एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः

एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 न खलु वयस्तेजसो हेतुः समाधान, अभ्यास के प्रश्न उत्तर, हिंदी अनुवाद, कठिन शब्द-अर्थ, सारांश, अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए यहाँ से प्राप्त किए जा सकते हैं। कक्षा 9 संस्कृत शारदा का चतुर्थ पाठ ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ एक प्रेरणादायक जीवनी-गद्यपाठ है। इसका शाब्दिक अर्थ है – ‘आयु निश्चित रूप से तेज (वीरता) का कारण नहीं होती।’ अर्थात् वीरता और देशभक्ति के लिए बड़ी उम्र आवश्यक नहीं। यह पाठ बालक्रान्तिवीर खुदीराम बोस के जीवन पर आधारित है जिन्होंने मात्र 18 वर्ष की आयु में देश की स्वतन्त्रता के लिए हँसते-हँसते फाँसी का वरण किया। भारत की स्वतन्त्रता का अमृतमहोत्सव मनाते हुए एनसीईआरटी ने इस पाठ को कक्षा 9 में रखकर छात्रों को उन ज्ञात-अज्ञात क्रान्तिवीरों के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाने का प्रयास किया है।
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एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 समाधान (2026-27 के अनुसार)

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर

अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

१. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत –

(क) खुदीरामस्य जन्म कुत्र अभवत्? (खुदीराम का जन्म कहाँ हुआ?)
उत्तर:
खुदीरामस्य जन्म बंगप्रान्तस्य मेदिनीपुर-जनपदे मोहोबनी-ग्रामे नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमे वर्षे (१८८९) दिसम्बरमासस्य तृतीये दिनाङ्के अभवत्।
(खुदीराम का जन्म बंगाल के मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में 3 दिसम्बर 1889 को हुआ।)

(ख) खुदीरामः किमर्थं व्यथितः भवति स्म? (खुदीराम किस कारण से व्यथित होते थे?)
उत्तर:
सः देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।
(देशवासियों पर होने वाले अत्याचारों को देखकर वे व्यथित होते थे।)

(ग) सत्येन्द्रनाथः किम् उपदिष्टवान्? (सत्येन्द्रनाथ ने क्या उपदेश दिया?)
उत्तर:
सत्येन्द्रनाथः उपदिष्टवान् — “क्रान्तिकार्यं कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं दृढं, बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा, मनः गङ्गाजलमिव निर्मलं च भवेत्।”
(सत्येन्द्रनाथ ने कहा — क्रान्तिकार्य के लिए शरीर वज्र की तरह दृढ़, बुद्धि तलवार जैसी तीक्ष्ण और मन गंगाजल की तरह निर्मल होना चाहिए।)

(घ) खुदीरामः कदा पर्यन्तं पादत्राणं न धरिष्यामि इति प्रतिज्ञातवान्? (खुदीराम ने कब तक जूता न पहनने की प्रतिज्ञा की?)
उत्तर:
खुदीरामः प्रतिज्ञातवान् यत् ‘यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि’ इति।
(खुदीराम ने प्रतिज्ञा की — जब तक भारत अंग्रेजों के शासन से मुक्त नहीं होता, तब तक जूता नहीं पहनूँगा।)

(ङ) किमर्थं न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः च चकिताः? (न्यायाधीश और अंग्रेज अधिकारी क्यों चकित रह गए?)
उत्तर:
राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्। तत् दृष्ट्वा ते चकिताः।
(खुदीराम के चेहरे पर भय या दुःख नहीं, बल्कि प्रसन्नता, शान्ति, तृप्ति और तेज था — यह देखकर वे चकित रह गए।)

२. अधः प्रदत्तेषु वाक्येषु किं वाक्यं सत्यं किं च असत्यम् इति सूचयत –

(क) देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति। — सत्यम्/असत्यम्
(ख) निर्दयः किङ्ग्ज़फोर्ड् बालान् अपि दण्डयति स्म। — सत्यम्/असत्यम्
(ग) खुदीरामस्य आक्रमणेन किङ्ग्ज़फोर्ड् मृतः। — सत्यम्/असत्यम्
(घ) खुदीरामः किङ्ग्ज़फोर्ड् महोदयस्य रथस्य उपरि विस्फोटकं क्षिप्तवान्। — सत्यम्/असत्यम्
(ङ) खुदीरामः बालानां सङ्घटनं कृत्वा पदयात्राम् आयोजयति स्म। — सत्यम्/असत्यम्
उत्तर:
(क) देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति। — सत्यम्
(ख) निर्दयः किङ्ग्ज़फोर्ड् बालान् अपि दण्डयति स्म। — सत्यम्
(ग) खुदीरामस्य आक्रमणेन किङ्ग्ज़फोर्ड् मृतः। — असत्यम्
(घ) खुदीरामः किङ्ग्ज़फोर्ड् महोदयस्य रथस्य उपरि विस्फोटकं क्षिप्तवान्। — सत्यम्
(ङ) खुदीरामः बालानां सङ्घटनं कृत्वा पदयात्राम् आयोजयति स्म। — सत्यम्

३. अधः प्रदत्तानां संवत्सराणां शब्दानाम् अङ्कैः सह मेलनं कुरुत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 3 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 3 के उत्तर का चित्र

४. अधः प्रदत्तानि पदानि आधृत्य चित्रं दृष्ट्वा पञ्च वाक्यानि लिखत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 4 का चित्र

उत्तर:
(क) उद्याने बहूनि पुष्पाणि विकसन्ति।
(ख) वृक्षेषु पक्षिणः मधुरं गायन्ति।
(ग) पर्वतस्य उपरि मेघाः सन्ति।
(घ) बालकः द्विचक्रिकया मार्गे गच्छति।
(ङ) सूर्यः आकाशे प्रकाशते, सर्वत्र स्वच्छता च दृश्यते।

५. सन्धिच्छेदं कुरुत-

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 5 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 5 के उत्तर का चित्र

६. विग्रहवाक्यं दृष्ट्वा पाठ्यपुस्तकात् समस्तपदानि चित्वा पूरयत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 6 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 6 के उत्तर का चित्र

७. लङ्-लकारः, क्तवतु-प्रत्ययः, स्म, क्तप्रत्ययः – एते सर्वेऽपि भूतकालं सूचयन्ति। अधः दत्तानि वाक्यानि सूचनानुसारं परिवर्तयत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 7 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 7 के उत्तर का चित्र

८. पाठे कदाचित्, कस्यचित्, इति एवं विधानि पदानि सन्ति। एतानि ‘चित्’ प्रत्यययुक्तानि अव्ययानि भवन्ति। एतानि पदानि विशेषणानि भवन्ति। चित् प्रत्ययस्य योजनेन अर्थे अनिश्चयस्य भावः सूच्यते। यथा –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 8 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 प्रश्न 8 के उत्तर का चित्र

स्वाध्यायान्मा प्रमदः

१. अधः प्रदत्तानि युगलपदानि अव्ययानि सन्ति। तेषां प्रयोगः अधः प्रदत्तेषु वाक्येषु प्रदर्शितः। ध्यानेन पठन्तु रिक्तस्थानानि च पूरयन्तु –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 पेज 48 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 पेज 48 के उत्तर का चित्र

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 की पृष्ठभूमि

शारदा पाठ 4 का स्रोत एवं पृष्ठभूमि

यह पाठ एक संस्कृत गद्य-जीवनी है। इसमें निम्नलिखित ऐतिहासिक सन्दर्भ हैं-

घटनावर्ष
खुदीराम का जन्म3 दिसम्बर 1889 (नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमं वर्षम्)
बंगभंग आन्दोलन1905 (पञ्चाधिक-नवदशशततमं वर्षम्)
बम-विस्फोट घटना28 अप्रैल 1908
खुदीराम का बलिदान11 अगस्त 1908
भारत की स्वतन्त्रता1947
गणतन्त्र दिवस1950

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 का चरण-दर-चरण संक्षिप्त सारांश

पाठस्य सारः (हिन्दी में)

