एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 गणित प्रकाश अध्याय 3 संख्याओं की कहानी

सत्र 2026-27 के लिए कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 — संख्याओं की कहानी — गणित के सबसे रोचक और प्रेरणादायक अध्यायों में से एक है। यह अध्याय एक सवाल से शुरू होता है जो हर बच्चे के मन में कभी न कभी आता है — “हम 0 से 9 तक जो अंक लिखते हैं, वे कहाँ से आए?”

इस अध्याय में विद्यार्थी जानते हैं कि मनुष्य ने 4000 वर्ष पूर्व मेसोपोटामिया से लेकर प्राचीन भारत तक कैसे संख्याएँ गिनीं और लिखीं। रोमन संख्यांक, मिस्र की संख्या पद्धति, माया सभ्यता, चीनी संख्यांक और हिंदू संख्या पद्धति — सभी को एक ऐतिहासिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ स्थानीय मान पद्धति और शून्य की खोज — जो भारत की सबसे महान गणितीय उपलब्धि है — को विशेष रूप से समझाया गया है।

यह अध्याय सीबीएसई परीक्षा 2026-27 के साथ-साथ बच्चों की सामान्य जिज्ञासा और गणितीय सोच विकसित करने के लिए भी अत्यंत उपयोगी है। तिवारी अकादमी पर सभी समाधान हिंदी में निशुल्क उपलब्ध हैं।

एनसीईआरटी कक्षा 8 गणित प्रकाश अध्याय 3 के प्रश्न उत्तर

पेज 54 – आइए, पता लगाएँ

1. मान लीजिए आप एक संख्या पद्धति का उपयोग कर रहे हैं जिसमें संख्याओं को दर्शाने के लिए छड़ियों का उपयोग किया जाता है जैसा कि विधि 1 में बताया गया है। हिंदू संख्या पद्धति के संख्या-नामों या संख्यांकों का उपयोग किए बिना दो संख्याओं या छड़ियों के दो संग्रहों के जोड़, घटाव, गुणन और विभाजन की विधि बताइए।

उत्तर:
(क) जोड़ (Addition)
दो समूहों की छड़ियों को एक साथ मिला दिया जाता है।
जितनी कुल छड़ियाँ होंगी वही जोड़ का परिणाम होगा।
उदाहरण:
यदि पहले समूह में |||| (4 छड़ियाँ) हैं और दूसरे समूह में ||| (3 छड़ियाँ) हैं,
तो दोनों को मिलाने पर
|||| + ||| = |||||||
अर्थात कुल 7 छड़ियाँ।

(ख) घटाव (Subtraction)
एक समूह से उतनी छड़ियाँ हटा दी जाती हैं जितनी दूसरी संख्या दर्शाती है।
उदाहरण:
यदि एक समूह में |||||| (6 छड़ियाँ) हैं और उसमें से || (2 छड़ियाँ) हटा दें,
तो शेष बचेंगी
||||||
– ||
= ||||
अर्थात 4 छड़ियाँ।

(ग) गुणा (Multiplication)
किसी संख्या की छड़ियों के समूह को उतनी बार दोहराया जाता है जितनी दूसरी संख्या है।
उदाहरण:
यदि ||| (3 छड़ियाँ) को |||| (4 बार) लिया जाए:
||| + ||| + ||| + |||
= ||||||||||||
अर्थात 12 छड़ियाँ।

(घ) विभाजन (Division)
कुल छड़ियों को बराबर-बराबर समूहों में बाँटा जाता है।
उदाहरण:
यदि |||||||| (8 छड़ियाँ) को || (2 छड़ियों) के समूह में बाँटें:
|| || || ||
तो कुल 4 समूह बनेंगे।
अर्थात परिणाम 4 है।

2. विधि 2 में दी गई संख्या पद्धति का विस्तार करने की एक विधि यह है कि एक से अधिक वर्णों वाली श्रृंखला का प्रयोग किया जाए। उदाहरण के लिए हम 27 के लिए ‘aa’ का प्रयोग कर सकते हैं। सभी संख्याओं को दर्शाने के लिए आप इस पद्धति को कैसे विस्तारित कर सकते हैं? ऐसा करने की अनेक विधियाँ हो सकती हैं।

