एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत्
एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् समाधान – अभ्यास के प्रश्न-उत्तर, पाठ का हिंदी अनुवाद, शब्द-अर्थ, सारांश तथा अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए यहाँ दिए गए हैं। कक्षा 9 संस्कृत शारदा का षष्ठ पाठ ‘मनःपूतं समाचरेत्’ एक सुभाषित-संग्रह है। इसका अर्थ है – ‘पवित्र मन से आचरण करो।’ इस पाठ में भारतीय ज्ञान-परम्परा के आठ महान् ग्रन्थों से एक-एक श्लोक संकलित किए गए हैं। ये सुभाषित केवल पढ़ने के लिए नहीं, जीवन में आचरण करने के लिए हैं। पाठ की प्रस्तावना में ही एक छात्र कहता है – ‘ये सुभाषित न केवल पठनाय, अपितु जीवने आचरणाय सन्ति।’ ये श्लोक पवित्र मन, धर्म के दस लक्षण, श्रेष्ठ जनों का अनुसरण, अभ्यास का महत्त्व, विघ्नों में भी कार्य न छोड़ना, पुरुषार्थ, विवेकशीलता और विचारपूर्वक कार्य करने की शिक्षा देते हैं।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 के त्वरित लिंक:
- कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 प्रश्न-उत्तर
- शारदा पाठ 6 के ग्रंथों का परिचय
- संस्कृत शारदा पाठ 6 का सारांश
- संस्कृत शारदा अध्याय 6 शब्द-अर्थ
- संस्कृत शारदा पाठ 6 में व्याकरण
- शारदा पाठ 6 के हिंदी अनुवाद
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एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 समाधान (2026-27 नया पाठ्यक्रम)
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
१. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत –
(क) लोकः कस्य आचरणम् अनुकरोति?
(ख) कीदृशी वाणी वक्तव्या?
(ग) लक्ष्मीः कम् उपैति?
(घ) उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य किं न कुर्वन्ति?
(ङ) धर्मस्य लक्षणानि कानि?
(च) सकलाः कलाः कस्मात् सिध्यन्ति?
(छ) सम्पदः कं वृणते?
उत्तर:
(क) लोकः श्रेष्ठस्य आचरणम् अनुकरोति। (यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः — श्रीमद्भगवद्गीता ३.२१)
(ख) सत्यपूतां वाणीं वक्तव्या।
(ग) लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।
(घ) उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः (कार्यं) न परित्यजन्ति ।
(ङ) धृतिः क्षमा दमः अस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रहः धीः विद्या सत्यम् अक्रोधः — इति दशकं धर्मलक्षणम्।
(च) सकलाः कलाः अभ्यासात् सिध्यन्ति।
(छ) सम्पदः विमृश्यकारिणं (गुणलुब्धाः स्वयमेव) वृणते।
२. अधोलिखितेषु श्लोकांशेषु रिक्तस्थानानि पूरयत –

उत्तर:

३. रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

उत्तर:

४. अधोलिखितं श्लोकं पठित्वा प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत –
श्लोकः
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥
(क) अस्मिन् श्लोके प्रथमं क्रियापदं किम्?
(ख) कं न्यसेत्?
(ग) कीदृशं पादं न्यसेत्?
(घ) द्वितीयं किं क्रियापदम् अस्ति?
(ङ) किं पिबेत्?
(च) कीदृशं जलं पिबेत्?
(छ) तृतीयं किं क्रियापदम् अस्ति?
(ज) कां वदेत्?
(झ) कीदृशीं वाणीं वदेत्?
(ञ) चतुर्थं किं क्रियापदम् अस्ति?
(ट) कथं समाचरेत्?
उत्तर:
(क) प्रथमं क्रियापदम् — न्यसेत्।
(ख) पादं न्यसेत्।
(ग) दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्।
(घ) द्वितीयं क्रियापदम् — पिबेत्।
(ङ) जलं पिबेत्।
(च) वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
(छ) तृतीयं क्रियापदम् — वदेत्।
(ज) वाचं वदेत्।
(झ) सत्यपूतां वाणीं वदेत्।
(ञ) चतुर्थं क्रियापदम् — समाचरेत्।
(ट) मनःपूतं समाचरेत्।
५. मञ्जूषातः पदानि चित्वा भावार्थेषु रिक्तस्थानानि पूरयत –

उत्तर:

६. श्लोकानाम् अन्वयेषु रिक्तस्थानानि पूरयत –

उत्तर:

७. यथोचितं मेलनं कुरुत –

उत्तर:

८. रेखाङ्कितेषु पदेषु सन्धिविच्छेदं कुरुत –

उत्तर:

९. अत्र कतिचन विग्रहवाक्यानि दत्तानि सन्ति । तेषां समस्तपदानि पाठात् चित्वा लिखत –

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 में वर्णित ग्रंथों के बारे में
ग्रन्थ-स्रोत परिचय (हिन्दी में)
| श्लोकांश | स्रोत-ग्रन्थ | रचयिता |
|---|---|---|
| 1. दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम् | मनुस्मृतिः (६.४६) | मनुः |
| 2. धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् | मनुस्मृतिः (६.९२) | मनुः |
| 3. यद्यदाचरति श्रेष्ठः | श्रीमद्भगवद्गीता (३.२१) | महर्षि व्यासः |
| 4. अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः | सुभाषितरत्नभाण्डागारः | – |
| 5. प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन | नीतिशतकम् (२७) | भर्तृहरिः |
| 6. उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति | पञ्चतन्त्रम् – मित्रभेद (१४९) | विष्णुशर्मा |
| 7. पुराणमित्येव न साधु सर्वम् | मालविकाग्निमित्रम् (१.२) | कालिदासः |
| 8. सहसा विदधीत न क्रियाम् | किरातार्जुनीयम् (२.३०) | भारविः |
भारतीय ज्ञान-परम्परा सारिणी
| ग्रन्थ का नाम | भारतीय ज्ञान-परम्परा में स्थान | ग्रन्थकर्ता |
|---|---|---|
| 1. रामायणम् | ऐतिहासिक काव्य | महर्षि वाल्मीकि |
| 2. मनुस्मृतिः | धर्मशास्त्रीय ग्रन्थ | मनुः |
| 3. श्रीमद्भगवद्गीता | ज्ञानोपदेश | महर्षि व्यासः |
| 4. हठयोगप्रदीपिका | योग-दर्शन | स्वात्मारामः |
| 5. नीतिशतकम् | नीति-साहित्य | भर्तृहरिः |
| 6. पञ्चतन्त्रम् | कथा-साहित्य | विष्णुशर्मा |
| 7. मालविकाग्निमित्रम् | रूपकम् (नाटक) | कालिदासः |
| 8. किरातार्जुनीयम् | महाकाव्यम् | भारविः |
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 का संक्षिप्त सारांश
पाठ का सार (हिन्दी में)
प्रस्तावना: पाठ में अध्यापक छात्रों से पूछते हैं — ‘यदि कोई कार्य करना हो तो पहले क्या आवश्यक है?’ छात्र उत्तर देते हैं — विचारकर करना, उचित विधि से करना, पूर्ण मन से करना। तब अध्यापक कहते हैं — ‘यदि मन ही मलिन हो, उद्देश्य ही अनुचित हो, तो कोई भी कार्य सम्यक् कैसे होगा?’ इसीलिए सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए — यही इस पाठ का सन्देश है।
- श्लोक 1 (मनुस्मृति): दृष्टि से शुद्ध करके पैर रखो, वस्त्र से छानकर जल पियो, सत्य से शुद्ध वाणी बोलो और पवित्र मन से आचरण करो।
- श्लोक 2 (मनुस्मृति): धैर्य, क्षमा, इन्द्रिय-संयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध — ये दस धर्म के लक्षण हैं।
- श्लोक 3 (भगवद्गीता): श्रेष्ठ जन जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग वही करते हैं। वह जो प्रमाण करता है, लोग उसका अनुसरण करते हैं।
- श्लोक 4 (सुभाषितरत्नभाण्डागार): अभ्यास से सभी क्रियाएँ सिद्ध होती हैं, अभ्यास से सभी कलाएँ सिद्ध होती हैं, ध्यान-मौन आदि भी अभ्यास से ही सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए क्या कठिन है?
