एनसीईआरटी समाधान कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 बकस्य प्रतिकारः

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 बकस्य प्रतिकारः पाठ्यपुस्तक रुचिरा भाग 1 के अभ्यास के प्रश्नों के हल, रिक्त स्थान, शब्द अर्थ, मिलान आदि के उत्तर यहाँ से निशुल्क प्राप्त करें। कक्षा 6 संस्कृत पाठ 7 के उत्तर शैक्षणिक सत्र 2022-2023 के अनुसार सीबीएसई तथा राजकीय बोर्ड के अनुसार संशोधिक किए गए हैं। प्रश्नों के उत्तर सरल तरीके से दिए गए हैं ताकि प्रत्येक विद्यार्थी को आसानी से समझ आ सके।

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कक्षा 6 संस्कृत अध्याय 7 बकस्य प्रतिकारः का हिंदी अनुवाद

संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
एकस्मिन्‌ वने शृगाल: बक: च निवसत: स्म।किसी वन में एक सियार और एक बगुला रहते थे।
तयो: मित्रता आसीत्‌।उन दोनों में मित्रता (दोस्ती) थी।
एकदा प्रात: शृगाल: बकम्‌ अवदत्‌- “मित्र! श्व: त्वं मया सह भोजनं कुरु।”एक दिन सुबह सियार ने बगुले को कहा- “मित्र! कल तुम मेरे साथ खाना खाओ।”
शृगालस्य निमन्त्रणेन बक: प्रसन्न: अभवत्‌।सियार के निमंत्रण से बगुला बहुत खुश हुआ।
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
अग्रिमे दिने स: भोजनाय शृगालस्य निवासम्‌ अगच्छत्‌।अगले दिन वह भोजन के लिए सियार के निवास स्थान पर गया।
कुटिलस्वभाव: शृगाल: स्थाल्यां बकाय क्षीरोदनम्‌ अयच्छत्‌।कुटिल स्वभाव वाले सियार ने थाली में खीर डाल दी।
बकम्‌ अवदत्‌ च-“मित्र! अस्मिन्‌ पात्रे आवाम्‌ अधुना सहैव खादाव:।”बगुले ने कहा-“मित्र, इस बर्तन में साथ खाते हैं।
भोजनकाले बकस्य चञ्चु: स्थालीत: भोजनग्रहणे समर्था न अभवत्‌।बगुले की चोंच थाली से भोजन ग्रहण करने में असमर्थ थी।
अत: बक: केवलं क्षीरोदनम्‌ अपश्यत्‌।इसप्रकार, बगुला केवल खीर देखता रहा।
शृगाल: तु सर्वं क्षीरोदनम्‌ अभक्षयत्‌।सियार ने सारी खीर ली।
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
शृगालेन वञ्चित: बक: अचिन्तयत्‌-“यथा अनेन मया सह व्यवहार: कृत: तथा अहम्‌ अपि तेन सह व्यवहरिष्यामि”।सियार द्वारा ठगे जाने पर बगुले ने सोचा, “जिस प्रकार इसने मेरे साथ बर्ताव किया है, मैं भी उसके साथ यह बर्ताव करूँ।”
एवं चिन्तयित्वा स: शृगालम्‌ अवदत्‌-“मित्र! त्वम्‌ अपि श्व: सायं मया सह भोजनं करिष्यसि”।ऐसा सोचकर उसने सियार से कहा- “दोस्त। तुम भी न मेरे साथ शाम को भोजन करोगे।”
बकस्य निमन्त्रणेन शृगाल: प्रसन्न: अभवत्‌।बगुले के निमंत्रण से सियार खुश हो गया।
यदा शृगाल: सायं बकस्य निवासं भोजनाय अगच्छत्‌, तदा बक: सङ्कीर्णमुखे कलशे क्षीरोदनम्‌ अयच्छत्‌,जब सियार शाम को बगुले के निवास स्थान पर भोजन के लिए आया, तब बगुले ने छोटे सुख कलश (सुराही) में खीर डाल दी।
संस्कृत में वाक्यहिंदी में अनुवाद
शृगालं च अवदत्‌-“मित्र! आवाम्‌ अस्मिन्‌ पात्रे सहैव भोजनं कुर्व:”।और सियार से कहा- “दोस्त! हम दोनों इसी बर्तन में साथ भोजन करते हैं।”
बक: कलशात्‌ चञ्च्वा क्षीरोदनम्‌ अखादत्‌।बगुले ने कलश से चोंच द्वारा खीर खाई।
परन्तु शृगालस्य मुखं कलशे न प्राविशत्‌।परंतु सियार का मुंह कलश में न जा सका।
अत: बक: सर्वं क्षीरोदनम्‌ अखादत्‌।इसलिए बगुला सारी खीर खा गया।
शृगाल: च केवलम्‌ ईर्ष्यया अपश्यत्‌।सियार केवल ईर्ष्या से देखता रहा।
शृगाल: बकं प्रति यादृशं व्यवहारम्‌ अकरोत्‌ बक: अपि शृगालं प्रति तादृशं व्यवहारं कृत्वा प्रतीकारम्‌ अकरोत्‌।सियार ने बगुले के प्रति जिस प्रकार का व्यवहार किया बगुले ने भी सियार के साथ वैसा ही व्यवहार करके बदला लिया।
    • आत्मदुर्व्यवहारस्य फलं भवति दु:खदम्‌।
      तस्मात्‌ सद्‌व्यवहर्तव्यं मानवेन सुखैषिणा॥
    • अपने बुरे व्यवहार का परिणाम दुखद ही होता है।
      इस कारण सुख चाहने वाले मानव को सभी से सदा अच्छा व्यवहार करना चाहिए।
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