एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण अध्याय 13 पृथ्वी एक तंत्र – ऊर्जा, द्रव्य और जीवन
एनसीईआरटी कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण पाठ 13 समाधान – पृथ्वी एक तंत्र: ऊर्जा, द्रव्य और जीवन – अभ्यास के प्रश्न उत्तर तथा अतिरिक्त प्रश्नों के हल यहाँ से हिंदी में प्राप्त किए जा सकते हैं। कक्षा 9 विज्ञान की नई पाठ्यपुस्तक का अध्याय 13 “पृथ्वी एक तंत्र – ऊर्जा, द्रव्य और जीवन” सत्र 2026-27 के लिए जारी किया गया है। यह पुस्तक का अंतिम अध्याय है, जिसमें विद्यार्थियों को पृथ्वी के पाँच परस्पर संबंधित मंडलों (भूमंडल, जलमंडल, हिममंडल, वायुमंडल और जैवमंडल), पृथ्वी के असमान ऊष्मीकरण, एल्बिडो, स्थानीय व ग्रहीय पवन, महासागरीय धाराओं, जैव-भू रासायनिक चक्रों (जल चक्र, कार्बन चक्र, नाइट्रोजन चक्र, ऑक्सीजन चक्र) तथा पृथ्वी की प्रक्रियाओं पर मानवीय प्रभाव के बारे में विस्तार से पढ़ाया गया है। यह अध्याय विद्यार्थियों को समझाता है कि सूर्य की ऊर्जा से लेकर वायु, जल और चट्टानों में होने वाली रासायनिक अभिक्रियाओं तक, पृथ्वी के सभी मंडल किस प्रकार एक सूक्ष्म संतुलन में परस्पर क्रिया करते हैं और मानवीय गतिविधियाँ इस संतुलन को किस प्रकार प्रभावित कर रही हैं।
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण पाठ 13 के त्वरित लिंक:
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कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण पाठ 13 अभ्यास प्रश्न उत्तर
एनसीईआरटी कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण अध्याय 13 समाधान
1. पारितंत्र में जैव-भू रासायनिक चक्रों की भूमिका का वर्णन करने के लिए सबसे अधिक उपयुक्त विकल्प चुनिए।
(i) समस्त जीवों को प्रत्यक्ष रूप से भोजन उपलब्ध कराना।
(ii) जैविक और अजैविक घटकों के मध्य आवश्यक पोषक पुनर्चक्रण करना।
(iii) सजीवों के उपयोग के लिए नए तत्वों का निर्माण करना।
(iv) जीव से प्रदूषक और विषाक्त पदार्थों को हटाना।
उत्तर:
(ii) जैविक और अजैविक घटकों के मध्य आवश्यक पोषक पुनर्चक्रण करना।
पृथ्वी पर सजीव निरंतर अपने आस-पास की वायु, जल, मृदा और चट्टानों के साथ द्रव्य और ऊर्जा का आदान-प्रदान करते रहते हैं। पृथ्वी के निर्जीव (अजैविक) घटकों जैसे वायुमंडल, जलमंडल, भूमंडल और सजीव (जैविक) घटकों यानी जैवमंडल के मध्य निरंतर अंतःक्रिया होती रहती है। इसी अंतःक्रिया के फलस्वरूप कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन जैसे आवश्यक पोषक तत्व बार-बार चक्रित होकर पृथ्वी पर उपलब्ध रहते हैं। यदि यह पुनर्चक्रण न हो तो पोषक तत्व समाप्त हो जाएँगे और जीवन असंभव हो जाएगा। इसलिए विकल्प (ii) सबसे उपयुक्त है, जबकि शेष विकल्प इस चक्र की भूमिका को पूर्ण रूप से नहीं दर्शाते – (i) केवल भोजन तक सीमित है, (iii) गलत है क्योंकि नए तत्वों का निर्माण नहीं बल्कि विद्यमान तत्वों का पुनर्चक्रण होता है और (iv) केवल एक आंशिक प्रक्रिया है।
2. निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प पृथ्वी के गर्म होने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी है?
(i) सौर विकिरण शीघ्रता से कार्बन डाईआक्साइड द्वारा अवशोषित हो जाती है, जो इसे ऊष्मा के रूप में निर्मुक्त करती है।
(ii) वायुमंडल के सूक्ष्म कण आगामी सौर विकिरण को अवशोषित करते हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से पृथ्वी को गर्म करते हैं।
(iii) पृथ्वी की सतह, सौर विकिरण का अवशोषण करती है, जो पुन: विकिरित होती है और हरित गृह गैसों द्वारा रोक ली जाती है।
(iv) पृथ्वी का वातावरण बादलों द्वारा परावर्तित सौर विकिरण से ही गर्म होता है।
उत्तर:
(iii) पृथ्वी की सतह, सौर विकिरण का अवशोषण करती है, जो पुन: विकिरित होती है और हरितगृह गैसों द्वारा रोक ली जाती है।
सूर्य से आने वाला दृश्य प्रकाश पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है और सतह को गर्म करता है। पृथ्वी की सतह इस ऊर्जा को अवरक्त विकिरण के रूप में पुनः वायुमंडल में विकिरित करती है। बाहर जाने वाली इस ऊष्मा का कुछ भाग हरितगृह गैसों जैसे कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂), मीथेन (CH₄) और जलवाष्प द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे यह ऊष्मा अंतरिक्ष में जाने से रुक जाती है और पृथ्वी का ताप जीवन के अनुकूल बना रहता है। यही प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव है। मानवीय गतिविधियों से बढ़ती अतिरिक्त CO₂ इस प्रभाव को और तीव्र कर वैश्विक तापन को बढ़ाती है। अन्य विकल्प भौतिक रूप से गलत हैं – CO₂ सीधे सौर विकिरण को शीघ्रता से अवशोषित नहीं करती (i), वायुमंडलीय कण सीधे पृथ्वी को गर्म नहीं करते (ii), और पृथ्वी का ताप केवल बादलों से परावर्तित विकिरण से नहीं, बल्कि मुख्यतः सतह के अवशोषण-पुनर्विकिरण चक्र से आता है (iv)।
3. स्पष्ट कीजिए कि जलवायु परिवर्तन, जल चक्र को किस प्रकार प्रभावित करता है? उदाहरणों द्वारा दर्शाइए।
उत्तर:
