एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 णमो अरिहन्ताणम्
एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 णमो अरिहन्ताणम् – समाधान, प्रश्न उत्तर, शब्द अर्थ, सारांश, पाठ का हिंदी अनुवाद तथा अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए यहाँ दिए गए हैं। “णमो अरिहन्ताणम्” शारदा संस्कृत पाठ्यपुस्तक की कक्षा नवम् का दशमः पाठः अस्ति। अयं पाठः जैनधर्मस्य प्रथमतीर्थङ्करस्य ऋषभदेवस्य (आदिनाथस्य) जीवनचरितम् आधारित अस्ति। अस्मिन् पाठे महाराजनाभेः पुत्रस्य ऋषभस्य राजा भूत्वा प्रजासमस्यानां समाधानं, कृषिकार्यं, जीवनकौशलानां शिक्षणं, राज्यत्यागं, कठोरतपः, केवलज्ञानप्राप्तिः तथा जैनसङ्घस्य स्थापना च वर्णिता अस्ति। एतेन पाठेन विद्यार्थिनः जैनधर्मस्य मूलसिद्धान्तान् – अहिंसा, अनेकान्तवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह, पञ्चमहाव्रतानि च – ज्ञातुं शक्नुवन्ति। साथ ही प्राकृतभाषायाः परिचयः, नवकारमन्त्रः तथा जैनधर्मस्य चतुर्विंशति-तीर्थङ्कराणां सूची अपि पाठे प्रदत्ता अस्ति। यह पाठ छात्रों को कर्तव्यनिष्ठा, त्याग एवं करुणा जैसे मूल्यों की शिक्षा देता है।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 10 के त्वरित लिंक:
- कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 10 प्रश्न-उत्तर
- शारदा पाठ 10 पात्र परिचय
- संस्कृत शारदा पाठ 10 का सारांश
- संस्कृत शारदा अध्याय 10 शब्द-अर्थ
- संस्कृत शारदा पाठ 10 में व्याकरण
- शारदा पाठ 10 के हिंदी अनुवाद
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एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 के समाधान (2026-27 के अनुसार)
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
१. एकपदेन उत्तरं लिखत –
(क) ऋषभेण निर्मितस्य नगरस्य नाम किम्?
(ख) ऋषभस्य प्रसिद्धे द्वे कन्ये के?
(ग) कस्यां लिप्यां नैकानि शास्त्राणि लिपिबद्धानि?
(घ) विनिता नामकं राज्यं ऋषभः कस्मै समर्पितवान्?
(ङ) ऋषभः बाहुबलिने किं राज्यं प्रदत्तवान्?
(च) प्रजाः भिक्षायां कानि वस्तूनि यच्छन्ति स्म?
उत्तर:
(क) विनिता
(ख) ब्राह्मी च सुन्दरी
(ग) ब्राह्मीलिप्याम्
(घ) भरताय
(ङ) तक्षशिलाम्
(च) आभरणानि अनर्घवस्तूनि च
२. पूर्णवाक्येन प्रश्नानाम् उत्तराणि लिखत –
(क) देशे काः समस्याः सन्ति इति ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता?
(ख) महाराजः केषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्?
(ग) ऋषभदेवस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना का आसीत्?
(घ) ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकस्य उपवासस्य समाप्तिः कथम् अभवत्?
(ङ) ऋषभदेवः कदा कुत्र च केवलज्ञानं प्राप्तवान्?
(च) जनानां मार्गदर्शनार्थं कं क्रमं रचितवान्?
