कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 एनसीईआरटी समाधान – ऊर्जा के स्रोत

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 के लिए एनसीईआरटी समाधान पाठ 14 ऊर्जा के स्रोत के अभ्यास तथा पाठ के बीच में दिए गए प्रश्नों के उत्तर तथा सभी सवालों के जवाब विद्यार्थी यहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। वर्ग 10 विज्ञान अध्याय 14 के सलूशन सीबीएसई सत्र २०२१-२०२२ के अनुसार तैयार किए गए हैं। प्रश्नों के उत्तर सरल तथा आसान भाषा में चित्रों के माध्यम से समझकर बनाए गए हैं। सीबीएसई सत्र 2021-2022 के समाधानों के लिए आप कक्षा 10 विज्ञान ऑफलाइन ऐप का भी प्रयोग कर सकते हैं। 10वीं विज्ञान का यह एप्लीकेशन बिना इन्टरनेट के भी अच्छी तरह कार्य करता है।

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 के लिए एनसीईआरटी समाधान

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 के बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) उत्तर

Q1

अम्लीय वर्षा होने का कारण यह है कि

[A]. पृथ्वी के वायुमंडल में अम्ल होते हैं
[B]. बादलों में घर्षण के कारण विद्युत आवेश उत्पन्न होते हैं
[C]. सूर्य वायुमंडल की ऊपरी परतों को तप्त करना आरंभ करता है
[D]. जीवाश्मी ईंधनों के जलने पर वायुमंडल में कार्बन, नाइट्रोजन व सल्फर के ऑक्साइड मुक्त होते हैं
Q2

जल विद्युत संयंत्र में

[A]. जल से विद्युत निष्कर्ष की जाती है
[B]. विद्युत प्राप्त करने के लिए जल को भाप में रूपांतरित किया जाता है
[C]. संचित जल की स्थितिज ऊर्जा विद्युत में रूपांतरित हो जाती है
[D]. संचित जल की गतिज ऊर्जा स्थितिज ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है
Q3

महासागरीय तापीय ऊर्जा का कारण है

[A]. महासागर में विभिन्न स्तरों पर ताप में अंतर
[B]. महासागर में उत्पन्न ज्वार
[C]. महासागर में तरंगों द्वारा संचित ऊर्जा
[D]. महासागर में विभिन्न स्तरों पर दाब में अंतर
Q4

पवन शक्ति के संदर्भ में असत्य प्रकथन का चयन कीजिए।

[A]. खुले स्थानों पर न्यूनतम पवन ऊर्जा की अपेक्षा की जाती है
[B]. पवन चक्की की पंखुड़ियों के घूर्णन की ऊर्जा के उपयोग की एक संभावित विधि विद्युत जनित्र के टरबाइन को घुमाना है
[C]. पवन चक्की की पंखुड़ियों से टकराने वाली पवनें पवन चक्की में घूर्णन उत्पन्न करती हैं, इस प्रकार प्राप्त घूर्णन का उपयोग किया जा सकता है
[D]. अधिक ऊँचाई वाले स्थानों पर पवनों की स्थितिज ऊर्जा पवन शक्ति का स्रोत होती है

हमें ऊर्जा के स्रोतों की आवश्यकता क्यों होती है?

ऊर्जा के स्रोतों की आवश्यकता के निम्नलिखित कारण हैं:

    • खाना बनाने के लिए
    • प्रकाश उत्पन्न करने के लिए
    • यातायात के लिए
    • मशीनों को चलाने के लिए
    • उद्योगों एवं कृषि कार्य में।

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 के अतिरिक्त प्रश्न उत्तर

ऊर्जा का उत्तम स्रोत किसे कहते हैं?

एक उत्तम ऊर्जा का स्रोत वह है, जो-

    • (i) प्रति एकांक आयतन अथवा प्रति एकांक द्रव्यमान अधिक कार्य करे।
    • (ii) सरलता से सुलभ हो सके।
    • (iii) भंडारण तथा परिवहन में आसान हो।
    • (iv) कदाचित सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह सस्ता भी हो।
प्राचीन काल में ऊष्मीय ऊर्जा का स्रोत क्या था?