जल चक्र में जल वाष्पन, संघनन, वर्षण, अंतःस्यंदन और अपवाह की प्रक्रियाओं से होकर लगातार परिसंचरित होता रहता है। जलवायु परिवर्तन इस संतुलित चक्र को कई प्रकार से प्रभावित करता है:
- अधिक वाष्पन और तीव्र वर्षा: अधिक गर्म वायुमंडल अधिक नमी संचित कर सकता है। इस कारण कुछ क्षेत्रों में तीव्र मानसून के रूप में अत्यधिक वर्षा होती है (जैसे भारत के कुछ भागों में बाढ़), जबकि अन्य क्षेत्रों में वर्षा की कमी से सूखा पड़ सकता है।
- हिमानियों का पिघलना: वैश्विक तापन से हिमानियाँ तेजी से पिघल रही हैं, जिससे नदियों में जल की अधिकता होती है और दीर्घकाल में समुद्र का जलस्तर बढ़ सकता है। इससे मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय शहरों पर बाढ़ का खतरा उत्पन्न होता है।
- आकस्मिक तीव्र वर्षा और अपवाह: अचानक भारी वर्षा से सतही जल का अपवाह बढ़ जाता है, जिससे मृदा क्षरण होता है। साथ ही जल का मृदा में रिसाव (अंतःस्यंदन) कम हो जाता है, जिससे भूजल का पुनर्भरण घट जाता है।
- कृषि पर प्रभाव: भूजल पुनर्भरण में कमी के कारण शुष्क महीनों के दौरान सिंचाई और कृषि को बनाए रखना कठिन हो जाता है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जो वर्षा पर निर्भर हैं।
4. वर्णन कीजिए कि एल्बिडो किस प्रकार पृथ्वी की सतह के ताप और इसकी जलवायु को प्रभावित करता है।
उत्तर:
किसी सतह द्वारा परावर्तित सौर विकिरण के अंश को एल्बिडो कहते हैं। यह शब्द लैटिन भाषा के शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है ‘धवलता’ या श्वेतता।
- उच्च एल्बिडो सतहें: हिम और बर्फ जैसी सतहों का एल्बिडो बहुत अधिक होता है (लगभग 0.80–0.90)। ये सतहें अधिकतर सौर विकिरण को परावर्तित कर देती हैं, इसलिए कम गर्मी अवशोषित करती हैं और ठंडी बनी रहती हैं। इसी कारण ध्रुवीय और हिमाच्छादित प्रदेश अत्यधिक ठंडे रहते हैं।
- निम्न एल्बिडो सतहें: काली मृदा और महासागरीय जल का एल्बिडो कम होता है। ये सतहें अधिकांश सौर विकिरण को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे वे तेजी से गर्म हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, गहरे रंग की सड़कें जल्दी गर्म हो जाती हैं जबकि हल्के रंग की सतहें अपेक्षाकृत ठंडी रहती हैं। इसी कारण गहरे रंग के कपड़े गर्मी के मौसम में अधिक गर्म और सफेद रंग के कपड़े कम गर्म लगते हैं।
- जलवायु पर प्रभाव: एल्बिडो में परिवर्तन जलवायु को प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, यदि हिमानियाँ पिघलती हैं तो उच्च एल्बिडो वाली सफेद हिम सतह की जगह निम्न एल्बिडो वाला गहरे रंग का जल या भूमि आ जाती है, जो अधिक ऊष्मा अवशोषित करती है – इससे वैश्विक तापन और तेज़ हो जाता है (यह एक धनात्मक फीडबैक चक्र बनाता है)। इसी प्रकार वनोन्मूलन से भी सतही एल्बिडो बदल जाता है, जिससे स्थानीय जलवायु प्रभावित होती है।
5. पर्वतीय और घाटी समीर किस प्रकार बनती हैं? मान लीजिए दो पर्वत हैं, एक घास द्वारा आच्छादित है और दूसरा बंजर चट्टानों से, क्या दोनों पर्वतीय समीरों के ताप भिन्न-भिन्न होंगे? यदि ऐसा है तो किस प्रकार?
उत्तर:
पर्वतीय क्षेत्रों में ढलान और घाटी की निचली सतह समान दर से न तो गर्म होती है और न ही ठंडी होती है, जिससे स्थानीय पवनें उत्पन्न होती हैं:
- घाटी समीर : दिन के समय सूर्य के सामने वाली पर्वतीय ढलानें, घाटी तल की तुलना में अधिक तीव्रता से गर्म होती हैं। इसके परिणामस्वरूप ढलानों के ऊपर की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है, जिससे निम्न दाब क्षेत्र बनता है। घाटी से ठंडी वायु ढलान से ऊपर की ओर उठकर इस स्थान की पूर्ति करती है। वायु के इस ऊपर की ओर प्रवाह को घाटी समीर कहते हैं।
- पर्वतीय समीर : सूर्यास्त के बाद स्थिति उलट जाती है। पर्वतीय ढलानों से ऊष्मा का क्षय तीव्रता से होता है और वे शीघ्र ठंडी हो जाती हैं, जबकि घाटी का तल अपेक्षाकृत अधिक गर्म रहता है। ढलानों के ऊपर की ठंडी और सघन वायु नीचे घाटी की ओर बहने लगती है – इसे पर्वतीय समीर कहते हैं।
घास वाले और बंजर पर्वत में अंतर: हाँ, दोनों पर्वतीय समीरों के ताप में अंतर होगा।
- बंजर चट्टानी पर्वत का एल्बिडो कम होता है और वहाँ वाष्पोत्सर्जन नहीं होता, इसलिए यह दिन में अधिक तेजी से और अधिक तीव्रता से गर्म होगा। परिणामस्वरूप वहाँ की घाटी समीर अधिक प्रबल होगी, और रात में यह चट्टानें तेजी से ठंडी होकर अधिक ठंडी व तेज़ पर्वतीय समीर उत्पन्न करेंगी।
- घास से आच्छादित पर्वत पौधों की वाष्पोत्सर्जन क्रिया के कारण अपेक्षाकृत ठंडा रहेगा (क्योंकि वाष्पोत्सर्जन में ऊष्मा का उपयोग होता है) और सतह की नमी के कारण ताप परिवर्तन अपेक्षाकृत धीमा व कम तीव्र होगा। इसलिए वहाँ की घाटी और पर्वतीय समीर तुलनात्मक रूप से मंद (कम तीव्र) होंगी।
इस प्रकार सतह के प्रकार (एल्बिडो और वनस्पति आवरण) स्थानीय पवन तंत्र के ताप और तीव्रता को सीधे प्रभावित करते हैं।
6. आप पवन, तूफान और वर्षा आदि मौसमी परिघटनाओं के साक्षी रहे हैं। वायुमंडल की कौन-सी परतें इनके लिए उत्तरदायी हैं? और इन परिघटनाओं के होने का प्रमुख कारण क्या है?