उत्तर:
(क) ऋषभदेवस्य कल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यम्, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः — एताः मूलसमस्याः सन्ति।
(ख) महाराजः कृषिकार्यम्, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणम्, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणम्, पशूनां पालनम्, काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणम्, पात्रनिर्माणम्, गृहनिर्माणम्, नगरनिर्माणम् इत्यादिषु कार्येषु प्रजाः प्रशिक्षितवान्।
(ग) एकदा ऋषभदेवः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनम् आयोजितवान्। तत्र आगता काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः विक्षुब्धम् अभवत् और सः सर्वं परित्यज्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितवान्।
(घ) ऋषभदेवः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म। तस्य प्रपौत्रः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः।
(ङ) ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्।
(च) ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः, भिक्षुणी, श्रावकः, श्राविका इति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः जैनसङ्घः इति प्रसिद्धः वर्तते।
३. समस्तपदानि लिखत –

उत्तर:

४. वाक्यानि उदाहरणानुसारं परिवर्तयत –

उत्तर:

५. सन्धिं कुरुत –

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 10 पात्र परिचय
पात्र-परिचय
| नाभि महाराज | युगों के आरम्भ में प्रजा के प्रिय राजा, राजनीति एवं युद्धतन्त्र में निपुण, ऋषभ के पिता। |
| मरुदेवी | नाभि की पत्नी, बुद्धिमती तथा करुणाशालिनी माता। |
| ऋषभदेव (आदिनाथ) | नाभि-मरुदेवी के पुत्र, सर्वगुणसम्पन्न राजकुमार, बाद में राजा, फिर तपस्वी और जैनधर्म के प्रथम तीर्थङ्कर। कृषि, वस्त्र-निर्माण, पात्र-निर्माण जैसे जीवन-कौशलों के प्रवर्तक। |
| भरत | ऋषभदेव के सौ पुत्रों में सर्वाधिक विख्यात पुत्र, जिन्हें विनीता राज्य प्राप्त हुआ। |
| बाहुबलि | ऋषभदेव के पुत्र, अत्यन्त शौर्यवान्, जिन्हें तक्षशिला राज्य प्राप्त हुआ। |
| ब्राह्मी | ऋषभदेव की पुत्री, गणितादि शास्त्रों में प्रवीण; ब्राह्मी लिपि का विकास इन्हीं के द्वारा माना जाता है। |
| सुन्दरी | ऋषभदेव की दूसरी पुत्री, शास्त्रों में प्रसिद्ध विदुषी। |
| श्रेयांस | ऋषभदेव के प्रपौत्र, जिन्होंने इक्षुरस देकर ऋषभदेव का दीर्घकालिक उपवास समाप्त कराया। |
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 10 का चरण-दर-चरण संक्षिप्त सारांश
पाठ का हिन्दी सारांश
युगों के आरम्भ में नाभि नामक एक महाराजा थे, जो राजनीति, युद्धतन्त्र तथा शासन में अत्यन्त निपुण थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और करुणाशालिनी थीं। उनके प्रिय पुत्र ऋषभ सर्वगुणसम्पन्न, विद्वान् तथा राजनीतिज्ञ थे। युवावस्था में राजकुमार को देखकर नाभि ने उन्हें राज्यभार सौंपने का विचार किया।
एक बार समाज में दुर्भिक्ष (अकाल) जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं और लोगों में परस्पर विद्वेष की भावना जाग उठी। यह देखकर नाभि ने यह समय ऋषभ की राजनीति-कुशलता की परीक्षा के लिए उपयुक्त मानकर उन्हें राज्य सौंप दिया। राजा बनने पर ऋषभ ने पहले समस्याओं के मूल कारणों पर विचार किया और पाया कि लोगों का आलस्य, कृषिकार्य में कमी तथा उत्पादन-क्षमता का अभाव ही मूल समस्याएँ हैं।
अतः उन्होंने कृषिकार्य, भोजन-निर्माण, वस्त्र-निर्माण, पशुपालन, बर्तन-निर्माण, गृह-निर्माण तथा नगर-निर्माण जैसे विविध जीवन-कौशल सिखाए। धीरे-धीरे लोग सक्रिय हुए, उनकी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई और राज्य पुनः सुभिक्ष (समृद्ध) हो गया। ऋषभ ने विनीता नामक सुन्दर नगर का निर्माण करवाया, जिससे प्रजा ने प्रेमपूर्वक उन्हें “ऋषभदेव” कहकर सम्बोधित किया। उनके सौ पुत्रों में भरत तथा बाहुबलि अत्यन्त विख्यात हुए, तथा उनकी पुत्रियाँ ब्राह्मी और सुन्दरी विदुषी एवं गणितज्ञ के रूप में प्रसिद्ध हुईं।
