एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 11 प्राणेभ्योऽपि प्रिय: सुहृद्‌

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 11 – एकादश: पाठ: प्राणेभ्योऽपि प्रिय: सुहृद्‌ शेमुषी भाग 2 के सभी प्रश्न उत्तर तथा रिक्त स्थान आदि के हल सीबीएसई सत्र 2022-2023 के छात्र यहाँ से मुफ़्त में डाउनलोड करें। कक्षा 10 संस्कृत का पाठ 11 संवाद पर आधारित नाटक के कुछ अंश हैं, जिसमें चाणक्य की भूमिका को बहुत अच्छे से दर्शाया गया है। हिंदी अनुवाद का प्रयोग करके विद्यार्थी आसानी से पाठ के सारांश को समझ सकते हैं।

कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 11 के लिए एनसीईआरटी समाधान

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संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चाणक्य: – वत्स! मणिकारश्रेष्ठिनं चन्दनदासमिदानीं द्रष्टुमिच्छामि।चाणक्य – बेटा (प्रिय)! जौहरी सेठ चन्दनदास को इस समय देखना (मिलना) चाहता हूँ।
शिष्य: – तथेति (निष्क्रम्य चन्दनदासेन सह प्रविश्य) इत: इत: श्रेष्ठिन्‌! (उभौ परिक्रामत:)शिष्य – ठीक है (वैसा ही हो) (निकलकर चन्दनदास के साथ प्रवेश करके) इधर-से-इधर से श्रेष्ठी (सेठ जी)। (दोनों घूमते हैं)
शिष्य: – (उपसृत्य) उपाध्याय! अयं श्रेष्ठी चन्दनदास:।शिष्य – (पास जाकर) आचार्य जी! यह सेठ चन्दनदास है।
चन्दनदास: – जयत्वार्य:चन्दनदास – आर्य की विजय हो
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चाणक्य: – श्रेष्ठिन्‌! स्वागतं ते। अपि प्रचीयन्ते संव्यवहाराणां वृद्धिलाभा:?चाणक्य – सेठ! तुम्हारा स्वागत है। क्या व्यवहारों का (कारोबार में) लाभ बढ़ रहे हैं?
चन्दनदास: – (आत्मगतम्‌) अत्यादर: शटनीय:। (प्रकाशम्‌) अथ किम्‌। चंदनदास – (मन-ही-मन में) अधिक सम्मान शंका के योग्य है। (प्रकट रूप से) और क्या।
आर्यस्य प्रसादेन अखण्डिता मे वणिज्या।आर्य की कृपा से मेरा व्यापार अखण्डित है।
चाणक्य: – भो श्रेष्ठिन्‌! प्रीताभ्य: प्रकृतिभ्य: प्रतिप्रियमिच्छन्ति राजान:।चाणक्य – अरे सेठ! प्रसन्न स्वभाव वालों (लोगों) से राजा लोग उपकार के बदले किए गए उपकार को चाहते हैं।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चन्दनदास: – आज्ञापयतु आर्य:, किं कियत्‌ च अस्मज्जनादिष्यते इति।चन्दनदास – आर्य आज्ञा दें, क्या और कितना इस व्यक्ति से आशा करते हैं।
चाणक्य: – भो श्रेष्ठिन्‌! चन्द्रगुप्तराज्यमिदं न नन्दराज्यम्‌। चाणक्य – अरे सेठ! यह चन्द्रगुप्त का राज्य है
नन्दस्यैव अर्थसम्बन्ध: प्रीतिमुत्पादयति। नन्द का राज्य नहीं। नन्द का राज्य ही धन से प्रेम रखता है।
चन्द्रगुप्तस्य तु भवतामपरिक्लेश एव।चन्द्रगुप्त तो आपके सुख से ही (प्रेम रखता है)।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चन्दनदास: – (सहर्षम्‌) आर्य! अनुगृहीतोऽस्मि।चन्दनदास – (खुशी के साथ) आर्य! आभारी हूँ।
चाणक्य: – भो श्रेष्ठिन्‌! स चापरिक्लेश: कथमाविर्भवति इति ननु भवता प्रष्टव्या: स्म:।चाणक्य – हे सेठ! और वह दुःख का अभाव कैसे उत्पन्न होता है यही आपसे पूछने योग्य है।
चन्दनदास: – आज्ञापयतु आर्य:।चन्दनदास – आर्य आज्ञा दीजिए।
चाणक्य: – राजनि अविरुद्धवृत्तिर्भव।चाणक्य – राजा में (के लिए) विरुद्ध व्यवहार वाला न होओ (बनो)।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चन्दनदास: – आर्य! क: पुनरधन्यो राज्ञो विरुद्ध इति आर्येणावगम्यते?चन्दनदास – आर्य! फिर कौन अभागा राजा के विरुद्ध है ऐसा आर्य समझते हैं।