उत्तर:
पृथ्वी का वायुमंडल विभिन्न परतों में विभाजित है – क्षोभमंडल, समतापमंडल, मध्यमंडल, तापमंडल और बहिर्मंडल। इनमें से क्षोभमंडल, जो पृथ्वी की सतह से लगभग 12 km की ऊँचाई तक फैला है, लगभग सभी मौसम संबंधी परिघटनाओं जैसे पवन, तूफान और वर्षा के लिए उत्तरदायी है।
कारण: यह परत पृथ्वी की सतह से सीधे गर्म होती है, इसलिए इसमें ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान लगातार घटता जाता है (लगभग 6.5°C प्रति किलोमीटर)। जैसे-जैसे सतह के निकट की गर्म वायु ऊपर उठती है, वह तेज़ हवाएँ, आँधी-तूफान और संवहनीय वर्षा उत्पन्न करती है। क्षोभमंडल की ऊँचाई भूमध्य रेखा के ऊपर सबसे अधिक और ध्रुवीय प्रदेशों के ऊपर सबसे कम होती है।
मूल कारण: इन सभी मौसमी परिघटनाओं का प्रमुख कारण पृथ्वी की सतह का असमान ऊष्मण है। सूर्य विभिन्न अक्षांशों और सतहों (स्थल-जल, वनस्पति-बंजर भूमि) को असमान रूप से गर्म करता है, जिससे वायुदाब में भिन्नता उत्पन्न होती है। वायु उच्च दाब क्षेत्र से निम्न दाब क्षेत्र की ओर प्रवाहित होती है, जिससे पवन बनती है, और गर्म-नम वायु के ऊपर उठने व ठंडी होने से संघनन तथा वर्षा होती है।
समतापमंडल के ऊपर के मंडल (मध्यमंडल, तापमंडल, बहिर्मंडल) पृथ्वी की सतह की जलवायु को नियंत्रित करने में गौण भूमिका निभाते हैं।
7. नाइट्रोजन चक्र में होने वाली प्रक्रियाओं की व्याख्या कीजिए। यदि नाइट्रोजन का चक्रण नहीं हो तो पृथ्वी पर जीवन किस प्रकार प्रभावित होगा?
उत्तर:
नाइट्रोजन सभी सजीवों में प्रोटीन और न्यूक्लीक अम्लों के संश्लेषण के लिए एक आवश्यक तत्व है। इसका सबसे बड़ा भंडार वायुमंडल में है (लगभग 78%), परंतु नाइट्रोजन गैस (N₂) कम अभिक्रियाशील होने के कारण पादप व जंतु इसका सीधे उपयोग नहीं कर सकते। इसलिए यह पहले घुलनशील यौगिकों में परिवर्तित होती है। वायु, मृदा, जल और जीवों के मध्य नाइट्रोजन के इस समग्र संचरण को नाइट्रोजन चक्र कहते हैं, जिसके पाँच मुख्य चरण हैं:

- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: फलीदार पादपों की जड़ों की ग्रंथियों में पाए जाने वाले जीवाणु राइजोबियम और मृदा में पाए जाने वाले एजोटोबैक्टर जैसे जीवाणु वायुमंडलीय N₂ को अमोनिया (NH₃) में परिवर्तित करते हैं। तड़ित (बिजली चमकना) भी नाइट्रोजन ऑक्साइडों के स्थिरीकरण में सहायता करती है।
- नाइट्रीकरण: नाइट्रोसोमोनास जीवाणु अमोनिया को नाइट्राइट (NO₂⁻) में और नाइट्रोबैक्टर जीवाणु नाइट्राइट को नाइट्रेट (NO₃⁻) में परिवर्तित करते हैं।
- स्वांगीकरण: पादप मृदा से नाइट्रोजन यौगिकों (नाइट्रेट) का अवशोषण करते हैं, जबकि जंतु पादपों या अन्य जंतुओं को खाकर नाइट्रोजन प्राप्त करते हैं।
- अमोनीकरण: जब पादप और जंतु मरते हैं या अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं, तो जीवाणु और कवक जैसे अपघटक कार्बनिक द्रव्य को अपघटित कर अमोनिया के रूप में नाइट्रोजन को पुनः मृदा में लौटाते हैं।
- विनाइट्रीकरण: स्यूडोमोनास जैसे जीवाणु नाइट्रेट की कुछ मात्रा को पुनः नाइट्रोजन गैस में परिवर्तित कर वायुमंडल में लौटा देते हैं, जिससे चक्र पूरा होता है।
8. वनोन्मूलन का पृथ्वी के ऑक्सीजन और कार्बन चक्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है? वनोन्मूलन के अन्य परिणाम क्या हैं?
उत्तर:
कार्बन चक्र पर प्रभाव: पेड़-पौधे प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय CO₂ का अवशोषण करते हैं और कार्बन को कार्बनिक पदार्थों के रूप में संचित करते हैं – इसलिए वन एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक कार्बन अवशोषक हैं। वनोन्मूलन से यह अवशोषण क्षमता घट जाती है। साथ ही काटे गए वृक्षों को जलाने या सड़ने पर संचित कार्बन पुनः CO₂ के रूप में वायुमंडल में मुक्त हो जाता है। इस प्रकार वायुमंडलीय CO₂ की मात्रा बढ़ती है, जो हरितगृह प्रभाव को तीव्र कर वैश्विक तापन में योगदान देती है।
ऑक्सीजन चक्र पर प्रभाव: वन प्रकाश संश्लेषण के माध्यम से बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन उत्पन्न करते हैं। वनोन्मूलन से प्रकाश संश्लेषण की दर घटती है, जिससे वायुमंडल में ऑक्सीजन उत्पादन कम हो जाता है और उपभोग (श्वसन, दहन) की तुलना में उत्पादन-उपभोग का संतुलन बिगड़ सकता है।
अन्य परिणाम:
- वाष्पोत्सर्जन में कमी: वृक्षों की कमी से वाष्पोत्सर्जन घटता है, जिससे स्थानीय वर्षा में कमी हो सकती है और जल चक्र प्रभावित होता है।
- एल्बिडो में परिवर्तन: वनोन्मूलन सतही एल्बिडो को बदल देता है, जिससे स्थानीय ताप-संतुलन प्रभावित होता है।
- मृदा अपरदन: वृक्षों की जड़ें मृदा को बाँधकर रखती हैं। इनके अभाव में मृदा अपरदन बढ़ जाता है।
- पर्यावास हानि और जैव विविधता में कमी: समय के साथ पर्यावास नष्ट होने से अनेक जातियाँ अपना प्राकृतिक आवास खो देती हैं, जिससे जैव विविधता घटती है।
9. उपयुक्त चित्र से उस पथ की व्याख्या कीजिए जिससे कार्बन पुन: वायुमंडल में जाता है। इस चित्र का आरंभ आप पादपों द्वारा वायुमंडलीय CO₂ के उपयोग से कर सकते हैं।
उत्तर:
कार्बन चक्र में कार्बन विभिन्न मार्गों से पुनः वायुमंडल में लौटता है। चक्र का आरंभ इस प्रकार होता है:
- प्रकाश संश्लेषण: पादप सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय CO₂ को ग्लूकोस में परिवर्तित करते हैं, जिससे कार्बन पादप के शरीर (कार्बनिक पदार्थ) में संचित हो जाता है।
- श्वसन द्वारा: पादप और जंतु दोनों श्वसन क्रिया के लिए ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं और CO₂ को वायुमंडल में वापस छोड़ते हैं। यह द्रुत चक्र (कुछ दिनों से वर्षों तक चलने वाला) का हिस्सा है।
- खाद्य श्रृंखला द्वारा: जंतु पादपों को और अन्य जंतुओं को खाते हैं, जिससे कार्बन खाद्य श्रृंखला में स्थानांतरित होता है।
- अपघटन द्वारा: पादपों और जंतुओं की मृत्यु के पश्चात अपघटक (जीवाणु, कवक) कार्बनिक द्रव्य का अपघटन करते हैं, जिससे कार्बन CO₂ के रूप में पुनः वायु में मिल जाता है।
- दहन द्वारा: लाखों वर्षों तक चलने वाले मंद चक्र में, मृत पादप-जंतु मृदा में दबकर जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल, गैस) में बदल जाते हैं। जब मानव इन ईंधनों को ताप, यातायात या औद्योगिक उद्देश्यों के लिए जलाता है, तो संचित कार्बन बहुत कम समय में CO₂ के रूप में उत्सर्जित हो जाता है।
- महासागरों से विनिमय: वायुमंडल और महासागरों के बीच भी CO₂ का निरंतर आदान-प्रदान होता है – महासागर का जल CO₂ को अवशोषित कर कार्बोनेट व हाइड्रोजन कार्बोनेट आयनों में बदलता है, और आवश्यकतानुसार यह पुनः वायुमंडल में मुक्त भी हो सकता है।

10. वायुमंडल में CO₂ की अधिकता को अवांछनीय क्यों माना जाता है जबकि पादपों को इसकी आवश्यकता होती है?