  • भाग 1: जन्म एवं बचपन: भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में बंगाल अग्रणी था। मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में 3 दिसम्बर 1889 को खुदीराम का जन्म हुआ। पिता त्रैलोक्यनाथ और माता लक्ष्मीप्रिया देवी थे। बचपन में ही माता-पिता का देहान्त हो गया। बड़ी बहन अपरूपा देवी ने पालन-पोषण किया। बचपन से ही खुदीराम असाधारण थे — देशवासियों पर होने वाले अत्याचार देखकर व्यथित होते थे।
  • भाग 2: बंगभंग आन्दोलन (1905): वायसराय कर्जन ने बंगप्रान्त के क्रान्तिवीरों का उत्साह तोड़ने के लिए बंगाल का विभाजन किया। तब मात्र 15 वर्षीय खुदीराम देशभक्ति से प्रेरित होकर जनान्दोलन में कूद पड़े। नवमीं कक्षा भी पूरी न कर सके क्योंकि देशभक्तों का जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित होता है।
  • भाग 3: क्रान्तिकार्य: खुदीराम बालों का संगठन बनाकर पदयात्राएँ करते थे। ‘वन्दे मातरम्’ के घोष होते थे। पत्रक वितरण के समय एक बार अंग्रेजों के हाथ में पकड़े गए किन्तु पीटकर वहाँ से निकल गए।
  • भाग 4: सत्येन्द्रनाथ का उपदेश: गुप्तमण्डल के सञ्चालक सत्येन्द्रनाथ ने खुदीराम और प्रफुल्ल को प्रशिक्षण दिया – ‘क्रान्तिकार्य के लिए शरीर वज्र की तरह दृढ़, बुद्धि तलवार की तरह तीक्ष्ण और मन गंगाजल की तरह निर्मल होना चाहिए।’ राणा प्रताप से प्रेरित होकर खुदीराम ने प्रतिज्ञा की — ‘जब तक भारत स्वतन्त्र न हो, जूता नहीं पहनूँगा।’
  • भाग 5: किंग्जफोर्ड पर बम-आक्रमण: कलकत्ता के क्रूर न्यायिक अधिकारी किंग्जफोर्ड को मारने की योजना बनी। 28 अप्रैल 1908 को प्रफुल्ल और खुदीराम ने उसके रथ पर बम फेंका। किन्तु उस रथ में किंग्जफोर्ड नहीं था – केनेडी नामक अधिकारी की पत्नी और पुत्री मारी गईं। प्रफुल्ल ने ‘वन्दे मातरम्’ कहकर स्वयं को गोली मारी।
  • भाग 6: बलिदान: पकड़े गए खुदीराम ने न्यायालय में हर प्रश्न का एक ही उत्तर दिया – ‘वन्दे मातरम्।’ न्यायाधीश ने फाँसी की सजा सुनाई। खुदीराम के मुख पर भय या दुःख नहीं था — प्रसन्नता, शान्ति, तृप्ति और तेज था। यह देखकर अंग्रेज अधिकारी भी चकित रह गए। 11 अगस्त 1908 को ‘वन्दे मातरम्’ जपते हुए हँसते-हँसते खुदीराम स्वर्ग सिधारे।

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 हिंदी अनुवाद

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 – संपूर्ण अध्याय का हिंदी अनुवाद

भारतदेशस्य स्वतन्त्रतायाः अमृतमहोत्सववर्षं वयम् आचिरतवन्तः। किं वयं जानीमः यत् देशाय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं कियन्तः ज्ञाताः अज्ञाताः च क्रान्तिवीराः स्वतन्त्रतायज्ञे स्वीयपरिवारं स्वीयजीवनं च आहुतिरूपेण समर्पितवन्तः इति? छात्राः! ते सर्वेऽपि क्रान्तिवीराः अस्माभिः कृतज्ञताभावनया नित्यं वन्दनीयाः। खुदीरामः तेषु एव देशभक्तेषु कश्चन तेजस्वी बालक्रान्तिवीरः हुतात्मा अस्ति। क्रान्तिवीरस्य खुदीरामस्य जीवनवृत्तान्तः संक्षेपेण अत्र वर्णितः अस्ति।
हिंदी अनुवादभारत देश की स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव वर्ष को हमने मनाया है। क्या हम जानते हैं कि देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिए कितने ज्ञात और अज्ञात क्रांतिकारियों ने अपने परिवार और अपने जीवन को स्वतंत्रता-यज्ञ में आहुति के रूप में समर्पित कर दिया?
छात्रों! वे सभी क्रांतिकारी हमारे द्वारा कृतज्ञता की भावना से सदैव वंदनीय हैं। खुदीराम बोस उन्हीं देशभक्तों में एक तेजस्वी बाल-क्रांतिकारी और हुतात्मा थे।
क्रांतिकारी खुदीराम बोस के जीवन-वृत्तांत का संक्षिप्त वर्णन यहाँ प्रस्तुत है।


भारतस्य स्वतन्त्रतासङ्ग्रामे सशस्त्रान्दोलने बङ्गप्रान्तः अग्रेसरः आसीत्। तस्मिन् बङ्गप्रान्ते मेदिनीपुरनामके जनपदे मोहोबनी-ग्रामे नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमे वर्षे (१८८९) दिसम्बरमासस्य तृतीये दिनाङ्के खुदीरामस्य जन्म अभवत्। तस्य जनकस्य नाम त्रैलोक्यनाथः इति, जनन्याः नाम लक्ष्मीप्रिया देवी च आसीत्। खुदीरामस्य बाल्यकाले एव तस्य पितरौ दिवङ्गतौ। अतः तस्य अग्रजया अपरूपादेव्या एव खुदीरामस्य पालनं पोषणं च कृतम्। बाल्यकालतः एव खुदीरामः असाधारणः आसीत्। साधारण व क्रीडादिषु तस्य मनः न रमते स्म। सः देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।
हिंदी अनुवादभारत के स्वतंत्रता संग्राम में सशस्त्र आंदोलन में बंगाल प्रांत अग्रणी था। उसी बंगाल प्रांत के मेदिनीपुर नामक जनपद के मोहोबनी ग्राम में सन् 1889 ईस्वी के 3 दिसंबर को खुदीराम बोस का जन्म हुआ।
उनके पिता का नाम त्रैलोक्यनाथ था और माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था। खुदीराम के बचपन में ही उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। इसलिए उनकी बड़ी बहन अपरूपा देवी ने ही उनका पालन-पोषण किया।
बाल्यकाल से ही खुदीराम बोस असाधारण थे। सामान्य खेल-कूद आदि में उनका मन नहीं लगता था। वे देशवासियों पर हो रहे अत्याचारों को देखकर बहुत दुखी हो जाते थे।


बङ्गप्रान्ते क्रान्तिवीराणां महिद्भः गुप्तगतिविधिभिः आङ्ग्लाः संत्रस्ताः आसन्। भारतस्य तात्कालिकः वायसरायः कर्जनः बङ्गप्रान्तस्य एतत् वीरत्वं दमियतुम्, उत्साहं ध्वंसियतुं, देशभिक्तं मर्दियतुं च बङ्गप्रान्तस्य पन्थाधारितं विभजनं करणीयम् इति निश्चितवान्। पञ्चाधिक-नवदशशततमे वर्षे (१९०५) तेन बङ्गप्रान्तः भागद्वये विभाजितः। तस्य एतया कृत्या न केवलं बङ्गप्रान्ते अपि तु सर्वस्मिन् देशे जनान्दोलनं प्रवृत्तम्। बङ्गभङ्ग-आन्दोलनमिति तस्य जनान्दोलनस्य नाम। यद्यपि खदीरामः तस्मिन् समये केवलं पञ्चदशवर्षीयः तथापि देशभक्तेः भावनया सः प्रेरितः सन् जनान्दोलने कूदितः। आङ्ग्लानां पारतन्त्र्यशृङ्खलातः वन्दनीयभारतमातुः मोचनं करणीयम् इत्येव
हिंदी अनुवादबंगाल प्रांत में क्रांतिकारियों की गुप्त गतिविधियों से अंग्रेज भयभीत हो गए थे। उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल के इस वीरत्व को दबाने, उत्साह को नष्ट करने और देशभक्ति को कुचलने के लिए बंगाल प्रांत का विभाजन करने का निश्चय किया।
सन् 1905 में उसने बंगाल प्रांत को दो भागों में बाँट दिया। उसके इस कार्य से न केवल बंगाल में, बल्कि पूरे देश में जन-आंदोलन शुरू हो गया। इस आंदोलन को बंग-भंग आंदोलन कहा गया।
यद्यपि खुदीराम बोस उस समय केवल पंद्रह वर्ष के थे, फिर भी देशभक्ति की भावना से प्रेरित होकर वे जन-आंदोलन में कूद पड़े।
अंग्रेजों की दासता की बेड़ियों से वंदनीय भारतमाता को मुक्त करना ही उनका एकमात्र उद्देश्य था।


