मुझसे किए गए अपराध से अपनी सन्तान को इस प्रकार क्रोध भरे शब्दों से धमकाती है। (नेत्रों में आँसू के साथ देखते हैं)
राम: – अतिदीर्घ: प्रवासोऽयं दारुणश्च। (विदूषकमवलोक्य जनान्तिकम्‌) कुतूहलेनाविष्टो मातरमनयोर्नामतो वेदितुमिच्छामि। राम – यह यात्रा बहुत लम्बी और कष्टदायी है। (विदूषक को देखकर परदे के पीछे) कौतूहल वश घिरे हुए इनकी माता को नाम से जानना चाहता हूँ
न युक्तं च स्त्रीगतमनुयोक्तुम्‌, विशेषतस्तपोवने। तत्‌ कोऽत्राभ्युपाय:?और स्त्री से संबंधित कार्य (पूरा परिचय जानना) उचित नहीं है। विशेषकर तवोवन में तो यहाँ क्या उपाय है?
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
विदूषक: – (जनान्तिकम्‌) अहं पुन: पृच्छामि। (प्रकाशम्‌) किं नामधेया युवयोर्जननी?विदूषक -(परदे के पीछे) मैं फिर से पूछता हूँ। (प्रकट रूप में) तुम्हारी माता किस नाम वाली है?
लव: – तस्या: द्वे नामनी।लव – उनके दो नाम हैं।
विदूषक: – कथमिव?विदूषक – कैसे?
लव: – तपोवनवासिनो देवीति नाम्नाह्वयन्ति, भगवान्‌ वाल्मीकिर्वधूरिति।लव – तपोवन निवासी उनको देवी नाम से बुलाते हैं, भगवान वाल्मीकि बहू के नाम से।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
राम: – अपि च इतस्तावद्‌ वयस्य! मुहूर्त्तमात्रम्‌।राम – मित्र तो और इधर भी थोड़ी देर के लिए।
विदूषक: – (उपसृत्य) आज्ञापयतु भवान्‌।विदूषक – (पास जाकर) आप (महाराज) आज्ञा दीजिए।
राम: – अपि कुमारयोरनयोरस्माकं च सर्वथा समरूप: कुटुम्बवृत्तान्त:? (नेपथ्ये)राम – इन दोनों कुमारों का और मेरे परिवार का विवरण पूरी तरह समान है? (परदे के पीछे से)
इयती वेला सञ्जाता, रामायणगानस्य नियोग: किमर्थं न विधीयते?इतना समय हो गया रामायण के गाने का कार्य क्यों नहीं किया जा रहा है?
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
उभौ – राजन्‌! उपाध्यायदूतोऽस्मान्‌ त्वरयति।दोनों – महाराज! गुरुवर के दूत हमको जल्दी करने के लिए कह रहे हैं।
राम: – मयापि सम्माननीय एव मुनिनियोग:। तथाहि-राम- मुझे भी गुरुवर का आदेश सम्माननीय (मानने योग्य) है। क्योंकि –
भवन्तौ गायन्तौ कविरपि पुराणो व्रतनिधिर्‌आप दोनों के द्वारा गाया जाने वाला यह विवरण (कथा) अति वयोवृद्ध (पुराण) व्रतों के सागर कवि विद्वान भगवान वाल्मीकि की रचना है।
गिरां सन्दर्भोऽयं प्रथममवतीर्णो वसुमतीम्‌।इसकी वाणी धरती पर प्रथमवार उतरी है।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
कथा चेयं श्लाघ्या सरसिरुहनाभस्य नियतं पुनाति श्रोतारं रमयति च सोऽयं परिकर:॥यह कथा भगवान कमल नाभि विष्णु से सम्बन्धित है।
वयस्य! अपूर्वोऽयं मानवानां सरस्वत्यवतार:, तदहं सुहृज्जनसाधारणं श्रोतुमिच्छामि। इस तरह निश्चय से यह संयोग श्रोताओं को पवित्र व आनन्दित करता है।
सन्निधीयन्तां सभासद:, प्रेष्यतामस्मदन्तिकं सौमित्रि:, अहमप्येतयोश्चिरासनपरिखेदं विहरणं कृत्वा अपनयामि।हे मित्र! यह मनुष्यों में सरस्वती के अवतार अनोखे (विचित्र) हैं, तो मैं साधारण हृदयशील लोग की तरह सुनना चाहता हूँ। सभासद शान्त हो, लक्ष्मण को हमारे पास भेज दो, मैं भी इन दोनों के समाने बहुत देर से आसन पर बैठने से दु:ख को घूम करके हटा रहा हूँ।
(इति निष्क्रान्ता: सर्वे)(इस प्रकार से सब निकल गए)
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