चाणक्य: – भवानेव तावत्‌ प्रथमम्‌।चाणक्य – सबसे पहले तो आप ही।
चन्दनदास: – (कर्णौ पिधाय) शान्तं पापम्‌, शान्तं पापम्‌। कीदृशस्तृणानामग्निना सह विरोध:?चन्दनदास (कानों को छूकर/बन्द करके) क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए। सूखी घासों का आग के साथ कैसा विरोध?
चाणक्य: – अयमीदृशो विरोध: यत्‌ त्वमद्यापि राजापथ्यकारिणोऽमात्यराक्षसस्य गृहजनं स्वगृहे रक्षसि।चाणक्य – यह ऐसा विरोध है कि तुम आज भी राजा का बुरा करने वाले अमात्य राक्षस के परिवार को अपने घर में रखते हो।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चन्दनदास: – आर्य! अलीकमेतत्‌। केनाप्यनार्येण आर्याय निवेदितम्‌।चन्दनदास – हे आर्य! यह झूठ है। किसी दुष्ट ने आर्य को (गलत) कहा है।
चाणक्य: – भो श्रेष्ठिन्‌! अलमाशटया। भीता: पूर्वराजपुरुषा: पौराणामनिच्छतामपि गृहेषु गृहजनं निक्षिप्य देशान्तरं व्रजन्ति। चाणक्य – हे सेठ! आशंका (संदेह) मत करो। डरे हुए भूतपूर्व (पिछले/अपदस्थ) राजपुरुष पुर (नगर) वासियों की इच्छा से भी (उनके) घरों में परिवार जन को रखकर (छोड़कर) दूसरे स्थानों को चले जाते हैं।
ततस्तत्प्रच्छादनं दोषमुत्पादयति।उससे उन्हें छिपाने का दोष पैदा होता है।
चन्दनदास: – एवं नु इदम्‌। तस्मिन्‌ समये आसीदस्मद्‌गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति।चन्दनदास – निश्चय से ऐसा ही है। उस समय हमारे घर में अमात्य राक्षस का परिवार था।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चाणक्य: – पूर्वम्‌ ‘अनृतम्‌’, इदानीम्‌ “आसीत्‌” इति परस्परविरुद्धे वचने।चाणक्य – पहले ‘झूठ’ अब “था” ये दोनों आपस में विरोधी वचन हैं।
चन्दनदास: – आर्य! तस्मिन्‌ समये आसीदस्मद्‌गृहे अमात्यराक्षसस्य गृहजन इति।चन्दनदास – आर्य। उस समय हमारे घर में अमात्य राक्षस का परिवार था।
चाणक्य: – अथेदानीं क्व गत:?चाणक्य – अब इस समय कहाँ गया है?
चन्दनदास: – न जानामि।चन्दनदास – नहीं जानता हूँ।
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चाणक्य: – कथं न ज्ञायते नाम? भो श्रेष्ठिन्‌! शिरसि भयम्‌, अतिदूरं तत्प्रतिकार:।चाणक्य – क्यों नहीं जानते हो? हे सेठ! सिर पर डर है, उसका समाधान बहुत दूर है।
चन्दनदास: – आर्य! किं मे भयं दर्शयसि? सन्तमपि गेहे अमात्यराक्षसस्य गृहजनं न समर्पयामि, किं पुनरसन्तम्‌?चन्दनदास – आर्य! क्यों मुझे डर दिखाते हो? अमात्य राक्षस के परिवार के घर में होने पर भी नहीं समर्पित करता, फिर न होने पर तो बात ही क्या है?
चाणक्य: – चन्दनदास! एष एव ते निश्चय:?चाणक्य – हे चन्दनदास! यही तुम्हारा निश्चय है?
संस्कृत वाक्यहिन्दी अनुवाद
चन्दनदास: – बाढम्‌, एष एव मे निश्चय:।चन्दनदास – हाँ, यही मेरा निश्चय है।
चाणक्य: – (स्वगतम्‌) साधु! चन्दनदास साधु।चाणक्य – (अपने मन में) शाबाश ! चन्दनदास शाबाश।
सुलभेष्वर्थलाभेषु परसंवेदने जने। क इदं दुष्करं कुर्यादिदानीं शिविना विना॥दूसरे की वस्तु को समर्पित करने पर बहुत धन का लाभ सरल होने की स्थिति में दूसरों की वस्तु की सुरक्षा रूपी कठिन कार्य को एक शिवि को छोड़कर तुम्हारे अलावा कौन कर सकता है?
कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 11 एनसीईआरटी समाधान
कक्षा 10 संस्कृत अध्याय 11 एनसीईआरटी के प्रश्न उत्तर
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