सङ्कल्पः आसीत्। अतः सः नवमीं कक्षाम् अपि पूर्णां कर्तुं न शक्तवान्। यतोहि देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति।
बालानां संघटनं कृत्वा सः पदयात्राम् आयोजयति स्म। तस्यां यात्रायां देशभक्तियुतानि गीतानि, वन्दे मातरम् चेत्यादयः घोषणाः भवन्ति स्म। सः पदयात्रामाध्यमेन लोकजागरणविषयकाणि पत्रकाणि जनेषु वितरति स्म। कदाचित् खुदीरामः पत्रकवितरणसमये आङ्ग्लानां हस्तगतः जातः। किन्तु सामर्थ्यसम्पन्नः खुदीरामः आङ्ग्लानां ताडनं कृत्वा ततः निरगच्छत्।
हिंदी अनुवादउनका यही संकल्प था। इसलिए वे नौवीं कक्षा भी पूरी नहीं कर पाए, क्योंकि देशभक्तों का जीवन राष्ट्र के लिए समर्पित होता है।
बालकों का संगठन बनाकर वे पदयात्रा आयोजित करते थे। उस यात्रा में देशभक्ति से भरे गीत गाए जाते थे और “वंदे मातरम्” जैसे नारे लगाए जाते थे। वे पदयात्रा के माध्यम से लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए पत्रक (पर्चे) भी बाँटते थे। एक बार पत्रक बाँटते समय खुदीराम बोस अंग्रेजों के हाथ लग गए, लेकिन अपनी साहसिकता से उन्होंने अंग्रेजों को मारकर वहाँ से निकलने में सफलता पाई।


बङ्गप्रान्ते क्रान्तिवीरैः सञ्चालितानि बहूनि गुप्तमण्डलानि आङ्ग्लानां मनसि आतङ्कं स्म। कस्यचित् गुप्तमण्डलस्य सञ्चालकः आसीत् सत्येन्द्रनाथः। खुदीरामः स्वमित्रेण प्रफुल्लेन सह गत्वा सत्येन्द्रनाथेन अमिलत। सत्येन्द्रनाथः उपादिशत —
तस्मात् गुप्तप्रशिक्षणकेन्द्रात् द्वाभ्याम् अष्टमासात्मकं प्रशिक्षणं प्राप्तम्। भुशुण्डिसञ्चालने अपि तौ अचिरादेव प्रवीणौ सञ्जातौ। राणाप्रतापस्य चरित्रेण प्रेरितः खुदीरामः प्रतिज्ञातवान् यत् ‘यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि’ इति।
हिंदी अनुवादबंगाल में क्रांतिकारियों द्वारा चलाए जा रहे अनेक गुप्त संगठन अंग्रेजों के मन में भय उत्पन्न करते थे। ऐसे ही एक गुप्त संगठन के संचालक सत्येन्द्रनाथ थे। खुदीराम बोस अपने मित्र प्रफुल्ल चाकी के साथ उनसे मिले।
सत्येन्द्रनाथ के निर्देशन में दोनों ने गुप्त प्रशिक्षण केंद्र से आठ महीनों का प्रशिक्षण प्राप्त किया और शीघ्र ही हथियार चलाने में निपुण हो गए। महाराणा प्रताप के जीवन से प्रेरित होकर खुदीराम बोस ने प्रतिज्ञा की कि “जब तक भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त नहीं होगा, तब तक मैं जूते (पादत्राण) नहीं पहनूँगा।”


कलकत्ता-जनपदस्य मुख्यः न्यायिकः आङ्ग्लः अधिकारी ‘किङ्ग्जफोई’ भारतीय-देशभक्तान् अतीवकठोररीत्या दण्डयति स्म। निर्दयः सः बालान् अपि न त्यजति स्म। तस्य स्थानान्तरणं यदा मुञ्जफ्फरनगरे जातं तदा ‘सः हन्तव्यः’ इति सशस्त्रक्रान्तिवीरमण्डलेन निश्चितम्। हत्यायोजनायाः सम्पूर्णम् उत्तरदायित्वं प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां स्वीकृतम्। तस्य वधस्य सूक्ष्मा योजनापि द्वाभ्यां निर्मिता।
अष्टाधिक-नवदशश्ततमवर्षस्य एप्रिलमासस्य अष्टाविंशे दिनाङ्के (२८-०४-१९०८) किङ्ग्जफोई इत्यस्य रथिविशेषे प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां विस्फोटकं प्रक्षिप्तम्।
हिंदी अनुवादकलकत्ता जनपद का मुख्य न्यायिक अंग्रेज अधिकारी किंग्सफोर्ड भारतीय देशभक्तों को अत्यंत कठोर दंड देता था। वह इतना निर्दयी था कि बच्चों को भी नहीं छोड़ता था। जब उसका स्थानांतरण मुज़फ्फरनगर (यहाँ आशय मुज़फ्फरपुर से है) में हुआ, तब सशस्त्र क्रांतिकारियों ने निश्चय किया कि “उसे मारना चाहिए।”
इस हत्या-योजना की पूरी जिम्मेदारी खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी ने ली। दोनों ने मिलकर उसकी हत्या की सूक्ष्म योजना बनाई।
28 अप्रैल 1908 को किंग्सफोर्ड की बग्घी (रथ) पर इन दोनों ने बम फेंका।


महान् विस्फोटध्वनिः जातः। अग्निज्वालाः आकाशम् अस्पृशन्। ‘किङ्ग्जफोई हतः’ अस्माकम् उत्तरदायित्वं पूर्णम् इति कृतार्थभावनया तौ पलायितवन्तौ। किन्तु हा धिक्! यद्यपि सः किङ्ग्जफोई महोदयस्य रथः आसीत् तथापि तस्मिन् सः नासीदेव। केनेडीनामकस्य अधिकारिणः पत्नी पुत्री च तत्र आस्ताम्। ते मृते किन्तु किङ्ग्जफोई रक्षितः। आरात्रि द्वौ अपि क्रान्तिवीरौ अधावताम्। किन्तु दौर्भाग्यवशात् आङ्ग्लाः आरक्षकाः तौ अगृह्णन्। वीरप्रफुल्लेन
हिंदी अनुवादजोरदार विस्फोट हुआ और आग की लपटें आसमान तक पहुँच गईं। “किंग्सफोर्ड मारा गया, हमारा कार्य पूरा हुआ”—इस भावना से वे दोनों वहाँ से भाग निकले।
लेकिन दुर्भाग्य से, जिस बग्घी पर बम फेंका गया, उसमें किंग्सफोर्ड नहीं था। उसमें एक अंग्रेज अधिकारी केनेडी की पत्नी और पुत्री थीं, जो उस विस्फोट में मारी गईं, जबकि किंग्सफोर्ड बच गया।
रात भर दोनों क्रांतिकारी भागते रहे, परंतु दुर्भाग्यवश अंग्रेज सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया। वीर प्रफुल्ल ने


आङ्ग्लानां विरोधे कृतः प्रतीकारयत्नः व्यर्थः अभूत्। अनन्यगतिकः प्रफुल्लः भारतमातरं मनसा प्रणम्य ‘वन्दे मातरमिति’ उद्घोष्य च स्ववक्षःस्थले भुशुण्ड्या गोलिकाप्रहारं कृतवान्। वीरबालः प्रफुल्लः हौतात्म्येन अमरः जातः।
आङ्ग्लैः गृहीतः खुदीरामः न्यायालयं नीतः। तत्र अधिवक्तृणां प्रत्येकं प्रश्नस्य खुदीरामस्य निश्चितम् उत्तरम् आसीत् यत् ‘वन्दे मातरम्’ इति। न्यायाधीशेन निर्दयतया बालाय खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः – उद्वन्धनम् इति।
हिंदी अनुवादअंग्रेजों के विरोध में किया गया प्रतिकार-प्रयास असफल हो गया। निराश्रय हुए प्रफुल्ल चाकी ने मन ही मन भारतमाता को प्रणाम किया और “वंदे मातरम्” का उद्घोष करते हुए अपने सीने पर गोली चला ली। इस प्रकार वीर बालक प्रफुल्ल हुतात्मा बनकर अमर हो गए।
अंग्रेजों द्वारा पकड़े गए खुदीराम बोस को न्यायालय में ले जाया गया। वहाँ वकीलों के प्रत्येक प्रश्न का उनका एक ही उत्तर था—“वंदे मातरम्”। न्यायाधीश ने निर्दयतापूर्वक इस बालक को मृत्युदंड (फाँसी) की सजा सुना दी।


राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्। तत् दृष्ट्वा न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः चापि चकिताः। अष्टाधिक-नवदशश्ततमस्य वर्षस्य अगस्तमासस्य एकादशे दिनाङ्के (११-०८-१९०८) बाल्ये वयसि एव देशस्य स्वातन्त्र्यार्थं हुतात्मा जातः। प्रियभारतमातुः दर्शनार्थं सः हसन् वन्दे मातरम् इति जपन् आनन्देन दिवं गतः।
हिंदी अनुवाददेशभक्त खुदीराम बोस के चेहरे पर न तो भय था और न ही दुःख, बल्कि प्रसन्नता, शांति, संतोष और तेज झलक रहा था। यह देखकर न्यायाधीश और अंग्रेज अधिकारी भी आश्चर्यचकित रह गए।
11 अगस्त 1908 को, बहुत कम आयु में ही, वे देश की स्वतंत्रता के लिए हुतात्मा हो गए। अपनी प्रिय भारतमाता के दर्शन की कामना करते हुए, हँसते-हँसते “वंदे मातरम्” का जप करते हुए वे आनंदपूर्वक स्वर्ग सिधार गए।

हिंदी अनुवाद – प्रमुख गद्यांशों का

  • गद्यांश 1:
    भारतदेशस्य स्वतन्त्रतायाः अमृतमहोत्सववर्षं वयम् आचरितवन्तः। किं वयं जानीमः यत् देशाय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं कियन्तः ज्ञाताः अज्ञाताः च क्रान्तिवीराः स्वतन्त्रतायज्ञे स्वीयपरिवारं स्वीयजीवनं च आहुतिरूपेण समर्पितवन्तः इति?
    हिन्दी अनुवाद: हमने भारत की स्वतन्त्रता का अमृतमहोत्सव मनाया। क्या हम जानते हैं कि देश को स्वतन्त्रता दिलाने के लिए कितने ज्ञात-अज्ञात क्रान्तिवीरों ने अपने परिवार और जीवन को स्वतन्त्रता-यज्ञ में आहुति के रूप में समर्पित किया?
  • गद्यांश 2 (सत्येन्द्रनाथ का उपदेश):
    “क्रान्तिकार्यं कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं दृढं, बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा, मनः गङ्गाजलमिव निर्मलं च भवेत् इति।”
    हिन्दी अनुवाद: क्रान्तिकार्य करने के लिए शरीर वज्र के समान दृढ़, बुद्धि तलवार की धार की तरह तीक्ष्ण और मन गंगाजल की तरह निर्मल होना चाहिए।
  • गद्यांश 3 (खुदीराम की प्रतिज्ञा):
    ‘यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि’ इति।
    हिन्दी अनुवाद: ‘जब तक भारत अंग्रेजी शासन से मुक्त नहीं हो जाता, तब तक मैं जूता नहीं पहनूँगा।’
  • गद्यांश 4 (खुदीराम का बलिदान):
    राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्। तत् दृष्ट्वा न्यायाधीशः आङ्ग्लाः अधिकारिणः चापि चकिताः।
    हिन्दी अनुवाद: राष्ट्रभक्त खुदीराम के मुख पर भय या दुःख नहीं था, बल्कि प्रसन्नता, शान्ति, तृप्ति और तेज था। यह देखकर न्यायाधीश और अंग्रेज अधिकारी भी चकित रह गए।
  • गद्यांश 5 (अन्तिम क्षण):
    प्रियभारतमातुः दर्शनार्थं सः हसन्, वन्दे मातरम् इति जपन् आनन्देन दिवं गतः।
    हिन्दी अनुवाद: प्रिय भारतमाता के दर्शन के लिए वे हँसते हुए, ‘वन्दे मातरम्’ जपते हुए आनन्दपूर्वक स्वर्ग सिधारे।

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 – कठिन शब्दों के अर्थ

महत्त्वपूर्ण शब्दार्थ (परीक्षोपयोगी)

संस्कृत-शब्दःसंस्कृते अर्थःहिन्दी अर्थ
हुतात्मास्वातन्त्र्यार्थं प्राणत्यागीशहीद
पादत्राणम्पादयोः त्राणम्जूता
बुभुक्षितःक्षुधार्तःभूखा
असिधाराअसेः धारातलवार की धार
उद्बन्धनम्दण्डविशेषःफाँसी
प्रतीकारयत्नःप्रत्युत्तरप्रयासःप्रतिरोध का प्रयास
आहुतिःयज्ञे समर्पणम्आहुति, बलिदान
पारतन्त्र्यशृङ्खलापराधीनतायाः बन्धनम्गुलामी की बेड़ी
वायसरायःब्रिटिशप्रतिनिधिःवायसराय
आतङ्कम्भयम्डर
व्यथितःदुःखितःव्यथित, चिन्तित
चकितःविस्मितःचौंका हुआ
असाधारणःन साधारणःअसामान्य
सञ्चालकःनेतासंचालक, नेता

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 में व्याकरण

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 व्याकरणम्

सन्धिविच्छेदः (परीक्षोपयोगी)

सन्धिपदम्विच्छेदःसन्धिभेदः
इत्यादयःइति + आदयःयण्-सन्धिः
सर्वेऽपिसर्वे + अपिपूर्वरूप-सन्धिः
कश्चित्कः + चित्विसर्ग-सन्धिः
प्रत्येकम्प्रति + एकम्यण्-सन्धिः
वयस्तेजसःवयः + तेजसःविसर्ग-सन्धिः
अचिरादेवअचिरात् + एवविसर्ग-सन्धिः

समस्तपदानि (पाठ से)

विग्रहवाक्यम्समस्तपदम्समासभेदः
देशस्य भक्ताःदेशभक्ताःषष्ठी-तत्पुरुषः
बालः च क्रान्तिवीरः चबालक्रान्तिवीरःद्वन्द्वः
वज्रेण सदृशम्वज्रसदृशम्तृतीया-तत्पुरुषः
असेः धाराअसिधाराषष्ठी-तत्पुरुषः
मृत्युः एव दण्डःमृत्युदण्डःकर्मधारयः
न साधारणःअसाधारणःनञ्-तत्पुरुषः
निर्गता दया यस्मात् सःनिर्दयःबहुव्रीहिः
भुशुण्ड्या सञ्चालनम्भुशुण्डिसञ्चालनम्तृतीया-तत्पुरुषः

भूतकालस्य चत्वारः प्रकाराः

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 में लङ्-लकार, क्तवतु-प्रत्यय, स्म और क्त-प्रत्यय — ये चारों भूतकाल सूचित करते हैं।

प्रकारःउदाहरणम् (पाठतः)अर्थः
लङ्-लकारःखुदीरामः हुतात्मा अजायतखुदीराम शहीद हुए
क्तवतु-प्रत्ययःसत्येन्द्रनाथः उपदिष्टवान्सत्येन्द्रनाथ ने उपदेश दिया
स्मसः देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्मवे व्यथित होते थे
क्त-प्रत्ययःदेशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवतिसमर्पित होता है

चित्-प्रत्ययान्तपदानि (अनिश्चयवाचक)

‘चित्’-प्रत्यय लगने से अनिश्चय का भाव आता है –

मूलपदम्चित्-प्रत्ययान्तपदम्अर्थः
कदाकदाचित्कभी
कःकश्चित्कोई (पुं.)
काकाचित्कोई (स्त्री.)
किम्किञ्चित्कुछ
केनकेनचित्किसी से
कस्यकस्यचित्किसी का
कुत्रकुत्रचित्कहीं
कुतःकुतश्चित्कहीं से
कतिकतिचित्कुछ
कथम्कथञ्चित्किसी प्रकार

युगलपदानि

युगलपदम्अर्थःउदाहरणम्
यत् — तत्कि — वहवदति यत् भवन्तः मह्यं रुधिरं यच्छन्तु।
यदा — तदाजब — तबयदा कृष्णः शङ्खनादं कृतवान् तदा दुर्योधनादीनां हृदयानि कम्पितानि।
यावत् — तावत्जब तक — तब तकयावत् भूतले गिरयः भवन्ति तावत् रामायणकथा प्रचलिष्यति।
यद्यपि — तथापियद्यपि — तथापियद्यपि मेघाः सन्ति तथापि वृष्टिः न भवति।