एक दिन राजमहल में नृत्य देखते समय एक नर्तकी अचानक भूमि पर गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गई। इस घटना से ऋषभदेव का मन विचलित हो गया और उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने अपना सम्पूर्ण साम्राज्य पुत्रों में बाँट दिया – विनीता राज्य भरत को तथा तक्षशिला बाहुबलि को सौंपकर स्वयं भिक्षुरूप में सत्य की खोज में निकल पड़े।
वन में उन्होंने मौन-तप, ध्यान एवं दीर्घकालिक उपवास किए। एक बार उन्होंने चार सौ दिनों तक निरन्तर उपवास किया। अन्ततः हस्तिनापुर के समीप उनके प्रपौत्र श्रेयांस ने उन्हें इक्षुरस (गन्ने का रस) पिलाकर उपवास समाप्त कराया। यह दिन वैशाख मास की अक्षयतृतीया था, जो आज भी “वर्षीतप पारणा महोत्सव” के रूप में मनाया जाता है।
तत्पश्चात् फाल्गुन मास की कृष्णपक्ष एकादशी को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे ऋषभदेव को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। वे जैनधर्म के प्रथम तीर्थङ्कर “आदिनाथ” कहलाए। उन्होंने भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक तथा श्राविका – इस चतुर्विध जैनसंघ की स्थापना की। जैनियों का परम पवित्र मन्त्र “नवकारमन्त्र” पञ्चपरमेष्ठियों (अरिहन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु) को नमन करता है। पाठ के अन्त में जैनधर्म के मूल सिद्धान्तों – अहिंसा, अनेकान्तवाद, स्याद्वाद, अपरिग्रह तथा पञ्चमहाव्रतों (सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य) – का उल्लेख किया गया है।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 – कठिन शब्दों के अर्थ
कठिन शब्दार्थ (संस्कृत और हिंदी में)
| संस्कृत शब्द | संस्कृत अर्थ | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|
| अचिन्तयत् | चिन्तितवान् | विचार किया |
| अधीतविद्यः | अधीता विद्या येन | पढ़ा-लिखा |
| अनर्घवस्तूनि | अनर्घाणि वस्तूनि | अनमोल वस्तुएँ |
| अनुयायिनः | अनुगामिनः | अनुयायी |
| अनेकान्तवादः | सत्यस्य बहुपक्षवादः | अनेकान्तवाद |
| अरिहन्ताणम् | जितशत्रूणाम् | अरिहन्तों का |
| आरम्भे | आदौ | आरम्भ में |
| आलस्यम् | प्रमादः | आलस्य |
| करुणाशालिनी | दयायुक्ता | दयालु |
| दुर्भिक्षम् | भिक्षायाः अभावः | अकाल |
| नवकारमन्त्रः | जैनप्रार्थनामन्त्रः | नवकार मन्त्र |
| परिहृताः | निवारिताः | दूर किए गए |
| सम्भ्रान्ताः | किंकर्तव्यमूढाः | असमंजस में |
| संयोगः | मेलनम् | संयोग |
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 में व्याकरण
व्याकरण खण्ड
1. समास
| विग्रहवाक्यम् | समस्तपदम् | समासनाम |
|---|---|---|
| महान् च असौ राजा च | महाराजः | कर्मधारय समास |
| प्रजानां सुखम् | प्रजासुखम् | षष्ठी तत्पुरुष समास |
| मूलाः समस्याः | मूलसमस्याः | कर्मधारय समास |
| भोजनस्य निर्माणम् | भोजननिर्माणम् | षष्ठी तत्पुरुष समास |
| आर्थिकी स्थितिः | आर्थिकस्थितिः | कर्मधारय समास |
| विधिना लिखितम् | विधिलिखितम् | तृतीया तत्पुरुष समास |
| गृहं गृहं प्रति | गृहेगृहम् | अव्ययीभाव समास |
| ब्राह्मीनामा लिपिः | ब्राह्मीलिपिः | कर्मधारय समास |
2. कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य में परिवर्तन
नियम: कर्मवाच्य वाक्य में कर्ता तृतीया विभक्ति में होता है और क्रिया कर्म के अनुसार होती है। कर्तृवाच्य में बनाते समय कर्ता प्रथमा विभक्ति में तथा क्रिया कर्ता के अनुसार परिवर्तित होती है।
उदाहरण:
जनैः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धम्।
→ जनाः स्वयमेव निर्माणकार्यम् आरब्धवन्तः।
इसी नियमानुसार निम्न वाक्यों को बदला जा सकता है:
- महाराजेन राज्यं समर्पितम् → महाराजः राज्यं समर्पितवान्।
- केनापि तत् न चिन्तितम् → कोऽपि तत् न चिन्तितवान्।
- ऋषभदेवेन दीर्घकालिकः उपवासः कृतः → ऋषभदेवः दीर्घकालिकम् उपवासम् अकरोत्।
- जनैः जीवनपद्धतिः परिवर्तिता → जनाः जीवनपद्धतिं परिवर्तितवन्तः।
- ऋषभेण योजना कृता → ऋषभः योजनां कृतवान्।
3. सन्धि-नियम एवं उदाहरण
