एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः
एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः – समाधान, प्रश्न उत्तर, शब्द अर्थ, सारांश, पाठ का हिंदी अनुवाद तथा अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए यहाँ दिए गए हैं। कक्षा 9 संस्कृत शारदा का नवम पाठ ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ एक नाट्य-रूपक है जो महामहोपाध्याय श्रीरङ्गनाथशर्मा द्वारा विरचित ‘एकचक्रम्’ नामक लघु रूपक के तृतीय और चतुर्थ अंक से उद्धृत है। इसकी कथावस्तु महाभारत में वर्णित बकासुर-वध पर आधारित है।
पाठ का शीर्षक-वाक्य है – ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ – अर्थात् ‘किए गए उपकार का प्रत्युपकार करना – यही सनातन धर्म है।’ भीमसेन ने जब ब्राह्मण परिवार की दुर्दशा जानी, तो तत्काल बकासुर का सामना करने का संकल्प किया – क्योंकि उस ब्राह्मण ने पहले पाण्डवों की सेवा की थी।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 के त्वरित लिंक:
- कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 प्रश्न-उत्तर
- शारदा पाठ 9 पात्र परिचय
- संस्कृत शारदा पाठ 9 का सारांश
- संस्कृत शारदा अध्याय 9 शब्द-अर्थ
- संस्कृत शारदा पाठ 9 में व्याकरण
- शारदा पाठ 9 के हिंदी अनुवाद
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एनसीईआरटी कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 के समाधान (2026-27 के अनुसार)
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
१. अधः प्रदत्तप्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत –
(क) भीमस्य जननी का?
(ख) कुन्त्या निश्चितं कः न समर्थयति?
(ग) पाण्डवानाम् उपकर्ता कः?
(घ) कं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते?
(ङ) पाण्डवाः कुत्र निवसन्ति स्म?
(च) भरतवंशप्रदीपः कः?
(छ) कः भृशं परिदेवयते?
उत्तर:
(क) कुन्ती। (भीम की माँ कुन्ती हैं।)
(ख) युधिष्ठिरः। (कुन्ती के निर्णय का समर्थन युधिष्ठिर नहीं करते।)
(ग) प्रतिवेशी ब्राह्मणः। (पाण्डवों के उपकर्ता पड़ोसी ब्राह्मण हैं।)
(घ) भीमम्। (भीम को सोचकर दुर्योधन निद्रा नहीं पाता।)
(ङ) एकचक्रनगरे ब्राह्मणस्य गृहे। (एकचक्र नगर में ब्राह्मण के घर।)
(च) भीमः। (भरतवंश का दीपक भीम है।)
(छ) ब्राह्मणः (विप्रः)। (ब्राह्मण अत्यन्त विलाप करता है।)
२. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत –
(क) “भैक्षप्रदानेन…….. ” इति श्लोकानुसारं सनातनः धर्मः कः?
(ख) बकनामा दैत्यः कुत्र वसति?
(ग) कुन्ती किं प्रतिश्रुतवती?
(घ) भीमस्य अग्रजः कः?
(ङ) का प्रत्यादेशं न अर्हति?
(च) पौराः बकासुराय कथं बलिम् आहरन्ति?
(छ) क्षत्रियाणां धर्मः कः?
उत्तर:
(क) भैक्षप्रदानेन चिरं परैः उपकृताः वयम्। अतः कृतम् उपकारम् प्रतिकृतेन चुकाया जाए – ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ इत्ययं धर्मः सनातनः।
(भिक्षा देकर हम बहुत काल उपकृत हुए। इसलिए उपकार का प्रत्युपकार करना – यही सनातन धर्म है।)
(ख) एकचक्रस्य पुरस्य अदूरवर्तिनि पर्वते बकनामा दैत्यः वसति।
(एकचक्र नगर के निकट के पर्वत पर बक नामक दैत्य रहता है।)
(ग) कुन्ती प्रतिश्रुतवती – ‘स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामि’ इति।
(कुन्ती ने वचन दिया – ‘अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजूँगी।’)
(घ) भीमस्य अग्रजः युधिष्ठिरः।
(भीम के अग्रज युधिष्ठिर हैं।)
(ङ) मातुः आज्ञा प्रत्यादेशम् न अर्हति।
(माता की आज्ञा का उल्लंघन उचित नहीं।)
(च) नगरवासिनः पर्यायक्रमेण – अर्थात् एकैकः जनः क्रमेण – बकासुराय बलिम् आहरन्ति।
(नगरवासी बारी-बारी से बकासुर के लिए बलि देते हैं।)
(छ) ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः’ इति भीमः उक्तवान्।
(भीम ने कहा – नर-रक्षण ही क्षत्रियों का धर्म है।)
३. अधस्तात् दत्तानि वाक्यानि केन कं प्रति उक्तानि इति निर्दिशत –

उत्तर:
| वाक्यम् | केन/कया | कं/कां प्रति |
|---|---|---|
| यथा – तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति | कुन्त्या | भीमम् |
| १. न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति | भीमेन | युधिष्ठिरम् |
| २. न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते | भीमेन | अर्जुनम् |
| ३. क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम् | भीमेन | युधिष्ठिरम् (सर्वान् च) |
| ४. अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे? | सहदेवेन | भीमम् |
| ५. तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्? | युधिष्ठिरेण | कुन्तीम् |
| ६. नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः | बकेन | भीमम् |
४. रेखाङ्कितपदेषु सन्धिं विभज्य सन्धिनाम लिखत –

उत्तर:

५. पर्यायवाचि-पदानां मेलनं कुरुत –

उत्तर:

६. अधोलिखितानां पदानां विपरीतार्थक-शब्दान् लिखत –

उत्तर:

७. मञ्जूषातः समुचितं विशेषणपदं चित्वा लिखत –

उत्तर:

८. समस्तपदानि लिखत –

उत्तर:

९. अधोलिखितवाक्यानाम् उचितभावैः सह सम्मेलनं कुरुत –

उत्तर:

१०. वाच्यपरिवर्तनं कुरुत –

उत्तर:

कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 पात्र परिचय
पात्र-परिचय
| पात्र का नाम | परिचय | भूमिका |
|---|---|---|
| कुन्ती | पाण्डवों की माता | ब्राह्मण से किया वचन पूरा करती हैं |
| भीमसेनः | पाण्डवों में द्वितीय – महाबलशाली | बकासुर से लड़ने का संकल्प करता है |
| युधिष्ठिरः | ज्येष्ठ पाण्डव – धर्मराज | माता के निर्णय पर प्रारम्भ में चिन्तित |
| अर्जुनः | धनुर्धर पाण्डव | भीम के साथ जाने की इच्छा करता है |
| नकुलः | चतुर्थ पाण्डव | हास्यपूर्ण टिप्पणी करता है |
| सहदेवः | पञ्चम पाण्डव | हास्यपूर्ण प्रश्न करता है |
| बकः | राक्षस-असुर | एकचक्र नगर का आतंककारी नरभक्षक |
रचयिता का परिचय
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| नाम | विद्वान् एन. रङ्गनाथशर्मा (महामहोपाध्याय) |
| जन्म | ७ अप्रैल १९२६, नडळल्ली ग्राम, शिवमोग्गा मण्डल, कर्णाटक |
| देहत्याग | २०१४ |
| उपाधियाँ | महामहोपाध्याय, विद्यावारिधि, व्याकरणशास्त्रप्रवीण, राष्ट्रप्रशस्ति और राज्यप्रशस्ति-भाजन |
| कार्यक्षेत्र | व्याकरण, अलंकारशास्त्र और अद्वैत-वेदान्त |
| कार्यस्थान | बेंगलुरु – चामराजेन्द्र संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण-प्राध्यापक |
| प्रमुख कृतियाँ | बाहुबलिविजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्जलिः, श्रीशङ्करचरितामृतम् |
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 का संक्षिप्त सारांश
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 9 का सारांश – 3 भागों में
- भाग 1 – कुन्ती और भीम का संवाद:
कुन्ती ने भीम को बताया – कल प्रातःकाल उस ब्राह्मण की बारी है। बकासुर नरभक्षी है – उसके लिए भोजन के साथ एक मनुष्य भी भेजना पड़ेगा। भीम ने तत्काल कहा – ‘मैं ही जाऊँगा।’ श्लोक बोला – ‘भिक्षाप्रदान से हम बहुत काल तक दूसरों द्वारा पालित हुए हैं। उपकार का प्रत्युपकार हो – यही सनातन धर्म है।’ कुन्ती ने कहा – स्वादिष्ट भोजन से भरी शकट (गाड़ी) भेजो। - भाग 2 – पाण्डव भाइयों का संवाद:
युधिष्ठिर और अन्य भाइयों ने भीम को प्रसन्न देखा। भीम ने बताया – भोजन और युद्ध – दोनों तैयार हैं। युधिष्ठिर ने माता पर चिन्ता व्यक्त की – ‘जिस भीम के भुजबल पर हम सुखपूर्वक सोते हैं, जिसे सोचकर दुर्योधन निद्रा नहीं पाता, उसे कैसे भेजा?’ भीम ने कहा – ‘माता की आज्ञा का उल्लंघन उचित नहीं।’ अर्जुन भी साथ जाने को तैयार हुआ – भीम ने मना किया। भीम ने श्लोक कहा – ‘ये दोनों भुजाएँ मेरे सहजात सहायक हैं। जैसे सिंह क्षुद्र पशु को, वैसे मैं बक को नष्ट करूँगा।’ - भाग 3 – भीम-बक संवाद:
भीम ने पहले सारा भोजन स्वयं खाया। बक ने कहा – ‘हे अधम मानव! मेरा भोजन परोसो।’ भीम ने कहा – ‘सब भोजन मेरे पेट में बसे अग्नि को अर्पण हो गया। मैं तुम्हें मारने आया हूँ।’ बक ने पूछा – ‘मेरा क्या अधर्म?’ भीम ने कहा – ‘नरभक्षण।’ बक ने कहा – ‘नरभक्षण राक्षसों का धर्म है।’ भीम ने उत्तर दिया – ‘नर-रक्षण क्षत्रियों का धर्म है।’ बक ने पहचाना – ‘तुम हिडिम्ब के हत्यारे कुन्तीपुत्र भीमसेन हो?’ भीम ने कहा – ‘हाँ।’ बक ने कहा – ‘मेरा भाग्य – चिरकाल का खोजा मृग स्वयं बाघ की गुफा में आया।’ भीम ने कहा – ‘अपने मित्र हिडिम्ब का अनुसरण करो।’ तत्पश्चात् भीषण मल्लयुद्ध हुआ और बक मारा गया।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 हिंदी अनुवाद
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 – संस्कृत से हिंदी में अनुवाद – संपूर्ण पाठ
रामायणं महाभारतं चेति द्वौ प्रसिद्धौ इतिहास-ग्रन्थौ। महाभारतम् अवलम्ब्य बहवो ग्रन्थाः विरचिताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचितम् एकचक्रम् इति लघुरूपकम् अन्यतमम्। महाभारते प्रतिपादितः बकासुरवधः अस्य कथावस्तु। अयं पाठ्य-भागः एकचक्रम् इति रूपकस्य तृतीय-चतुर्थाङ्काभ्याम् उद्धृतः।
हिंदी अनुवादरामायण और महाभारत — ये दो प्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ हैं। महाभारत के आधार पर अनेक ग्रन्थ रचे गए हैं। उनमें महामहोपाध्याय श्रीरङ्गनाथशर्मा द्वारा रचित “एकचक्रम्” नामक लघु नाटक भी एक है। महाभारत में वर्णित बकासुर-वध इस नाटक का कथानक है। यह पाठ्यांश “एकचक्रम्” नाटक के तृतीय और चतुर्थ अंक से लिया गया है।
पूर्वकथा-प्रसङ्ग
पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति। गृहस्वामिनः गृहे रोदनध्वनिं श्रुत्वा तत्र गता पाण्डवानां माता कुन्ती रोदनकारणं पृच्छति। ततः शोकाकुलेन परिवारेण सा ज्ञापिता यत् एकचक्रनगरवासिनां नातिदूरस्थितेन बकनाम्ना असुरेण सह सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी स्वेच्छया असुरस्य भक्ष्यं भवेत्, तद्दिने पर्यायेण तस्यैव ब्राह्मणपरिवारस्य बलिदानस्य वारः आसीत् इति। तेषां दुःस्थितिं ज्ञात्वा स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामीति कुन्ती प्रतिज्ञां कृतवती।
हिंदी अनुवादपांडव एकाचक्र नगर में एक ब्राह्मण के घर में रहते थे। घर के मुखिया के घर से रोने की आवाज सुनकर वहाँ गई पाण्डवों की माता कुन्ती ने रोने का कारण पूछा। तब दुःख से व्याकुल परिवार ने उन्हें बताया कि एकचक्र नगर के निवासियों के और पास ही स्थित बक नामक असुर के साथ हुई संधि के नियम के अनुसार प्रतिदिन कोई नगरवासी स्वेच्छा से असुर का भोजन बने — और उस दिन उसी ब्राह्मण परिवार के बलिदान की बारी थी। उनकी दयनीय दशा जानकर कुन्ती ने अपने पुत्रों में से एक को बकासुर के पास भेजने का वचन दिया।