प्राचीन काल में ऊष्मीय ऊर्जा का सबसे अधिक सामान्य स्रोत लकड़ी था। कुछ सीमित क्रियाकलापों के लिए पवन तथा बहते जल की ऊर्जा का भी उपयोग किया जाता था।

हमें जीवाश्मी ईंधन को क्यों संरक्षित करना चाहिए?

ये ईंधन करोड़ों वर्षों में बने हैं तथा अब केवल इनके सीमित मात्रा ही शेष हैं। जीवाश्मी ईंधन ऊर्जा के अनवीकरणीय स्रोत हैं। यदि हम इन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग इसी चिंताजनक दर से करते रहेंगे तो हमारे ये भंडार शीघ्र ही रिक्त हो जाएँगे। अत: इन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है।

जीवाश्मी ईंधन को अधिक मात्रा में उपयोग करने से क्या हानियाँ हो सकती हैं?

जीवाश्मी ईंधन के जलने पर मुक्त होने वाले कार्बन, नाइट्रोजन तथा सल्फर के ऑक्साइड, अम्लीय ऑक्साइड होते हैं। इनसे अम्लीय वर्षा होती है जो हमारे जल तथा मृदा के संसाधनों को प्रभावित करती है। वायु प्रदूषण की समस्या के अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसों के ग्रीन हाउस (पौधघर) प्रभाव को भी बढाती हैं।

तापीय विद्युत संयंत्र किस प्रकार कार्य करता है?

इन संयंत्रों को तापीय विद्युत संयंत्र कहने का कारण यह है कि इन संयंत्रों में ईंधन के दहन द्वारा ऊष्मीय ऊर्जा उत्पन्न की जाती है जिसे विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित किया जाता है। तापीय विद्युत संयंत्रों में प्रतिदिन विशाल मात्रा में जीवाश्मी ईंधन का दहन करके जल उबालकर भाप बनाई जाती है जो टरबाइनों को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करती है। बहुत से तापीय विद्युत संयंत्र कोयले तथा तेल के क्षेत्रों के निकट स्थापित किए गए हैं।

जल विद्युत संयंत्र में किस प्रकार ऊर्जा का रूपांतरण होता है?

बहते जल की गतिज ऊर्जा अथवा किसी ऊँचाई पर स्थित जल की स्थितिज ऊर्जा को जब जल विद्युत संयंत्रों में गिराते हैं तो गिरते जल की स्थितिज ऊर्जा, विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित हो जाती है।

जल विद्युत संयंत्र में विद्युत का उत्पादन किस प्रकार किया जाता है?

जल विद्युत उत्पन्न करने के लिए नदियों के बहाव को रोककर बड़े जलाशयों (कृत्रिम झीलों) में जल एकत्र करने के लिए ऊँचे-ऊँचे बाँध बनाए जाते हैं। इन जलाशयों में जल संचित होता रहता है जिसके फलस्वरूप इनमें भरे जल का तल ऊँचा हो जाता है। बाँध के ऊपरी भाग से पाइपों द्वारा जल, बाँध के आधार के पास स्थापित टरबाइन के ब्लेडों पर मुक्त रूप से गिरता है फलस्वरूप टरबाइन के ब्लेड घूर्णन गति करते हैं और जनित्र द्वारा विद्युत उत्पादन होता है।

मोमबत्ती को जलाने पर ऊर्जा एक रूप से दूसरे रूप में किस प्रकार बदलती है?

यदि हम किसी मोमबत्ती को जलाते हैं तो रासायनिक ऊर्जा, ऊष्मीय ऊर्जा तथा प्रकाश ऊर्जा में परिवर्तित हो जाती है।

बडे़-बड़े बाँधों के निर्माण में समस्याएँ आती हैं?