- श्लोक 5 (नीतिशतकम्): नीच व्यक्ति विघ्न के भय से कार्य ही नहीं आरम्भ करते। मध्यम व्यक्ति आरम्भ करके विघ्न आने पर छोड़ देते हैं। उत्तम व्यक्ति आरम्भ करके बार-बार विघ्न आने पर भी कार्य नहीं छोड़ते।
- श्लोक 6 (पञ्चतन्त्रम्): सम्पत्ति उद्योगी पुरुष-सिंह के पास स्वयं आती है। ‘भाग्य में जो होगा वही मिलेगा’ — ऐसा कायर कहते हैं। भाग्य को जीतकर पुरुषार्थ करो। यदि प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले तो दोष किसका?
- श्लोक 7 (मालविकाग्निमित्रम्): ‘पुराना है इसलिए सब अच्छा है’ — यह नियम नहीं। ‘नया है इसलिए निकृष्ट है’ — यह भी नहीं। सज्जन परीक्षा करके अच्छे को ग्रहण करते हैं। मूर्ख दूसरों के मत से चलते हैं।
- श्लोक 8 (किरातार्जुनीयम्): बिना सोचे-विचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। अविवेक सबसे बड़े संकटों का घर है। गुणों की चाह रखने वाली सम्पत्तियाँ स्वयं ही विचारपूर्वक कार्य करने वाले का आश्रय लेती हैं।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 हिंदी अनुवाद
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 – संपूर्ण पाठ का हिंदी अनुवाद
प्रियच्छात्राः !
वदन्तु किमपि कार्यं करणीयम् अस्ति चेत् आदौ किम् आवश्यकम् ?
आचार्ये ! विचिन्त्य कार्यकरणम्।
पूर्णमनसा कार्यकरणम्।
उचितविधिना कार्यकरणम्।
हिंदी अनुवादप्रिय छात्रों!
बताओ — यदि कोई कार्य करना हो तो पहले क्या आवश्यक है?
आचार्य जी! सोच-विचारकर कार्य करना।
पूरे मन से कार्य करना।
उचित विधि से कार्य करना।
सर्वे उचितमेव वदन्ति । अधुना विचारयन्तु — यदि मनः एव मलिनं स्यात्, उद्देश्यम् एव अनुचितं स्यात् तर्हि किमपि कार्यं सम्यक् कथं भवेत् ?
एवं चेत् तस्य कार्यस्य फलम् अपि दूषितम् एव स्यात्।
हिंदी अनुवादसभी उचित ही कह रहे हैं। अब विचार करो — यदि मन ही मैला हो, उद्देश्य ही अनुचित हो, तो कोई भी कार्य ठीक प्रकार से कैसे होगा?
यदि ऐसा है तो उस कार्य का फल भी दूषित ही होगा।
अत एव अस्माभिः सर्वाणि कार्याणि पवित्रेण मनसा करणीयानि । एतदेव शिक्षयति प्रस्तुतः पाठः ‘मनःपूतं समाचरेत्’ इति ।
आचार्ये ! अस्मिन् पाठे विविधेभ्यः ग्रन्थेभ्यः सुभाषितानि सङ्कलितानि दृश्यन्ते । किम् एतानि सुभाषितानि वर्तमानसमये अपि उपयोगीनि सन्ति ?
हिंदी अनुवादइसीलिए हमें सभी कार्य पवित्र मन से करने चाहिए। यही शिक्षा देता है प्रस्तुत पाठ — ‘मन से शुद्ध होकर आचरण करो।’
आचार्य जी! इस पाठ में विभिन्न ग्रन्थों से सुभाषित(सुंदर वचन) संकलित दिखाई देते हैं। क्या ये सुभाषित वर्तमान समय में भी उपयोगी हैं?
भवन्तः स्वयमेव चिन्तयन्तु ।
अहं वदामि आचार्ये ! एतानि सुभाषितानि न केवलं पठनाय अपितु जीवने आचरणाय सन्ति।
सम्यक् उक्तम्। आयान्तु वयं सुभाषितानि पठामः जीवने च आचरामः।
हिंदी अनुवादआप स्वयं ही विचार करें।
मैं कहता हूँ, आचार्य जी! ये सुभाषित केवल पढ़ने के लिए नहीं, अपितु जीवन में आचरण करने के लिए भी हैं।
बहुत अच्छा कहा। आओ, हम सुभाषितों को पढ़ें और जीवन में आचरण भी करें।
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनः पूतं समाचरेत् ॥ १ ॥
(मनुस्मृति: — ६.४६)
हिंदी अनुवादआँखों से अच्छी तरह देख-परख कर ही कदम आगे बढ़ाना चाहिए, वस्त्र से छानकर जल पिए, सत्य से शुद्ध वाणी बोले, और मन से शुद्ध होकर आचरण करे।
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ २ ॥
(मनुस्मृति: — ६.९२)
हिंदी अनुवादधैर्य, क्षमा, इन्द्रिय-मन का संयम, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध — ये दस धर्म के लक्षण हैं।
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः ।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥ ३ ॥
(श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)
हिंदी अनुवादश्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, दूसरे लोग भी वही करते हैं। वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसी का अनुसरण करता है।
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः ।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम् ॥ ४ ॥
(सुभाषितरत्नभाण्डागार:)
हिंदी अनुवादअभ्यास से सभी क्रियाएँ सिद्ध होती हैं, अभ्यास से सभी कलाएँ सिद्ध होती हैं। अभ्यास से ध्यान, मौन आदि भी सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए कठिन क्या है?
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः ।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति ॥ ५ ॥
(नीतिशतकम् — २७)
हिंदी अनुवादनीच श्रेणी के लोग बाधाओं और विघ्नों के भय से कार्य आरम्भ ही नहीं करते। मध्यम लोग कार्य आरम्भ करके विघ्नों से बाधित होने पर रुक जाते हैं। किन्तु उत्तम लोग कार्य आरम्भ करके बार-बार विघ्नों से बाधित होने पर भी उसे नहीं छोड़ते।
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति ।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः ॥ ६ ॥
(पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेद: — १४९)
हिंदी अनुवादउद्यमी पुरुषसिंह के पास लक्ष्मी स्वयं आती है। ‘भाग्य से मिलेगा’ — ऐसा कायर लोग कहते हैं। भाग्य को परे हटाकर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो। यत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले, तो इसमें दोष किसका?