इमं विषयं ज्ञात्वा ब्राह्मणेन कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारकालः सन्निहितः इति भावयन् भीमः मृष्टान्न-भाण्डसहितः बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः भवति।
हिंदी अनुवादयह विषय जानकर भीम ने सोचा कि ब्राह्मण द्वारा किए गए उपकार का प्रत्युपकार करने का समय आ गया है — और वे स्वादिष्ट भोजन के पात्र लेकर बकासुर के पास जाने के लिए तैयार हो गए।
(ततः प्रविशति कुन्ती भीमसेनेन सह)
कुन्ती — पुत्र! किञ्चित् प्रतिश्रुतं मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय।
भीमः — सम्यगनुष्ठितम्। आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन।
कुन्ती — आकर्णय, अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।
भीमः — श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्। पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः।
हिंदी अनुवाद(तब कुन्ती भीमसेन के साथ प्रवेश करती हैं)
कुन्ती — पुत्र! मैंने पड़ोसी ब्राह्मण को कुछ वचन दिया है।
भीम — उचित ही किया। वे ब्राह्मण सेवा करके हमारे उपकारी हैं, और अतिथि-सत्कार करने वाले रहे हैं।
कुन्ती — सुनो, इस एकचक्र नगर के पास ही एक पर्वत पर बक नामक दैत्य रहता है।
भीम — उस दुरात्मा का वृत्तान्त मैंने सुना है। नगरवासी बारी-बारी से उसे बलि देते हैं।
कुन्ती — श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः।
भीमः — बाढम्।
कुन्ती — न चैतावत्। मानुषभोजी स राक्षसः श्रूयते। भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः। तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति।
भीमः — विदितमवशिष्टम्। मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यत इति भवत्या प्रतिश्रुतम्।
कुन्ती — (मौनमवलम्बते)
हिंदी अनुवादकुन्ती — कल सुबह इस ब्राह्मण की बारी है।
भीम — ठीक है।
कुन्ती — बस इतना ही नहीं। वह राक्षस मनुष्यों को खाने वाला बताया जाता है। भोजन सामग्री के साथ एक मनुष्य भी उसके पास भेजना होगा। इसीलिए उस बालक का पिता शोक रहे हैं।
भीम — शेष बात तो मैं जान गया। आपने वचन दिया है कि मेरे पुत्रों में से कोई एक भेजा जाएगा।
कुन्ती — (मौन धारण कर लेती हैं)
मूल संवाद:
भीमः — मातः! नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्। क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। युक्तोऽयं प्रतिश्रवः। श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। पश्य —
भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥
अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि।
हिंदी अनुवादभीम — माँ! इसमें किसी बात का शोक नहीं करना चाहिए। क्षत्राणी ने जो उचित समझा, वही किया। यह वचन उचित है। यह पड़ोसी ब्राह्मण हमारे प्रत्युपकार का अधिकारी है। देखिए —
भिक्षा देकर दूसरों ने बहुत काल तक हम पर उपकार किया। किया हुआ उपकार, प्रत्युपकार से चुकाया जाए — यही सनातन धर्म है।
मैं स्वयं ही बकासुर के पास जाऊँगा।
कुन्ती — वत्स भीम! अनुरूपमभिहितं भरतवंशप्रदीपेन मम पुत्रेण।
भीमः — भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूर्णं पूरयित्वा प्रेषणीयं भवति राक्षसाय। तदेतत् सज्जीक्रियतामिति प्रेरयिष्यामि ब्राह्मणकुटुम्बम्।
कुन्ती — अहो! प्रियं मे। सज्जीक्रियताम्। अपरमिदं प्रियमनुष्ठितं मे भवत्या। प्रभूतमुपाहरिष्यते भोजनम्।
हिंदी अनुवादकुन्ती — वत्स भीम! भरतवंश के दीपक मेरे पुत्र ने उचित ही कहा।
भीम — खाने-पीने की स्वादिष्ट सामग्री से एक गाड़ी भरकर राक्षस के पास भेजनी होगी। ब्राह्मण परिवार को इसे तैयार करने के लिए प्रेरित करूँगा।
कुन्ती — वाह! मुझे प्रसन्नता है। तैयारी करवाओ। तुमने यह और अधिक प्रिय कार्य किया। खूब भोजन लेकर जाओ।
(ततः प्रविशन्ति युधिष्ठिरादयः)
युधिष्ठिरः — (विलोक्य) अये! हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः।
भीमः — प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्।
अर्जुनः — स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य।
नकुलः — ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य।
हिंदी अनुवाद(तब युधिष्ठिर आदि प्रवेश करते हैं)
युधिष्ठिर — (देखकर) अरे! यह वत्स भीम की आँखें तो हर्ष (ख़ुशी) के मारे खिली हुई सी लग रही हैं।
भीम — आज मुझे बहुत सारा भोजन मिलने वाला है।
अर्जुन — पेटू के लिए प्रसन्नता तो उचित ही है।
नकुल — बड़े भाई के होंठ भी (भोजन के स्वाद की कल्पना में) फड़क रहे हैं।
भीमः — पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः।
सहदेवः — अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे?
भीमः — तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनमुपस्थितम्। आयोधनमपि।
युधिष्ठिरः — आयोधनमिति। केन?
भीमः — बकासुरेण।
हिंदी अनुवादभीम — देखो, बाहें भी फड़क रही हैं।
सहदेव — क्या दोनों हाथों से खाओगे?
भीम — वह भी होगा। केवल भोजन ही नहीं, युद्ध भी तैयार है।
युधिष्ठिर — युद्ध? किससे?
भीम — बकासुर से।
युधिष्ठिरः — अम्ब! किमिदानीमुपक्षिप्तम्?
