एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २

एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा २ – समाधान, प्रश्न उत्तर, शब्द अर्थ, सारांश, पाठ का संस्कृत से हिंदी अनुवाद तथा अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए यहाँ दिए गए हैं। “वर्णोच्चारण-शिक्षा २” शारदा संस्कृत पाठ्यपुस्तक की कक्षा नवम् का एकादशः पाठः अस्ति। अयं पाठः पूर्वकक्षायां पठितस्य “मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया” इत्यस्य विषयस्य अग्रिमः भागः अस्ति। इस पाठ में वर्णों के उच्चारण से सम्बन्धित तीन आवश्यक तत्त्वों – स्थानम्, करणम् तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नः – में से “आभ्यन्तर-प्रयत्नः” का विस्तृत वर्णन किया गया है। इस पाठ में यह बताया गया है कि जब मुख के अन्दर करण (जीभ आदि) स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका) को स्पर्श करता है या उसके समीप जाता है, तो इस प्रक्रिया को “प्रयत्न” कहा जाता है। यह प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है – स्पृष्ट-प्रयत्न, ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्न, ईषद्-विवृत-प्रयत्न, विवृत-प्रयत्न तथा संवृत-प्रयत्न। इस पाठ के माध्यम से विद्यार्थी संस्कृत भाषा के शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण की वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझ सकते हैं, जो पाणिनीय शिक्षा-सूत्रों पर आधारित है।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 11 के त्वरित लिंक:

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एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के समाधान (2026-27 के अनुसार)

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर

अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

१. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत –

(क) वर्णानाम् उत्पत्यर्थं कति आवश्यकानि तत्त्वानि भवन्ति?
(ख) कति स्थानानि सन्ति?
(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः कतिविधः?
(घ) करणं यदा स्थानं स्पष्टरूपेण स्पृशति, तदा करणस्य कः प्रयत्नः भवति?
(ङ) अ-वर्णस्य कति उपभेदाः सन्ति?
(च) संवृत-प्रयत्नः कुत्र भवति?
उत्तर:
(क) त्रीणि
(ख) षट्
(ग) पञ्चविधः
(घ) स्पृष्ट-प्रयत्नः
(ङ) त्रयः
(च) कण्ठे

२. अधोलिखितप्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत –

(क) आभ्यन्तर-प्रयत्नः कः उच्यते?
(ख) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः कदा भवति?
(ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन के स्वराः उच्चार्यन्ते?
(घ) आभ्यन्तर-प्रयत्नाः कुत्र दृश्यन्ते?
(ङ) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्टः स्वरः कः अस्ति?
उत्तर:
(क) आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते।
(ख) करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति।
(ग) करणस्य विवृत-प्रयत्नेन अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे स्वराः उच्चार्यन्ते।
(घ) कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु स्थान-करणयोः मध्ये आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।
(ङ) आभ्यन्तर-प्रयत्ने स्वरेषु विशिष्टः स्वरः अ-कारः (ह्रस्वः) अस्ति, यस्य उच्चारणे संवृत-प्रयत्नः भवति।

३. अधोलिखितानां वर्णानां क-स्तम्भेन सह मेलनं कुरुत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 3 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 3 के उत्तर का चित्र

४. अधोलिखितानां वाक्यानाम् उत्तराणि आम्/न इति सन्दर्भानुसारं लिखत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 4 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 4 के उत्तर का चित्र

५. रेखाङ्कितपदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 5 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 5 के उत्तर का चित्र

६. वर्णसमुच्चयं पाठात् चित्वा लिखत –

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 6 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 के प्रश्न 6 के उत्तर का चित्र

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 11 प्रमुख अवधारणाएँ

प्रमुख अवधारणाएँ (पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः)

पाठ की पाँच मूल अवधारणाओं (पञ्च आभ्यन्तर-प्रयत्नाः) का संक्षिप्त परिचय:

स्पृष्ट-प्रयत्नःकरण द्वारा स्थान का पूर्ण स्पर्श; परिणाम – स्पर्श-व्यंजन (क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग)।
ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नःकरण द्वारा स्थान का अल्प स्पर्श; परिणाम – अन्तःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व)।
ईषद्-विवृत-प्रयत्नःकरण-स्थान के बीच लघु विवर (छोटा अन्तराल); परिणाम – ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) तथा अयोगवाह (अं, अः)।
विवृत-प्रयत्नःकरण-स्थान के बीच स्पष्ट/स्फुट विवर; परिणाम – समस्त स्वर (अ-कार को छोड़कर)।
संवृत-प्रयत्नःकेवल कण्ठ-स्थान में, केवल ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में करण-स्थान के बीच संकोच।

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 11 का चरण-दर-चरण संक्षिप्त सारांश

पाठ का हिन्दी सारांश

पिछली कक्षा में हमने मनुष्यों में वाणी की उत्पत्ति की प्रक्रिया को सामान्य रूप में देखा था। वहाँ यह भी जाना था कि मुख के अन्दर वर्णों की उत्पत्ति के लिए तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं – स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न। स्थान और करण के छह-छह भेदों (षट् स्थानानि तथा षट् करणानि) के विषय में हम पिछली कक्षा में विस्तार से पढ़ चुके हैं। इस पाठ में तीसरे तत्त्व “आभ्यन्तर-प्रयत्नः” का विस्तृत अध्ययन किया गया है।
आभ्यन्तर-प्रयत्न वह बल या प्रयास है, जिसके द्वारा मुख के अन्दर करण, स्थान को स्पर्श करता है अथवा उसके समीप पहुँचता है। यह प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है:

  1. स्पृष्ट-प्रयत्न – जब करण स्थान को पूर्ण रूप से स्पष्ट स्पर्श करता है, तब स्पर्श-व्यंजन (क वर्ग से लेकर प वर्ग तक) उत्पन्न होते हैं।
  2. ईषत्स्पृष्ट-प्रयत्न – जब करण स्थान को केवल थोड़ा-सा स्पर्श करता है, तब अन्तःस्थ व्यंजन (य, र, ल, व) उत्पन्न होते हैं।
  3. ईषद्-विवृत-प्रयत्न – जब करण स्थान को स्पर्श नहीं करता, परन्तु उसके बहुत समीप पहुँचता है और दोनों के बीच थोड़ा-सा अन्तराल रहता है, तब ऊष्म-व्यंजन (श, ष, स, ह) तथा अयोगवाह (अनुस्वार व विसर्ग) उत्पन्न होते हैं।
  4. विवृत-प्रयत्न – जब करण स्थान को स्पर्श नहीं करता, बल्कि उसके कुछ समीप जाता है और दोनों के बीच स्पष्ट अन्तराल रहता है, तब स्वर वर्ण (अ को छोड़कर) उच्चारित होते हैं।
  5. संवृत-प्रयत्न – यह विशेष रूप से केवल ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में होता है। इस समय कण्ठ में स्थान और करण के बीच संकोच (सिकुड़न) उत्पन्न होता है, जिसे संवृतत्व कहते हैं। यह एकमात्र प्रयत्न केवल कण्ठ-स्थान में तथा केवल अ-कार के लिए ही होता है।

पाठ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि दीर्घ आ-कार तथा प्लुत अ३-कार के उच्चारण में विवृत-प्रयत्न ही होता है, संवृत-प्रयत्न नहीं। इसके अतिरिक्त वर्णमाला को स्वर तथा व्यंजन में विभाजित करके, स्वरों को समानाक्षर व सन्ध्यक्षर में तथा व्यंजनों को स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म व अयोगवाह में वर्गीकृत करके प्रत्येक वर्ग के स्थान, करण व प्रयत्न को सारणी एवं चित्रों के माध्यम से समझाया गया है। पाठ के अन्त में पाणिनीय शिक्षा के मूल सूत्रों को उद्धृत करते हुए आभ्यन्तर-प्रयत्न की सम्पूर्ण प्रक्रिया को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है।