बडे़-बड़े बाँधों के निर्माण में आने वाली समस्याएँ निम्नलिखित हैं:

    • (i) बाँधों का केवल कुछ सीमित क्षेत्रों में ही निर्माण किया जा सकता है तथा इनके लिए पर्वतीय क्षेत्र अच्छे माने जाते हैं।
    • (ii) बाँधों के निर्माण से बहुत-सी कृषियोग्य भूमि तथा मानव आवास डूबने के कारण, नष्ट हो जाते हैं।
    • (iii) बाँध के जल में डूबने के कारण बड़े-बड़े पारिस्थितिक तंत्र नष्ट हो जाते हैं।
    • (iv) जो पेड़-पौधे, वनस्पति आदि जल में डूब जाते हैं वे अवायवीय परिस्थितियों में सड़ने लगते हैं और विघटित होकर विशाल मात्रा में मेथैन गैस उत्पन्न करते हैं जो कि एक ग्रीन हाउस गैस है।
    • (v) बाँधों के निर्माण से विस्थापित लोगों के संतोषजनक पुनर्वास व क्षतिपूर्ति की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
गोबर गैस संयंत्र की क्रियाविधि क्या है?

गोबर गैस संयंत्र में र्इंटों से बनी गुबंद जैसी संरचना होती है। गोबर गैस बनाने के लिए मिश्रण टंकी में गोबर तथा जल का एक गाढ़ा घोल, जिसे कर्दम कहते हैं, बनाया जाता है जहाँ से इसे संपाचित्र में डाल देते हैं। संपाचित्र चारों ओर से बंद एक कक्ष होता है जिसमें ऑक्सीजन नहीं होती। अवायवीय सूक्ष्मजीव जिन्हें जीवित रहने के लिए ऑक्सीजन की आवश्यकता नहीं होती, गोबर की कर्दम के जटिल यौगिकों का अपघटन कर देते हैं। अपघटन-प्रक्रम पूरा होने तथा इसके फलस्वरूप मेथैन, कार्बन डाइऑक्साइड, हाइड्रोजन तथा हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें उत्पन्न होने में कुछ दिन लगते हैं। जैव गैस को संपाचित्र के ऊपर बनी गैस टंकी में संचित किया जाता है। जैव गैस को गैस टंकी से उपयोग के लिए पाइपों द्वारा बाहर निकाल लिया जाता है।

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 अभ्यास के लिए प्रश्न उत्तर

जैव मात्रा किसे कहते हैं?

यदि ईंधन पादप एवं जंतु उत्पाद से तैयार होता है तो इन र्इंधनों के स्रोत को हम जैव-मात्रा कहते हैं। ये ईंधन अधिक ऊष्मा उत्पन्न नहीं करते तथा इन्हें जलाने पर अत्यधिक धुआँ निकलता है इसीलिए, इन ईंधनों की दक्षता में वृद्धि के लिए प्रौद्योगिकी का सहारा आवश्यक है।

चारकोल क्या है और यह लकड़ी से किस प्रकार बेहतर है?

जब लकड़ी को वायु की सीमित आपूर्ति में जलाते हैं तो उसमें उपस्थित जल तथा वाष्पशील पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और एक अवशेष बचाता है जिसे चारकोल कहते हैं। चारकोल बिना ज्वाला के जलता है, इससे अपेक्षाकृत कम धुआँ निकलता है तथा इसकी ऊष्मा उत्पन्न करने की दक्षता भी लकड़ी से अधिक होती है।

जैव गैस क्या है? इसे गोबर गैस क्यों कहते हैं?

गोबर, फसलों के कटने के पश्चात बचे अवशिष्ट, सब्ज़ियों के अपशिष्ट जैसे विविध पादप तथा वाहित मल जब ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में अपघटित होते हैं तो बायो गैस (जैव गैस) निकलती है। चूँकि इस गैस को बनाने में उपयोग होने वाला आरंभिक पदार्थ मुख्यत: गोबर है, इसलिए इसका प्रचलित नाम “गोबर गैस” है। आजकल जैव गैस को एक संयंत्र में उत्पन्न किया जाता है।

जैव गैस एक उत्तम ईंधन क्यों है?