उत्तर:
यदि हम अंग्रेज़ी वर्णमाला का उपयोग करें तो:
1 = a
2 = b
3 = c
4 = d
5 = e

26 = z
26 के बाद दो वर्णों का प्रयोग किया जा सकता है।
27 = aa
28 = ab
29 = ac
30 = ad

इसी प्रकार आगे बढ़ाया जा सकता है:
52 = az
53 = ba
54 = bb
इस प्रकार वर्णों के संयोजन से बहुत बड़ी संख्याओं को भी व्यक्त किया जा सकता है।

3. आप स्वयं एक संख्या पद्धति बनाने का प्रयास कीजिए।

उत्तर:
एक सरल संख्या पद्धति इस प्रकार बनाई जा सकती है:
● = 1
●● = 2
●●● = 3
पाँच वस्तुओं का एक समूह बनाने के लिए नया चिन्ह लें:
★ = 5
फिर,
★ ● = 6
★ ●● = 7
★ ●●● = 8
★ ●●●● = 9

दो ★ = 10
इस प्रकार हम छोटे चिन्हों और बड़े समूहों के चिन्हों का उपयोग करके अपनी स्वयं की संख्या पद्धति बना सकते हैं।

पेज 60 – आइए, पता लगाएँ

1. प्रशांत महासागर के एक द्वीप में रहने वाले मूल निवासियों का एक समूह भिन्न-भिन्न वस्तुओं को गिनने के लिए संख्या नामों के विभिन्न अनुक्रम का प्रयोग करते हैं। वे ऐसा क्यों करते हैं? सोचकर बताइए।

उत्तर:
प्रशांत महासागर के द्वीपों में रहने वाले मूल निवासी अलग-अलग प्रकार की वस्तुओं की गिनती के लिए अलग-अलग संख्या नामों के अनुक्रम का प्रयोग करते हैं।
इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं—

(1) सुविधा के लिए
भिन्न वस्तुओं की गिनती अलग-अलग तरीके से करना उनके लिए अधिक आसान होता है।

(2) वस्तुओं के समूह अलग-अलग होना
कुछ वस्तुएँ जोड़े, कुछ पाँच-पाँच या दस-दस के समूह में गिनी जाती हैं। इसलिए उनके लिए अलग संख्या नाम उपयोग किए जाते हैं।

(3) परंपरा और संस्कृति
उनकी पारंपरिक भाषा और संस्कृति में विभिन्न वस्तुओं के लिए अलग गिनती की प्रणालियाँ विकसित हो गई हैं।

(4) गणना को सरल बनाने के लिए
जब अलग-अलग वस्तुओं के लिए अलग अनुक्रम होता है, तो बड़ी मात्रा में वस्तुओं की गिनती करना आसान हो जाता है।
अतः विभिन्न वस्तुओं की गिनती को सरल और सुविधाजनक बनाने के लिए वे संख्या नामों के अलग-अलग अनुक्रम का उपयोग करते हैं।

पेज 60–61 : आइए, पता लगाएँ

2. 2 के बार-बार प्रयोग से गिनती करने की इसी विधि से गुमुलगल संख्या पद्धति की 6 से आगे की संख्याओं पर विचार कीजिए। इस पद्धति में आने वाली संख्याओं के लिए हिंदू संख्यांकों का प्रयोग किए बिना विभिन्न अंकगणितीय संक्रियाएँ (+, −, ×, ÷) करने की विधियों का पता लगाइए। इसका उपयोग निम्नलिखित का मूल्यांकन करने के लिए कीजिए।

(i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन)
(ii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) − (उकासर-उकासर-उकासर)
(iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर-उकासर)
(iv) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
उत्तर:
गुमुलगल संख्या पद्धति में
उरापोन = 1
उकासर = 2