उत्तर:
यह सत्य है कि पादपों को प्रकाश संश्लेषण के लिए CO₂ आवश्यक है और पृथ्वी पर जीवन को बनाए रखने तथा उसे पर्याप्त गर्म रखने के लिए कुछ मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड की आवश्यकता होती है (यह प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव के लिए ज़रूरी है)। परंतु समस्या इसकी अत्यधिक मात्रा से है, न कि इसके होने से।
मानव गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधनों के दहन और वनोन्मूलन ने वर्ष 1960 से वायुमंडलीय CO₂ की मात्रा को लगभग 35 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है (315 ppm से 420 ppm)। यह वृद्धि मानव सभ्यता के इतिहास में असामान्य रूप से तीव्र है। CO₂ की यह अत्यधिक मात्रा हरितगृह प्रभाव को तीव्र कर देती है, जिससे:
- वैश्विक तापन बढ़ता है।
- हिमानियों और आर्कटिक समुद्र की बर्फ का पिघलना तेज़ होता है।
- समुद्र का जल स्तर बढ़ता है, जिससे तटीय क्षेत्रों को खतरा होता है।
- मौसम की अधिक चरम परिस्थितियाँ (तीव्र मानसून, बाढ़, सूखा) उत्पन्न होती हैं।
- महासागरों में CO₂ के अधिक अवशोषण से जल अधिक अम्लीय हो जाता है, जिससे सूक्ष्म प्लवक और प्रवाल भित्तियों को खतरा होता है।
इसलिए वायुमंडल में CO₂ की एक संतुलित, प्राकृतिक मात्रा जीवन के लिए आवश्यक है, परंतु मानव गतिविधियों द्वारा उत्पन्न अतिरिक्त CO₂ इस संतुलन को बिगाड़कर पर्यावरण के लिए हानिकारक सिद्ध हो रही है।
11. पृथ्वी की सतह से ऊष्मा का क्षय किस प्रकार होता है? इसकी क्या सार्थकता है?
उत्तर:
सभी वस्तुएँ ऊष्मा का विकिरण करती हैं। पृथ्वी की सतह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित करती है और इस ऊर्जा को अवरक्त विकिरण के रूप में पुनः वायुमंडल में विकिरित करती है – इसी प्रक्रिया को ऊष्मा का क्षय कहते हैं।
यह बाहर जाने वाली ऊष्मा का कुछ भाग हरितगृह गैसों (CO₂, CH₄, जलवाष्प) द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे यह पूरी तरह अंतरिक्ष में नहीं जा पाती, बल्कि वायुमंडल में ही बनी रहती है। शेष भाग अंतरिक्ष में विकिरित हो जाता है।
रात्रि में विभिन्न पदार्थों से ऊष्मा क्षय की दर भिन्न होती है – उदाहरण के लिए, ग्रीष्मकाल की रात्रि में पक्के (कंक्रीट के) मकान अधिक गर्मी महसूस कराते हैं क्योंकि कंक्रीट रात में ऊष्मा को पुनः विकिरित करता है, जबकि गारे-मिट्टी और लकड़ी से बने पारंपरिक घर भीषण गर्मी में भी ठंडक देते हैं क्योंकि उनसे ऊष्मा का पुनः विकिरण कम होता है।
सार्थकता: यह प्रक्रिया पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन को बनाए रखती है। यदि सारी ऊष्मा बिना रुके अंतरिक्ष में चली जाए, तो पृथ्वी अत्यधिक ठंडी हो जाएगी और जीवन असंभव हो जाएगा। दूसरी ओर, यदि यह ऊष्मा हरितगृह गैसों द्वारा अत्यधिक मात्रा में रोकी जाए (जैसा वर्तमान में हो रहा है), तो पृथ्वी अत्यधिक गर्म हो जाती है। इस प्रकार ऊष्मा क्षय और हरितगृह गैसों द्वारा उसके नियंत्रण के बीच का संतुलन ही पृथ्वी के ताप को जीवन के अनुकूल बनाए रखता है।
12. यदि पृथ्वी गोलाकार न होकर एक तश्तरी के समान चपटी होती तब सौर विकिरण और ताप के पैटर्न किस प्रकार भिन्न होते?
उत्तर:
पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें विभिन्न अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न कोणों पर पड़ती हैं। भूमध्यरेखीय प्रदेशों के निकट सौर विकिरण छोटे क्षेत्र में केंद्रित रहती हैं (लंबवत् किरणें) जबकि ध्रुवीय प्रदेशों में यही विकिरण बड़े क्षेत्र में फैल जाती है (तिरछी किरणें)। इसी कारण भूमध्यरेखीय प्रदेश अधिक गर्म और ध्रुवीय प्रदेश अधिक ठंडे रहते हैं, जिससे भूमध्य रेखा और ध्रुवों के बीच ताप में बड़ा अंतर उत्पन्न होता है – यही अंतर वैश्विक पवन और महासागरीय धाराओं को संचालित करता है।
यदि पृथ्वी चपटी (तश्तरीनुमा) होती:
- सूर्य की किरणें तश्तरी के लगभग पूरे भाग पर एक समान कोण पर (अधिकतर लंबवत् के निकट) पड़तीं, जिससे सतह पर सौर विकिरण का वितरण कहीं अधिक समान होता।
- भूमध्य रेखा और ध्रुवों जैसा वर्तमान अत्यधिक तीव्र ताप-अंतर उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि अक्षांश के अनुसार किरणों के कोण में इतनी भिन्नता नहीं होती।
- चूँकि ताप-अंतर ही वैश्विक पवन तंत्र और महासागरीय धाराओं (जैसे ग्रहीय पवन, गल्फ स्ट्रीम) को संचालित करने का मूल कारण है, इसलिए इन परिघटनाओं का स्वरूप पूरी तरह भिन्न होता या संभवतः वे उत्पन्न ही न होतीं।
- मौसम के मौसमी बदलाव (ऋतु-चक्र) भी अलग ढंग से घटित होते, क्योंकि वर्तमान ऋतु-परिवर्तन पृथ्वी की गोलीय आकृति और उसके घूर्णन अक्ष के झुकाव के संयुक्त प्रभाव से होता है।
- संभवतः चपटी सतह के किनारों और केंद्र में असमान भौतिक परिस्थितियाँ (जैसे किनारों पर अलग वायुमंडलीय व्यवहार) उत्पन्न होतीं, जो वर्तमान पृथ्वी की सुसंगत गोलीय जलवायु प्रणाली से पूर्णतः भिन्न होतीं।
13. कल्पना कीजिए कि पृथ्वी पर वायुमंडलीय ताप बढ़ जाता है। यह किस प्रकार हिममंडल, जलमंडल और जैवमंडल को प्रभावित करेगा?