जैव गैस एक उत्तम र्इंधन है क्योंकि इसमें 75 प्रतिशत तक मेथैन गैस होती है। यह धुआँ उत्पन्न किए बिना जलती है। लकड़ी, चारकोल तथा कोयले के विपरीत जैव गैस के जलने के पश्चात राख जैसा कोई अपशिष्ट शेष नहीं बचता। इसकी तापन क्षमता उच्च होती है। जैव गैस का उपयोग प्रकाश के स्रोत के रूप में भी किया जाता है।

जैव गैस संयंत्र से निकली खाद किसानों के लिए अधिक उपयोगी क्यों होती है?

जैवगैस संयंत्र में शेष बची स्लरी में नाइट्रोजन तथा फॉस्फोरस प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो फ़सलों के लिए महत्वपूर्ण होते हैं। अत: यह एक उत्तम खाद के रूप में काम आती है।

जैव अपशिष्टों एवं वाहित मल को किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं?

जैव गैस संयंत्र लगाकर जैव अपशिष्टों व वाहित मल के उपयोग द्वारा जैव गैस निर्मित करके ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं। इससे हमें ऊर्जा का सुविधाजनक दक्ष स्रोत मिलता है, उत्तम खाद मिलती है और साथ ही अपशिष्ट पदार्थों के निपटारे का सुरक्षित उपाय भी मिल जाता है। जैव-मात्रा ऊर्जा का नवीकरणीय स्रोत है।

पवन ऊर्जा फार्म किसे कहते हैं?

पवन-चक्की की घूर्णी गति का उपयोग विद्युत उत्पन्न करने के लिए विद्युत जनित्र के टरबाइन को घुमाने के लिए किया जाता है। किसी एकल पवन चक्की का निर्गत (अर्थात उत्पन्न विद्युत) बहुत कम होता है जिसका व्यापारिक उपयोग संभव नहीं होता। अत: किसी विशाल क्षेत्र में बहुत-सी पवन-चक्कियाँ लगाई जाती हैं तथा इस क्षेत्र को पवन ऊर्जा फार्म कहते हैं।

पवन ऊर्जा के उपयोग की क्या सीमाएँ हैं?

पवन ऊर्जा के उपयोग करने की कई सीमाएँ हैं:

    • पहली सीमा यह है कि पवन ऊर्जा फार्म केवल उन्हीं क्षेत्रों में स्थापित किए जा सकते हैं जहाँ वर्ष के अधिकांश दिनों में तीव्र पवन चलती हों। टरबाइन की आवश्यक चाल को बनाए रखने के लिए पवन की चाल भी 15 km/h से अधिक होनी चाहिए।
    • इसके साथ ही संचायक सेलों जैसी कोई पूर्तिकर सुविधा भी होनी चाहिए जिसका उपयोग ऊर्जा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उस समय किया जा सके जब पवन नहीं चलती हों।
    • ऊर्जा फार्म स्थापित करने के लिए एक विशाल भूखंड की आवश्यकता होती है। 1MW के जनित्र के लिए पवन फार्म को लगभग 2 हेक्टेयर भूमि चाहिए।
महासागरीय तापीय ऊर्जा का उपयोग किस प्रकार किया जाता है?