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 – महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

अतिलघूत्तरीय प्रश्नाः

  1. ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ इत्यस्य किम् तात्पर्यम्?
    (इस शीर्षक का क्या तात्पर्य है?)
    उत्तरम्: ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ इत्यस्य तात्पर्यम् अस्ति यत् तेजसे वीरताप्रदर्शनाय वा आयुः कारणं न भवति।
    (इसका तात्पर्य है — वीरता और तेज के लिए आयु कारण नहीं होती।)
  2. खुदीरामस्य जनकस्य जनन्याः च नामे के आस्ताम्?
    (खुदीराम के पिता और माता के नाम क्या थे?)
    उत्तरम्: खुदीरामस्य जनकस्य नाम त्रैलोक्यनाथः, जनन्याः च नाम लक्ष्मीप्रिया देवी आसीत्।
    (पिता त्रैलोक्यनाथ और माता लक्ष्मीप्रिया देवी थीं।)
  3. खुदीरामस्य पालनपोषणं केन कृतम्?
    (खुदीराम का पालन-पोषण किसने किया?)
    उत्तरम्: खुदीरामस्य पालनपोषणं तस्य अग्रजया अपरूपादेव्या कृतम्।
    (खुदीराम का पालन-पोषण बड़ी बहन अपरूपा देवी ने किया।)
  4. बंगप्रान्तं कः कदा च विभाजितवान्?
    (बंगाल को किसने और कब विभाजित किया?)
    उत्तरम्: वायसरायः कर्जनः पञ्चाधिक-नवदशशततमे वर्षे (१९०५) बंगप्रान्तं विभाजितवान्।
    (वायसराय कर्जन ने 1905 में बंगाल को विभाजित किया।)
  5. बंगभंग-आन्दोलनसमये खुदीरामस्य वयः कियत् आसीत्?
    (बंगभंग आन्दोलन के समय खुदीराम की आयु कितनी थी?)
    उत्तरम्: बंगभंग-आन्दोलनसमये खुदीरामस्य वयः केवलं पञ्चदशवर्षीयम् आसीत्।
    (बंगभंग आन्दोलन के समय खुदीराम केवल 15 वर्ष के थे।)
  6. खुदीरामस्य गुप्तमण्डलस्य सञ्चालकः कः आसीत्?
    (खुदीराम के गुप्तमण्डल का सञ्चालक कौन था?)
    उत्तरम्: गुप्तमण्डलस्य सञ्चालकः सत्येन्द्रनाथः आसीत्।
    (गुप्तमण्डल का संचालक सत्येन्द्रनाथ था।)
  7. खुदीरामः प्रफुल्लेन सह कस्य वधाय बमं क्षिप्तवान्?
    (खुदीराम और प्रफुल्ल ने किसे मारने के लिए बम फेंका?)
    उत्तरम्: खुदीरामः प्रफुल्लेन सह किंग्जफोर्डस्य वधाय बमं क्षिप्तवान्।
    (खुदीराम और प्रफुल्ल ने किंग्जफोर्ड को मारने के लिए बम फेंका।)
  8. बम-विस्फोटे किंग्जफोर्डस्य रथे वस्तुतः के आस्ताम्?
    (बम-विस्फोट में किंग्जफोर्ड के रथ में वास्तव में कौन थे?)
    उत्तरम्: रथे किंग्जफोर्डः नासीत् — केनेडीनामकस्य अधिकारिणः पत्नी पुत्री च तत्र आस्ताम्।
    (रथ में किंग्जफोर्ड नहीं था — केनेडी की पत्नी और पुत्री वहाँ थीं।)
  9. प्रफुल्लः कथं हुतात्मा जातः?
    (प्रफुल्ल किस प्रकार शहीद हुए?)
    उत्तरम्: अनन्यगतिकः प्रफुल्लः ‘वन्दे मातरम्’ इत्युद्घोष्य स्ववक्षःस्थले भुशुण्ड्या गोलिकाप्रहारं कृत्वा हुतात्मा जातः।
    (मजबूर होकर प्रफुल्ल ने ‘वन्दे मातरम्’ कहकर स्वयं को गोली मारी।)
  10. न्यायालये प्रत्येकस्य प्रश्नस्य खुदीरामस्य किम् उत्तरम् आसीत्?
    (न्यायालय में हर प्रश्न का खुदीराम का क्या उत्तर था?)
    उत्तरम्: न्यायालये प्रत्येकस्य प्रश्नस्य खुदीरामस्य निश्चितम् उत्तरम् आसीत् — ‘वन्दे मातरम्’।
    (न्यायालय में हर प्रश्न का उत्तर था — ‘वन्दे मातरम्’।)
  11. खुदीरामस्य बलिदानस्य दिनाङ्कः कः?
    (खुदीराम के बलिदान की तिथि क्या है?)
    उत्तरम्: अष्टाधिक-नवदशशततमस्य वर्षस्य अगस्तमासस्य एकादशे दिनाङ्के (११-०८-१९०८) खुदीरामः हुतात्मा जातः।
    (11 अगस्त 1908 को खुदीराम शहीद हुए।)
  12. ‘कश्चित्’ इत्यस्य पदस्य विच्छेदः कः?
    (‘कश्चित्’ का सन्धिविच्छेद क्या है?)
    उत्तरम्: ‘कश्चित्’ = कः + चित् (विसर्गसन्धिः)।
    (‘कश्चित्’ = कः + चित्।)
  13. ‘निर्दयः’ इत्यस्य समासः कः?
    (‘निर्दयः’ का समास क्या है?)
    उत्तरम्: ‘निर्दयः’ = निर्गता दया यस्मात् सः — बहुव्रीहिसमासः।
    (‘निर्दयः’ बहुव्रीहि समास है — जिससे दया निकल गई।)
  14. ‘असिधारा’ इत्यस्य विग्रहः कः?
    (‘असिधारा’ का विग्रह क्या है?)
    उत्तरम्: ‘असिधारा’ = असेः धारा — षष्ठी-तत्पुरुषसमासः।
    (‘असिधारा’ = तलवार की धार — षष्ठी-तत्पुरुष।)
  15. ‘यद्यपि — तथापि’ युगलपदयोः प्रयोगेण एकं वाक्यं लिखत।
    (‘यद्यपि — तथापि’ से एक वाक्य लिखिए।)
    उत्तरम्: यद्यपि खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः तथापि सः प्रसन्नवदनः आसीत्।
    (यद्यपि खुदीराम को फाँसी की सजा सुनाई गई, तथापि वे प्रसन्नमुख थे।)