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 – कठिन शब्दों के अर्थ

कठिन शब्दार्थ (संस्कृत तथा हिन्दी में अर्थ)

संस्कृत शब्दसंस्कृत अर्थहिंदी अर्थ
अभ्यन्तरेअन्तःअंदर
ईषत्अल्पम्थोड़ा
विवृतःउद्घाटितःखुला हुआ
विवरःछिद्रःअन्तराल
संवृतःअविस्तृतःसिकुड़ा हुआ
मूर्धातालोः ऊर्ध्वभागःतालु का ऊपरी भाग
सन्ध्यक्षरम्द्विस्थानीयः स्वरःदो-स्थान वाला स्वर

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 में व्याकरण

व्याकरण खण्ड

यह पाठ “शिक्षा” (ध्वनि-विज्ञान/उच्चारण-व्याकरण) पर आधारित है, अतः इसका सम्पूर्ण व्याकरण-सार निम्नवत् है:

1. वर्णोच्चारण के तीन आवश्यक तत्त्व

  • स्थानम् – जहाँ वर्ण का उच्चारण होता है (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका – षट् स्थानानि)
  • करणम् – जिस अंग से उच्चारण किया जाता है (जिह्वा-मध्य, जिह्वा-उपाग्र, जिह्वा-अग्र, स्वस्थान आदि – षट् करणानि)
  • आभ्यन्तर-प्रयत्नः – करण द्वारा स्थान की ओर किया गया प्रयास (पञ्चविधः)

2. वर्णों के दो मुख्य भेद

आधारस्वरःव्यञ्जनम्
स्वतंत्रतास्वतन्त्र वर्णपरतन्त्र वर्ण (आधार-स्वर आवश्यक)
मात्राएकमात्र/द्विमात्र/त्रिमात्रअर्धमात्र सदैव
प्रयत्नविवृत-प्रयत्न (अ-कार में संवृत-प्रयत्न)स्पृष्ट/ईषत्स्पृष्ट/ईषद्-विवृत

3. स्वरों के दो भेद

समानाक्षर स्वर:एक-स्थानी (अ, इ, उ, ऋ, ऌ – इनके ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत तीन उपभेद; केवल ऌ का दीर्घ नहीं होता)
सन्ध्यक्षर स्वर:द्वि-स्थानी (ए, ऐ, ओ, औ – इनमें केवल दीर्घ व प्लुत दो उपभेद; ह्रस्व नहीं होता)

4. व्यंजनों के चार भेद

व्यंजन-भेदप्रयत्नउदाहरण
स्पर्श-व्यंजनस्पृष्ट-प्रयत्नःक ख ग घ ङ, च छ ज झ ञ, ट ठ ड ढ ण, त थ द ध न, प फ ब भ म
अन्तःस्थ-व्यंजनईषत्स्पृष्ट-प्रयत्नःय र ल व
ऊष्म-व्यंजनईषद्-विवृत-प्रयत्नःश ष स ह
अयोगवाह-व्यंजनईषद्-विवृत-प्रयत्नःअं (अनुस्वार), अः (विसर्ग)

5. षट्स्थान-करण-प्रयत्न

वर्गकरणउदाहरण वर्ण
कण्ठ्यस्वस्थानम् (कण्ठ)अ, आ, क वर्ग, ह, विसर्ग
तालव्यजिह्वा-मध्यःइ, ई, च वर्ग, य, श
मूर्धन्यजिह्वा-उपाग्रःऋ, ट वर्ग, र, ष
दन्त्यजिह्वा-अग्रःऌ, त वर्ग, ल, स
ओष्ठ्यस्वस्थानम् (ओष्ठ)उ, ऊ, प वर्ग, व
नासिक्यस्वस्थानम् (नासिका)ङ, ञ, ण, न, म, अनुस्वार

6. पाणिनीय शिक्षा-सूत्र (मूल सूत्र एवं सरल अर्थ)