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः ॥ ७ ॥
(मालविकाग्निमित्रम् — १.२)
हिंदी अनुवादपुराना है इसीलिए सब कुछ श्रेष्ठ नहीं होता, और नया काव्य है इसीलिए निम्नस्तरीय नहीं होता। सज्जन परीक्षा करके किसी एक को स्वीकार करते हैं। मूर्ख की बुद्धि दूसरों के मत से निर्देशित होती है।
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ॥ ८ ॥
(किरातार्जुनीयम् — २.३०)
हिंदी अनुवादकिसी कार्य को अचानक/बिना सोचे नहीं करना चाहिए। अविवेक ही सबसे बड़े खतरों का स्थान है। गुणों की अभिलाषिणी सम्पत्तियाँ भली-भाँति सोच-विचारकर कार्य करने वाले के पास स्वयं ही आ जाती हैं।
शारदा अध्याय 6 के सभी श्लोकों का भावार्थ
श्लोक 1 (मनुस्मृतिः — ६.४६)
श्लोकः:
दृष्टिपूतं न्यसेत् पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत्।
सत्यपूतां वदेत् वाचं मनःपूतं समाचरेत्॥
- हिन्दी अनुवाद: दृष्टि (आँख) से शुद्ध करके पैर रखो, वस्त्र से छानकर जल पियो, सत्य से शुद्ध वाणी बोलो और पवित्र मन से आचरण करो।
- भावार्थ: इस श्लोक में चार प्रकार की शुद्धि बताई गई है — दृष्टि-शुद्धि (ध्यान से देखकर चलना), जल-शुद्धि (छानकर पानी पीना), वाणी-शुद्धि (सत्य और मधुर बोलना) और मन-शुद्धि (शुद्ध भाव से कार्य करना)। मन की शुद्धि सर्वोपरि है।
- अन्वयः: दृष्टिपूतं पादं न्यसेत्, वस्त्रपूतं जलं पिबेत्, सत्यपूतां वाचं वदेत्, मनःपूतं समाचरेत्।
श्लोक 2 (मनुस्मृतिः — ६.९२)
श्लोकः:
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
- हिंदी अनुवाद: धैर्य, क्षमा, इन्द्रिय-संयम (दमः), चोरी न करना (अस्तेयम्), पवित्रता (शौचम्), इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि (धीः), विद्या, सत्य और अक्रोध — ये दस धर्म के लक्षण हैं।
- भावार्थ: मनु महाराज ने धर्म के दस लक्षण बताए हैं जो प्रत्येक मनुष्य में होने चाहिए। ये केवल धार्मिक नियम नहीं, बल्कि नैतिक जीवन की आधारशिला हैं। जो इन दसों को धारण करता है, वही वास्तव में धार्मिक है।
- अन्वयः: धृतिः क्षमा दमः अस्तेयं शौचम् इन्द्रियनिग्रहः धीः विद्या सत्यम् अक्रोधः (च इति) दशकं धर्मलक्षणं (भवति)।
श्लोक 3 (श्रीमद्भगवद्गीता — ३.२१)
श्लोकः:
यद्यदाचरति श्रेष्ठः तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
- हिंदी अनुवाद: श्रेष्ठ जन जो-जो आचरण करता है, अन्य लोग वही-वही करते हैं। वह जो प्रमाण निर्धारित करता है, लोक उसी का अनुसरण करता है।
- भावार्थ: यह भगवान् श्रीकृष्ण का अर्जुन को उपदेश है। महान् और श्रेष्ठ व्यक्तियों का आचरण समाज के लिए मानक बन जाता है। इसीलिए नेताओं, शिक्षकों और अभिभावकों की जिम्मेदारी सबसे अधिक है — क्योंकि समाज उनका अनुसरण करता है।
- अन्वयः: श्रेष्ठः यत् यत् आचरति इतरः जनः तत् तत् एव (आचरति)। सः यत् प्रमाणं कुरुते, लोकः तत् अनुवर्तते।
श्लोक 4 (सुभाषितरत्नभाण्डागारः)
श्लोकः:
अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः।
अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥
- हिंदी अनुवाद: अभ्यास से सभी क्रियाएँ सिद्ध होती हैं, अभ्यास से सभी कलाएँ सिद्ध होती हैं, अभ्यास से ध्यान-मौन आदि भी सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए क्या कठिन है?
- भावार्थ: यह श्लोक अभ्यास की अपरिमित शक्ति बताता है। संगीत, नृत्य, विज्ञान, ध्यान — सब कुछ अभ्यास से ही प्राप्त होता है। ‘करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान’ — यही इस श्लोक का सार है। अभ्यास कोई भी कार्य असम्भव नहीं रहने देता।
- अन्वयः: सर्वाः क्रियाः अभ्यासेन (सिद्ध्यन्ति)। सकलाः कलाः अभ्यासात् (सिद्ध्यन्ति)। ध्यानमौनादि (अपि) अभ्यासात् (सिद्ध्यति)। अभ्यासस्य दुष्करं किम् (अस्ति)?
श्लोक 5 (नीतिशतकम् — २७)
श्लोकः:
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजनाः न परित्यजन्ति॥
- हिंदी अनुवाद: नीच व्यक्ति विघ्न के भय से कार्य ही आरम्भ नहीं करते। मध्यम व्यक्ति आरम्भ करके विघ्न आने पर छोड़ देते हैं। उत्तम जन आरम्भ करके बार-बार विघ्नों से बाधित होने पर भी कार्य नहीं छोड़ते।
- भावार्थ: भर्तृहरि ने तीन प्रकार के मनुष्यों का सुन्दर वर्गीकरण किया है। नीच — भय से प्रारम्भ ही नहीं करते। मध्यम — बाधा आने पर छोड़ देते हैं। उत्तम — बार-बार असफल होने पर भी नहीं छोड़ते। यह श्लोक उत्तम बनने की प्रेरणा देता है।
- अन्वयः: नीचैः विघ्नभयेन (कार्यं) न प्रारभ्यते खलु। मध्याः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नविहताः (कार्यात्) विरमन्ति। उत्तमजनाः (कार्यं) प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः (कार्यं) न परित्यजन्ति।
श्लोक 6 (पञ्चतन्त्रम् — मित्रभेद — १४९)
श्लोकः:
उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥
- हिंदी अनुवाद: सम्पत्ति उद्योगी पुरुष-सिंह के पास स्वयं आती है। ‘भाग्य में जो होगा वही मिलेगा’ — ऐसा कायर लोग कहते हैं। भाग्य को जीतकर अपनी शक्ति से पुरुषार्थ करो। यदि प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले, तो इसमें किसका दोष?