कुन्ती — पुत्रकाः! बकासुरस्य भोजनपरिकल्पनं जानीथ पौराणाम्। तदिदानीं पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य।
युधिष्ठिरः — ततस्ततः।
कुन्ती — स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते।
युधिष्ठिरः — ज्ञातमवशिष्टं मातः! न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये। यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे, यच्च चिन्तयन् दुर्योधनो निद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?
हिंदी अनुवादयुधिष्ठिर — माँ! अब यह क्या कहा जा रहा है?
कुन्ती — पुत्रों! बकासुर के लिए नगरवासियों की भोजन की व्यवस्था तो जानते ही हो। अब वह बारी हमारे पड़ोसी ब्राह्मण पर आई है।
युधिष्ठिर — फिर? फिर?
कुन्ती — वह एकमात्र पुत्र वाला तपस्वी ब्राह्मण बहुत विलाप कर रहा है।
युधिष्ठिर — शेष बात समझ गया, माँ! लेकिन आपने जो निश्चय किया, उसे मैं उचित नहीं मानता। जिस वीर की भुजाओं के बल पर हम सुख से सोते हैं, जिसके बारे में सोचकर दुर्योधन को नींद नहीं आती — उस भीम को भेजने का विचार आपने कैसे किया?
भीमः — धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।
युधिष्ठिरः — वत्स भीमसेन! बलवान् मानुषभोजी स राक्षसः इति श्रूयते।
भीमः — ततः किम्? राक्षसध्वंसी भीमः स्मर्यते। अलं विशङ्कया। हनिष्यामि तं दुरात्मानम्।
अर्जुनः — धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि।
भीमः — मा मैवम्। न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।
हिंदी अनुवादभीम — धर्म को जाननेवाले आप यहाँ धर्म-संग्रह देखें। माता की आज्ञा की अवज्ञा नहीं होनी चाहिए।
युधिष्ठिर — वत्स भीमसेन! सुना जाता है कि वह राक्षस बलवान और मनुष्यों को खाने वाला है।
भीम — तो क्या? राक्षसों का नाश करने वाला भीम भी तो याद किया जाता है। संदेह मत करो। मैं उस दुरात्मा को मार डालूँगा।
अर्जुन — मैं धनुषधारी भी साथ चलूँगा।
भीम — नहीं, ऐसा मत करो। तीखे दाँतों वाला जंगल का राजा (सिंह) किसी सहायक की अपेक्षा नहीं रखता।
इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
हिंदी अनुवादये दोनों बलिष्ठ भुजाएँ ही मेरी सहज सहायक हैं। जैसे सिंह किसी छोटे पशु को नष्ट कर देता है, उसी प्रकार मैं बक को भी नष्ट कर दूँगा।
(ततः सर्वैरनुज्ञातः बकं हन्तुकामः भीमः प्रस्थितः)
(ततः प्रविशति भक्ष्य-भोज्यादिक-भाण्ड-पूरित-शकटेन सह)
हिंदी अनुवाद(तब सबकी अनुमति लेकर बक को मारने की इच्छा से भीम चल पड़े)
(तब वे भोजन सामग्री से भरी गाड़ी लेकर आते हैं)
मूल संवाद:
बकः — मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्।
भीमः — सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। त्वां धर्मदूषणं हन्तुम् आगतोऽहम्।
बकः — कथं, कः खलु अधर्मः मया सेवितः? (सहासमुदरं परिमृजन्)
भीमः — नरभक्षणम्।
हिंदी अनुवादबक — अरे नीच मनुष्य, मेरे लिए भोजन परोस।
भीम — सारा भोजन तो मेरे पेट में रहने वाले भगवान अग्नि को परोस दिया। मैं तुम जैसे धर्मद्रोही को मारने आया हूँ।
बक — क्या? मैंने कौन सा अधर्म किया है? (हँसते हुए पेट सहलाते हुए)
भीम — नरभक्षण।
बकः — नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।
भीमः — नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।
बकः — क्षत्रियोऽसि?
भीमः — बाढम्, क्षत्रियोऽस्मि।
हिंदी अनुवादबक — नरभक्षण तो माँसाहारी राक्षसों का धर्म है।
भीम — और नररक्षण राजाओं और क्षत्रियों का धर्म है।
बक — क्या तुम क्षत्रिय हो?
भीम — हाँ, निश्चित ही क्षत्रिय हूँ।
रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्।
निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥
हिंदी अनुवादमैं साधु-लोगों का रक्षक हूँ, बाहुबलियों में श्रेष्ठ हूँ, हिडिम्ब का नाश करने वाला हूँ और तुम जैसों के लिए मृत्यु हूँ।
बकः — अहह! मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान्?
भीमसेनः — कामम्! कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः।
बकः — इदमस्ति मे भागधेयम्। चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्। श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः।
भीमसेनः — इदं मे स्वस्त्ययनं यन्मां श्लाघनीयं रिपुं मन्यसे। अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्।
हिंदी अनुवादबक — अरे! मेरे मित्र हिडिम्ब का वध करने वाले कुन्तीपुत्र तुम हो?
भीमसेन — हाँ, निश्चित ही! मैं कुन्तीपुत्र भीमसेन हूँ।
बक — यह तो मेरा सौभाग्य है। चिरकाल से खोजा हुआ शिकार स्वयं ही बाघ की गुफा में आ गया। तुम मेरे शत्रु होने योग्य हो।
भीमसेन — यही मेरे लिए शुभ है कि तुम मुझे प्रशंसनीय शत्रु मानते हो। अपने मित्र हिडिम्ब के पास जाओ।
बकः — वाचाट! क्षत्रियडिम्भ, गृहाण शस्त्रम्। शातयामि ते दर्पम्।
भीमसेनः — अलं शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, त्वन्मस्तकास्थिभिदुरोऽस्ति ममैष मुष्टिः।
(उभौ प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवर्तते। हतः पतति बकः।)
हिंदी अनुवादबक — अरे बड़बोले! क्षत्रिय के बच्चे, हथियार उठाओ। तुम्हारा घमंड चूर करता हूँ।
भीमसेन — हथियार उठाने का नाटक करने की जरूरत नहीं। यह मेरी मुट्ठी तुम्हारी खोपड़ी की हड्डियाँ तोड़ने में सक्षम है।
(दोनों प्रहार करते हैं। कुश्ती होती है। बक मारा जाकर गिर पड़ता है।)