समुद्रों अथवा महासागरों के पृष्ठ का जल सूर्य द्वारा तप्त हो जाता है जबकि इनके गहराई वाले भाग का जल अपेक्षाकृत ठंडा होता है। ताप में इस अंतर का उपयोग सागरीय तापीय ऊर्जा रूपांतरण विद्युत संयंत्र (OTEC विद्युत संयंत्र) में ऊर्जा प्राप्त करने के लिए किया जाता है। OTEC विद्युत संयंत्र केवल तभी प्रचालित होते हैं जब महासागर के पृष्ठ पर जल का ताप तथा 2 km तक की गहराई पर जल के ताप में 20 डिग्री सेल्सियस का अंतर हो। पृष्ठ के तप्त जल का उपयोग अमोनिया जैसे वाष्पशील द्रवों को उबालने में किया जाता है। इस प्रकार बनी द्रवों की वाष्प फिर जनित्र के टरबाइन को घुमाती है। महासागर की गहराइयों से ठंडे जल को पंपों से खींचकर वाष्प को ठंडा करके फिर से द्रव में संघनित किया जाता है।

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 के महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

व्यापारिक स्तर पर पवन-चक्कियों को प्रयोग किस प्रकार होता है?

व्यापारिक स्तर पर विद्युत प्राप्त करने के लिए किसी विशाल क्षेत्र में बहुत-सी पवन-चक्कियाँ लगाकर सभी पवन-चक्कियों को परस्पर युग्मित कर लिया जाता है जिसके फलस्वरूप प्राप्त नेट ऊर्जा सभी पवन-चक्कियों द्वारा उत्पन्न विद्युत ऊर्जाओं के योग के बराबर होती है।

डेनमार्क को पवनों का देश क्यों कहा जाता है?

डेनमार्क को “पवनों का देश” इसलिए कहते हैं क्योंकि देश की 25 प्रतिशत से भी अधिक विद्युत की पूर्ति पवन-चक्कियों के विशाल नेटवर्क द्वारा विद्युत उत्पन्न करके की जाती है।

भारत की पवन ऊर्जा में क्या क्षमता है?

भारत का पवन ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन करने वाले देशों में पाँचवाँ स्थान है। यदि हम पवनों द्वारा विद्युत उत्पादन की अपनी क्षमता का पूरा उपयोग करें तो अनुमानों के अनुसार लगभग 45,000 MW विद्युत शक्ति का उत्पादन कर सकते हैं। तमिलनाडु में कन्याकुमारी के समीप भारत का विशालतम पवन ऊर्जा फार्म स्थापित किया गया है। यह 380 MW विद्युत उत्पन्न करता है।

पवन ऊर्जा फार्म स्थापित करने की आरंभिक लागत अत्यधिक है।

इसके अतिरिक्त पवन-चक्कियों के दृढ़ आधार तथा पंखुड़ियाँ वायुमंडल में खुले होने के कारण अंधड़, चक्रवात, धूप, वर्षा आदि प्राकृतिक थपेड़ों को सहन करते हैं, अत: उनके लिए उच्च स्तर के रखरखाव की आवश्यकता होती है।

सौर ऊर्जा का कितना भाग पृथ्वी पर पहुँचता है?

सौर ऊर्जा का केवल एक लघु भाग ही पृथ्वी के वायुमंडल की बाह्य परतों पर पहुँच पाता है। इसका लगभग आधा भाग वायुमंडल से गुजरते समय अवशोषित हो जाता है तथा शेष भाग पृथ्वी के पृष्ठ पर पहुँचता है।

सौर कुकर किस प्रकार कार्य करता है?

हम जानते हैं कि सर्वसम परिस्थितियों में परावर्तक पृष्ठ अथवा श्वेत (सप़ेद) पृष्ठ की तुलना में कृष्ण (काला) पृष्ठ अधिक ऊष्मा अवशोषित करता है। इसलिए सौर कुकरों का अंदर का भाग काला होता है। कुछ सौर कुकरों में सूर्य की किरणों को फोकसित करने के लिए दर्पणों का उपयोग किया जाता है जिससे इनका ताप और उच्च हो जाता है। सौर कुकरों में काँच की शीट का ढक्कन होता है जो पौधघर प्रभाव को बढाता है और भोजन जल्दी पक जाता है।

सौर पैनल क्या होता है?