- भावार्थ: विष्णुशर्मा ने पुरुषार्थ का महत्त्व समझाया है। कर्म ही भाग्य बनाता है। भाग्य का बहाना कायर बनाता है। जो परिश्रम से कार्य करता है, सम्पत्ति स्वयं उसके पास आती है। प्रयत्न करने के बाद असफलता में दोष नहीं।
- अन्वयः: लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति। दैवेन देयम् इति (तु) कापुरुषाः वदन्ति। दैवं निहत्य पौरुषं कुरु। यत्ने कृते यदि (कार्यं) न सिध्यति, (तर्हि) अत्र कः दोषः (स्यात्)?
श्लोक 7 (मालविकाग्निमित्रम् — १.२)
श्लोकः:
पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम्।
सन्तः परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः॥
- हिंदी अनुवाद: पुराना है इसलिए सब कुछ अच्छा है — ऐसा नहीं है। नया है इसलिए काव्य निकृष्ट है — ऐसा भी नहीं। सज्जन परीक्षा करके किसी एक को स्वीकार करते हैं। मूर्ख दूसरों के विचारों से निर्देशित बुद्धिवाला होता है।
- भावार्थ: कालिदास ने विवेकशीलता का सन्देश दिया है। किसी भी बात को अन्धे विश्वास से न स्वीकारें — न पुराने होने के कारण, न नए होने के कारण। स्वयं परीक्षा करें और उत्तम को स्वीकारें। मूर्ख वह है जो दूसरों के कहने पर चलता है।
- अन्वयः: पुराणम् इति सर्वं साधु न (वर्तते), काव्यं नवम् इति अवद्यं न (वर्तते), सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते, मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः (भवति)।
श्लोक 8 (किरातार्जुनीयम् — २.३०)
श्लोकः:
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥
- हिंदी अनुवाद: बिना सोचे-विचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। अविवेक सबसे बड़े संकटों का स्थान है। गुणों की चाह रखने वाली सम्पत्तियाँ स्वयं ही विचारपूर्वक कार्य करने वाले का वरण करती हैं।
- भावार्थ: भारवि ने विवेकशीलता का महत्त्व बताया है। बिना सोचे-समझे की गई क्रिया बड़े संकटों को जन्म देती है। जो मनुष्य सोच-समझकर, विवेक से कार्य करता है, सम्पत्ति और सफलता स्वयं उसके पास आती है। अतः ‘पहले सोचो, फिर करो।’
- अन्वयः: क्रियां सहसा न विदधीत। अविवेकः परम् आपदां पदम् (भवति)। हि गुणलुब्धाः सम्पदः स्वयमेव विमृश्यकारिणं वृणते।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 – कठिन शब्दों के अर्थ
महत्त्वपूर्ण शब्दार्थ
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत में अर्थ | हिंदी में अर्थ |
|---|---|---|
| पूतम् | शुद्धम् | पवित्र, शुद्ध |
| धृतिः | धैर्यम् | धैर्य |
| दमः | इन्द्रियाणां नियन्त्रणम् | इन्द्रिय-संयम |
| अस्तेयम् | न स्तेयम् | चोरी न करना |
| शौचम् | पवित्रता | शुद्धता, पवित्रता |
| अक्रोधः | क्रोधरहितता | क्रोध न करना |
| कापुरुषाः | कुत्सिताः पुरुषाः | कायर, अधम लोग |
| उद्योगी | परिश्रमी | प्रयत्नशील |
| पुरुषसिंहः | पुरुषेषु सिंह इव | पुरुषों में सिंह के समान |
| दैवम् | भाग्यम् | भाग्य |
| पौरुषम् | पुरुषार्थः | पुरुषार्थ, परिश्रम |
| विमृश्यकारी | चिन्तयित्वा कार्यं करोति यः | सोच-समझकर कार्य करने वाला |
| सहसा | अविचार्य | बिना सोचे-विचारे |
| अविवेकः | विवेकरहितता | विवेक का अभाव |
| विघ्नः | बाधा | रुकावट, बाधा |
| मूढः | मूर्खः | मूर्ख |
| सम्पद् | ऐश्वर्यम् | सम्पत्ति |
| परीक्ष्य | परीक्षणानन्तरम् | परीक्षा करके |
| अनुवर्तते | अनुसरति | अनुसरण करता है |
| गुणलुब्धाः | गुणेषु लुब्धाः | गुणों की चाह रखने वाले |
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 में व्याकरण अध्ययन
व्याकरण – सन्धिविच्छेदः
| सन्धिपदम् | विच्छेदः | सन्धिभेदः |
|---|---|---|
| बहून्यपि | बहूनि + अपि | यण्-सन्धिः |
| दमोऽस्तेयम् | दमः + अस्तेयम् | विसर्ग-सन्धिः |
| पुराणमित्येव | पुराणम् + इति + एव | यण्-सन्धिः |
| चोत्तमजनाः | च + उत्तमजनाः | गुण-सन्धिः |
| विघ्नविहता | विघ्नैः + विहता | विसर्ग-लोपः |
| परीक्ष्यान्यतरद्भजन्ते | परीक्ष्य + अन्यतरत् + भजन्ते | यण्-सन्धिः |
व्याकरण – समास
| विग्रहवाक्यम् | समस्तपदम् | समासभेदः |
|---|---|---|
| मनसा पूतम् | मनःपूतम् | तृतीया-तत्पुरुषः |
| विघ्नैः विहताः | विघ्नविहताः | तृतीया-तत्पुरुषः |
| पुरुषः सिंहः इव | पुरुषसिंहः | कर्मधारयः |
| न विवेकः | अविवेकः | नञ्-तत्पुरुषः |
| उत्तमाः जनाः | उत्तमजनाः | कर्मधारयः |
परीक्षा अभ्यास के लिए – शारदा अध्याय 6 के अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर
अतिलघूत्तरीय प्रश्न – अतिलघु उत्तर
- ‘मनःपूतं समाचरेत्’ इत्यस्य किं तात्पर्यम्?
(इस शीर्षक का क्या तात्पर्य है?)
उत्तरम्:
अस्य तात्पर्यम् अस्ति — मनसा पवित्रेण भावेन सर्वाणि कार्याणि करणीयानि।
(इसका तात्पर्य है — पवित्र मन से सभी कार्य करने चाहिए।) - प्रथमः श्लोकः कस्मात् ग्रन्थात् आगतः?
(पहला श्लोक किस ग्रन्थ से आया है?)
उत्तरम्:
प्रथमः श्लोकः मनुस्मृतेः (६.४६) आगतः।
(पहला श्लोक मनुस्मृति के छठे अध्याय के ४६वें श्लोक से आया है।) - ‘दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्’ इत्यस्य किम् अर्थः?
(इस वाक्य का क्या अर्थ है?)
उत्तरम्:
दृष्टिपूतम् इति — दृष्ट्या पूतम् — दृष्टिना शुद्धम् करके पादं स्थापयेत् इत्यर्थः।
(दृष्टि से शुद्ध करके पैर रखना चाहिए — अर्थात् ध्यान से देखकर चलना।) - धर्मस्य दशानां लक्षणानां नामानि लिखत।
(धर्म के दस लक्षणों के नाम लिखिए।)
उत्तरम्:
धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः।
(धैर्य, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, पवित्रता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध।) - तृतीयः श्लोकः कस्मात् ग्रन्थात् उद्धृतः?