सूत्रसरल अर्थ
प्रयत्नोऽपि द्विविधःप्रयत्न दो प्रकार का होता है
आभ्यन्तरो बाह्यश्चआभ्यन्तर-प्रयत्न तथा बाह्य-प्रयत्न
स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्करण का अपने स्थान के प्रति जो प्रयत्न, वही आभ्यन्तर-प्रयत्न है
स्पृष्टकरणाः स्पर्शाःस्पर्श वर्णों में करण, स्थान को पूर्ण रूप से स्पर्श करता है
ईषत्स्पृष्टकरणा अन्तःस्थाःअन्तःस्थ वर्णों में करण, स्थान को थोड़ा स्पर्श करता है
ईषद्विवृतकरणा ऊष्माणःऊष्म वर्णों में करण, स्थान के समीप जाता है
विवृतकरणाः स्वराःस्वर वर्णों में करण, स्थान से कुछ दूर तक जाता है
संवृतस्त्वकारःअ-कार के उच्चारण में करण संकुचित होता है
इत्येषोऽन्तःप्रयत्नःयही आभ्यन्तर-प्रयत्न कहलाता है

कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 11 हिंदी अनुवाद

शारदा अध्याय 11 संस्कृत से हिंदी में अनुवाद

पूर्वस्यां कक्षायां ‘मनुष्येषु वाग्-उत्पत्ति-प्रक्रिया’ कथं भवतीति वयं सामान्यतः दृष्टवन्तः। तत्रैव ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति – (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ च इत्यपि वयम् अवलोकितवन्तः। तत्र (क) षट् स्थानानि; (ख) षट् करणानि इति उभयोः विषये वयं पूर्वस्यां कक्षायाम् एव विस्तरेण ज्ञातवन्तः, यथा –
हिंदी अनुवादपिछली कक्षा में ‘मनुष्यों में वाक्-उत्पत्ति-प्रक्रिया’ किस प्रकार होती है – यह हमने सामान्यतः देखा था। वहीं ‘मुख के भीतर वर्णों की उत्पत्ति के लिए तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं – (क) स्थान, (ख) करण, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्न’ – यह भी हमने देखा था। वहाँ (क) छः स्थान और (ख) छः करण – इन दोनों के विषय में हमने पिछली कक्षा में ही विस्तार से जाना था। इसके विषय में विस्तार से समझते हैं।


अस्मिन् पाठे – (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः – इत्यस्य विषये विस्तरेण अवगच्छामः।
(ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः
आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः — ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते। आभ्यन्तरप्रयत्नः पञ्चविधः भवति —
हिंदी अनुवादइस पाठ में – (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्न —
मुख के भीतर करण जिस प्रयत्न से स्थान को स्पर्श करता है, अथवा स्थान के समीप जाता है, वह प्रयत्न — ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ कहलाता है। आभ्यन्तर-प्रयत्न पाँच प्रकार का होता है –


(१) स्पृष्ट-प्रयत्नः
करणं यदा स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृशति’, तदा करणस्य ‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य स्पृष्ट-प्रयत्नेन
स्थाने स्पर्श-व्यञ्जनानि उत्पद्यन्ते।
उदाहरणार्थम् — मूर्धन्य-वर्णान् पश्यामः — उदाहरणम् — मूर्धन्याः वर्णाः।
हिंदी अनुवादकरण जब स्थान को ‘स्पष्ट रूप से स्पर्श करता है’, तब करण का ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। करण के स्पृष्ट-प्रयत्न से उस स्थान पर स्पर्श-व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं। उदाहरण के लिए यहाँ मूर्धन्य-वर्णों को देखते हैं — उदाहरण — मूर्धन्य वर्ण।


(२) ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः
करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि जायन्ते।
उदाहरणम् — मूर्धन्याः वर्णाः।
हिंदी अनुवादकरण जब स्थान को ‘थोड़ा ही स्पर्श करता है’, तब करण का ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। करण के ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न से उस स्थान पर अन्तःस्थ-व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण — मूर्धन्य वर्ण।