लघूत्तरीय प्रश्नाः

  1. खुदीरामस्य बाल्यकालं संस्कृते वर्णयत।
    (खुदीराम के बचपन का संस्कृत में वर्णन कीजिए।)
    उत्तरम्: खुदीरामस्य जन्म बंगप्रान्तस्य मोहोबनी-ग्रामे १८८९ तमे वर्षे अभवत्। तस्य जनकस्य नाम त्रैलोक्यनाथः, जनन्याः च नाम लक्ष्मीप्रिया देवी आसीत्। बाल्यकाले एव तस्य पितरौ दिवंगतौ। अतः अग्रजा अपरूपादेवी तस्य पालनपोषणम् अकरोत्। बाल्यकालतः एव सः असाधारणः आसीत् — देशवासिषु जायमानान् अत्याचारान् दृष्ट्वा सः व्यथितः भवति स्म।
    (खुदीराम का जन्म 1889 में मोहोबनी ग्राम में हुआ। बचपन में माता-पिता का निधन हो गया। बड़ी बहन अपरूपादेवी ने पालन-पोषण किया। बचपन से असाधारण थे — अत्याचार देखकर व्यथित होते थे।)
  2. सत्येन्द्रनाथस्य उपदेशः कः आसीत्? संस्कृते लिखत।
    (सत्येन्द्रनाथ का उपदेश क्या था?)
    उत्तरम्: सत्येन्द्रनाथः उपदिष्टवान् — “क्रान्तिकार्यं कर्तुं शरीरं वज्रसदृशं दृढं भवेत्, बुद्धिः असिधारा इव तीक्ष्णा भवेत्, मनः च गङ्गाजलमिव निर्मलं भवेत्।” एतत् त्रयम् एव क्रान्तिकार्यस्य मूलाधारम् आसीत्। खुदीरामः प्रफुल्लश्च तस्मात् केन्द्रात् अष्टमासात्मकं प्रशिक्षणं प्राप्तवन्तौ।
    (सत्येन्द्रनाथ ने कहा — शरीर वज्र जैसा दृढ़, बुद्धि तलवार जैसी तीक्ष्ण और मन गंगाजल जैसा निर्मल हो। खुदीराम और प्रफुल्ल ने आठ मास का प्रशिक्षण प्राप्त किया।)
  3. खुदीरामस्य प्रतिज्ञां संस्कृते वर्णयत।
    (खुदीराम की प्रतिज्ञा का वर्णन संस्कृत में कीजिए।)
    उत्तरम्: राणाप्रतापस्य चरित्रेण प्रेरितः खुदीरामः दृढं प्रतिज्ञातवान् — ‘यावत् भारतम् आङ्ग्लशासनात् मुक्तं न भविष्यति तावत् पादत्राणं न धरिष्यामि।’ एषा प्रतिज्ञा तस्य देशभक्तेः पराकाष्ठां दर्शयति। सः केवलं वाचा न अपि तु जीवनेन अपि एतां प्रतिज्ञां पालितवान्।
    (राणा प्रताप से प्रेरित होकर खुदीराम ने प्रतिज्ञा की — ‘जब तक भारत स्वतन्त्र न हो, जूता नहीं पहनूँगा।’ यह प्रतिज्ञा उनकी देशभक्ति की पराकाष्ठा दिखाती है।)
  4. ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ इत्यस्य भावः खुदीरामस्य जीवनाधारेण संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
    (खुदीराम के जीवन के आधार पर इस शीर्षक का भाव स्पष्ट कीजिए।)
    उत्तरम्: ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ इत्यस्य भावः अस्ति — वीरताप्रदर्शनाय वयः कारणं न भवति। खुदीरामः एतस्य जीवन्तः प्रमाणम् आसीत्। पञ्चदशवर्षे आन्दोलने, अष्टादशवर्षे बलिदाने — सः तेजस्वी जीवनम् उपस्थापितवान्। न्यायालये ‘वन्दे मातरम्’ उद्घोष्य, फाँसीमञ्चे हसन् — सः सिद्धितवान् यत् तेजः अन्तरात् उद्भवति, न वयसः।
    (इसका भाव है — तेज के लिए उम्र कारण नहीं। खुदीराम इसका जीवन्त प्रमाण थे। 15 वर्ष में आन्दोलन, 18 वर्ष में बलिदान — उन्होंने सिद्ध किया कि तेज भीतर से आता है, उम्र से नहीं।)
  5. बम-विस्फोट-घटनायाः वर्णनं संस्कृते कुरुत।
    (बम-विस्फोट की घटना का संस्कृत में वर्णन कीजिए।)
    उत्तरम्: अष्टाधिक-नवदशशततमस्य एप्रिलमासस्य अष्टाविंशे दिनाङ्के प्रफुल्ल-खुदीरामाभ्यां किंग्जफोर्डस्य रथे विस्फोटकं प्रक्षिप्तम्। महान् विस्फोटध्वनिः जातः। किन्तु दुर्भाग्यवशात् रथे किंग्जफोर्डः नासीत् — केनेडी-पत्नी-पुत्र्यौ तत्र आस्ताम् — ते मृते। आरात्रि आङ्ग्लाः आरक्षकाः तौ अगृह्णन्। प्रफुल्लः स्वयमेव हुतात्मा जातः।
    (28 अप्रैल 1908 को दोनों ने बम फेंका। विस्फोट हुआ किन्तु रथ में किंग्जफोर्ड नहीं था — केनेडी की पत्नी और पुत्री मारी गईं। रात को पकड़े गए। प्रफुल्ल ने स्वयं को गोली मारी।)
  6. खुदीरामस्य अन्तिमसमयस्य वर्णनं संस्कृते कुरुत।
    (खुदीराम के अन्तिम समय का संस्कृत में वर्णन कीजिए।)
    उत्तरम्: न्यायालये न्यायाधीशेन खुदीरामाय मृत्युदण्डः उद्घोषितः। किन्तु राष्ट्रभक्तस्य खुदीरामस्य मुखे भयं दुःखं वा नासीत् — प्रत्युत प्रसन्नता, शान्तिः, तृप्तिः, तेजः च आसीत्। अष्टाधिक-नवदशशततमस्य अगस्तमासस्य एकादशे दिनाङ्के सः हसन् ‘वन्दे मातरम्’ इति जपन् आनन्देन दिवं गतः। तत् दृष्ट्वा न्यायाधीशः अधिकारिणः च चकिताः।
    (न्यायाधीश ने फाँसी सुनाई। किन्तु मुख पर भय नहीं — प्रसन्नता, शान्ति, तेज था। 11 अगस्त 1908 को हँसते हुए ‘वन्दे मातरम्’ जपते स्वर्ग सिधारे। यह देख सब चकित रह गए।)
  7. भूतकालस्य चत्वारः प्रकाराः के सन्ति? पाठतः एकम् एकम् उदाहरणं दत्त्वा संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
    (भूतकाल के चार प्रकार कौन-से हैं? पाठ से उदाहरण दीजिए।)
    उत्तरम्: भूतकालस्य चत्वारः प्रकाराः सन्ति —

    • लङ्-लकारः — यथा: खुदीरामः हुतात्मा अजायत।
    • क्तवतु-प्रत्ययः — यथा: सत्येन्द्रनाथः खुदीरामम् उपदिष्टवान्।
    • स्म — यथा: सः देशवासिषु अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।
    • क्त-प्रत्ययः — यथा: देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति।
      एते चत्वारः प्रकाराः भूतकालिकं क्रियाकलापं सूचयन्ति।
      (ये चारों भूतकालिक क्रिया को सूचित करते हैं।)
  8. चित्-प्रत्ययः किम्? पञ्च उदाहरणानि दत्त्वा संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
    (चित्-प्रत्यय क्या है? पाँच उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।)
    उत्तरम्: ‘चित्’-प्रत्ययस्य योजनेन अनिश्चयस्य भावः सूच्यते। प्रश्नवाचकपदेभ्यः ‘चित्’-प्रत्ययं योजयित्वा अनिश्चयवाचकपदानि निर्मीयन्ते —

    • कः + चित् = कश्चित् (कोई) — कश्चित् बालकः गच्छति।
    • का + चित् = काचित् (कोई स्त्री) — काचित् महिला आगता।
    • किम् + चित् = किञ्चित् (कुछ) — किञ्चित् फलं खाद।
    • कुत्र + चित् = कुत्रचित् (कहीं) — कुत्रचित् पुस्तकं लुप्तम्।
    • कदा + चित् = कदाचित् (कभी) — सः कदाचित् आगच्छेत्।
      (चित्-प्रत्यय अनिश्चय का बोध कराता है।)
  9. बंगभंग-आन्दोलनस्य किं कारणम् आसीत्? खुदीरामः कथम् आन्दोलने सहभागी अभवत्? संस्कृते लिखत।
    (बंगभंग आन्दोलन का क्या कारण था? खुदीराम किस प्रकार उसमें सहभागी हुए?)
    उत्तरम्: वायसरायः कर्जनः बंगप्रान्तस्य क्रान्तिवीरताम् दमयितुं, उत्साहं ध्वंसयितुं, देशभक्तिं मर्दयितुं च १९०५ तमे वर्षे बंगप्रान्तं भागद्वये विभाजितवान्। एतेन सर्वत्र जनान्दोलनम् प्रवृत्तम् — एतस्यैव नाम ‘बंगभंग-आन्दोलनम्’। तस्मिन् समये केवलं पञ्चदशवर्षीयः खुदीरामः देशभक्त्या प्रेरितः सन् आन्दोलने कूर्दितः। सः बालानां संघटनं कृत्वा पदयात्राम् आयोजयति स्म, देशभक्तिगीतानि, ‘वन्दे मातरम्’ च गायति स्म।
    (कर्जन ने 1905 में क्रान्ति को दबाने के लिए बंगाल बाँटा। इससे जनान्दोलन हुआ। 15 वर्षीय खुदीराम देशभक्ति से प्रेरित होकर कूद पड़े — संगठन, पदयात्रा, गीत-घोष किए।)
  10. ‘देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति’ इत्यस्य भावं खुदीरामस्य जीवनाधारेण संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
    (इस वाक्य का भाव खुदीराम के जीवन के आधार पर संस्कृत में स्पष्ट कीजिए।)
    उत्तरम्: खुदीरामः एतस्य वाक्यस्य साक्षात् प्रमाणम् आसीत्। तेन नवमी कक्षा अपि न पूर्णीकृता यतोहि देशकार्यम् एव तस्य जीवनम् आसीत्। स्वपरिवारं, स्वशिक्षाम्, स्वजीवनं च तेन राष्ट्राय अर्पितम्। न्यायालये ‘वन्दे मातरम्’ उद्घोष्य, फाँसीमञ्चे हसन् प्राणान् त्यक्त्वा सः सिद्धितवान् यत् देशभक्तस्य जीवनं वस्तुतः राष्ट्राय एव समर्पितम् भवति।
    (खुदीराम इसके साक्षात् प्रमाण थे। नवमी कक्षा न पूरी की, परिवार-शिक्षा-जीवन सब राष्ट्र को अर्पित किया। हँसते हुए फाँसी पर सिद्ध किया — देशभक्त का जीवन राष्ट्र के लिए होता है।)