उत्तर:
- हिममंडल पर प्रभाव: वायुमंडलीय ताप में वृद्धि से हिमालयी हिमानियों, लद्दाख की जमी बर्फ और ध्रुवीय हिम छत्रकों के पिघलने की दर बढ़ जाएगी। इससे स्थायी हिम आवरण घटता जाएगा और दीर्घकाल में हिमानियाँ लुप्त होने का खतरा बढ़ जाएगा। साथ ही हिम-बर्फ का उच्च एल्बिडो कम होने से पृथ्वी और अधिक सौर ऊर्जा अवशोषित करेगी, जिससे तापन और तेज़ होगा।
- जलमंडल पर प्रभाव: हिमानियों और ध्रुवीय हिम के पिघलने से नदियों में जल की अधिकता होगी और दीर्घकाल में समुद्र का जल स्तर बढ़ जाएगा, जिससे मुंबई और चेन्नई जैसे तटीय शहरों को बाढ़ का गंभीर खतरा उत्पन्न होगा। अरब सागर जैसे महासागरों के गर्म जल से अधिक वाष्पीकरण होगा, जिससे दक्षिण-पश्चिम मानसून में उतार-चढ़ाव आएगा – कुछ क्षेत्रों में बाढ़ तो अन्य में सूखा पड़ सकता है। साथ ही महासागरीय जल अधिक अम्लीय होता जाएगा, जो अपने आप में समुद्री जीवन के लिए हानिकारक है।
- जैवमंडल पर प्रभाव: समुद्र के गर्म व अम्लीय होने से सूक्ष्म प्लवक और प्रवाल भित्तियों को गंभीर खतरा होगा, जिससे संपूर्ण समुद्री पारितंत्र बाधित हो सकता है। स्थलीय पारितंत्रों में पर्यावास हानि के कारण अनेक जातियाँ अपने प्राकृतिक आवास खो सकती हैं, जिससे जैव विविधता में कमी आएगी। कृषि पर भी बदलते मौसमी पैटर्न (अनियमित वर्षा, सूखा) का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जो खाद्य सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है।
14. व्याख्या कीजिए कि किस प्रकार पृथ्वी का वायुमंडल, इसका ताप उपयुक्त बनाए रखने के लिए सहायता करता है जो कि पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक है।
उत्तर:
पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा करने में वायुमंडल दो महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाता है:
- हानिकारक विकिरण से सुरक्षा: वायुमंडल पृथ्वी पर आने वाले सौर विकिरण का कुछ भाग अवशोषित कर लेता है। समतापमंडल में स्थित ओजोन परत हानिकारक पराबैंगनी (UV) किरणों को अवशोषित कर उन्हें पृथ्वी की सतह तक पहुँचने से रोकती है, जिससे सजीवों को त्वचा कैंसर और अन्य क्षति से सुरक्षा मिलती है। इसके अतिरिक्त बादल और अन्य गैसें भी सूर्य के कुछ प्रकाश को सतह तक पहुँचने से पहले अवशोषित या प्रकीर्णित कर लेती हैं।
- ऊष्मा को बनाए रखना (हरितगृह प्रभाव): वायुमंडल बाहर जाने वाली ऊष्मा को रोककर रखता है। पृथ्वी की सतह सूर्य के प्रकाश को अवशोषित कर उसे अवरक्त विकिरण के रूप में पुनः विकिरित करती है। हरितगृह गैसें जैसे CO₂, मीथेन (CH₄) और जलवाष्प इस पुनः विकिरित ऊष्मा को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे यह अंतरिक्ष में जाने से रुक जाती है। यदि वायुमंडल न होता, तो पृथ्वी इतनी ठंडी होती कि यहाँ जीवन संभव न होता।
इसके अतिरिक्त, वायुमंडल में मुख्यतः नाइट्रोजन (78%) और ऑक्सीजन (21%) गैसें उपस्थित हैं, जो श्वसन और नाइट्रोजन चक्र जैसी जैविक प्रक्रियाओं के लिए आवश्यक हैं। वायुमंडल का यह संतुलन इतना नाज़ुक है कि इसमें मामूली परिवर्तन भी (जैसे CO₂ की अधिकता) संपूर्ण जलवायु तंत्र को असंतुलित कर सकता है – जैसा शुक्र ग्रह के उदाहरण से स्पष्ट है, जहाँ अनियंत्रित हरितगृह प्रभाव के कारण वह बुध ग्रह से भी अधिक गर्म है, यद्यपि बुध सूर्य के अधिक निकट है।
15. पृथ्वी के विभिन्न मंडलों के मध्य अंत:संबंधों का वर्णन कीजिए। उदाहरण सहित समझाइए कि ये मंडल किस प्रकार एक सूक्ष्म संतुलन में कार्य करते हैं।
उत्तर:
पृथ्वी को एक तंत्र के रूप में समझने के लिए पाँच परस्पर संबंधित मंडलों पर विचार किया जाता है:
- भूमंडल – ठोस चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ और पृथ्वी का आंतरिक भाग।
- जलमंडल – द्रव रूप में पाया जाने वाला सतही जल जैसे महासागर, नदियाँ, झीलें और भूजल।
- हिममंडल – जल का ठोस रूप जैसे हिम और बर्फ।
- वायुमंडल – पृथ्वी के चारों ओर की वायु।
- जैवमंडल – सभी जीवित जीव और उनके पर्यावास।
- उदाहरण 1 – हिम, जलमंडल और जैवमंडल का संबंध: यदि शीतकाल में हिमपात कम होता है (हिममंडल में परिवर्तन), तो ग्रीष्मकाल में झील का जलस्तर घट जाता है (जलमंडल प्रभावित)। इसके परिणामस्वरूप मैदानों में घास की वृद्धि के लिए जल कम उपलब्ध हो पाता है, जिससे भेड़ों जैसे पशुओं के चारे पर असर पड़ता है (जैवमंडल प्रभावित)।
- उदाहरण 2 – जलमंडल और वायुमंडल का संबंध: अरब सागर के गर्म जल के कारण समुद्र से अधिक वाष्पीकरण होता है, जिससे दक्षिण-पश्चिम मानसून (वायुमंडलीय परिघटना) में उतार-चढ़ाव आता है। इससे वर्षा में असमानता के कारण भारत के कुछ क्षेत्रों में बाढ़ तो कुछ में सूखा पड़ सकता है – अर्थात जलमंडल में परिवर्तन वायुमंडल और अंततः भूमंडल (कृषि भूमि) को प्रभावित करता है।
- उदाहरण 3 – वायुमंडल, हिममंडल और जलमंडल की शृंखला: वायुमंडलीय ताप में वृद्धि से हिममंडल में हिमानियों और ध्रुवीय हिम के पिघलने की दर बढ़ती है। इससे निचले तटीय क्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है और भविष्य में समुद्र का जल स्तर बढ़ने से तटीय शहरों को खतरा उत्पन्न होता है – यह जैवमंडल में पारितंत्रों को पर्यावास हानि के कारण विक्षोभित कर सकता है।
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण अध्याय 13 से परीक्षा के लिए अतिरिक्त प्रश्न उत्तर
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण पाठ 13 पर आधारित अतिलघुउत्तरीय प्रश्न उत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. भूमंडल किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंठोस चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ तथा पृथ्वी का आंतरिक भाग भूमंडल कहलाता है।
2. जलमंडल किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंद्रव रूप में पाया जाने वाला सतही जल, जैसे महासागर, नदियाँ, झीलें और भूजल, जलमंडल कहलाता है।
3. सौर स्थिरांक का मान लगभग कितना होता है?