अतः
उकासर-उरापोन = 3
उकासर-उकासर = 4
उकासर-उकासर-उरापोन = 5
उकासर-उकासर-उकासर = 6
उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन = 7
उकासर-उकासर-उकासर-उकासर = 8
उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन = 9

(i) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) + (उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन)
= 9 + 7 = 16

(ii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) − (उकासर-उकासर-उकासर)
= 9 − 6 = 3

(iii) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उरापोन) × (उकासर-उकासर)
= 9 × 4 = 36

(iv) (उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर-उकासर) ÷ (उकासर-उकासर)
= 16 ÷ 4 = 4

3. हिंदू संख्या पद्धति की उन विशेषताओं की पहचान कीजिए जो इसे रोमन संख्या पद्धति की तुलना में अधिक प्रभावी बनाती हैं।

उत्तर:
हिंदू संख्या पद्धति की प्रमुख विशेषताएँ—
1. इसमें 0 से 9 तक केवल 10 अंक होते हैं।
2. यह स्थानमान (Place Value) प्रणाली पर आधारित है।
3. इसमें शून्य (0) का प्रयोग किया जाता है।
4. बड़ी संख्याओं को लिखना सरल होता है।
5. जोड़, घटाव, गुणा और भाग जैसी गणनाएँ आसानी से की जा सकती हैं।
6. वैज्ञानिक गणनाओं के लिए यह अधिक उपयोगी है।

इसी कारण हिंदू संख्या पद्धति रोमन संख्या पद्धति से अधिक प्रभावी और सुविधाजनक मानी जाती है।

4. इस अनुभाग में चर्चा की गई अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए पूर्व में बनी संख्या पद्धति को परिष्कृत करने का प्रयास कीजिए।

उत्तर:
संख्या पद्धति को परिष्कृत करने के लिए निम्न सुधार किए जा सकते हैं—
1. निश्चित आधार (जैसे 10) का प्रयोग किया जाए।
2. सीमित प्रतीकों (0–9) का उपयोग किया जाए।
3. स्थानमान प्रणाली अपनाई जाए।
4. बड़े समूहों को छोटे समूहों में व्यवस्थित किया जाए।
5. गणनाओं को सरल बनाने के लिए मानक नियम बनाए जाएँ।
इन सुधारों के कारण संख्या पद्धति अधिक सरल, व्यवस्थित और उपयोगी बन जाती है।

पेज 62 – आइए, पता लगाएँ

प्रश्न 1. निम्नलिखित संख्याओं को मिस्र की संख्या पद्धति में दर्शाइए।

10458, 1023, 2660, 784, 1111, 70707
उत्तर:

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 62 के प्रश्न 1 के उत्तर का चित्र

2. ये संख्यांक किन संख्याओं को दर्शाते हैं?

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 62 के प्रश्न 2 का चित्र

उत्तर:
(i) 100 + 100 + 10 + 10 + 10 + 10 + 10 + 10 + 10 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1 + 1
= 200 + 70 + 6
= 276
(ii) 1000 + 1000 + 1000 + 1000 + 100 + 100 + 100 + 10 + 10 + 1 + 1
= 4000 + 300 + 20 + 2
= 4322

पेज 63 – आइए, पता लगाएँ

1. निम्नलिखित संख्याओं को आधार–5 पद्धति में दिए गए प्रतीकों का प्रयोग करके लिखिए।

15, 50, 137, 293, 651
उत्तर:
आधार–5 पद्धति में केवल पाँच अंक होते हैं:
0, 1, 2, 3, 4

15 :
15 ÷ 5 = 3 शेष 0
3 ÷ 5 = 0 शेष 3
अतः 15₁₀ = 30₅

50 :
50 ÷ 5 = 10 शेष 0
10 ÷ 5 = 2 शेष 0
2 ÷ 5 = 0 शेष 2
अतः 50₁₀ = 200₅

137 :
137 ÷ 5 = 27 शेष 2
27 ÷ 5 = 5 शेष 2
5 ÷ 5 = 1 शेष 0
1 ÷ 5 = 0 शेष 1
अतः 137₁₀ = 1022₅