दीर्घउत्तरीय प्रश्नाः

1. कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 के आधार पर खुदीराम बोस का जीवनवृत्त हिन्दी में लिखिए।

उत्तरम्:

  • जन्म एवं बचपन: खुदीराम बोस का जन्म 3 दिसम्बर 1889 को बंगाल के मेदिनीपुर जनपद के मोहोबनी ग्राम में हुआ। पिता त्रैलोक्यनाथ और माता लक्ष्मीप्रिया देवी थे। बचपन में ही माता-पिता का निधन हो गया। बड़ी बहन अपरूपा देवी ने पालन-पोषण किया। बचपन से ही वे असाधारण थे — देशवासियों पर होने वाले अत्याचार देखकर उनका हृदय व्यथित हो जाता था।
  • क्रान्तिकार्य: 1905 में वायसराय कर्जन ने बंगाल का विभाजन किया। मात्र 15 वर्षीय खुदीराम देशभक्ति से प्रेरित होकर बंगभंग आन्दोलन में कूद पड़े। नवमीं कक्षा भी पूरी न कर सके। बालों का संगठन बनाकर पदयात्राएँ करते, ‘वन्दे मातरम्’ के घोष लगाते और पत्रक वितरित करते थे।
  • प्रशिक्षण एवं प्रतिज्ञा: गुप्तमण्डल के सञ्चालक सत्येन्द्रनाथ से मिले। उनका उपदेश था — वज्र जैसा दृढ़ शरीर, तलवार जैसी तीक्ष्ण बुद्धि और गंगाजल जैसा निर्मल मन। आठ मास का प्रशिक्षण लिया। राणा प्रताप से प्रेरित होकर प्रतिज्ञा की — ‘जब तक भारत स्वतन्त्र न हो, जूता नहीं पहनूँगा।’
  • बम-विस्फोट एवं बलिदान: 28 अप्रैल 1908 को प्रफुल्ल के साथ किंग्जफोर्ड के रथ पर बम फेंका। किन्तु रथ में किंग्जफोर्ड नहीं था। खुदीराम पकड़े गए। न्यायालय में हर प्रश्न का एक ही उत्तर — ‘वन्दे मातरम्’। न्यायाधीश ने फाँसी की सजा सुनाई। 11 अगस्त 1908 को हँसते हुए ‘वन्दे मातरम्’ जपते स्वर्ग सिधारे।

2. कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 के शीर्षक ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ की सार्थकता खुदीराम बोस के जीवन के सन्दर्भ में सिद्ध कीजिए।

उत्तरम्:

  • शीर्षक का अर्थ: ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ — वीरता और तेज के लिए आयु कारण नहीं होती।
    खुदीराम के जीवन से साक्ष्य:
  • 15 वर्ष में राष्ट्रीय आन्दोलन: 1905 में जब बंगाल का विभाजन हुआ, तब मात्र 15 वर्षीय खुदीराम जनान्दोलन में कूद पड़े। इस उम्र में अधिकांश बच्चे खेलकूद में रहते हैं। खुदीराम ने इस आयु में राष्ट्रीय चेतना का परिचय दिया।
  • शिक्षा का बलिदान: नवमीं कक्षा पूरी न करना — यह दर्शाता है कि उनके लिए राष्ट्र सर्वोपरि था। छोटी उम्र में इतना बड़ा निर्णय लेना असाधारण साहस का प्रमाण है।
  • अंग्रेजों को पराजित करना: पत्रक वितरण के समय पकड़े जाने पर अंग्रेजों को पीटकर निकल जाना — यह 16-17 वर्ष के बालक का काम था।
  • 18 वर्ष में मृत्युदण्ड को हँसकर स्वीकारना: जब अनुभवी और वृद्ध व्यक्ति भी मृत्यु के भय से काँपते हैं, तब 18 वर्षीय खुदीराम के मुख पर प्रसन्नता, शान्ति और तेज था। न्यायाधीश और अंग्रेज अधिकारी भी चकित रह गए।
  • निष्कर्ष: खुदीराम का जीवन इस शीर्षक का जीवन्त उदाहरण है कि वीरता, देशभक्ति और आत्मबलिदान का वय से कोई सम्बन्ध नहीं। तेज आत्मा से आता है।

3. कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 के आधार पर भूतकाल के चारों प्रकारों को उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तरम्:
पाठ में बताया गया है कि संस्कृत में भूतकाल चार प्रकारों से व्यक्त होता है –

  1. लङ्-लकार (सामान्य भूतकाल):
    पाठ में उदाहरण — खुदीरामः हुतात्मा अजायत (अजायत = जायत + अ)।
    अन्य — वायसरायः बंगप्रान्तं विभाजयत्।
    जब एकबार हुई किसी क्रिया को बताना हो, लङ् का प्रयोग होता है।
  2. क्तवतु-प्रत्यय (कर्तृवाच्य भूतकाल):
    पाठ में उदाहरण — सत्येन्द्रनाथः खुदीरामम् उपदिष्टवान्।
    यह कर्ता के लिङ्ग-वचन के अनुसार बदलता है — गतवान् (पुं.), गतवती (स्त्री.)।
  3. स्म (अभ्यासकालीन भूतकाल):
    पाठ में उदाहरण — सः देशवासिषु अत्याचारान् दृष्ट्वा व्यथितः भवति स्म।
    जब किसी नियमित या बार-बार होने वाली भूतकालिक क्रिया को बताना हो, तब वर्तमान काल + स्म का प्रयोग होता है।
  4. क्त-प्रत्यय (कर्मवाच्य भूतकाल):
    पाठ में उदाहरण — देशभक्तानां जीवनं राष्ट्राय समर्पितं भवति।
    यह प्रत्यय प्रायः कर्म या भाव से सम्बन्धित होता है।
    व्यावहारिक उपयोग: परीक्षा में एक भूतकाल वाक्य को दूसरे भूतकाल में बदलने को कहा जाता है — इसलिए चारों की पहचान आवश्यक है।

4. प्रफुल्ल और खुदीराम की योजना, उसका परिणाम और उसके बाद की घटनाओं का क्रमबद्ध वर्णन कीजिए।

उत्तरम्:

  • किंग्जफोर्ड कौन था: कलकत्ता का क्रूर न्यायिक अंग्रेज अधिकारी जो भारतीय देशभक्तों को अत्यन्त कठोरता से दण्डित करता था। बालकों को भी नहीं छोड़ता था।
  • योजना का निर्माण: सशस्त्र क्रान्तिवीर मण्डल ने निश्चय किया — ‘किंग्जफोर्ड हन्तव्यः।’ सम्पूर्ण उत्तरदायित्व प्रफुल्ल और खुदीराम ने लिया। दोनों ने सूक्ष्म योजना बनाई।
  • बम-विस्फोट (28 अप्रैल 1908): किंग्जफोर्ड के रथ पर विस्फोटक फेंका। महाविस्फोट हुआ, अग्निज्वालाएँ आकाश को छूने लगीं। दोनों ‘किंग्जफोर्ड हतः’ समझकर भाग गए।
  • दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम: किन्तु वह किंग्जफोर्ड का रथ होने पर भी उसमें वह नहीं था। केनेडी की पत्नी और पुत्री उस रथ में थीं — वे मारी गईं। किंग्जफोर्ड बच गया।
  • प्रफुल्ल का बलिदान: रात में दोनों पकड़े गए। प्रफुल्ल के प्रतिरोध का कोई उपाय न बचा। उसने ‘वन्दे मातरम्’ उद्घोषित करके स्वयं को गोली मारी।
  • खुदीराम का न्याय और बलिदान: खुदीराम को न्यायालय लाया गया। हर प्रश्न का एक उत्तर — ‘वन्दे मातरम्’। मृत्युदण्ड सुनाया गया। 11 अगस्त 1908 को हँसते हुए फाँसी पर चढ़े — यह दृश्य देखकर अंग्रेज भी चकित रह गए।

5. ‘देशभक्तों के प्रति कृतज्ञता’ – कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 की इस भावना की आज के जीवन में क्या प्रासंगिकता है?

