कक्षा 7 नागरिक शास्त्र अध्याय 1 एनसीईआरटी समाधान – समानता

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भारतीय लोकतंत्र में समानता

भारत का संविधान समस्त नागरिकों को समानता के लिए आश्वस्त करता है। इसके बावज़ूद लोगों का रोज़मर्रा का जीवन समानता से कोसों दूर है। असमानताओं को दूर करने के लिए ज़रूरी कानून और नीतियाँ बनाने में सरकार की भूमिका की चर्चा हम यह दिखाने के लिए कर रहे हैं कि मौज़ूदा असमानताओं को मिटाने की प्रतिबद्धता सरकार के काम का एक बड़ा हिस्सा है।

भारतीय लोकतंत्र की विशेषता

भारत एक लोकतंत्रीय देश है। हमने लोकतंत्रीय सरकार के मुख्य तत्त्वों के बारे में पढ़ा था, जैसे-लोगों की भागीदारी, संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान, समानता और न्याय। ‘समानता’, लोकतंत्र की मुख्य विशेषता है और इसकी कार्यप्रणाली के सभी पहलुओं को प्रभावित करती है।

मताधिकार की समानता

भारत जैसे लोकतंत्रीय देश में सभी वयस्कों को मत देने का अधिकार है चाहे उनका धर्म कोई भी हो, शिक्षा का स्तर या जाति कुछ भी हो, वे गरीब हों या अमीर। इसे सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार कहा जाता है और यह सभी लोकतन्त्रों का आवश्यक पहलू है। ‘सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विचार’, समानता के विचार पर आधारित है क्योंकि यह घोषित करता है कि देश का हर वयस्क स्त्री/पुरुष चाहे उसका आर्थिक स्तर या जाति कुछ भी हो वह वोट का हकदार है।

अन्य प्रकार की असमानताएँ

जो भारतीय लोकतंत्र में रहते हैं और जिन्हें मताधिकार प्राप्त है, लेकिन बहुत सारे लोगों के दैनिक जीवन और कार्य करने की स्थितियाँ समानता से बहुत दूर हैं। निर्धन होने के अतिरिक्त भारत में लोगों को अन्य अनेक कारणों से भी असमानता का सामना करना पड़ता है। जैसे: जाति आधारित असमानता, धर्म आधारित असमानता, लिंग आधारित असमानता।

मानवीय गरिमा का मूल्य

भारतीय लोकतंत्र में समानता

प्राय: कुछ लोगों के साथ असमानता का व्यवहार बस इस कारण होता है कि उनका जन्म किस जाति, लिंग या धर्म में हुआ और वे उच्च वर्ग के हैं या मध्यम या निम्न वर्ग के। जब लोगों के साथ असमानता का व्यवहार होता है, तो उनके सम्मान को ठेस पहुँचती है।

भारतीय संविधान सब व्यक्तियों को समान मानता है। इसका अर्थ है कि देश के व्यक्ति चाहे वे पुरुष हों या स्त्री, किसी भी जाति, धर्म, शैक्षिक और आर्थिक पृष्ठभूमि से संबंध रखते हों, वे सब समान माने जाएँगे। लेकिन इसके बाद भी हम यह नहीं कह सकते कि असमानता खत्म हो गई है। यह खत्म नहीं हुई है, लेकिन फिर भी कम-से-कम भारतीय संविधान में सब व्यक्तियों की समानता के सिद्धांत को मान्य किया गया है। जहाँ पहले भेदभाव और दुर्व्यवहार से लोगों की रक्षा करने के लिए कोई कानून नहीं था, अब अनेक कानून लोगों के सम्मान तथा उनके साथ समानता के व्यवहार को सुनिश्चित करने के लिए मौज़ूद हैं।

समानता को स्थापित करने के लिए भारत के संविधान में क्या प्रावधान हैं?

समानता को स्थापित करने के लिए संविधान में जो प्रावधान हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:
1. काननू की दृष्टि में हर व्यक्ति समान है। इसका तात्पर्य यह है कि हर व्यक्ति को देश के राष्ट्रपति से लेकर कांता जैसी घरेलू काम की नौकरी करने वाली महिला तक, सभी को एक ही जैसे कानून का पालन करना है।
2. किसी भी व्यक्ति के साथ उसके धर्म, जाति, वंश, जन्मस्थान और उसके स्त्री या पुरुष होने के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता।
3. हर व्यक्ति सावर्ज निक स्थानों पर जा सकता है, जिनमें खेल के मैदान, होटल, दुकानें और बाज़ार आदि सम्मिलित हैं। सब लोग सावर्जनिक कुओं, सड़कों आरै नहाने के घाटों का उपयागे कर सकते हैं।
4. अस्पृश्यता का उन्मूलन कर दिया गया है।

शासन संविधान द्वारा प्रदत समानता के अधिकारों को कैसे लागू करता है?

शासन ने संविधान द्वारा मान्य किए गए समानता के अधिकार को दो तरह से लागू किया है:
1. कानून के द्वारा
2. सरकार की योजनाओं व कार्यक्रमों द्वारा सुविधाहीन समाजों की मदद करके।
भारत में ऐसे अनेक कानून हैं, जो व्यक्ति के समान व्यवहार प्राप्त करने के अधिकार की रक्षा करते हैं। कानून के साथ-साथ सरकार ने उन समुदायों जिनके साथ सैकड़ों वर्षों तक असमानता का व्यवहार हुआ है, उनका जीवन सुधारने के लिए अनेक कार्यक्रम और योजनाएँ लागू की हैं। ये योजनाएँ यह सुनिश्चित करने के लिए चलाई गई हैं कि जिन लोगों को अतीत में अवसर नहीं मिले, अब उन्हें अधिक अवसर प्राप्त हों।

मध्याह्न भोजन कार्यक्रम क्या है? इस कार्यक्रम के क्या लाभ हैं?

इस कार्यक्रम के अंतर्गत सभी सरकारी प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को दोपहर का भोजन स्कूल द्वारा दिया जाता है। इस कार्यक्रम के बहुत से सकारात्मक प्रभाव हुए हैं। उदाहरण के लिए, दोपहर का भोजन मिलने के कारण गरीब बच्चों ने अधिक संख्या में स्कूल में प्रवेश लेना और नियमित रूप से स्कूल जाना शुरू कर दिया। शिक्षक बताते हैं कि पहले बच्चे खाना खाने घर जाते थे और फिर वापस स्कूल लौटते ही नहीं थे। परंतु अब, जब से स्कूल में मध्याह्न भोजन मिलने लगा है, उनकी उपस्थिति में सुधार आया है। वे माताएँ जिन्हें पहले अपना काम छोड़कर दोपहर को बच्चों को खाना खिलाने घर आना पड़ता था, अब उन्हें ऐसा नहीं करना पड़ता है। इस कार्यक्रम से जातिगत पूर्वाग्रहों को कम करने में भी सहायता मिली है, क्योंकि स्कूल में सभी जातियों के बच्चे साथ-साथ भोजन करते हैं और कुछ स्थानों पर तो भोजन पकाने के लिए दलित महिलाओं को काम पर रखा गया है। मध्याह्न भोजन कार्यक्रम ने निर्धन विद्यार्थियों की भूख मिटाने में भी सहायता की है, जो प्राय: खाली पेट स्कूल आते हैं और इस कारण पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित नहीं कर पाते हैं।

कक्षा 7 नागरिक शास्त्र अध्याय 1 एनसीईआरटी समाधान
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