| सन्धि-पद | नियम | संयुक्त रूप |
|---|---|---|
| इति + अतः | दीर्घ सन्धि (अ+अ=आ) | इत्यतः |
| च + इति | यण् सन्धि | चेति |
| देवस्य + अपि | स्वर सन्धि | देवस्यापि |
| तथा + एव | गुण/वृद्धि सन्धि | तथैव |
| इति + एतादृशाः | यण् सन्धि | इत्येतादृशाः |
| ब्राह्मीद्वारा + एव | वृद्धि सन्धि | ब्राह्मीद्वारैव |
| प्रस्थितः + अयम् | विसर्ग सन्धि | प्रस्थितोऽयम् |
4. प्राकृतभाषा-सम्बन्धी ज्ञातव्यम्
भारत में विभिन्न कालखण्डों में अनेक प्राकृतभाषाएँ प्रचलित थीं – आर्षप्राकृत, मागधीप्राकृत, शौरसेनीप्राकृत, महाराष्ट्रप्राकृत, पैशाचिप्राकृत, चूलिकाप्राकृत तथा अपभ्रंशप्राकृत। जैन आगम अर्धमागधी भाषा में लिखे गए हैं। संस्कृत को यदि सरिता कहें तो प्राकृत उसी की सरल धारा है।
संस्कृत-प्राकृत वाक्य-रूपान्तरण के उदाहरण:
- अहं विद्यालयं गच्छामि → अहं विज्जालयं गच्छामि
- सः जलं पिबति → सो जलं पिवइ
- बालकः पद्यं पठति → बालओ पोत्थं पढइ
- भवान् कुत्र गच्छति → भवतो कत्थ गच्छउ
- अहं फलानि खादामि → अहं फलाइं खामि
- एतत् मम मित्रम् अस्ति → एसो मम मित्तं अत्थि
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 10 हिंदी अनुवाद
संस्कृत शारदा अध्याय 10 णमो अरिहन्ताणम् – संस्कृत से हिंदी में अनुवाद
आसीत् युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रियः नाभिनामकः कश्चन महाराजः। सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासनादिषु च समर्थः। तस्य पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती करुणाशालिनी च। तयोः एव प्रियपुत्रः ऋषभः। ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञश्च आसीत्। यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य नाभिः तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।
हिंदी अनुवादयुग के आरंभ में प्रजा के प्रिय नाभि नामक एक महाराज थे। वे राजनीति, युद्धतंत्र और प्रशासन आदि में निपुण थे। उनकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमान और दयालु थीं। उन दोनों के प्रिय पुत्र ऋषभ थे। ऋषभ सर्वगुण सम्पन्न, विद्वान और राजनीति के ज्ञाता थे। यौवन से दीप्तिमान उस राजकुमार को देखकर नाभि ने उन्हें राज्यभार सौंपने का विचार किया।
अथैकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुद्भवन्। जनेषु परस्परं विद्वेषादयः भावनाः आविरभवन्। तदा नाभिः “अयं कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः” इति मन्यमानः तस्मै राज्यं समर्पितवान्। ऋषभः यदा राजा अभवत् तदा सः आदौ जनानां समस्याः काः, दुर्भिक्षस्य कारणं किं, जनेषु कुतः परस्परं विद्वेषः, समस्यानां समाधानोपायाः के इत्यादिषु विषयेषु चिन्तनं कृतवान्।
हिंदी अनुवादफिर एक बार समाज में अकाल आदि अनेक समस्याएँ उत्पन्न हो गईं। लोगों में परस्पर द्वेष आदि भावनाएँ पनपने लगीं। तब नाभि ने यह सोचते हुए कि “यह समय ऋषभ की राजनीति की परीक्षा के लिए उचित है”, और उन्हें राज्य सौंप दिया। जब ऋषभ राजा बने, तो उन्होंने सबसे पहले विचार किया कि लोगों की समस्याएँ क्या हैं, अकाल का कारण क्या है, लोगों में परस्पर द्वेष क्यों है और समस्याओं के समाधान के उपाय क्या हैं।
तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता यत् जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः चेत्येतादृश्यः मूलसमस्याः सन्ति इति। अतः सः मूलसमस्यानां परिष्काराय जनानां सुखमय-जीवनाय च विविधाः योजनाः रचितवान्। विशेषरूपेण कृषिकार्यं, विविधपदार्थैः भोजननिर्माण, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणं, गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनं चेत्यादीनि जीवनकौशलानि प्रशिक्षितवान्।
हिंदी अनुवादउन्हें यह स्पष्ट रूप से समझ आ गया था कि लोगों में आलस्य, कृषिकार्य में कमी और और उत्पादकता की कमी जैसी मूल समस्याएं मौजूद हैं। अतः उन्होंने मूल समस्याओं के निवारण के लिए और लोगों के सुखमय जीवन के लिए अनेक योजनाएँ बनाईं। विशेष रूप से कृषिकार्य, विविध पदार्थों से भोजन निर्माण, धागों से वस्त्र निर्माण, गाय-घोड़े आदि पशुओं का पालन — इन जीवन-कौशलों का प्रशिक्षण दिया।
काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणं, पात्रनिर्माणं, गृहनिर्माणं, नगरनिर्माणादिकं च प्रशिक्षितवान्। तेन क्रमशः जनाः सक्रियाः अभवन् जीवनपद्धतिं च परिवर्तितवन्तः। क्रमशः जनानाम् आर्थिकस्थितिः अपि सुदृढा जाता। जनाः स्वयमेव गृहाणां विविधभोज्यपदार्थानां नित्योपयोगिवस्तूनां च निर्माणं कर्तुम् आरब्धवन्तः। कृषिकार्याणि अपि प्रचुरतया आरब्धानि। तेन जनानां समस्याः स्वयमेव परिहृताः, राज्यं पुनः सुभिक्षं चाभवत्।
हिंदी अनुवादलकड़ी, धातु और पत्थरों से घर के उपयोग की वस्तुओं का निर्माण, बर्तन बनाना, घर बनाना और नगर निर्माण आदि का भी प्रशिक्षण दिया। इससे क्रमशः लोग सक्रिय होने लगे और उन्होंने अपनी जीवन पद्धति बदल ली। धीरे-धीरे लोगों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो गई। लोग स्वयं ही घर, विविध खाद्य पदार्थ और नित्य उपयोग की वस्तुओं का निर्माण करने लगे। कृषिकार्य भी खूब होने लगे। इससे लोगों की समस्याएँ स्वयं ही दूर हो गईं और राज्य में फिर से सुख-समृद्धि आ गई।
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥
हिंदी अनुवादप्रजा के सुख में ही राजा का सुख है और प्रजा के हित में ही उसका हित है। राजा का हित वह नहीं जो उसे स्वयं प्रिय हो, बल्कि वही उसका हित है जो प्रजा को प्रिय हो।
ऋषभः जनानां जीवने शान्तिं सुरक्षां न्यायिकव्यवस्थां च पुनः सुदृढां कृतवान्। एवम् ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च विनितानाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत्। समाजस्य उत्कर्षेण सः जनानां मनस्सु सुप्रतिष्ठितं स्थानं प्राप्तवान्। अतः तं प्रजाः प्रेम्णा राजा ऋषभदेवः इति कथयन्ति स्म।
हिंदी अनुवादऋषभ ने लोगों के जीवन में शांति, सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को फिर से सुदृढ़ किया। इस प्रकार ऋषभ के कुशल शासन और दक्षता से ‘विनिता’ नामक नगर का निर्माण हुआ। समाज के उत्थान के साथ, उन्होंने लोगों के मन में एक सुस्थापित स्थान प्राप्त किया। इसलिए प्रजा उन्हें प्रेम से ‘राजा ऋषभदेव’ कहती थी।
ऋषभदेवः समाजस्य उत्कर्षेण सह साम्राज्यस्यापि विस्तारं कृतवान्। एतादृशस्य महाराजस्य पुत्राः अपि शौर्येण पराक्रमेण बुद्धिबलेन च विश्वप्रसिद्धाः आसन्। तादृशेषु शते पुत्रेषु विशेषरूपेण भरतः बाहुबलिः च अत्यन्तं सुविख्यातौ। तथैव ऋषभस्य पुत्रीषु ब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये अपि गणितादिषु शास्त्रेषु प्रवीणे प्रसिद्धे च आस्ताम्।
हिंदी अनुवादऋषभदेव ने समाज के उत्थान के साथ-साथ साम्राज्य का भी विस्तार किया। ऐसे महाराज के पुत्र भी शौर्य, पराक्रम और बुद्धिबल से विश्वप्रसिद्ध थे। उन सौ पुत्रों में विशेष रूप से भरत और बाहुबलि अत्यंत प्रसिद्ध थे। उसी प्रकार ऋषभ की पुत्रियों में ब्राह्मी और सुन्दरी — ये दोनों कन्याएँ भी गणित आदि शास्त्रों में निपुण और प्रसिद्ध थीं।
दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्।
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥
हिंदी अनुवादसारा जगत भाग्य के अधीन है, जन्म और कर्म शुभ फल देने वाले हैं। मिलन भी होता है और वियोग भी — और भाग्य से बड़ी कोई शक्ति नहीं।
एकदा ऋषभदेवः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनम् आयोजितवान्। तत्र आगता काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः सहसा विक्षुब्धम् अभवत्। कथं काचित् आरोग्यवती स्त्री सहसा मरणं प्राप्तवती, किं नाम जीवनम्, कथं जीवनीयम् इत्यादयः अनेके प्रश्नाः तस्य बुद्धौ आविरभवन्। इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति, इदं सुखं स्थायि नास्ति इति विचिन्त्य स्थिरसुखस्य प्राप्त्यर्थं सः सर्वमपि परित्यज्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितवान्।