(तीसरा श्लोक किस ग्रन्थ से उद्धृत है?)
उत्तरम्:
तृतीयः श्लोकः श्रीमद्भगवद्गीतायाः (३.२१) उद्धृतः।
(तीसरा श्लोक श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के २१वें श्लोक से।) - लोकः कस्य अनुसरणं करोति?
(लोग किसका अनुसरण करते हैं?)
उत्तरम्:
लोकः श्रेष्ठस्य आचरणम् अनुवर्तते — यत् श्रेष्ठः प्रमाणं कुरुते तत् लोकः अनुसरति।
(लोग श्रेष्ठ जन के आचरण का अनुसरण करते हैं।) - अभ्यासेन किम् सिध्यति?
(अभ्यास से क्या सिद्ध होता है?)
उत्तरम्:
अभ्यासेन सर्वाः क्रियाः, सकलाः कलाः, ध्यानमौनादि च सिध्यन्ति।
(अभ्यास से सभी क्रियाएँ, सभी कलाएँ और ध्यान-मौन आदि सिद्ध होते हैं।) - नीतिशतकस्य रचयिता कः?
(नीतिशतक के रचयिता कौन हैं?)
उत्तरम्:
नीतिशतकस्य रचयिता भर्तृहरिः।
(नीतिशतक के रचयिता भर्तृहरि हैं।) - पञ्चतन्त्रम् कस्य रचना?
(पञ्चतन्त्र किसकी रचना है?)
उत्तरम्:
पञ्चतन्त्रम् विष्णुशर्मणः रचना।
(पञ्चतन्त्र विष्णुशर्मा की रचना है।) - उत्तमजनाः विघ्नों में क्या करते हैं? (संस्कृत में)
उत्तरम्:
उत्तमजनाः कार्यं प्रारभ्य विघ्नैः पुनः पुनः अपि प्रतिहन्यमानाः तत् न परित्यजन्ति।
(उत्तम जन कार्य आरम्भ करके बार-बार विघ्न आने पर भी उसे नहीं छोड़ते।) - लक्ष्मीः कम् उपैति?
(सम्पत्ति किसके पास आती है?)
उत्तरम्:
लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति।
(सम्पत्ति उद्योगी पुरुष-सिंह के पास जाती है।) - कापुरुषाः किं वदन्ति?
(कायर क्या कहते हैं?)
उत्तरम्:
कापुरुषाः वदन्ति — ‘दैवेन देयम् इति’ — अर्थात् भाग्य में जो होगा वही मिलेगा।
(कायर कहते हैं — जो भाग्य में लिखा है वही मिलेगा।) - ‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’ इत्यस्य किम् अर्थः?
(इस वाक्य का क्या अर्थ है?)
उत्तरम्:
अस्य अर्थः — बिना विचार्य कार्यं न करणीयम्। विचार्य, विमृश्य एव कार्यं करणीयम्।
(इसका अर्थ — बिना सोचे-विचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए।) - मालविकाग्निमित्रम् कस्य रचना?
(मालविकाग्निमित्र किसकी रचना है?)
उत्तरम्:
मालविकाग्निमित्रम् कालिदासस्य रचना।
(मालविकाग्निमित्र कालिदास की रचना है।) - किरातार्जुनीयम् कस्य रचना?
(किरातार्जुनीय किसकी रचना है?)
उत्तरम्:
किरातार्जुनीयम् भारवेः रचना।
(किरातार्जुनीय भारवि की रचना है।)
लघूत्तरीय प्रश्न – लघु उत्तर
- ‘दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्’ इत्यादि श्लोकस्य भावार्थं संस्कृते लिखत।
(पहले श्लोक का भावार्थ संस्कृत में लिखिए।)
उत्तरम्:
अस्मिन् श्लोके चतुर्विधा शुद्धिः उक्ता अस्ति। दृष्टिना शुद्धं स्थानं दृष्ट्वा पादं न्यसेत्। वस्त्रेण शुद्धं जलं पिबेत्। सत्येन युक्तां मधुरां च वाणीं वदेत्। सर्वेषु कार्येषु मनसः शुद्धिः सर्वोपरि अस्ति — मनःपूतं समाचरेत्। यदि मनः शुद्धम् अस्ति तर्हि सर्वाणि कार्याणि शुभानि भवन्ति।
(इस श्लोक में चार प्रकार की शुद्धि बताई है — दृष्टि, जल, वाणी और मन। मन की शुद्धि सर्वोपरि है। शुद्ध मन से सभी कार्य शुभ होते हैं।) - धर्मस्य दश लक्षणानि संस्कृते लिखत।
(धर्म के दस लक्षण संस्कृत में लिखिए।)
उत्तरम्:
मनुस्मृतौ धर्मस्य दशकं लक्षणं प्रतिपादितम् — (१) धृतिः — धैर्यम्, (२) क्षमा — अपराधिनः क्षन्तुं शक्तिः, (३) दमः — इन्द्रियाणां नियन्त्रणम्, (४) अस्तेयम् — चोरी न करना, (५) शौचम् — आन्तरिकी बाह्यी च पवित्रता, (६) इन्द्रियनिग्रहः — इन्द्रियाणां वशीकरणम्, (७) धीः — विवेकयुक्ता बुद्धिः, (८) विद्या — ज्ञानम्, (९) सत्यम् — सत्यवचनम्, (१०) अक्रोधः — क्रोधस्य अभावः।
(मनुस्मृति में बताए धर्म के दस लक्षण — धैर्य, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और अक्रोध।) - नीतिशतकस्य आधारेण मनुष्याणां त्रयः वर्गाः के सन्ति? संस्कृते वर्णयत।
(नीतिशतक के आधार पर मनुष्यों के तीन वर्ग कौन-से हैं?)
