एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 भारतजनताऽहम्‌

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 सप्तम: पाठ: भारतजनताऽहम्‌ के अभ्यास के प्रश्न उत्तर के साथ-साथ पूरे पाठ का हिंदी अनुवाद सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ से प्राप्त किए जा सकते हैं। इस कविता में कवि ने भारत के लोगों की विभिन्न रुचियों और कौशल के बारे में बताते हुए उनकी विशेषताओं का उल्लेख किया है। कविता के साथ-साथ कविता का का हिंदी अनुवाद भी दिया गया है ताकि प्रत्येक पंक्ति को समझने में कोई दिक्कत न हो।

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत सप्तम: पाठ: भारतजनताऽहम्‌

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कक्षा 8 संस्कृत अध्याय 7 भारतजनताऽहम्‌ का हिंदी अनुवाद

संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
अभिमानधना विनयोपेता, शालीना भारतजनताऽहम्‌। कुलिशादपि कठिना कुसुमादपि, सुकुमारा भारतजनताऽहम्‌।1।मैं भारत की जनता हूँ। मैं स्वाभिमान रूपी धन वाली हूँ। मैं वज्र से भी कठोर हूँ। मैं विनम्रता से परिपूर्ण तथा शालीन हूँ। मैं फूल से भी अत्यधिक कोमल हूँ।
निवसामि समस्ते संसारे, मन्ये च कुटुम्बं वसुन्धराम्‌। प्रेय: श्रेय: च चिनोम्युभयं, सुविवेका भारतजनताऽहम्‌।2।मैं भारत की जनता हूँ। मैं समस्त संसार में निवास करती हूँ और (समस्त) भूमण्डल को परिवार मानती हूँ। रुचिकर और कल्याणप्रद दोनों (मार्गों) का चयन करती हूँ। अच्छे विवेक से पूर्ण हूँ।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
विज्ञानधनाऽहं ज्ञानधना, साहित्यकला-सङ्गीतपरा। अध्यात्मसुधातटिनी-स्नानै:, परिपूता भारतजनताऽहम्‌।3।मैं भारत की जनता हूँ। मैं विज्ञान रूपी धन वाली, ज्ञान रूपी धन वाली तथा साहित्य, कला व संगीत परायण हूँ। मैं अध्यात्म रूपी अमृतमयी नदी में स्नान से अत्यधिक पवित्र हूँ।
मम गीतैर्मुग्धं समं जगत्‌, मम नृत्यैर्मुग्धं समं जगत्‌। मम काव्यैर्मुग्धं समं जगत्‌, रसभरिता भारतजनताऽहम्‌।4।मेरे गीतों के द्वारा सारा संसार मुग्ध है, मेरे नृत्य के द्वारा सारा संसार मुग्ध है तथा मेरे काव्य के द्वारा सारा संसार मुग्ध है। मैं रस से परिपूर्ण भारत की जनता हूँ।
उत्सवप्रियाऽहं श्रमप्रिया, पदयात्रा-देशाटन-प्रिया। लोकक्रीडासक्ता वर्धेऽतिथिदेवा, भारतजनताऽहम्‌।5।मैं भारत की जनता हूँ। मैं उत्सवप्रिय, श्रमप्रिय तथा पदयात्रा के द्वारा देशों का भ्रमण करने वाली हूँ। मैं लोक, क्रीडाओं अनुराग रखने वाली, अतिथि प्रिय हूँ। मैं वृद्धि को प्राप्त होती हूँ।
संस्कृत वाक्यहिंदी अनुवाद
मैत्री मे सहजा प्रकृतिरस्ति, नो दुर्बलताया: पर्याय:। मित्रस्य चक्षुषा संसारं, पश्यन्ती भारतजनताऽहम्‌।6।मित्रता हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति है तथा दुर्बलता का पर्याय नहीं है। (सम्पूर्ण) संसार को मित्र की दृष्टि से देखती हुई मैं भारत की जनता हूँ।
विश्वस्मिन्‌ जगति गताहमस्मि, विश्वस्मिन्‌ जगति सदा दृश्ये। विश्वस्मिन्‌ जगति करोमि कर्म, कर्मण्या भारतजनताऽहम्‌।7।मैं सम्पूर्ण जगत् में गई हूँ। मुझे सम्पूर्ण जगत् में देखा जाता है। मैं सम्पूर्ण जगत् में कार्य करती हूँ। मैं कर्मशील भारत की जनता हूँ।
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