293 :
293 ÷ 5 = 58 शेष 3
58 ÷ 5 = 11 शेष 3
11 ÷ 5 = 2 शेष 1
2 ÷ 5 = 0 शेष 2
अतः 293₁₀ = 2133₅

651 :
651 ÷ 5 = 130 शेष 1
130 ÷ 5 = 26 शेष 0
26 ÷ 5 = 5 शेष 1
5 ÷ 5 = 1 शेष 0
1 ÷ 5 = 0 शेष 1
अतः 651₁₀ = 10101₅

2. क्या ऐसी कोई संख्या है जिसे हमारी उपर्युक्त वर्णित आधार–5 पद्धति में नहीं दर्शाया जा सकता? क्यों या क्यों नहीं?

उत्तर:
नहीं, ऐसी कोई संख्या नहीं है।
कारण: आधार–5 पद्धति में 0, 1, 2, 3 और 4 अंकों का उपयोग करके किसी भी प्राकृतिक संख्या को व्यक्त किया जा सकता है। जैसे दशमलव पद्धति में 0 से 9 तक के अंकों से सभी संख्याएँ लिखी जाती हैं, उसी प्रकार आधार–5 पद्धति में 0 से 4 तक के अंकों के संयोजन से सभी संख्याएँ दर्शाई जा सकती हैं।
अतः हर संख्या को आधार–5 पद्धति में लिखा जा सकता है।

3. आधार–7 पद्धति की सांकेतिक संख्याओं का अभिकलन कीजिए। सामान्यतः आधार–n पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ क्या हैं?

उत्तर:
आधार–7 पद्धति में प्रयुक्त अंक हैं:
0, 1, 2, 3, 4, 5, 6
अर्थात इसमें कुल 7 अंक होते हैं।
सामान्य रूप से आधार–n पद्धति में प्रयुक्त अंक होते हैं:
0, 1, 2, 3, … , (n – 1)
और इस पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ n की घातों के रूप में होती हैं:
n⁰, n¹, n², n³, ……
अर्थात 1, n, n², n³, ……
यही आधार–n संख्या पद्धति की सांकेतिक संख्याएँ कहलाती हैं।

पेज 65 – आइए, पता लगाएँ

1. निम्नलिखित मिश्र संख्यांकों का योग ज्ञात कीजिए।

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 65 के प्रश्न 1 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 65 के प्रश्न 1 के उत्तर का चित्र

2. निम्नलिखित संख्यांकों का योग हिंदू संख्या पद्धति द्वारा निर्मित आधार–5 पद्धति में ज्ञात कीजिए।

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 65 के प्रश्न 2 का चित्र

स्मरण रखिए इस पद्धति में सांकेतिक संख्या का 5 गुना करने पर अगली सांकेतिक संख्या प्राप्त होती है।
उत्तर:

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 65 के प्रश्न 2 के उत्तर का चित्र

पेज 69 – आइए, पता लगाएँ

1. क्या कोई ऐसी संख्या हो सकती है जिसके मिस्र संख्यांक निरूपण में कोई एक प्रतीक 10 या उससे अधिक बार आता हो? क्यों नहीं?

उत्तर:
नहीं, मिस्र संख्या पद्धति में किसी एक प्रतीक का प्रयोग 10 या उससे अधिक बार नहीं किया जाता।
कारण यह है कि मिस्र संख्या पद्धति में हर 10 समान प्रतीकों को मिलाकर अगले बड़े मान का एक नया प्रतीक प्रयोग किया जाता है।
उदाहरण के लिए:
10 इकाइयाँ (|) मिलकर 1 दस (∩) बनाती हैं।
10 दस (∩) मिलकर 1 सौ का प्रतीक बनाते हैं।
10 सौ मिलकर 1 हजार का प्रतीक बनाते हैं।
इसलिए यदि किसी प्रतीक की संख्या 10 या उससे अधिक हो जाए तो उसे अगले बड़े मान के प्रतीक में बदल दिया जाता है।
इसी कारण किसी एक प्रतीक का प्रयोग 10 या उससे अधिक बार नहीं किया जाता।