उत्तर देखेंसौर स्थिरांक का मान लगभग 1.4 किलोवाट प्रति वर्ग मीटर (1.4 kWm⁻²) होता है।
4. सूर्यातप (Insolation) किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंपृथ्वी की सतह पर पहुँचने वाले सौर विकिरण की मात्रा को सूर्यातप कहते हैं।
5. एल्बिडो किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंकिसी सतह द्वारा सौर विकिरण के परावर्तित अंश को एल्बिडो कहते हैं।
6. महासागरीय भंवर (Gyres) किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंपृथ्वी के घूर्णन के कारण महासागरीय जल में बनने वाले विशाल वृत्ताकार प्रवाह पैटर्न को भंवर कहते हैं।
7. जैव-भू रासायनिक चक्र किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंअजैविक और जैविक घटकों के मध्य द्रव्य और ऊर्जा के चक्रीय संचलन को जैव-भू रासायनिक चक्र कहते हैं।
8. नाइट्रोजन स्थिरीकरण किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंवायुमंडलीय नाइट्रोजन को जीवाणुओं द्वारा अमोनिया में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को नाइट्रोजन स्थिरीकरण कहते हैं।
9. सुपोषण किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंउर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से जल निकायों में शैवाल की अत्यधिक वृद्धि की प्रक्रिया को सुपोषण कहते हैं।
10. हाबर-बॉश प्रक्रिया क्या है?
उत्तर देखेंवायुमंडलीय नाइट्रोजन से कृत्रिम रूप से अमोनिया बनाने की प्रक्रिया को हाबर-बॉश प्रक्रिया कहते हैं।
11. शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव किसे कहते हैं?
उत्तर देखेंशहरों का अपने आस-पास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म होने की घटना को शहरी ऊष्मा द्वीप प्रभाव कहते हैं।
12. क्षोभमंडल की औसत ऊँचाई कितनी होती है?
उत्तर देखेंक्षोभमंडल की औसत ऊँचाई लगभग 12 किलोमीटर होती है, जहाँ मौसम संबंधी परिघटनाएँ होती हैं।
13. मिशन लाइफ का पूरा नाम और उद्देश्य क्या है?
उत्तर देखेंमिशन लाइफ भारत की एक पहल है जिसका उद्देश्य पर्यावरण हितैषी जीवनशैली अपनाने के लिए प्रेरित करना है।
14. मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल किससे संबंधित है?
उत्तर देखेंमॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल CFC के उपयोग को घटाकर ओजोन परत के सुधार से संबंधित एक वैश्विक समझौता है।
15. घाटी समीर कब बनती है?
उत्तर देखेंदिन के समय जब पर्वतीय ढलानें गर्म होकर वायु ऊपर उठती है, तब घाटी समीर बनती है।
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण पाठ 13 पर आधारित लघुउत्तरीय प्रश्न उत्तर
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम में कौन-सी तरंगें पृथ्वी के लिए हानिकारक हो सकती हैं और क्यों?
उत्तर देखेंउच्च आवृत्ति या लघु तरंगदैर्घ्य विकिरण जैसे गामा किरणें और X-किरणें अत्यधिक ऊर्जा वाली होती हैं, इसलिए ये पृथ्वी पर जीवन के लिए हानिकारक हो सकती हैं। सौभाग्य से ये किरणें अधिकांशतः पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल द्वारा छान ली जाती हैं, जिससे पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुँच पातीं।
2. पराबैंगनी (UV) किरणों से हमें सुरक्षा कैसे मिलती है और इनका क्या उपयोग है?
उत्तर देखेंलघु तरंगदैर्घ्य वाली पराबैंगनी किरणों का अधिकांश भाग ऊपरी वायुमंडल में स्थित ओजोन परत द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, जिससे पृथ्वी पर जीवन को सुरक्षा मिलती है। पराबैंगनी किरणें जल शोधकों में कीटाणुओं को नष्ट करने और प्रतिदीप्त प्रकाश को ऊर्जा प्रदान करने में भी सहायक होती हैं।
3. अक्षांश और पृथ्वी के आकार के कारण असमान ऊष्मण कैसे होता है?
उत्तर देखेंपृथ्वी गोलाकार होने के कारण सूर्य की किरणें विभिन्न अक्षांशों पर भिन्न-भिन्न कोणों पर पड़ती हैं। भूमध्यरेखीय प्रदेशों के निकट सौर विकिरण छोटे क्षेत्र में केंद्रित रहती है जबकि ध्रुवीय प्रदेशों में यह बड़े क्षेत्रों में फैल जाती है, जिससे भूमध्यरेखीय प्रदेश अधिक गर्म और ध्रुवीय प्रदेश अधिक ठंडे रहते हैं।
4. वायुमंडल पृथ्वी पर जीवन की सुरक्षा में कौन-सी दो मुख्य भूमिकाएँ निभाता है?
उत्तर देखेंपहली, वायुमंडल पृथ्वी पर आने वाले सौर विकिरण का कुछ भाग अवशोषित कर लेता है, और ओजोन परत हानिकारक पराबैंगनी किरणों को रोक देती है। दूसरी, यह बाहर जाने वाली ऊष्मा को हरितगृह गैसों (CO₂, CH4, जलवाष्प) के माध्यम से रोक कर रखता है, जिससे पृथ्वी का ताप जीवन के लिए अनुकूल बना रहता है।
5. ग्रहीय पवनों का निर्माण कैसे होता है?
उत्तर देखेंभूमध्य रेखा के पास सूर्य द्वारा तीव्र ऊष्मण से गर्म वायु ऊपर उठती है जिससे भूमध्यरेखीय निम्न दाब पट्टी बनती है। यह वायु ऊपर उठकर ध्रुवों की ओर गति करती है, ठंडी होकर लगभग 30° अक्षांशों पर उतरती है, जिससे उपोष्ण उच्च दाब पट्टियाँ बनती हैं और एक परिसंचरण चक्र पूरा होता है।
6. महासागरीय धाराएँ पृथ्वी की जलवायु को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?