हिंदी अनुवादएक बार ऋषभदेव ने राजमहल में नृत्यकला का प्रदर्शन आयोजित किया। वहाँ आई एक नर्तकी नृत्य प्रदर्शित करते-करते अचानक भूमि पर गिर पड़ी और मर गई। इस घटना से ऋषभदेव का मन अचानक विचलित हो गया। एक स्वस्थ स्त्री अचानक मृत्यु को कैसे प्राप्त हुई, जीवन क्या है, कैसे जीना चाहिए — इस प्रकार के अनेक प्रश्न उनके मन में उठने लगे। “इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है, यह सुख स्थायी नहीं है” — यह सोचकर स्थायी सुख की प्राप्ति के लिए वे सब कुछ छोड़कर भिक्षु के रूप में चल पड़े।
स्वस्य विशालं साम्राज्यं स्वपुत्रेषु विभक्तवान्। विशेषतया ‘विनिता’ राज्यं भरताय तक्षशिलां बाहुबलये च समर्प्य जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्रस्थितोऽयं महामुनिः। तम् अनेके जनाः शिष्यरूपेण अनुसृतवन्तः। ऋषभदेवः तदारभ्य अरण्येषु मौनेन ध्यानं निरन्तरम् अध्ययनं च करोति स्म।
हिंदी अनुवादउन्होंने अपना विशाल साम्राज्य अपने पुत्रों में बाँट दिया। विशेष रूप से ‘विनिता’ राज्य भरत को और तक्षशिला बाहुबलि को सौंपकर यह महामुनि जीवन के परम सत्य की खोज में चल पड़े। उनके पीछे अनेक लोग शिष्य के रूप में चले। ऋषभदेव तब से वनों में मौन रहकर ध्यान और निरंतर अध्ययन करने लगे।
सः अध्ययने गभीरध्याने च तथा लीनः भवति स्म येन सः भोजनपानादिकमपि विस्मृत्य बहुकालं यावत् स्वाभाविकरूपेण निराहारम् अकरोत्। परं तस्य अनुयायिनः तथा निराहारं स्थातुं कष्टम् अनुभवन्ति स्म। किन्तु ते ऋषभदेवं त्यक्त्वा गन्तुमपि न इच्छन्ति स्म। ते अरण्ये विद्यमानेभ्यः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा चित्वा जीवनं यापयन्ति स्म।
हिंदी अनुवादवे अध्ययन और गहरे ध्यान में इतने लीन हो जाते थे कि भोजन-पानी भूलकर स्वाभाविक रूप से बहुत समय तक निराहार रहते थे। परन्तु उनके अनुयायियों को इतने समय तक बिना भोजन के रहना कठिन लगता था। फिर भी वे ऋषभदेव को छोड़कर जाना नहीं चाहते थे। वे वन में उपलब्ध वृक्षों से फल और साग-सब्जी चुनकर जीवन यापन करते थे।
कदाचित् तेषाम् एतादृशं व्यवहारं दृष्ट्वा जैनसन्यासिनः वृक्षेभ्यः फलानि शाकानि वा न चिनयुः इति बोधनार्थं स्वयं भिक्षार्थं प्रस्थितः। अनुयायिनः अपि तस्य आचरणेन प्रभाविताः सन्तः भिक्षार्थं गताः। ग्रामेषु प्रतिगृहं गत्वा भिक्षां प्राप्य जीवनं निर्वर्तयन्ति स्म।
हिंदी अनुवादएक बार उनके इस व्यवहार को देखकर — वे स्वयं जैन भिक्षुओं से विनती करने जाते थे कि वे पेड़ों से फल या सब्जियां न तोड़ें। अनुयायी भी उनके आचरण से प्रभावित होकर भिक्षा के लिए गए। वे गाँवों में प्रत्येक घर जाकर भिक्षा प्राप्त कर जीवन-निर्वाह करने लगे।
परम् ऋषभः पूर्वं भोजनार्थं मौनेन भिक्षायाचनं करणीयम् इति मौनेन प्रतिगृहं भिक्षायाचनम् आरब्धवान्। परं तत्रत्याः जनाः तेषां प्रियं महाराजं दृष्ट्वा भिक्षायां किं दातव्यम् इति सम्भ्रान्ताः सन्तः तस्मै आभरणानि अनर्घवस्तूनि च यच्छन्ति स्म। परं भिक्षायां भोजनपदार्थः देयः इति न केनापि चिन्तितम्। फलतः ऋषभदेवस्य दिनेदिने सकष्टम् उपवासः करणीयः आपतितम्।
हिंदी अनुवादपरन्तु ऋषभ को पहले यह नहीं पता था कि भोजन के लिए मौन रहते हुए भिक्षा माँगनी होती है, इसलिए वे मौन रहकर प्रत्येक घर भिक्षा माँगने लगे। परन्तु वहाँ के लोग अपने प्रिय महाराज को देखकर भिक्षा में क्या देना चाहिए — यह न समझकर उन्हें आभूषण और अनमोल वस्तुएँ देने लगे। भिक्षा में भोजन देना चाहिए — यह किसी ने नहीं सोचा। परिणामस्वरूप, ऋषभदेव को दिन-प्रतिदिन कठिन उपवास करना पड़ा।
कदाचित् ऋषभदेवः भोज्यपदार्थानाम् अभावे चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासं कृतवान्। एकदा पर्यटनावसरे सः हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म। तच्च इक्षुक्षेत्रं तस्यैव प्रपौत्रस्य श्रेयांसस्य आसीत्। सः श्रेयांसः प्रपितामहाय पानार्थम् इक्षुरसं दत्तवान्। अनेन ऋषभदेवस्य दीर्घकालिकः उपवासः समाप्तः। तच्च वैशाखमासस्य अक्षयतृतीया-दिनम् आसीत्।