2. आधार–4 की अपनी स्वयं की संख्या पद्धति बनाइए और 1 से 16 तक की संख्याओं को इसमें निरूपित कीजिए।

उत्तर:
आधार–4 संख्या पद्धति में चार अंक होते हैं:
0, 1, 2, 3
अब 1 से 16 तक की संख्याओं को आधार–4 में लिखते हैं:
1 = 1
2 = 2
3 = 3
4 = 10
5 = 11
6 = 12
7 = 13
8 = 20
9 = 21
10 = 22
11 = 23
12 = 30
13 = 31
14 = 32
15 = 33
16 = 100
इस प्रकार 1 से 16 तक की संख्याएँ आधार–4 पद्धति में ऊपर दिए अनुसार लिखी जाती हैं।

3. हमारे द्वारा बनाई गई आधार–5 पद्धति में किसी दी गई संख्या को 5 से गुणा करने का एक सरल नियम दीजिए।

उत्तर:
आधार–5 संख्या पद्धति में किसी संख्या को 5 से गुणा करने का एक सरल नियम यह है कि उस संख्या के दाईं ओर एक शून्य (0) जोड़ दिया जाता है।
उदाहरण:
12₅ × 5 = 120₅
23₅ × 5 = 230₅
क्योंकि आधार–5 में 5 से गुणा करने पर संख्या का स्थान एक स्थान बाएँ खिसक जाता है।
अतः निष्कर्ष:
आधार–5 पद्धति में किसी संख्या को 5 से गुणा करने के लिए उस संख्या के अंत में एक 0 जोड़ दिया जाता है।

पेज 73 – आइए, पता लगाएँ

1. नीचे दी गई संख्याओं को मेसोपोटामिया की पद्धति में निरूपित कीजिए।

(i) 63
(ii) 132
(iii) 200
(iv) 60
(v) 3605
उत्तर:

कक्षा 8 एनसीईआरटी गणित प्रकाश का अध्याय 3 पेज 73 के प्रश्न 1 के उत्तर का चित्र

पेज 80 – आइए, पता लगाएँ

1. आपके विचार से चीन के लोग जोंग और हेंग प्रतीकों को एकांतर रूप से क्यों प्रयोग करते थे?

यदि मात्र जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को कैसे प्रदर्शित किया जाता? यदि दो क्रमिक स्थानों के मध्य कोई सार्थक अंतराल न हो तो क्या इस संख्यांक की किसी अन्य प्रकार से व्याख्या की जा सकती थी?
उत्तर:
चीन की प्राचीन संख्या पद्धति में जोंग (ऊर्ध्व रेखा) और हेंग (क्षैतिज रेखा) प्रतीकों का एकांतर प्रयोग इसलिए किया जाता था ताकि अलग-अलग स्थानों के अंकों को स्पष्ट रूप से पहचाना जा सके। इससे यह समझना आसान हो जाता था कि कौन-सा अंक इकाई, दहाई या सैकड़ा के स्थान पर है।
यदि केवल जोंग प्रतीकों का ही प्रयोग किया जाता तो 41 को चार दहाइयों और एक इकाई के रूप में दर्शाना कठिन हो जाता, क्योंकि सभी प्रतीक एक जैसे दिखाई देते। उदाहरण के लिए:
दहाई: ||||
इकाई: |
इस स्थिति में यह स्पष्ट नहीं होता कि यह 41 है या 5।
यदि दो क्रमिक स्थानों के बीच कोई स्पष्ट अंतराल न हो, तो संख्या की सही पहचान करना कठिन हो जाता और उसकी विभिन्न प्रकार से गलत व्याख्या की जा सकती थी। इसलिए अलग-अलग प्रतीकों या उनके एकांतर प्रयोग की आवश्यकता पड़ती थी।