सौर सेल सौर ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित करते हैं। धूप में रखे जाने पर किसी प्ररूपी सौर सेल से 0.5-1.0 V तक वोल्टता विकसित होती है तथा लगभग 0.7 W विद्युत उत्पन्न कर सकते हैं। जब बहुत अधिक संख्या में सौर सेलों को संयोजित करते हैं तो यह व्यवस्था सौर पैनल कहलाती है जिनसे व्यावहारिक उपयोग के लिए पर्याप्त विद्युत प्राप्त हो जाती है।

सौर सेलों उपयोग के क्या लाभ हैं?

सौर सेलों के साथ संबद्ध प्रमुख लाभ यह है कि इनमें कोई भी गतिमान पुरजा नहीं होता, इनका रखरखाव सस्ता है तथा ये बिना किसी फोकसन युक्ति के काफी संतोषजनक कार्य करते हैं। सौर सेलों के उपयोग करने का एक अन्य लाभ यह है कि इन्हें सुदूर तथा अगम्य स्थानों में स्थापित किया जा सकता है। इन्हें ऐसे छितरे बसे हुए क्षेत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है जहाँ शक्ति संचरण के लिए केबल बिछाना अत्यंत खर्चीला तथा व्यापारिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं होता।

सौर सेलों को बनाने में क्या-क्या बाधाएँ हैं?

1. सौर सेल बनाने के लिए सिलिकॉन का उपयोग किया जाता है जो प्रकृति में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं, परंतु सौर सेलों को बनाने में उपयोग होने वाले विशिष्ट श्रेणी के सिलिकॉन की उपलब्धता सीमित है।
2. सौर सेलों को परस्पर संयोजित करके सौर पैनल बनाने में सिल्वर (चाँदी) का उपयोग होता है जिसके कारण लागत में और वृद्धि हो जाती है।

सौर सेलों का कहाँ उपयोग होता है?

उच्च लागत तथा कम दक्षता होने पर भी सौर सेलों का उपयोग बहुत से वैज्ञानिक तथा प्रौद्योगिक अनुप्रयोगों के लिए किया जाता है। मानव-निर्मित उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अन्वेषक युक्तियों जैसे मार्स ऑर्बिटरों में सौर सेलों का उपयोग प्रमुख ऊर्जा स्रोत के रूप में किया जाता है। रेडियो अथवा बेतार संचार तंत्रों अथवा सुदूर क्षेत्रों के टी.वी. रिले केंद्रों में सौर सेल पैनल उपयोग किए जाते हैं। ट्रैफिक सिग्नलों, परिकलकों तथा बहुत से खिलौनों में सौर सेल लगे होते हैं। सौर सेल पैनल विशिष्ट रूप से डिज़ाइन की गई आनत छतों पर स्थापित किए जाते हैं ताकि इन पर अधिक से अधिक सौर ऊर्जा आपतित हो। तथापि अत्यधिक मँहगा होने के कारण सौर सेलों का घरेलू उपयोग अभी तक सीमित है।

ज्वारीय ऊर्जा से आप क्या समझते हैं?

ज्वार-भाटे में जल के स्तर के चढ़ने तथा गिरने से हमें ज्वारीय ऊर्जा प्राप्त होती है। घूर्णन गति करती पृथ्वी पर मुख्य रूप से चंद्रमा के गुरुत्वीय खिंचाव के कारण सागरों में जल का स्तर चढ़ता व गिरता रहता है। यदि हम समुद्र का प्रेक्षण करें तो देखेंगे कि समुद्र में जल का स्तर दिन में परिवर्तित होता रहता है। इस परिघटना को ज्वार-भाटा कहते हैं। ज्वारीय ऊर्जा का दोहन सागर के किसी संकीर्ण क्षेत्र पर बाँध का निर्माण करके किया जाता है। बाँध के द्वार पर स्थापित टरबाइन ज्वारीय ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में रूपांतरित कर देती है। इस प्रकार के बाँध निर्मित किए जा सकने वाले स्थान सीमित हैं।

तरंग ऊर्जा कैसे प्राप्त की जाती है?