उत्तरम्:
भर्तृहरिः नीतिशतके मनुष्याणां त्रयः वर्गाः उक्तवान् —
नीचाः — एते विघ्नभयेन कार्यम् एव न प्रारभन्ते। भयात् आरम्भः एव नास्ति।
मध्याः — एते कार्यम् आरभन्ते किन्तु विघ्नः आगते तत् परित्यजन्ति।
उत्तमाः — एते कार्यम् आरभ्य विघ्नैः पुनः पुनः बाधितैः अपि तत् न परित्यजन्ति।
अस्माभिः उत्तमवर्गे स्थातव्यम् — यत्र विघ्नैः अपि कार्यं न परित्यज्यते।
(नीच — आरम्भ ही नहीं। मध्यम — आरम्भ करके छोड़ देते हैं। उत्तम — बार-बार विघ्न आने पर भी नहीं छोड़ते। हमें उत्तम वर्ग में रहना चाहिए।) - अभ्यासस्य महत्त्वं चतुर्थश्लोकस्य आधारेण संस्कृते वर्णयत।
(अभ्यास का महत्त्व चौथे श्लोक के आधार पर बताइए।)
उत्तरम्:
सुभाषितरत्नभाण्डागारे उक्तम् — अभ्यासेन सर्वाः क्रियाः सिध्यन्ति। अभ्यासात् सकलाः कलाः सिध्यन्ति। ध्यानं, मौनम् आदि अपि अभ्यासात् एव लभ्यते। अभ्यासस्य दुष्करं किम् अस्ति? अर्थात् अभ्यासेन सर्वम् एव सम्भवम् अस्ति। यः निरन्तरम् अभ्यासं करोति सः सर्वाणि कार्याणि साधयितुं समर्थः भवति।
(अभ्यास से सभी क्रियाएँ, कलाएँ, ध्यान-मौन सिद्ध होते हैं। अभ्यास के लिए कुछ भी कठिन नहीं। निरन्तर अभ्यास करने वाला सब कुछ साध सकता है।) - पञ्चतन्त्रस्य श्लोकस्य आधारेण पुरुषार्थस्य महत्त्वं संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
(पञ्चतन्त्र के श्लोक के आधार पर पुरुषार्थ का महत्त्व बताइए।)
उत्तरम्:
विष्णुशर्मा पञ्चतन्त्रे उक्तवान् — लक्ष्मीः उद्योगिनं पुरुषसिंहम् उपैति। यः परिश्रमी, पराक्रमी च अस्ति सम्पत्तिः स्वयं तं गच्छति। किन्तु कापुरुषाः ‘दैवेन देयम्’ इति वदन्ति — एतत् आलस्यस्य कारणम् अस्ति। भाग्यम् अतिक्रम्य पुरुषार्थं कुर्यात्। यदि यत्ने कृते अपि सफलता न प्राप्यते तर्हि दोषः नास्ति — यतः प्रयत्नः एव कर्तव्यम् अस्ति।
(सम्पत्ति परिश्रमी के पास जाती है। ‘भाग्य में होगा’ — यह आलसी का बहाना है। भाग्य को जीतकर पुरुषार्थ करो। प्रयत्न के बाद असफलता में दोष नहीं।) - सप्तमश्लोकः (मालविकाग्निमित्रम्) कौन-सी शिक्षा देता है? संस्कृते वर्णयत।
(सातवाँ श्लोक कौन-सी शिक्षा देता है?)
उत्तरम्:
कालिदासः मालविकाग्निमित्रे उक्तवान् — पुराणम् इति सर्वं साधु न भवति। नूतनम् इति सर्वम् अवद्यम् (निकृष्टम्) न भवति। सन्तः परीक्ष्य अन्यतरम् भजन्ते — अर्थात् सज्जनाः स्वयं परीक्षणं कृत्वा उत्तमं गृह्णन्ति। मूढाः अन्येषां मतं श्रुत्वा तदनुसारेण प्रवर्तन्ते। अस्य शिक्षा — स्वयं विचारय, स्वतन्त्रचिन्तनं कुरु।
(पुराना — सब अच्छा नहीं। नया — सब बुरा नहीं। सज्जन परीक्षा करके चुनते हैं। मूर्ख दूसरों के कहने पर चलते हैं। शिक्षा — स्वयं विचार करो।) - ‘अविवेकः परमापदां पदम्’ इत्यस्य भावार्थं संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
(‘अविवेक सबसे बड़े संकटों का घर है’ — भावार्थ बताइए।)
उत्तरम्:
भारविः किरातार्जुनीये उक्तवान् — क्रियां सहसा न विदधीत। अविवेकः परमम् आपदां पदम् — अर्थात् विना विचार्य कृतं कार्यम् अनेकान् संकटान् आनयति। विमृश्यकारिणं — अर्थात् चिन्तयित्वा कार्यं कुर्वन्तं — सम्पदः गुणलुब्धाः स्वयमेव वृणते। अतः सर्वेषु कार्येषु आदौ विचारः करणीयः।
(बिना सोचे-विचारे किया कार्य अनेक संकट लाता है। जो सोच-समझकर कार्य करता है, सम्पत्ति स्वयं उसके पास आती है। अतः पहले विचार करो।) - पाठस्य प्रस्तावनायाः संक्षिप्तं भावम् संस्कृते लिखत।
(पाठ की प्रस्तावना का संक्षिप्त भाव संस्कृत में लिखिए।)
उत्तरम्:
पाठस्य प्रस्तावनायाम् अध्यापकः छात्रान् पृच्छति — ‘किमपि कार्यं करणीयम् अस्ति चेत् आदौ किम् आवश्यकम्?’ छात्राः वदन्ति — विचिन्त्य कार्यकरणम्, उचितविधिना करणम्, पूर्णमनसा करणम्। अध्यापकः स्पष्टीकरोति — यदि मनः एव मलिनं स्यात् तर्हि कार्यस्य फलम् अपि दूषितम् एव स्यात्। अतः सर्वाणि कार्याणि पवित्रेण मनसा करणीयानि।
(शिक्षक ने पूछा — कार्य के लिए पहले क्या चाहिए? छात्रों ने कहा — विचार, उचित विधि, पूर्ण मन। शिक्षक ने बताया — मन ही मलिन हो तो फल भी दूषित होगा। अतः पवित्र मन से कार्य करो।) - पाठे किं किं जीवनमूल्यम् वर्णितम् अस्ति? संस्कृते लिखत।
(पाठ में कौन-कौन से जीवन-मूल्य बताए गए हैं?)