उत्तरम्:
पाठ के प्रारम्भ में ही कहा गया है — “किं वयं जानीमः यत् देशाय स्वातन्त्र्यं प्रदातुं कियन्तः ज्ञाताः अज्ञाताः च क्रान्तिवीराः… आहुतिरूपेण समर्पितवन्तः इति?” यह प्रश्न आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

  • ज्ञात-अज्ञात शहीदों की स्मृति: खुदीराम, भगत सिंह, चन्द्रशेखर आजाद आदि के नाम हम जानते हैं। किन्तु अनगिनत अज्ञात क्रान्तिवीर भी थे जिनकी कहानी इतिहास में दर्ज नहीं। उनके प्रति कृतज्ञता हमारा नैतिक दायित्व है।
  • स्वतन्त्रता का मूल्य: आज की पीढ़ी स्वतन्त्रता को सहज मान लेती है। यह पाठ याद दिलाता है कि इस स्वतन्त्रता की कीमत अनगिनत युवाओं के जीवन से चुकाई गई है।
  • प्रेरणा: खुदीराम मात्र 18 वर्ष के थे — यही आयु कक्षा 9-12 के छात्रों की होती है। उनका जीवन प्रेरित करता है कि युवावस्था में देश के लिए कुछ सकारात्मक किया जा सकता है।
  • कर्तव्य: कृतज्ञता केवल भावना नहीं — यह कर्तव्यबोध है। देश का कर्तव्यनिष्ठ नागरिक बनना, ईमानदारी से कार्य करना, भ्रष्टाचार से दूर रहना — यही शहीदों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
  • समापन: ‘ते सर्वेऽपि क्रान्तिवीराः अस्माभिः कृतज्ञताभावनया नित्यं वन्दनीयाः’ — यह पाठ का सन्देश है। उनकी स्मृति को जीवन्त रखना और उनके आदर्शों का पालन करना — यही आज की पीढ़ी का दायित्व है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 में कौन-से मुख्य व्याकरण बिन्दु हैं जो परीक्षा में पूछे जाते हैं?

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 परीक्षा की दृष्टि से व्याकरण के चार प्रमुख बिन्दु हैं — (1) सन्धिविच्छेद (यण्, विसर्ग, पूर्वरूप), (2) समस्तपद (तत्पुरुष, कर्मधारय, बहुव्रीहि), (3) भूतकाल के चार प्रकार (लङ्, क्तवतु, स्म, क्त) और (4) चित्-प्रत्ययान्त अनिश्चयवाचक अव्यय। युगलपदों (यत्-तत्, यदा-तदा, यावत्-तावत्, यद्यपि-तथापि) का प्रयोग भी महत्त्वपूर्ण है।

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 में संवत्सर-ज्ञान (संस्कृत में वर्ष बोलना) पढ़ाना क्यों महत्त्वपूर्ण है?

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 में संस्कृत में वर्ष बोलने की विशेष पद्धति प्रयुक्त है —
जैसे ‘नवाशीत्यधिक-अष्टादशशततमं वर्षम्’ = 1889।
एनसीईआरटी ने अभ्यास 3 में इसे मिलान-कार्य के रूप में रखा है। यह अंकपद्धति और समास का सुन्दर संयोजन है जो छात्रों को संस्कृत की संख्याओं से परिचित कराता है।

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी 2020) के अनुसार क्या प्रासंगिकता है?

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 एनईपी 2020 के मूल्यपरक शिक्षा के लक्ष्य को पूरी तरह पूरा करता है। यह देशभक्ति, त्याग, साहस और राष्ट्रीय चेतना जागृत करता है। ‘यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्’ खण्ड में अन्य क्रान्तिवीरों पर शोध और प्रस्तुति से छात्रों में स्वतन्त्र चिन्तन और अनुसन्धान-कौशल विकसित होता है।

क्या कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 कठिन है? विद्यार्थी इसे कितने समय में तैयार कर सकता है?

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 मध्यम कठिनाई का है। पाठ की विषयवस्तु — खुदीराम बोस का जीवनवृत्त — रोचक और प्रेरणादायक है जिससे बच्चे की रुचि बनी रहती है। व्याकरण थोड़ा चुनौतीपूर्ण है। यदि बच्चा प्रतिदिन 30-40 मिनट दे तो 5-7 दिनों में पाठ अच्छी तरह तैयार हो सकता है।

एक दिन में कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 कैसे तैयार करें?

एक दिन में कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 तैयार करने के लिए –

  1. पहले हिन्दी अनुवाद पढ़कर कथा समझें (30 मिनट)
  2. एनसीईआरटी अभ्यासों के उत्तर याद करें (45 मिनट)
  3. सन्धिविच्छेद, समस्तपद और महत्त्वपूर्ण शब्दार्थ देखें (30 मिनट)
  4. युगलपद और चित्-प्रत्यय के उदाहरण पढ़ें (20 मिनट)
  5. अति लघु प्रश्नोत्तर एक बार पढ़ें (15 मिनट)।

परीक्षा से पहले का यह क्रम सबसे प्रभावी रहेगा।

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 में अच्छे अंक पाने के लिए क्या तैयारी करें?

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 4 में अच्छे अंक के लिए –

  1. पूर्णवाक्येन उत्तर संस्कृत में लिखने का अभ्यास करें
  2. सन्धिविच्छेद और समस्तपद के सभी उदाहरण याद रखें
  3. भूतकाल के चारों प्रकार — लङ्, क्तवतु, स्म, क्त — को समझकर अभ्यास करें
  4. महत्त्वपूर्ण तिथियाँ (जन्म, बलिदान) संस्कृत-संख्याओं में याद रखें।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 के मुख्य तथ्य कौन-से हैं जो परीक्षा में पूछे जाते हैं?

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 से परीक्षा में सर्वाधिक पूछे जाने वाले तथ्य –

  1. खुदीराम का जन्मस्थान (मोहोबनी ग्राम, मेदिनीपुर)
  2. माता-पिता के नाम (त्रैलोक्यनाथ और लक्ष्मीप्रिया देवी)
  3. सत्येन्द्रनाथ का उपदेश (वज्र सदृश शरीर, असिधारा बुद्धि, गंगाजल मन)
  4. बम-विस्फोट की तिथि (28 अप्रैल 1908)
  5. बलिदान की तिथि (11 अगस्त 1908)
  6. न्यायालय में खुदीराम का उत्तर (वन्दे मातरम्)।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 के मुख्य व्याकरण बिन्दु क्या हैं जो परीक्षा में जरूर आते हैं?

कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 4 से परीक्षा में निश्चित रूप से आने वाले व्याकरण बिन्दु — (1) सन्धिविच्छेद — विशेषकर इत्यादयः, सर्वेऽपि, कश्चित्, (2) समस्तपद — देशभक्ताः, असिधारा, मृत्युदण्डः, असाधारणः, निर्दयः, (3) भूतकाल परिवर्तन — क्तवतु↔लङ् और (4) चित्-प्रत्यय — कश्चित्, काचित्, किञ्चित्, कुत्रचित्, कदाचित्।

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 4 ‘न खलु वयस्तेजसो हेतुः’ का क्या अर्थ है और यह शीर्षक कैसे सार्थक है?

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 4 के शीर्षक का अर्थ है — ‘आयु निश्चित रूप से तेज (वीरता) का कारण नहीं होती।’ यह शीर्षक खुदीराम बोस के जीवन से पूरी तरह सार्थक है। मात्र 15 वर्ष की आयु में जनान्दोलन में कूद पड़ना, 18 वर्ष की आयु में हँसते-हँसते फाँसी का वरण करना — यह सिद्ध करता है कि वीरता, देशभक्ति और आत्मबलिदान के लिए बड़ी उम्र की आवश्यकता नहीं। कक्षा 9 के छात्रों को यह सन्देश मिलता है कि वे अभी से देश और समाज के लिए कुछ करने की भावना रख सकते हैं।