2. उकासर और उरापोन को अंकों के रूप में लेकर एक आधार–2 वाली स्थानीय मान पद्धति बनाइए। इस पद्धति की तुलना गुमुलगल पद्धति से कीजिए।

उत्तर:
गुमुलगल पद्धति में:
उरापोन = 1
उकासर = 2
यदि इन्हें आधार–2 (द्विआधारी) पद्धति में अंक के रूप में लें तो:
उरापोन = 0
उकासर = 1
आधार–2 पद्धति में स्थानमान इस प्रकार होते हैं:
1, 2, 4, 8, 16, …
उदाहरण:
1 = 1
2 = 10
3 = 11
4 = 100
5 = 101
6 = 110
तुलना:
गुमुलगल पद्धति में संख्याएँ 2 को बार-बार जोड़कर बनाई जाती हैं, जबकि आधार–2 पद्धति में केवल दो अंक (0 और 1) होते हैं और यह स्थानमान प्रणाली पर आधारित होती है। इसलिए आधार–2 पद्धति अधिक व्यवस्थित और गणनाओं के लिए अधिक उपयोगी है।

3. बताइए कि किस प्रकार आपके दैनिक जीवन में और किन व्यवसायों में हिंदू संख्यांक और 0 महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं? यदि हमारी संख्या पद्धति और 0 का आविष्कार या कल्पना नहीं हुई होती तो हमारा जीवन कितना भिन्न होता?

उत्तर:
हिंदू संख्यांक और शून्य (0) हमारे दैनिक जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
दैनिक जीवन में उपयोग:
• पैसों की गणना में
• समय और तिथि लिखने में
• दूरी और माप बताने में
• मोबाइल नंबर और पहचान संख्या में
• बैंकिंग और लेन-देन में

व्यवसायों में उपयोग:
• व्यापार और लेखांकन
• बैंकिंग और वित्तीय गणनाएँ
• विज्ञान और इंजीनियरिंग
• कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी
• सांख्यिकी और अनुसंधान
यदि शून्य और आधुनिक संख्या पद्धति का आविष्कार नहीं हुआ होता तो गणना करना बहुत कठिन होता। बड़ी संख्याएँ लिखना और गणितीय क्रियाएँ करना मुश्किल हो जाता, और विज्ञान, तकनीक तथा व्यापार का विकास भी धीमा पड़ जाता।

4. प्राचीन भारतीयों ने हिंदू संख्या पद्धति के लिए संभवतः आधार–10 का उपयोग किया होगा क्योंकि मनुष्य की दस उँगलियाँ होती हैं।

यदि हमारी केवल 8 उँगलियाँ होती तो क्या होता? तब हम संख्याएँ कैसे लिखते? यदि हम आधार–8 का उपयोग करते तब हिंदू संख्यांक कैसे लिखते? आधार–5 का उपयोग करने पर हिंदू संख्यांक कैसे लिखे जाते हैं? आधार–10 वाले हिंदू संख्यांक 25 को क्रमशः आधार–8 और आधार–5 वाले हिंदू संख्यांकों के रूप में लिखने का प्रयास कीजिए। क्या आप इसे आधार–2 में लिख सकते हैं?

उत्तर:
यदि मनुष्य की केवल 8 उँगलियाँ होतीं तो संभवतः हम आधार–8 संख्या पद्धति का उपयोग करते।
आधार–8 में अंक होते हैं:
0, 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7
आधार–5 में अंक होते हैं:
0, 1, 2, 3, 4
अब संख्या 25 को विभिन्न आधारों में लिखते हैं:
दशमलव (आधार–10) = 25
आधार–8 में:
25 ÷ 8 = 3 शेष 1
अतः
25₁₀ = 31₈
आधार–5 में:
25 ÷ 5 = 5 शेष 0
5 ÷ 5 = 1 शेष 0
अतः
25₁₀ = 100₅
आधार–2 में:
25 = 16 + 8 + 1
अतः
25₁₀ = 11001₂