प्रमुख श्लोकों का भावार्थ
- श्लोक 1 – पाठ का केन्द्रीय सन्देश
श्लोकः:
भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥
हिन्दी अनुवाद: भिक्षा देने से हम बहुत काल तक दूसरों द्वारा उपकृत होते रहे हैं। किया गया उपकार प्रत्युपकार से चुकाया जाए — यही सनातन धर्म है।
भावार्थ: जब हम किसी के घर आश्रय लेते हैं, भिक्षा पाते हैं, तो वह उपकार है। उस उपकार का प्रतिउपकार करना धर्म है। यही भारतीय संस्कृति का मूल सिद्धान्त है — ‘कृतज्ञता’ और ‘प्रत्युपकार’। भीम ने इसी भाव से बकासुर का सामना किया। - श्लोक 2 – भीम का पराक्रम
श्लोकः:
इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥
हिन्दी अनुवाद: ये दोनों हृष्ट-पुष्ट भुजाएँ मेरी सहजात (जन्म से साथ आए) सहायक हैं। जैसे सिंह क्षुद्र पशु को, वैसे मैं बक को नष्ट करूँगा।
भावार्थ: भीम के आत्मविश्वास और पराक्रम का उत्तम वर्णन है। किसी बाहरी हथियार की आवश्यकता नहीं — ये दोनों भुजाएँ ही पर्याप्त हैं। सिंह और क्षुद्र पशु की उपमा भीम और बक के बल-अन्तर को स्पष्ट करती है। - श्लोक 3 – भीम का क्षत्रिय-परिचय
श्लोकः:
रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्।
निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥
हिन्दी अनुवाद: मैं सज्जनों का रक्षक, बाहुवीरों में श्रेष्ठ, हिडिम्ब का विनाशक और तुम जैसे दुष्टों की मृत्यु हूँ।
भावार्थ: क्षत्रिय का धर्म सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का विनाश है। भीम अपना परिचय इन्हीं चार विशेषणों से देता है — रक्षक, श्रेष्ठ, हिडिम्बनाशक और मृत्यु। यह पाठ का सबसे ओजस्वी श्लोक है।
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 के कठिन शब्दों के अर्थ
महत्त्वपूर्ण शब्दार्थ
| संस्कृत शब्दः | संस्कृत में अर्थ | हिंदी अर्थ |
|---|---|---|
| प्रतिकृतम् | प्रत्युपकारः | प्रत्युपकार |
| आतिथेयः | अतिथिसेवाकारकः | अतिथि की सेवा करने वाला |
| प्रतिश्रुतम् | प्रतिज्ञातम् | वचन दिया गया |
| प्रतिश्रवः | प्रतिज्ञा | वचन |
| मृष्टान्नम् | मृष्टम् अन्नम् | स्वादिष्ट भोजन |
| आयोधनम् | युद्धम् | युद्ध |
| पीवरौ | स्थूलौ | हृष्ट-पुष्ट (दो) |
| जठरस्थाय | जठरे तिष्ठति तस्मै | पेट में स्थित के लिए |
| हुताशनाय | अग्नये | अग्नि को |
| निषूदकः | विनाशकः | विनाशक |
| पौराः | नागरिकाः | नागरिक |
| प्रत्यादेशम् | अनुल्लंघनम् | अवज्ञा |
| परिदेवयते | विलपति | विलाप करता है |
| औदरिकः | भोजनप्रियः | केवल पेट भरने वाला |
| मल्लयुद्धम् | मल्लानां युद्धम् | पहलवानों का युद्ध |
| श्रोत्रियः | वेदाध्येता | वेद पढ़ा हुआ ब्राह्मण |
| विशङ्कया | विशेषसंशयेन | विशिष्ट सन्देह से |
| क्षुद्रमृगम् | लघुवन्यप्राणिनम् | छोटे पशु को |
| कामम् | निश्चयेन | निश्चित ही |
| बाढम् | निश्चितम् | निश्चित |
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 में व्याकरण अध्ययन
शारदा अध्याय 9 में प्रयुक्त व्याकरण
व्याकरण – सन्धिविच्छेदः
| सन्धिपदम् | विच्छेदः | सन्धिभेदः |
|---|---|---|
| चैतावत् | च + एतावत् | वृद्धि-सन्धिः |
| सम्यगनुष्ठितम् | सम्यक् + अनुष्ठितम् | व्यञ्जन-सन्धिः |
| पुरस्यादूरवर्तिनि | पुरस्य + अदूरवर्तिनि | दीर्घ-सन्धिः |
| दुरात्मनो वृत्तम् | दुरात्मनः + वृत्तम् | विसर्ग-सन्धिः |
| मानुषोऽपि | मानुषः + अपि | विसर्ग-सन्धिः (पूर्वरूप) |
| नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम् | न + अस्ति + अत्र + किम् + अपि + अनुशोचितव्यम् | दीर्घ-सन्धिः |
| यदुचितं तदनुष्ठितम् | यत् + उचितम् + तत् + अनुष्ठितम् | यण्-सन्धिः |
| खल्वेकपुत्रः | खलु + एकपुत्रः | गुण-सन्धिः |
| कथं नु | कथम् + नु | व्यञ्जन-सन्धिः |
| धर्मसङ्ग्रहोऽत्र | धर्मसङ्ग्रहः + अत्र | विसर्ग-सन्धिः (पूर्वरूप) |
| मानुषभोजी स राक्षस | मानुषभोजी + सः + राक्षसः | दीर्घ-सन्धिः |
व्याकरण – समास
| विग्रहः | समस्तपदम् | समासभेदः |
|---|---|---|
| मृष्टम् अन्नम् | मृष्टान्नम् | कर्मधारयः |
| भुजयोः बलम् | भुजबलम् | षष्ठी-तत्पुरुषः |
| धर्माणां सङ्ग्रहः | धर्मसङ्ग्रहः | षष्ठी-तत्पुरुषः |
| मातुः आज्ञा | मातृआज्ञा | षष्ठी-तत्पुरुषः |
| धनुः धरति इति | धनुर्धरः | उपपद-तत्पुरुषः |
| खरदंष्ट्रः मृगाणाम् अधिपः | खरदंष्ट्रमृगाधिपः | कर्मधारयः |
| पुरस्य न दूरे वर्तते | पुरस्यादूरवर्तिनि | नञ्-तत्पुरुषः |
कक्षा 9 संस्कृत अध्याय 9 – परीक्षा के लिए अतिरिक्त प्रश्न उत्तर
अतिलघूत्तरीय प्रश्न
- अस्य पाठस्य मूलग्रन्थः कः?
(इस पाठ का मूलग्रन्थ कौन-सा है?)
उत्तरम्:
अस्य पाठस्य मूलग्रन्थः महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचितम् ‘एकचक्रम्’ इति लघुरूपकम् अस्ति, यत् महाभारतम् अवलम्ब्य विरचितम्।
(मूलग्रन्थ ‘एकचक्रम्’ है, जो महाभारत पर आधारित है।) - एकचक्रनगरे कः निवसति स्म?
(एकचक्र नगर में कौन रहता था?)
उत्तरम्:
एकचक्रनगरे पाण्डवाः कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति स्म।
(एकचक्र नगर में पाण्डव एक ब्राह्मण के घर रहते थे।) - ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ इत्यस्य किं तात्पर्यम्?
(इसका क्या तात्पर्य है?)
उत्तरम्:
अस्य तात्पर्यम् — यः जनः उपकारं करोति, तस्य कृते प्रत्युपकारः करणीयः। एषः एव सनातनधर्मः।