उत्तरम्:
अस्मिन् पाठे अनेकानि जीवनमूल्यानि सन्ति —
मनसः पवित्रता — श्लोक १ — मनःपूतं समाचरेत्।
धर्मपालनम् — श्लोक २ — दश धर्मलक्षणानि।
श्रेष्ठाचरणम् — श्लोक ३ — श्रेष्ठः यत् यत् आचरति।
अभ्यासः — श्लोक ४ — अभ्यासेन सर्वाणि सिध्यन्ति।
दृढ़संकल्पः — श्लोक ५ — उत्तमजनाः न परित्यजन्ति।
पुरुषार्थः — श्लोक ६ — दैवं निहत्य पौरुषम् कुरु।
विवेकशीलता — श्लोक ७ — परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते।
विचारपूर्वक कार्यम् — श्लोक ८ — सहसा न विदधीत।
(पवित्र मन, धर्मपालन, श्रेष्ठ आचरण, अभ्यास, दृढ़ संकल्प, पुरुषार्थ, विवेक और विचारपूर्वक कार्य।) - ‘पुराणम् इति न साधु सर्वम्’ — कालिदासस्य अस्य उपदेशस्य आधुनिक प्रासंगिकता संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
(कालिदास के इस उपदेश की आधुनिक प्रासंगिकता बताइए।)
उत्तरम्:
अयम् उपदेशः अद्यापि सार्थकः अस्ति। अनेके जनाः पुरातनं सर्वं स्वीकुर्वन्ति — परीक्षणं न कुर्वन्ति। अन्ये च सर्वं नूतनम् एव उत्तमम् इति मन्यन्ते। किन्तु कालिदासः उक्तवान् — सन्तः परीक्ष्य अन्यतरत् भजन्ते। अद्यत्वे कृत्रिम बुद्धिमत्तायाः, सामाजिक-माध्यमानां, विज्ञानस्य च युगे अयम् उपदेशः अत्यन्तम् आवश्यकः — सर्वं स्वयं परीक्ष्य एव स्वीकार्यम्।
(यह उपदेश आज भी सार्थक है। सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता के युग में हर बात को बिना सोचे न मानें। स्वयं परीक्षा करके स्वीकार करें।)
दीर्घउत्तरीय प्रश्न – वर्णनात्मक (हिन्दी में)
1. कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 के सभी आठ श्लोकों का परिचय, स्रोत-ग्रन्थ और मुख्य सन्देश लिखिए।
उत्तरम्:
- श्लोक 1 (मनुस्मृति): ‘दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम्…’ — दृष्टि, जल, वाणी और मन की चार प्रकार की शुद्धि बताती है। मन की पवित्रता सर्वोपरि है।
- श्लोक 2 (मनुस्मृति): ‘धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम्…’ — धर्म के दस लक्षण बताती है जो नैतिक जीवन की आधारशिला हैं।
- श्लोक 3 (भगवद्गीता): ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठः…’ — श्रेष्ठ जन का आचरण समाज के लिए मानक बनता है। नेतृत्व की जिम्मेदारी बताता है।
- श्लोक 4 (सुभाषितरत्नभाण्डागार): ‘अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः…’ — अभ्यास की अद्भुत शक्ति बताता है। सब कुछ अभ्यास से सम्भव है।
- श्लोक 5 (नीतिशतकम्): ‘प्रारभ्यते न खलु…’ — तीन वर्ग — नीच, मध्यम, उत्तम। उत्तम जन विघ्नों में भी नहीं छोड़ते।
- श्लोक 6 (पञ्चतन्त्रम्): ‘उद्योगिनं पुरुषसिंहम्…’ — पुरुषार्थ का महत्त्व। सम्पत्ति उद्योगी के पास जाती है। भाग्य का बहाना कायरता है।
- श्लोक 7 (मालविकाग्निमित्रम्): ‘पुराणमित्येव न साधु…’ — स्वतन्त्र विचार और परीक्षणशीलता का महत्त्व। न पुराना सब अच्छा, न नया सब बुरा।
- श्लोक 8 (किरातार्जुनीयम्): ‘सहसा विदधीत न…’ — विवेकपूर्ण कार्य का महत्त्व। सोच-समझकर काम करने पर सम्पत्ति स्वयं आती है।
2. ‘अभ्यास से सब कुछ सम्भव है’ – चौथे श्लोक के आधार पर विस्तार से समझाइए।
उत्तरम्:
‘अभ्यासेन क्रियाः सर्वाः अभ्यासात् सकलाः कलाः। अभ्यासाद् ध्यानमौनादि किमभ्यासस्य दुष्करम्॥’
- अभ्यास की शक्ति:
सुभाषितरत्नभाण्डागार के इस श्लोक में अभ्यास को सर्वसाधक बताया गया है। चाहे कोई भी क्रिया हो — खाना पकाना, गणित हल करना या शल्य-चिकित्सा — सब अभ्यास से ही सिद्ध होती हैं। - कलाओं में अभ्यास:
संगीत, नृत्य, चित्रकारी, कविता — कोई भी कला जन्मजात नहीं होती। ये सब बार-बार के अभ्यास से ही परिपक्व होती हैं। - आध्यात्मिक साधना:
ध्यान और मौन जैसी आध्यात्मिक साधनाएँ भी अभ्यास से ही प्राप्त होती हैं। पहले दिन से कोई ध्यान नहीं लगाता — यह धीरे-धीरे अभ्यास से विकसित होता है। - ‘किमभ्यासस्य दुष्करम्?’ का भाव:
‘अभ्यास के लिए क्या कठिन है?’ — यह प्रश्नवाचक वाक्य कहता है कि अभ्यास से कुछ भी असाधारण नहीं। जो आज कठिन लगता है, वह कल अभ्यास से सरल हो जाएगा। - आधुनिक संदर्भ:
आज के विज्ञान में भी यही सिद्ध है — मस्तिष्क अभ्यास से विकसित होता है। ‘10,000 घण्टे के अभ्यास से कोई भी किसी भी क्षेत्र में विशेषज्ञ बन सकता है।’
3. पाँचवें श्लोक के आधार पर बताइए कि नीच, मध्यम और उत्तम तीनों प्रकार के मनुष्यों का विघ्नों के प्रति क्या दृष्टिकोण होता है और हमें कैसा बनना चाहिए।
उत्तरम्:
- भर्तृहरि का नीतिशतक:
इस श्लोक में भर्तृहरि ने मानव स्वभाव का तीन वर्गों में अत्यन्त सटीक वर्गीकरण किया है – - नीच (निम्न वर्ग):
नीच व्यक्ति की सबसे बड़ी कमी है — विघ्न का भय। वह कार्य आरम्भ करने से पहले ही सोचता है — ‘यदि रुकावट आई तो?’ और इस भय से कभी प्रारम्भ ही नहीं करता। जीवन में ऐसे लोग अवसरों को गँवाते रहते हैं। - मध्यम (सामान्य वर्ग):
मध्यम व्यक्ति कार्य आरम्भ तो करता है किन्तु बाधा आने पर निराश होकर छोड़ देता है। यह वर्ग प्रयास की क्षमता रखता है किन्तु दृढ़ता की कमी है। - उत्तम (श्रेष्ठ वर्ग):
उत्तम जन कार्य आरम्भ करता है। विघ्न आते हैं — एक बार नहीं, बार-बार। फिर भी वह कार्य नहीं छोड़ता। इतिहास के सभी महान् व्यक्ति इसी वर्ग में आते हैं — राणा प्रताप, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गाँधी। - हमें क्या बनना चाहिए:
यह श्लोक स्पष्ट सन्देश देता है — हमें उत्तम वर्ग में रहना चाहिए। जीवन में विघ्न अवश्य आएँगे — किन्तु विघ्नों से घबराकर लक्ष्य नहीं छोड़ना चाहिए।
4. सुभाषितों से कौन-कौन से जीवन-मूल्य मिलते हैं और ये आज के जीवन में कैसे उपयोगी हैं?