समुद्र तट के निकट विशाल तरंगों की गतिज ऊर्जा को भी विद्युत उत्पन्न करने के उपयोग किया जाता है। महासागरों के पृष्ठ पर आर-पार बहने वाली प्रबल पवन तरंगें उत्पन्न करती है। तरंग ऊर्जा का वहीं पर व्यावहारिक उपयोग हो सकता है जहाँ तरंगें अत्यंत प्रबल हों। तरंग ऊर्जा को उपयोग करने के लिए विविध युक्तियाँ विकसित की गई हैं ताकि टरबाइन को घुमाकर विद्युत उत्पन्न करने के लिए इनका उपयोग किया जा सके।

भूतापीय ऊर्जा से विद्युत का उत्पादन किस प्रकार किया जाता है?

भौमिकीय परिवर्तनों के कारण भूपर्पटी में गहराइयों पर तप्त क्षेत्रों में पिघली चट्टानें ऊपर धकेल दी जाती हैं जो कुछ क्षेत्रों में एकत्र हो जाती हैं। इन क्षेत्रों को तप्त स्थल कहते हैं। जब भूमिगत जल इन तप्त स्थलों के संपर्क में आता है तो भाप उत्पन्न होती है। कभी-कभी यह भाप चट्टानों के बीच में फँस जाती है जहाँ इसका दाब अत्यधिक हो जाता है। तप्त स्थलों तक पाइप डालकर इस भाप को बाहर निकाल लिया जाता है। उच्च दाब पर निकली यह भाप विद्युत जनित्र की टरबाइन को घुमाती है जिससे विद्युत उत्पादन करते हैं। इसके द्वारा विद्युत उत्पादन की लागत अधिक नहीं है परंतु ऐसे बहुत कम क्षेत्र हैं जहाँ व्यापारिक दृष्टिकोण से इस ऊर्जा का दोहन करना व्यावहारिक है।

नाभिकीय ऊर्जा कैसे प्राप्त होती है?

नाभिकीय विखंडन अभिक्रिया एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी भारी परमाणु (जैसे यूरेनियम, प्लूटोनियम अथवा थोरियम) के नाभिक को निम्न ऊर्जा न्यूट्रॉन से बमवारी कराकर हलके नाभिकों में तोड़ा जा सकता है। इस क्रिया में विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। उदाहरण के लिए यूरेनियम, के एक परमाणु के विखंडन में जो ऊर्जा मुक्त होती है वह कोयले के किसी कार्बन परमाणु के दहन से उत्पन्न ऊर्जा की तुलना में 1 करोड़ गुनी अधिक होती है।

नाभिकीय विद्युत शक्ति संयंत्रों के मुख्य संकट क्या-क्या हैं?

नाभिकीय विद्युत शक्ति संयंत्रों का प्रमुख संकट पूर्णत: उपयोग होने के पश्चात शेष बचे नाभिकीय र्इंधन का भंडारण तथा निपटारा करना है क्योंकि शेष बचे र्इंधन का यूरेनियम अब भी हानिकारक (घातक) कणों (विकिरणों) में क्षयित होता है। यदि नाभिकीय अपशिष्टों का भंडारण तथा निपटारा उचित प्रकार से नहीं होता तो इससे पर्यावरण संदूषित हो सकता है। इसके अतिरिक्त नाभिकीय विकिरणों के आकस्मिक रिसाव का खतरा भी बना रहता है। नाभिकीय विद्युत शक्ति संयंत्रों के प्रतिष्ठापन की अत्यधिक लागत, पर्यावरणीय संदूषण का प्रबल खतरा तथा यूरेनियम की सीमित उपलब्धता बृहत स्तर पर नाभिकीय ऊर्जा के उपयोग को निषेधक बना देते हैं।

कक्षा 10 विज्ञान अध्याय 14 पेज 273 के प्रश्न उत्तर
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