हिंदी अनुवादएक बार ऋषभदेव ने भोजन के अभाव में लगातार चार सौ दिन उपवास किया। एक बार यात्रा के दौरान वे हस्तिनापुर के पास एक गन्ने के खेत के किनारे टहल रहे थे। वह गन्ने का खेत उन्हीं के परपोते श्रेयांस का था। श्रेयांस ने अपने परदादा को पीने के लिए गन्ने का रस दिया। इससे ऋषभदेव का दीर्घकालीन उपवास समाप्त हुआ। और वह दिन वैशाख मास की अक्षय तृतीया का था।
एवं दीर्घकालिकोपवासेन निरन्तराध्ययनेन कठोरतपसा च ऋषभदेवः फाल्गुनमासस्य कृष्णपक्षे एकादश्यां तिथौ प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान्। अयमेव जैनसम्प्रदाये आदिमः तीर्थङ्करः प्रभुः नाथः इत्यतः ‘आदिनाथः’ इति ख्यातः। ऋषभदेवः जनानां मार्गदर्शनार्थं भिक्षुः भिक्षुणी श्रावकः श्राविका चेति क्रमं रचितवान्। स एव क्रमः जैनसङ्घः इति प्रसिद्धः वर्तते।
हिंदी अनुवादइस प्रकार दीर्घकालीन उपवास, निरंतर अध्ययन और कठोर तप से ऋषभदेव ने फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष की एकादशी तिथि को प्रयागराज में अक्षयवट वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। वे ही जैन सम्प्रदाय में प्रथम तीर्थंकर, प्रभु, नाथ हैं, इसलिए ‘आदिनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। ऋषभदेव ने लोगों के मार्गदर्शन के लिए भिक्षु, भिक्षुणी, श्रावक और श्राविका — यह क्रम बनाया। वही क्रम ‘जैन संघ’ के नाम से प्रसिद्ध है।
तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इति प्रसिद्धः यच्च प्राकृतभाषायां वर्तते —
“णमो अरिहन्ताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं”
हिंदी अनुवादउनका परम मंत्र ‘नवकार मंत्र’ के नाम से प्रसिद्ध है जो प्राकृत भाषा में है — “मैं अरिहंतों को नमस्कार करता हूँ, सिद्धों को नमस्कार करता हूँ, आचार्यों को नमस्कार करता हूँ, उपाध्यायों को नमस्कार करता हूँ, संसार के सभी साधुओं को नमस्कार करता हूँ।”
अयं सर्वेषां जैनानां परमपावनः मन्त्रः अस्ति। प्रतिवर्षम् अप्रैल-मासस्य नवमे दिनाङ्के जैनजनाः सामूहिकरूपेण अस्य मन्त्रस्य जपादिकं कृत्वा उत्सवम् आचरन्ति। एषः मन्त्रः पञ्चपरमेष्ठिभ्यः (अरिहन्तारः, सिद्धाः, आचार्याः, उपाध्यायाः, सर्वे साधवः च) प्रणामं समर्पयति। वसुधैवकुटुम्बकम् इत्यस्य अनुरूपेण विश्वशान्त्यै कोटिशः जनैः गीयमानः परमो मन्त्रः अयं णमोकारमन्त्रः।
हिंदी अनुवादयह सभी जैनों का परम पावन मंत्र है। प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह की नौवीं तिथि को जैन लोग सामूहिक रूप से इस मंत्र का जप आदि करके उत्सव मनाते हैं। यह मंत्र पाँच परमेष्ठियों — अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सभी साधु — को प्रणाम अर्पित करता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के अनुरूप विश्वशांति के लिए करोड़ों लोगों द्वारा गाया जाने वाला यही परम मंत्र णमोकार मंत्र है।
जैनमतस्य प्रमुखाः सिद्धान्ताः — अहिंसा परमो धर्मः (मनसा, वाचा, कर्मणा च अहिंसापालनम्), अनेकान्तवादः (सत्यस्य अनेके पक्षाः भवन्ति), स्याद्वादः (प्रत्येकं वचनं सापेक्षं “स्यादिति” रूपेण ग्राह्यम्), अपरिग्रहः (आवश्यकात् अधिकं संग्रहः न करणीयः)। एतेषां दर्शनानां मध्ये — सम्यग्दर्शनम्, सम्यग्ज्ञानम्, सम्यक्चरित्रम् इति त्रीणि रत्नानि उच्यन्ते। तथा च प्राणिमात्रहिताय पञ्चमहाव्रतानि — सत्यम्, अहिंसा, अस्तेयम्, अपरिग्रहः, ब्रह्मचर्यं च आचरितुं कल्याणकरम् इति निगद्यते।
हिंदी अनुवादजैन मत के प्रमुख सिद्धान्त हैं — अहिंसा परमो धर्मः (मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन), अनेकान्तवाद (सत्य के अनेक पक्ष होते हैं), स्याद्वाद (प्रत्येक वचन सापेक्ष रूप में “स्यात्” के साथ ग्राह्य है), अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना चाहिए)। इन दर्शनों में — सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र — ये तीन रत्न कहे जाते हैं। तथा सभी प्राणियों के हित के लिए पाँच महाव्रत — सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी न करना), अपरिग्रह और ब्रह्मचर्य — का पालन करना कल्याणकारी बताया गया है।
अक्सर पूंछे जाने वाले प्रश्न
क्या कक्षा 9 संस्कृत पाठ 10 “णमो अरिहन्ताणम्” कठिन है?