उत्तर देखेंमहासागरीय धाराएँ भूमध्य रेखा से ध्रुवों की ओर ऊष्मा का स्थानांतरण कर भूमंडल के ताप के अंतर को कम करती हैं। उदाहरण के लिए, उत्तरी अटलांटिक प्रवाह (गल्फ स्ट्रीम का विस्तार) यूरोप के तट को गर्म रखता है और शीतकाल में कई बंदरगाहों को बर्फ से मुक्त रखता है।
7. कार्बन चक्र में द्रुत चक्र और मंद चक्र में क्या अंतर है?
उत्तर देखेंद्रुत चक्र (कुछ दिनों से वर्षों तक) में पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा CO₂ को ग्लूकोस में बदलते हैं और श्वसन द्वारा CO₂ वापस लौटती है। मंद चक्र (लाखों वर्षों तक चलने वाला) में मृत पादप व जंतु मृदा में दबकर जीवाश्म ईंधनों (कोयला, तेल, गैस) में परिवर्तित हो जाते हैं।
8. नाइट्रोजन चक्र के पाँच मुख्य चरण कौन-से हैं?
उत्तर देखेंनाइट्रोजन चक्र के पाँच मुख्य चरण हैं – नाइट्रोजन स्थिरीकरण (वायुमंडलीय N₂ का अमोनिया में परिवर्तन), स्वांगीकरण (पादपों द्वारा अवशोषण), अमोनीकरण (अपघटन द्वारा अमोनिया का निर्माण), नाइट्रीकरण (अमोनिया से नाइट्रेट का निर्माण) और विनाइट्रीकरण (नाइट्रेट का पुनः नाइट्रोजन गैस में परिवर्तन)।
9. ऑक्सीजन चक्र में उपभोग और उत्पादन के बीच संतुलन कैसे बना रहता है?
उत्तर देखेंपादप और जंतु श्वसन तथा ईंधनों के दहन (उपभोग) के लिए ऑक्सीजन का उपयोग करते हैं और CO₂ उत्सर्जित करते हैं। वहीं पादप प्रकाश संश्लेषण (उत्पादन) के माध्यम से CO₂ और जल का उपयोग करके ऑक्सीजन उत्सर्जित करते हैं। यह संतुलन वायुमंडल, स्थल, महासागरों और सजीवों के बीच ऑक्सीजन का परिसंचरण बनाए रखता है।
10. वनोन्मूलन के पृथ्वी पर क्या-क्या प्रभाव पड़ते हैं?
उत्तर देखेंवनोन्मूलन से प्रकाश संश्लेषण में कमी आती है और वाष्पोत्सर्जन घटता है जिससे स्थानीय वर्षा में कमी हो सकती है। यह सतही एल्बिडो को बदल देता है, वृक्षों की जड़ों के अभाव में मृदा अपरदन बढ़ता है, और परिणामस्वरूप पर्यावास नष्ट होने से जैव विविधता में कमी आती है।
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण पाठ 13 पर आधारित दीर्घउत्तरीय प्रश्न उत्तर
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. पृथ्वी के पाँच परस्पर संबंधित मंडलों का वर्णन कीजिए और उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि एक मंडल में विक्षोभ अन्य मंडलों को किस प्रकार प्रभावित करता है।
उत्तर देखेंपृथ्वी में पाँच परस्पर संबंधित मंडल हैं – भूमंडल (ठोस चट्टानें, मृदा, भू-आकृतियाँ), जलमंडल (द्रव जल जैसे महासागर, नदियाँ, झीलें, भूजल), हिममंडल (जल का ठोस रूप जैसे हिम और बर्फ), वायुमंडल (पृथ्वी के चारों ओर की वायु) और जैवमंडल (सभी जीवित जीव और उनके पर्यावास)। ये सभी मंडल परस्पर संबंधित हैं और एक मंडल में विक्षोभ अन्य मंडलों में परिवर्तन ला सकता है। उदाहरण के लिए, शीतकाल में हिमपात कम होने से हिममंडल प्रभावित होता है, जिससे ग्रीष्मकाल में झील का जल स्तर घट जाता है (जलमंडल), जिससे मैदानों में घास की वृद्धि के लिए जल कम उपलब्ध होता है (जैवमंडल)। इसी प्रकार वायुमंडलीय ताप में वृद्धि से हिमानियों और ध्रुवीय हिम के पिघलने की दर बढ़ने से समुद्र का जल स्तर बढ़ता है और तटीय शहरों को खतरा उत्पन्न हो सकता है।
2. पृथ्वी की सतह पर सौर विकिरण की पारस्परिक क्रिया को स्पष्ट कीजिए और एल्बिडो की भूमिका बताइए।
उत्तर देखेंविभिन्न पदार्थ सूर्य के प्रकाश को भिन्न-भिन्न मात्रा में अवशोषित करते हैं और उसी अनुसार गर्म होते हैं। गहरे रंग की सतहें सूर्य के प्रकाश का अधिक अवशोषण करती हैं जबकि हल्के रंग की सतहें प्रकाश का अधिक परावर्तन करती हैं और अपेक्षाकृत ठंडी रहती हैं। एक सतह द्वारा सौर विकिरण का परावर्तित अंश एल्बिडो कहलाता है। उच्च एल्बिडो सतहें (जैसे हिम और बर्फ, जिनका एल्बिडो 0.80-0.90 होता है) ठंडी रहती हैं क्योंकि वे अधिक प्रकाश परावर्तित करती हैं, इसी कारण ध्रुवीय प्रदेश अत्यधिक ठंडे रहते हैं। वहीं निम्न एल्बिडो सतहें (जैसे काली मृदा और महासागरीय जल) प्रकाश का कम परावर्तन और अधिक अवशोषण करने के कारण शीघ्रता से गर्म हो जाती हैं। यह अवधारणा जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में महत्वपूर्ण है क्योंकि हिम पिघलने से एल्बिडो घटता है, जिससे तापन और तेज हो सकता है।
3. स्थानीय पवन (घाटी समीर और पर्वतीय समीर) तथा ग्रहीय पवन के निर्माण की प्रक्रिया को समझाइए।
उत्तर देखेंपृथ्वी की सतह के असमान ऊष्मण से स्थानीय पवन उत्पन्न होती हैं। दिन के समय सूर्य के सामने वाली पर्वतीय ढलानें घाटी तल की तुलना में अधिक तीव्रता से गर्म होती हैं, जिससे ढलानों के ऊपर की वायु गर्म होकर ऊपर उठती है और निम्न दाब क्षेत्र बनता है; घाटी से ठंडी वायु ऊपर उठती है, जिसे घाटी समीर कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात स्थिति विपरीत हो जाती है – ढलानें ठंडी हो जाती हैं और घाटी की ओर ठंडी वायु बहती है, जिसे पर्वतीय समीर कहते हैं। इसी प्रकार बड़े स्तर पर भूमध्य रेखा और ध्रुवों के मध्य असमान ऊष्मण से निम्न व उच्च दाब की पट्टियाँ बनती हैं, जिससे ग्रहीय पवनों का निर्माण होता है। भूमध्य रेखा के पास गर्म वायु ऊपर उठकर निम्न दाब पट्टी बनाती है, फिर लगभग 30° अक्षांश पर उतरकर उच्च दाब पट्टी बनाती है, और पृथ्वी के घूर्णन के कारण ये पवनें सीधी रेखा में न बहकर वक्राकार मार्ग में चलती हैं।