(३) ईषद्-विवृत-प्रयत्नः
करणं यदा स्थानं न स्पृशति, परन्तु स्थानस्य बहु समीपं याति, तदा उभयोः स्थान-करणयोः मध्ये ‘लघुः विवरः’ इव स्वल्पः अन्तरालः जायते, तदा करणस्य ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्नः’ भवति। तदा करणस्य ईषद्-विवृत-प्रयत्नेन
स्थाने ऊष्म-व्यञ्जनानि जायन्ते, तथा च
स्थाने अयोगवाहौ — अनुस्वार-विसर्गौ अपि जायेते।
उदाहरणम् — मूर्धन्याः वर्णाः।
हिंदी अनुवादकरण जब स्थान को स्पर्श नहीं करता, परन्तु स्थान के बहुत समीप जाता है, तब उन दोनों स्थान-करणों के मध्य ‘लघु विवर’ के समान थोड़ा अन्तराल उत्पन्न होता है, तब करण का ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्न’ होता है। करण के ईषद्-विवृत-प्रयत्न से उस स्थान पर ऊष्म-व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं,
तथा उस स्थान पर अयोगवाह — अनुस्वार और विसर्ग भी उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण — मूर्धन्य वर्ण।


(४) विवृत-प्रयत्नः
करणं यदा स्थानं न स्पृशति, अपितु स्थानस्य किञ्चित् समीपं याति, तदा उभयोः स्थान-करणयोः मध्ये ‘स्फुटः विवरः’ इव अन्तरालः जायते, तदा करणस्य ‘विवृत-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य विवृत-प्रयत्नेन
स्थाने (अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे) स्वराः उच्चार्यन्ते। कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु — स्थान-करणयोः मध्ये उपर्युक्ताः चतुर्विधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।
उदाहरणम् — मूर्धन्याः वर्णाः।
हिंदी अनुवादकरण जब स्थान को स्पर्श नहीं करता, परन्तु स्थान के कुछ समीप जाता है, तब उन दोनों स्थान-करणों के मध्य ‘स्पष्ट विवर’ के समान अन्तराल उत्पन्न होता है, तब करण का ‘विवृत-प्रयत्न’ होता है। करण के विवृत-प्रयत्न से उस स्थान पर (अ-कार को छोड़कर अन्य सभी) स्वर उच्चारित होते हैं। कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्य इन पाँच प्रकार के वर्णों में — स्थान-करण के मध्य उपर्युक्त चार प्रकार के आभ्यन्तर-प्रयत्न दिखाई देते हैं।
उदाहरण — मूर्धन्य वर्ण।