उत्तरम्:
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 के आठ सुभाषित आठ महत्त्वपूर्ण जीवन-मूल्य देते हैं –
- पवित्र मन (श्लोक 1): आज जब मन में स्वार्थ, ईर्ष्या और लालच भरा है, तब ‘मनःपूतं समाचरेत्’ का सन्देश — सभी कार्य शुद्ध मन से करो — अत्यन्त आवश्यक है।
- नैतिक जीवन (श्लोक 2): धर्म के दस लक्षण — धैर्य, क्षमा, सत्य, अक्रोध आदि — आज के तनाव और हिंसा के युग में अत्यन्त प्रासंगिक हैं।
- नेतृत्व की जिम्मेदारी (श्लोक 3): आज के शिक्षकों, नेताओं और अभिभावकों को याद दिलाता है कि उनका आचरण समाज का आदर्श बनता है।
- अभ्यास की शक्ति (श्लोक 4): आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में यह श्लोक बताता है — कोई भी कौशल निरन्तर अभ्यास से प्राप्त हो सकता है।
- दृढ़ संकल्प (श्लोक 5): पढ़ाई हो, व्यवसाय हो या कोई भी लक्ष्य — बाधाओं में भी न छोड़ना ही सफलता की कुंजी है।
- पुरुषार्थ (श्लोक 6): आज के युवा कभी-कभी भाग्य का बहाना करते हैं। यह श्लोक कहता है — परिश्रम करो, भाग्य खुद चलकर आएगा।
- स्वतन्त्र विचार (श्लोक 7): आज सोशल मीडिया पर अनेक झूठी खबरें हैं। ‘परीक्ष्य भजन्ते’ — पहले जाँचो, फिर मानो।
- विवेकपूर्ण निर्णय (श्लोक 8): ‘सहसा विदधीत न क्रियाम्’ — बिना सोचे-समझे कोई निर्णय न लो। यह आज के आवेगी युग में अत्यन्त आवश्यक सन्देश है।
5. ‘भारतीय ज्ञान-परम्परा और आधुनिक जीवन’ – ये प्राचीन सुभाषित आज भी कैसे प्रासंगिक हैं।
उत्तरम्:
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 में जो ग्रन्थ हैं — मनुस्मृति, भगवद्गीता, नीतिशतक, पञ्चतन्त्र, मालविकाग्निमित्र, किरातार्जुनीय — ये सब सैकड़ों-हजारों वर्ष पुराने हैं। फिर भी इनकी शिक्षाएँ आज भी उतनी ही उपयोगी हैं।
- मनुस्मृति का ‘मनःपूतं समाचरेत्’:
आज जब भ्रष्टाचार, धोखा और स्वार्थ बढ़ रहे हैं, पवित्र मन की शिक्षा सर्वाधिक आवश्यक है। - भगवद्गीता का ‘श्रेष्ठः यत् आचरति’:
आज के सोशल मीडिया युग में हर व्यक्ति देखता है कि प्रसिद्ध लोग क्या करते हैं — इसलिए उनका आचरण और भी महत्त्वपूर्ण हो गया है। - नीतिशतक का तीन वर्ग:
स्टार्टअप के युग में — जो एक असफलता से नहीं रुकते, वे ही सफल होते हैं। - पञ्चतन्त्र का पुरुषार्थ:
‘भाग्य में होगा’ — यह सोचकर बेरोजगार बैठने से बेहतर है परिश्रम से नया रास्ता बनाना। - मालविकाग्निमित्र की विवेकशीलता:
फेक न्यूज, अफवाहों और गहन-मिथ्याचित्रों के युग में ‘स्वयं परीक्षा करके मानो’ — यह शिक्षा सबसे अधिक आवश्यक है। - किरातार्जुनीय का विवेक:
जल्दबाजी में लिए गए निर्णय आज भी संकट लाते हैं — ‘पहले सोचो, फिर करो’ सदा प्रासंगिक है।
इस प्रकार ये सुभाषित केवल प्राचीन ज्ञान नहीं, बल्कि सनातन जीवन-दर्शन हैं जो हर युग में उतने ही उपयोगी और प्रेरणादायक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 में कौन-से व्याकरण बिन्दु पढ़ाने उचित हैं?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 में परीक्षा की दृष्टि से –
- सन्धिविच्छेद (विसर्ग-सन्धि, यण्-सन्धि, गुण-सन्धि)
- समास (तृतीया-तत्पुरुष, नञ्-तत्पुरुष, कर्मधारय, सप्तमी-तत्पुरुष)
- अन्वय — प्रत्येक श्लोक का गद्यक्रम में अन्वय बनाना
- क्रियापद पहचान — प्रथम-द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ क्रियापद।
ये सभी अभ्यास में दिए गए हैं।
नवीं कक्षा में संस्कृत में शारदा पाठ 6 पढ़ाने की सर्वोत्तम विधि क्या है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 सुभाषित-संग्रह है – इसलिए पहले प्रत्येक श्लोक को लय में कण्ठस्थ कराएँ। फिर अन्वय, शब्दार्थ और भावार्थ समझाएँ। इसके बाद वर्तमान जीवन से उदाहरण देकर मूल्य-शिक्षा को व्यावहारिक बनाएँ। ग्रन्थ-स्रोत मेलन से भारतीय ज्ञान-परम्परा का परिचय कराएँ।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 में भारतीय ज्ञान-परम्परा को किस प्रकार पढ़ाएँ?
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 में आठ महान् ग्रन्थों से उद्धरण हैं। ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ खण्ड में इन ग्रन्थों की सारिणी दी गई है। प्रत्येक ग्रन्थ का संक्षिप्त परिचय देकर राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार भारतीय ज्ञान-परम्परा (भाज्ञप) से छात्रों को जोड़ें।
क्या कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 कठिन है? विद्यार्थी इसे कितने समय में तैयार कर सकता है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 सरल से मध्यम कठिनाई का है। आठ श्लोकों को लय में गाकर याद करना सरल है। व्याकरण में सन्धिविच्छेद और समास थोड़ा अभ्यास माँगते हैं। प्रतिदिन 30 मिनट के अभ्यास से 5 से 7 दिन में पूरा पाठ तैयार हो सकता है।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 को एक दिन में कैसे तैयार करें?
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 6 को एक दिन में — पहले सभी श्लोकों का हिन्दी अनुवाद पढ़ें (30 मिनट), फिर अभ्यास 1 से 7 के उत्तर याद करें (45 मिनट), सन्धिविच्छेद और समास देखें (20 मिनट), धर्म के दस लक्षण और ग्रन्थ-मेलन अलग से लिखकर याद करें (15 मिनट)।
कक्षा 9 शारदा अध्याय 6 का शीर्षक ‘मनःपूतं समाचरेत्’ का क्या अर्थ है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 के शीर्षक का अर्थ है — ‘पवित्र मन से आचरण करो।’ ‘मनःपूतम्’ = मन से पवित्र, ‘समाचरेत्’ = भली-भाँति आचरण करो। यह मनुस्मृति के पहले श्लोक की अन्तिम पंक्ति से लिया गया है। इसका सन्देश है — कोई भी कार्य शुद्ध मन से करो तो वह शुभ होता है।
कक्षा 9 शारदा पाठ 6 में अच्छे अंक पाने के लिए क्या करें?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 में अच्छे अंकों के लिए — (क) सभी आठ श्लोकों को कण्ठस्थ करें, (ख) प्रत्येक श्लोक का ग्रन्थ-स्रोत याद रखें, (ग) धर्म के दस लक्षण अवश्य याद रखें, (घ) सन्धिविच्छेद के सभी उत्तर याद रखें, (ङ) अन्वय को समझकर याद करें।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 में कुल कितने श्लोक हैं और किन ग्रन्थों से लिए गए हैं?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 6 में कुल आठ (८) श्लोक हैं। ये मनुस्मृति (२), भगवद्गीता (१), सुभाषितरत्नभाण्डागार (१), नीतिशतकम् (१), पञ्चतन्त्रम् (१), मालविकाग्निमित्रम् (१) और किरातार्जुनीयम् (१) से लिए गए हैं।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 6 में धर्म के कितने लक्षण बताए गए हैं?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 6 के दूसरे श्लोक (मनुस्मृति) में धर्म के दस (१०) लक्षण बताए गए हैं — धृतिः, क्षमा, दमः, अस्तेयम्, शौचम्, इन्द्रियनिग्रहः, धीः, विद्या, सत्यम्, अक्रोधः।