यह पाठ अन्य गद्य पाठों की तुलना में थोड़ा कठिन माना जाता है, क्योंकि इसमें दीर्घ समास, संयुक्त वाक्य-रचना तथा जैनधर्म-सम्बन्धी नए शब्द (जैसे तीर्थङ्करः, केवलज्ञानम्, अनेकान्तवादः) प्रयुक्त हुए हैं। यदि शब्दार्थ पहले याद कर लिए जाएँ और हिन्दी अनुवाद के साथ गद्यांश को दो-तीन बार पढ़ा जाए, तो पाठ समझना आसान हो जाता है। नियमित अभ्यास से यह पाठ अन्य पाठों जितना ही सरल लगने लगता है।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 10 को एक दिन में कैसे तैयार करें?
एक दिन में तैयारी हेतु सबसे पहले पाठ का हिन्दी सारांश पढ़ें ताकि कथा का क्रम समझ में आ जाए, फिर दिए गए कठिन शब्दार्थों को कण्ठस्थ करें। इसके बाद पाठ में दिए गए एकपदीय और पूर्णवाक्य प्रश्नोत्तर को याद करें, क्योंकि परीक्षा में यही सर्वाधिक पूछे जाते हैं। अन्त में समास, सन्धि तथा वाच्य-परिवर्तन के अभ्यास प्रश्नों को एक बार दोहरा लें। इस क्रम से पूरा पाठ एक दिन में भी अच्छी तरह तैयार हो सकता है।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 10 में व्याकरण खण्ड कितना सहायक है?
व्याकरण खण्ड इस पाठ की तैयारी में अत्यन्त सहायक है, क्योंकि परीक्षा में सीधे गद्यांश के अतिरिक्त समास-विग्रह, सन्धि-निर्माण तथा कर्मवाच्य से कर्तृवाच्य में परिवर्तन जैसे प्रश्न अनिवार्य रूप से पूछे जाते हैं। यह खण्ड न केवल इस पाठ के लिए बल्कि संस्कृत विषय की समग्र व्याकरण-नींव को मजबूत करता है, जिससे अन्य पाठों तथा अपठित गद्यांशों को हल करने में भी सुविधा होती है। इसलिए व्याकरण खण्ड को हल्के में नहीं लेना चाहिए।
हिन्दी अनुवाद पढ़ने से संस्कृत पाठ समझने में क्या लाभ होता है?
हिन्दी अनुवाद पढ़ने से संस्कृत के कठिन एवं संयुक्त वाक्यों का अर्थ शीघ्र स्पष्ट हो जाता है, जिससे विद्यार्थी को मूल संस्कृत गद्यांश को बार-बार पढ़े बिना भी कथा का सम्पूर्ण भाव समझ में आ जाता है। इससे समय की बचत होती है और परीक्षा में पूर्णवाक्य प्रश्नों के उत्तर आत्मविश्वास से लिखे जा सकते हैं। हालाँकि, केवल हिन्दी अनुवाद पर निर्भर न रहकर मूल संस्कृत शब्दों तथा वाक्य-रचना का अभ्यास भी साथ-साथ करना चाहिए, ताकि भाषा-कौशल भी विकसित हो।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 10 को याद रखने का सबसे आसान तरीका क्या है?
पाठ को याद रखने का सबसे आसान तरीका है इसे कहानी के रूप में समझना — पहले नाभि-मरुदेवी का परिचय, फिर ऋषभ का राज्याभिषेक और प्रजाकल्याण-कार्य, उसके बाद राज्यत्याग-तपस्या-केवलज्ञान, और अन्त में जैनसंघ की स्थापना — इस क्रम में कथा को मन में बिठाना चाहिए। साथ ही श्लोक “प्रजासुखे सुखं राज्ञः” तथा “दैवाधीनं जगत्सर्वम्” को कण्ठस्थ कर लेने से गद्यांश जल्दी याद हो जाता है और लम्बे समय तक स्मरण रहता है।