(५) संवृत-प्रयत्नः
स्वरेषु ‘अ-कारः’ कश्चिद् विशिष्टः स्वरः अस्ति।
‘अ-वर्णस्य’ त्रयः उपभेदाः वयं पूर्वं दृष्टवन्तः
अ-कारः (ह्रस्वः), आ-कारः (दीर्घः), अ३-कारः (प्लुतः) इति।
एते त्रयः अपि ‘स्वराः’, ‘कण्ठ्य-वर्णाः’ च सन्ति। कण्ठ्य-वर्णेषु ‘स्वस्थानम् एव करणं भवति’ इति वयं पूर्वं दृष्टवन्तः। अर्थात्,
कण्ठ्य-वर्णानां ⇒ स्थानम् अपि कण्ठः (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः)
⇒ करणम् अपि कण्ठः (कण्ठस्य अग्र-भागः)।
एतेषु त्रिप्रकारेषु अ-वर्णेषु (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुतेषु) —
केवलम् आ-कारस्य (दीर्घस्य), अ३-कारस्य (प्लुतस्य) च, द्वयोः एव उच्चारणे — कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘स्फुटः विवरः’ इव अन्तरालः भवति। अतः, अन्य-स्वराणाम् इव एतयोः द्वयोः दीर्घ-प्लुतयोः अपि पूर्ववत् ‘विवृत-प्रयत्नः’ एव भवति।
परन्तु, अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणे तु तथा न भवति। अत्र तु कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘संकोचः’ भवति। अर्थात्, अत्र ‘कण्ठः संकुचितः संकीर्णः वा भवति’। कण्ठस्य अयं ‘संकोचः’, ‘संकीर्णता’ वा ‘संवृतम्’ इति कथ्यते।
अतः, विशेषरूपेण अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) उच्चारणे ‘संवृत-प्रयत्नः’ भवति। कण्ठे करणस्य संवृत-प्रयत्नेन
⇒ स्थाने अ-कारः उच्चार्यते।
हिंदी अनुवादस्वरों में ‘अ-कार’ कोई विशिष्ट स्वर है। ‘अ-वर्ण’ के तीन उपभेद हमने पहले देखे थे — अ-कार (ह्रस्व), आ-कार (दीर्घ), अ३-कार (प्लुत) इति। ये तीनों भी ‘स्वर’ और ‘कण्ठ्य-वर्ण’ हैं। कण्ठ्य-वर्णों में ‘स्वस्थान ही करण होता है’ — यह हमने पहले देखा था। अर्थात्, कण्ठ्य-वर्णों का स्थान भी कण्ठ (कण्ठ का पिछला भाग) और करण भी कण्ठ (कण्ठ का अग्र-भाग) होता है। इन तीन प्रकार के अ-वर्णों (ह्रस्व-दीर्घ-प्लुत) में — केवल आ-कार (दीर्घ) और अ३-कार (प्लुत) — इन दोनों के ही उच्चारण में — कण्ठ में स्थान-करण के मध्य ‘स्पष्ट विवर’ के समान अन्तराल होता है। अतः, अन्य स्वरों की तरह इन दोनों दीर्घ-प्लुत के भी पूर्ववत् ‘विवृत-प्रयत्न’ ही होता है। परन्तु, अ-कार (ह्रस्व) के उच्चारण में तो ऐसा नहीं होता। यहाँ तो कण्ठ में स्थान-करण के मध्य ‘संकोच’ होता है। अर्थात्, यहाँ ‘कण्ठ संकुचित अथवा संकीर्ण होता है’। कण्ठ का यह ‘संकोच’, ‘संकीर्णता’ अथवा ‘संवृतम्’ कहलाता है। अतः, विशेष रूप से अ-कार (ह्रस्व) के उच्चारण में ‘संवृत-प्रयत्न’ होता है। कण्ठ में करण के संवृत-प्रयत्न से उस स्थान पर अ-कार उच्चारित होता है।


केवलं कण्ठ-स्थाने एव संवृत-प्रयत्नः भवति, तदपि केवलम् अ-कारस्य उच्चारणार्थम् एव।
हिंदी अनुवादकेवल कण्ठ-स्थान पर ही संवृत-प्रयत्न होता है, और वह भी केवल अ-कार के उच्चारण के लिए ही।


आस्ये विद्यमानानाम् एतेषां स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्-ज्ञानेन, तथा पुनःपुनः अभ्यासेन च वयं प्रत्येक-वर्णस्य एवञ्च सर्वेषां शब्दानां सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः।
एवमेव ‘वर्णमालायां स्वर-व्यञ्जनयोः मध्ये का भिन्नता?’ इत्यपि यथावत् अवबोधामः। पुनश्च, व्यञ्जनानां मध्ये अपि — स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ चेति ये भेदाः सन्ति; तेषाम् अपि परस्पर-भिन्नतां यथोचितम् अवगच्छामः।
हिंदी अनुवादमुख में विद्यमान इन स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नों के सम्यक् ज्ञान से, तथा बार-बार अभ्यास से हम प्रत्येक वर्ण एवं सभी शब्दों का सुस्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करने में समर्थ होते हैं। इसी प्रकार ‘वर्णमाला में स्वर और व्यञ्जन के मध्य क्या भिन्नता है?’ — यह भी यथावत् समझते हैं। पुनश्च, व्यञ्जनों के मध्य भी — स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्मण और अयोगवाह — जो भेद हैं; उनकी भी परस्पर भिन्नता को यथोचित रूप से समझते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कक्षा 9 संस्कृत पाठ 11 वर्णोच्चारण-शिक्षा 2 किस विषय पर आधारित है और यह कठिन है क्या?