4. कार्बन चक्र का विस्तृत वर्णन कीजिए और बताइए कि मानवीय गतिविधियाँ इसे किस प्रकार बाधित कर रही हैं।
उत्तर देखेंकार्बन जीवन का मुख्य आधार है और यह वायुमंडल (CO₂ गैस), जैवमंडल (पादप और जंतु), भूमंडल (कार्बोनेट चट्टानें और जीवाश्म ईंधन) तथा जलमंडल (घुली हुई CO₂) के मध्य निरंतर परिसंचरित होता रहता है। द्रुत चक्र में पादप प्रकाश संश्लेषण द्वारा वायुमंडलीय CO₂ को ग्लूकोस में बदलते हैं और श्वसन द्वारा CO₂ वापस वायुमंडल में छोड़ी जाती है। मंद चक्र में मृत पादप व जंतु मृदा में दबकर लाखों वर्षों में जीवाश्म ईंधनों में बदल जाते हैं। मानव गतिविधियों जैसे जीवाश्म ईंधनों के दहन और वनोन्मूलन ने 1960 से वायुमंडलीय CO₂ की मात्रा को लगभग 35 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है (315 ppm से 420 ppm), जिससे हरितगृह प्रभाव तीव्र हो रहा है, वैश्विक तापन बढ़ रहा है, हिमानियाँ पिघल रही हैं, और महासागरीय जल अधिक अम्लीय हो रहा है जिससे सूक्ष्म प्लवक और प्रवाल भित्तियों को खतरा है।
5. पृथ्वी की प्रक्रियाओं पर मानवीय प्रभाव का वर्णन करते हुए बताइए कि पृथ्वी के प्राकृतिक संतुलन को पुनः स्थापित करने के लिए कौन-से उपाय किए जा सकते हैं।
उत्तर देखेंमानवीय गतिविधियाँ पृथ्वी के सभी मंडलों में जैव-भू रासायनिक चक्रों को बाधित करती हैं। वायुमंडलीय CO₂ की अधिकता से महासागरों में अम्लीयता बढ़ती है, जिससे प्रवाल भित्तियों को खतरा होता है। कृषि में उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से नदियों में सुपोषण होता है, जिससे जल में ऑक्सीजन की कमी से मछलियाँ मर जाती हैं। वनोन्मूलन से मृदा अपरदन बढ़ता है और वाहनों से निकलने वाला धुआँ धूमकुहरा व हानिकारक ओजोन बनाता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए ऊर्जा और ऊर्जा संसाधनों का संरक्षण, नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों (सौर एवं पवन) का उपयोग, वृक्षारोपण, जल संरक्षण और सतत कृषि पद्धतियों का पालन आवश्यक है। भारत ने अरबों वृक्षारोपण किए हैं और सौर ऊर्जा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि की है। साथ ही मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल जैसे वैश्विक सहयोग और मिशन लाइफ जैसी पहलों के माध्यम से व्यक्तिगत व सामुदायिक स्तर पर अपशिष्ट कम करना, पुनः उपयोग करना और पुनर्चक्रण अपनाना पृथ्वी के पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में सहायक है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या कक्षा 9 विज्ञान का यह अध्याय “पृथ्वी एक तंत्र” पुराने एनसीईआरटी पाठ्यक्रम में भी था, या यह पूरी तरह नया है?
यह अध्याय नई अन्वेषण पाठ्यपुस्तक (सत्र 2026-27) में एक व्यापक और एकीकृत रूप में जोड़ा गया है, जो पुराने NCERT पाठ्यक्रम के “प्राकृतिक संपदा” जैसे विषयों से प्रेरित तो है, परंतु इसे कहीं अधिक विस्तृत, अंतःविषयी और डेटा-आधारित बनाया गया है। इसमें विद्युत चुंबकीय स्पेक्ट्रम, सौर स्थिरांक, एल्बिडो, जैव-भू रासायनिक चक्र और जलवायु परिवर्तन जैसे विषयों को भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान के समन्वय से पढ़ाया गया है, जो इसे कक्षा 9 के लिए एक अनूठा अध्याय बनाता है।
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण अध्याय 13 में शामिल भारतीय वैज्ञानिकों के योगदान (अन्ना मणि, के.आर. रामनाथन) के बारे में परीक्षा में क्या पूछा जा सकता है?
अन्ना मणि ने 1950 के दशक में संपूर्ण भारत के लिए सौर सूर्यातप का मानचित्रण किया और 1982 में एस. रंगराजन के साथ “सोलर रेडिएशन ओवर इंडिया” नामक भारत की प्रथम सूर्यातप एटलस प्रकाशित की। वहीं के.आर. रामनाथन ने 1934 में हिमालय की 18,000 फीट ऊँचाई पर ओजोन के स्तर को मापा और मानसून के पूर्वानुमान से जुड़े प्रारंभिक कार्यों का नेतृत्व किया। विद्यार्थियों को इनके नाम, कार्यक्षेत्र और योगदान को अच्छी तरह याद रखना चाहिए क्योंकि ऐसे “विज्ञान को भारत का योगदान” खंड से लघु उत्तरीय प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
क्या कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण अध्याय 13 सत्र 2026-27 के नए एनसीईआरटी पाठ्यक्रम के अनुसार है और इसे कहाँ से डाउनलोड करें?
हाँ, यह अध्याय एनसीईआरटी द्वारा जारी नई “अन्वेषण” पाठ्यपुस्तक (कक्षा 9 विज्ञान) का अंतिम व समापन अध्याय है, जो शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए लागू की गई है। यह एनसीईआरटी की आधिकारिक वेबसाइट से निःशुल्क पीडीएफ के रूप में डाउनलोड की जा सकती है। विद्यार्थियों और शिक्षकों को सलाह दी जाती है कि वे केवल आधिकारिक NCERT स्रोत से ही नवीनतम संस्करण डाउनलोड करें।
कक्षा 9 विज्ञान अन्वेषण अध्याय 13 के संख्यात्मक प्रश्न (जैसे सूर्यातप से ऊर्जा गणना) हल करने के लिए कौन-सा सूत्र याद रखना जरूरी है?
इस अध्याय में सबसे महत्वपूर्ण सूत्र है ऊर्जा (E) = तीव्रता × क्षेत्रफल × समय, जिसका उपयोग सूर्यातप से प्राप्त ऊर्जा की गणना करने के लिए किया जाता है (जैसा उदाहरण 13.1 में दिखाया गया है)। विद्यार्थियों को इकाइयों (kWm⁻² को J s⁻¹m⁻² में बदलना, समय को सेकंड में बदलना) का ध्यानपूर्वक रूपांतरण करना आना चाहिए, क्योंकि यह “वैज्ञानिक की भाँति सोचिए” जैसे प्रश्नों में भी उपयोगी है।