यह पाठ संस्कृत ध्वनि-विज्ञान पर आधारित है, जिसमें वर्णों के उच्चारण में लगने वाले “आभ्यन्तर-प्रयत्न” का विस्तृत वर्णन है। कहानी न होने के कारण यह पाठ अन्य गद्य पाठों की तुलना में अधिक तकनीकी लगता है, परन्तु यदि पाँच प्रयत्नों (स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषद्-विवृत, विवृत, संवृत) को चित्रों तथा सारणी के साथ समझा जाए, तो यह पाठ सरल हो जाता है। नियमित अभ्यास और दोहराव से यह पाठ अच्छी तरह याद रह जाता है।

इस पाठ को जल्दी तैयार करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

सबसे पहले पाँच आभ्यन्तर-प्रयत्नों के नाम और उनके परिणामस्वरूप बनने वाले वर्णों (स्पर्श, अन्तःस्थ, ऊष्म, स्वर) को क्रम से याद करें। इसके बाद संवृत-प्रयत्न की विशेषता (केवल कण्ठ में, केवल अ-कार के लिए) को अच्छी तरह समझें, क्योंकि यह परीक्षा में सबसे अधिक पूछा जाता है। अन्त में सारणी के माध्यम से स्वर-व्यंजन के भेद तथा पाणिनीय सूत्रों को एक बार दोहरा लेने से पाठ शीघ्र तैयार हो जाता है।

इस पाठ में दी गई सारणी और चित्र परीक्षा में कितने उपयोगी हैं?

इस पाठ की सारणी तथा चित्र अत्यन्त उपयोगी हैं, क्योंकि परीक्षा में प्रायः “किस वर्ण का कौन-सा प्रयत्न है” या “किस प्रयत्न से कौन-से वर्ण बनते हैं” जैसे मिलान (matching) एवं वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाते हैं। सारणी के माध्यम से समस्त वर्णों को एक साथ स्मरण रखना आसान हो जाता है, तथा चित्र (मुख के आन्तरिक भाग को दर्शाने वाले) यह स्पष्ट करते हैं कि करण और स्थान के बीच वास्तव में क्या होता है, जिससे अवधारणा दीर्घकाल तक याद रहती है।

संवृत-प्रयत्न तथा विवृत-प्रयत्न में क्या अन्तर है?

विवृत-प्रयत्न में करण, स्थान को स्पर्श नहीं करता परन्तु उसके कुछ समीप जाता है, जिससे स्थान-करण के बीच एक स्पष्ट (स्फुट) अन्तराल बनता है; यह प्रयत्न अ-कार को छोड़कर सभी स्वरों (आ, इ, ई, उ आदि) के उच्चारण में होता है। इसके विपरीत, संवृत-प्रयत्न केवल कण्ठ-स्थान में और केवल ह्रस्व अ-कार के उच्चारण में होता है, जिसमें कण्ठ संकुचित अथवा सिकुड़ा हुआ रहता है। ध्यान रहे कि दीर्घ आ-कार तथा प्लुत अ३-कार में विवृत-प्रयत्न ही होता है, संवृत-प्रयत्न नहीं।

क्या इस पाठ के शुद्ध उच्चारण-ज्ञान का व्यावहारिक लाभ भी है?

हाँ, इस पाठ का व्यावहारिक महत्व केवल परीक्षा तक सीमित नहीं है। स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न का सम्यक् ज्ञान होने से विद्यार्थी संस्कृत के प्रत्येक वर्ण का शुद्ध एवं स्पष्ट उच्चारण करना सीखते हैं, जिससे मन्त्रोच्चारण, श्लोक-पाठ तथा संस्कृत-भाषण में शुद्धता आती है। यह ज्ञान आगे चलकर सन्धि, समास तथा व्याकरण के अन्य नियमों को समझने में भी सहायक सिद्ध होता है, क्योंकि अनेक सन्धि-नियम इन्हीं उच्चारण-स्थानों पर आधारित हैं।