(जो उपकार करे उसका प्रत्युपकार करना ही सनातन धर्म है।) - बकासुरस्य वसतिस्थानं किम्?
(बकासुर का निवास-स्थान कहाँ है?)
उत्तरम्:
एकचक्रनगरस्य समीपे अदूरस्थे पर्वते बकासुरः वसति।
(एकचक्र नगर के समीप के पर्वत पर बकासुर रहता है।) - भीमः बकासुरस्य समीपं किमर्थं गतवान्?
(भीम बकासुर के पास क्यों गया?)
उत्तरम्:
भीमः प्रतिवेशिनः ब्राह्मणस्य उपकारस्य प्रत्युपकारार्थं तथा नगरवासिनां रक्षणार्थं बकासुरं हन्तुं गतवान्।
(पड़ोसी ब्राह्मण के उपकार का प्रत्युपकार करने और नगरवासियों की रक्षा के लिए भीम गया।) - युधिष्ठिरः कुन्त्याः निर्णयं कथम् अपश्यत्?
(युधिष्ठिर ने कुन्ती के निर्णय को कैसे देखा?)
उत्तरम्:
युधिष्ठिरः उक्तवान् — ‘यस्य भीमस्य भुजबलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे, यं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते, तस्य प्रेषणं न समर्थयामि।’
(युधिष्ठिर ने कहा — जिस भीम के भुजबल पर हम सुखपूर्वक सोते हैं, जिसे सोचकर दुर्योधन नहीं सोता — उसे भेजने का मैं समर्थन नहीं करता।) - भीमः अर्जुनं साथ क्यों नहीं ले गया? (संस्कृत में)
उत्तरम्:
भीमः उक्तवान् — ‘न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।’ इमौ पीवरौ बाहू एव मम सहायौ सन्ति।
(भीम ने कहा — तीखे नाखूनों वाला सिंह सहायक की अपेक्षा नहीं रखता। ये दोनों भुजाएँ ही पर्याप्त हैं।) - भीमः बकाय भोजनं कथम् अकरोत्?
(भीम ने बकासुर को भोजन क्यों नहीं परोसा?)
उत्तरम्:
भीमः सर्वं भोजनम् स्वयमेव जठरस्थाय हुताशनाय अर्पितवान् — अर्थात् सारा भोजन स्वयं खा गया।
(भीम ने सारा भोजन स्वयं खा लिया — पेट की अग्नि को अर्पण किया।) - बकेन भीमस्य किम् अभिहितम्?
(बक ने भीम से क्या कहा?)
उत्तरम्:
बकः उक्तवान् — ‘चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्।’ अर्थात् चिरकाल से खोजा हुआ शिकार स्वयं आ गया।
(बक ने कहा — ‘चिरकाल से खोजा मृग स्वयं बाघ की गुफा में आया।’) - ‘नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः’ — इत्युक्त्वा बकः किम् कथयितुम् इच्छति?
(बक इससे क्या कहना चाहता है?)
उत्तरम्:
बकः स्वपक्षं समर्थयितुम् इच्छति — यत् प्रत्येकस्य जातेः धर्मः भिन्नः अस्ति। राक्षसानां नरभक्षणम् एव स्वाभाविकः धर्मः।
(बक अपना पक्ष रखता है कि प्रत्येक जाति का अलग धर्म होता है — राक्षसों का नरभक्षण स्वाभाविक है।) - भीमेन दत्तः उत्तरः किम् आसीत्?
(भीम का उत्तर क्या था?)
उत्तरम्:
भीमः उत्तरम् अयच्छत् — ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।’ अर्थात् राक्षसानां धर्मः नरभक्षणं स्यात् किन्तु क्षत्रियाणां धर्मः नररक्षणं भवति।
(भीम ने कहा — नर-रक्षण क्षत्रियों का धर्म है। राक्षस का धर्म अलग, क्षत्रिय का अलग।) - ‘एकचक्रम्’ रूपकस्य रचयिता कः?
(‘एकचक्रम्’ रूपक के रचयिता कौन हैं?)
उत्तरम्:
‘एकचक्रम्’ रूपकस्य रचयिता महामहोपाध्यायः श्रीरङ्गनाथशर्मा। ते कर्णाटकराज्यस्य शिवमोग्गामण्डलस्य नडळल्ली ग्रामे जाताः।
(‘एकचक्रम्’ के रचयिता महामहोपाध्याय श्रीरङ्गनाथशर्मा हैं।) - ‘मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ इत्यस्य किं तात्पर्यम्?
(इसका क्या तात्पर्य है?)
उत्तरम्:
अस्य तात्पर्यम् — माता यद् आज्ञापयति, तत् उल्लंघनीयं न भवति। मातुः आज्ञायाः सम्मानं सर्वदा करणीयम्। एतत् भीमेन युधिष्ठिराय उक्तम्।
(माता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं करना चाहिए — यह भीम ने युधिष्ठिर को कहा।) - ‘अमरकोशे’ असुरस्य के पर्यायाः?
(अमरकोश में असुर के क्या पर्याय हैं?)
उत्तरम्:
अमरकोशे — ‘असुरः असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारिदानवाः’ इति असुरस्य पर्यायाः।
(असुर, असुरा, दैत्य, दैतेय, दनुज, इन्द्रारि, दानव — ये सब पर्याय हैं।) - भीम-बक संवाद में भीम का सर्वाधिक ओजस्वी कथन कौन-सा है?
उत्तरम्:
भीमस्य ओजस्वी कथनम् — ‘रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्। निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥’ एतत् श्लोकः पाठस्य सर्वाधिकं ओजस्वि वाक्यम् अस्ति।
(साधुजनों का रक्षक, बाहुवीरों में श्रेष्ठ, हिडिम्बनाशक और तुम जैसों की मृत्यु — यह पाठ का सबसे ओजस्वी श्लोक है।)
लघूत्तरीय प्रश्न
- पाठस्य पूर्वकथाप्रसंगं संस्कृते लिखत।
(पाठ का पूर्वकथा-प्रसंग संस्कृत में लिखिए।)
उत्तरम्:
पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति स्म। गृहस्वामिनः गृहे रोदनध्वनिं श्रुत्वा कुन्ती तत्र गता। शोकाकुलेन परिवारेण सा ज्ञापिता — एकचक्रनगरवासिनां समीपस्थेन बकनाम्ना असुरेण सह सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी स्वेच्छया तस्य भक्ष्यं भवेत्। तद्दिने तस्यैव ब्राह्मणपरिवारस्य बलिदानस्य वारः आसीत्। तेषां दुःस्थितिं ज्ञात्वा कुन्ती प्रतिज्ञाम् अकरोत् — ‘स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामि।’
(पाण्डव एकचक्र में ब्राह्मण के घर थे। रोने की आवाज सुनकर कुन्ती गईं। पता चला — बकासुर के लिए बारी-बारी बलि देते हैं — उस दिन उसी ब्राह्मण की बारी थी। कुन्ती ने वचन दिया।) - ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ — इत्यस्य भावार्थं संस्कृते वर्णयत।
उत्तरम्:
भीमः उक्तवान् — ‘भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृताः वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः।’ अस्य भावार्थः — वयं पाण्डवाः अनेकवर्षपर्यन्तं प्रतिवेशिनः ब्राह्मणस्य भिक्षादानेन पालिताः। सः अस्माकम् उपकारः अकरोत्। अतः तस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः करणीयः। यः जनः उपकारस्य प्रत्युपकारं करोति, सः एव धार्मिकः — एषः एव सनातनः शाश्वतश्च धर्मः।
(हम पाण्डव ब्राह्मण की भिक्षा से पले। उसका उपकार था। अतः उसका प्रत्युपकार हमारा धर्म है — यही सनातन धर्म है।) - भीमस्य पराक्रमं ‘इमौ हि पीवरौ बाहू…’ श्लोकस्य आधारेण संस्कृते वर्णयत।
उत्तरम्:
अर्जुनः भीमेन सह गन्तुम् इच्छति स्म। भीमः उक्तवान् — ‘मा मैवम्। न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।’ सः श्लोकम् उक्तवान् — ‘इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा।’ अस्य अर्थः — एतौ स्थूलौ भुजौ मम जन्मसिद्धौ सहायकौ स्तः। सिंहः यथा क्षुद्रं वन्यप्राणिनं विनाशयति, तथैव अहम् बकं विनाशयिष्यामि। एतत् भीमस्य आत्मविश्वासस्य ओजस्वी प्रकटीकरणम् अस्ति।
(भीम ने कहा — ये दोनों भुजाएँ ही पर्याप्त हैं। जैसे सिंह क्षुद्र पशु को, वैसे बक को नष्ट करूँगा। यह भीम के आत्मविश्वास की ओजस्वी अभिव्यक्ति है।) - भीम-बक संवाद का क्षत्रिय-धर्म विषयक अंश संस्कृते वर्णयत।
उत्तरम्:
बकः पूछवान् — ‘कोऽयं मम अधर्मः?’ भीमः उक्तवान् — ‘नरभक्षणम्।’ बकः उक्तवान् — ‘नरभक्षणं मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।’ भीमः प्रतिवचनम् अयच्छत् — ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।’ अयं संवादः स्पष्टयति — प्रत्येकस्य वर्गस्य धर्मः भिन्नः भवति। राक्षसः स्वधर्मं वदति। क्षत्रियः भीमः स्वधर्मं — नररक्षणम् — स्मारयति। क्षत्रियस्य धर्मः सदा प्रजाया रक्षणम् एव।
(बक ने अधर्म पूछा — भीम ने नरभक्षण कहा। बक बोला — यह राक्षसों का धर्म है। भीम बोला — नर-रक्षण क्षत्रियों का धर्म है। यह संवाद धर्म की अवधारणा को स्पष्ट करता है।) - ‘नन हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ — इसकी सार्थकता पाठ के संदर्भ में संस्कृते स्पष्टीकुरुत।
उत्तरम्:
युधिष्ठिरः कुन्त्याः निर्णयं न समर्थितवान् — यतः सः भीमस्य सुरक्षायाः विषये चिन्तितः आसीत्। भीमः युधिष्ठिरम् उक्तवान् — ‘धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।’ अस्य तात्पर्यम् — मातृआज्ञायाः सम्मानं सर्वप्रथमं करणीयम्। धर्मराजः धर्मज्ञः — अतः सः एतत् जानीयात् यत् मातृआज्ञोल्लंघनं धर्मविरुद्धम् अस्ति। भारतीयसंस्कृतौ ‘मातृदेवो भव’ इत्यस्य आचरणम् अत्र दर्शितम्।
(माता की आज्ञा का उल्लंघन धर्मविरुद्ध है — यह भीम ने युधिष्ठिर को याद दिलाया। ‘मातृदेवो भव’ का आचरण यहाँ प्रकट होता है।) - भीम-बक मल्लयुद्ध के पूर्व के संवाद की विशेषता संस्कृते वर्णयत।
उत्तरम्:
युद्धपूर्वः संवादः अत्यन्तं रोचकः अस्ति। बकः भीमम् ‘वाचाट, क्षत्रियडिम्भ’ इति आक्षिपति। भीमः शान्तः — ‘अलं शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, त्वन्मस्तकास्थिभिदुरोऽस्ति ममैष मुष्टिः।’ अर्थात् — शस्त्र की क्या आवश्यकता? तुम्हारे मस्तक की हड्डी तोड़ने के लिए यह मुट्ठी पर्याप्त है। एतत् भीमस्य अपूर्वं आत्मविश्वासम् प्रकटयति। बकः ‘श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः’ — तुम प्रशंसनीय शत्रु हो — इत्युक्तवान्। भीमः उत्तरम् अयच्छत् — ‘अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्।’
(युद्ध से पहले का संवाद अत्यन्त रोचक है। बक ने भीम को नाटकबाज कहा। भीम ने कहा — मुट्ठी काफी है। यह संवाद भीम के अपूर्व आत्मविश्वास को प्रकट करता है।) - पाठ में युधिष्ठिर के चरित्र की क्या विशेषताएँ हैं? संस्कृते वर्णयत।
उत्तरम्:
युधिष्ठिरस्य चरित्रं त्रिषु गुणेषु प्रकटितम् —
प्रथम — धर्मज्ञता: सः ‘धर्मं विजानता’ इत्युक्तः — अर्थात् धर्म को जानने वाला।
द्वितीय — स्नेहः: ‘यस्य भुजबलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे’ — भीम के प्रति गहरा स्नेह और चिन्ता।
तृतीय — विवेकशीलता: माता के निर्णय पर प्रश्न — यह उसकी विचारशीलता का प्रमाण।
अन्ततः भीम के तर्क से आश्वस्त होकर युधिष्ठिर मान जाता है — यह उसकी धर्मनिष्ठा का प्रमाण है।
(युधिष्ठिर का चरित्र — धर्मज्ञ, स्नेही और विवेकशील — तीनों गुण इस पाठ में प्रकट होते हैं।) - बकासुर के चरित्र की विशेषताएँ संस्कृते वर्णयत।
उत्तरम्:
बकस्य चरित्रम् अनेकरीत्या प्रकटितम् —
प्रथम — आतंककारी: सः नगरवासिभ्यः बलिम् आहरति — प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी तस्य भक्ष्यः भवति।
द्वितीय — हास्यास्पद: बकः स्वधर्मम् ‘मांसाशिनां धर्मः’ इति सिद्ध करोति।
तृतीय — वीरता: बकः भीमं ‘श्लाघनीयः शत्रुः’ इति स्वीकरोति।
चतुर्थ — षड्यन्त्री: भीमं मारिष्यामि इति अभिमानः।
अन्ततः बकः मल्लयुद्धे भीमेन हतः पतति।
(बकासुर — आतंककारी, हास्यास्पद तर्ककर्ता, किन्तु कुछ हद तक वीर — अन्त में भीम के हाथों मारा जाता है।)
दीर्घउत्तरीय प्रश्न
1. बकासुर-वध कथा का क्रमबद्ध सारांश लिखिए।
उत्तरम्:
- पूर्वकथा: पाण्डव एकचक्र नगर में एक ब्राह्मण के घर रह रहे थे। एक दिन कुन्ती ने रोने की आवाज सुनी। पता चला — नगर के समीप के पर्वत पर ‘बक’ नामक असुर रहता है। नगरवासियों की सन्धि है — बारी-बारी से एक व्यक्ति उसका भोजन बनेगा। उस दिन उसी ब्राह्मण की बारी थी। कुन्ती ने वचन दिया — ‘अपने पुत्रों में से एक को भेजूँगी।’
- भीम का संकल्प: भीम ने कहा — ‘मैं ही जाऊँगा। भिक्षा देने से हम बहुत काल तक उपकृत हुए हैं। उपकार का प्रत्युपकार करना सनातन धर्म है।’ युधिष्ठिर ने माता के निर्णय पर चिन्ता व्यक्त की किन्तु भीम ने कहा — ‘माता की आज्ञा का उल्लंघन नहीं होना चाहिए।’ अर्जुन साथ जाने को तैयार हुआ — भीम ने मना किया — ‘सिंह को सहायक की आवश्यकता नहीं।’
- भीम-बक संवाद: भीम ने सारा भोजन स्वयं खा लिया। बक ने कहा — ‘परोसो।’ भीम ने कहा — ‘तुम्हें मारने आया हूँ।’ बक ने कहा — ‘नरभक्षण राक्षसों का धर्म है।’ भीम ने कहा — ‘नर-रक्षण क्षत्रियों का धर्म है।’ बक ने भीम को हिडिम्ब के हत्यारे के रूप में पहचाना। भीम ने कहा — ‘हाँ, मैं भीमसेन हूँ।’ बक ने प्रशंसा की — ‘प्रशंसनीय शत्रु हो।’ भीम ने कहा — ‘हिडिम्ब का अनुसरण करो।’
- मल्लयुद्ध और विजय: दोनों में मल्लयुद्ध हुआ। बक मारा गया और गिर पड़ा। नगरवासियों को मुक्ति मिली।
2. ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ – इस सन्देश की सार्थकता आज के जीवन में विस्तार से समझाइए।
उत्तरम्:
- श्लोक का भाव: ‘भिक्षा देने से हम बहुत काल तक दूसरों द्वारा उपकृत हुए। किए गए उपकार का प्रत्युपकार होना चाहिए — यही सनातन धर्म है।’
- कृतज्ञता – भारतीय संस्कृति का आधार: भारतीय संस्कृति में कृतज्ञता को सर्वोच्च गुण माना गया है। जो उपकार करे उसे भूलना नहीं चाहिए। पाण्डवों ने ब्राह्मण का उपकार याद रखा और उस ब्राह्मण की जान बचाने के लिए भीम ने प्राण संकट उठाया।
- प्रत्युपकार – धर्म की परिभाषा: धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं। जो आपका उपकार करे उसका प्रत्युपकार करना भी धर्म है। भीम ने यही किया।
- ‘सनातनः’ शब्द का महत्त्व: यह धर्म ‘सनातन’ है — अर्थात् सदा से है, सदा रहेगा। यह किसी एक काल या देश का नियम नहीं, अपितु सार्वभौमिक और शाश्वत सत्य है।
- आज के जीवन में प्रासंगिकता: आज के समय में लोग उपकार पाने के बाद उसे भूल जाते हैं। माता-पिता, गुरु, समाज — जिन्होंने हमें बनाया — उनका प्रत्युपकार करना हमारा धर्म है। जो समाज से पाते हैं उसे समाज को लौटाना ही सच्चा धर्म है।
- निष्कर्ष: ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’ — यह केवल श्लोक नहीं, जीवन का सूत्र है। जो इसे जानकर आचरण करता है, वही वास्तव में धार्मिक है।
3. भीमसेन के चरित्र की विशेषताएँ विस्तार से लिखिए।
उत्तरम्:
भीमसेन इस पाठ का केन्द्रीय पात्र है। उसके चरित्र की अनेक विशेषताएँ हैं –
- धर्मनिष्ठा: भीम ने तत्काल कहा — ‘उपकार का प्रत्युपकार सनातन धर्म है।’ धर्म का ज्ञान और उसे आचरण में लाना — यह उसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
- मातृभक्ति: ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ — माता की आज्ञा का पालन करना भीम का अटल नियम है। जब युधिष्ठिर ने विरोध किया, तब भीम ने माता की आज्ञा को सर्वोपरि माना।
- कृतज्ञता: पड़ोसी ब्राह्मण ने उपकार किया था। भीम ने उसे याद रखा और बकासुर का सामना करके उस उपकार का बदला चुकाया।
- अपूर्व पराक्रम और आत्मविश्वास: ‘इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम’ — भीम को किसी बाहरी सहायक की आवश्यकता नहीं। ‘सिंहः क्षुद्रमृगं यथा’ — यह आत्मविश्वास अद्वितीय है।
- विनोदी स्वभाव: भोजन मिला तो प्रसन्न हुआ — युद्ध भी मिला तो और अधिक प्रसन्न हुआ। ‘अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे’ — भाइयों की चुटकी पर भी वह प्रसन्नचित्त रहा।
- क्षत्रिय-धर्म का पालन: ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः’ — भीम ने बकासुर के सामने क्षत्रिय-धर्म की घोषणा की। वह जानता था कि सज्जनों की रक्षा और दुर्जनों का विनाश ही क्षत्रिय का कर्तव्य है।
- निष्कर्ष: भीमसेन इस पाठ में एक आदर्श पुत्र, भाई, कृतज्ञ व्यक्ति और पराक्रमी क्षत्रिय के रूप में प्रकट होता है।
4. भीम-बक संवाद में धर्म की अवधारणा किस प्रकार प्रकट हुई है? विस्तार से लिखिए।
उत्तरम्:
भीम और बक का संवाद अत्यन्त रोचक है – दोनों अपने-अपने ‘धर्म’ का दावा करते हैं।
- बक का तर्क: बकासुर ने कहा — ‘नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।’ अर्थात् मांसाहारी राक्षसों का धर्म नरभक्षण है — मैं अपना धर्म पाल रहा हूँ।
- भीम का तर्क: भीम ने तत्काल उत्तर दिया — ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।’ अर्थात् नर-रक्षण क्षत्रियों का धर्म है — मैं अपना धर्म पाल रहा हूँ।
- संवाद का महत्त्व: यह संवाद दो विरोधी धर्मों का टकराव है। बक कहता है — ‘मैं खाता हूँ — यही मेरा धर्म।’ भीम कहता है — ‘मैं बचाता हूँ — यही मेरा धर्म।’ प्रकृति में हिंसा और रक्षा दोनों हैं — किन्तु मानव-समाज का धर्म रक्षा है, हिंसा नहीं।
- क्षत्रिय-धर्म की घोषणा: ‘रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्’ — क्षत्रिय सज्जनों का रक्षक होता है। यह उसका कर्तव्य है। भीम ने बकासुर को यही बताया।
- आज के लिए सन्देश: धर्म वह नहीं जो केवल अपने स्वार्थ के लिए हो। धर्म वह है जो दूसरों की रक्षा करे। ‘नररक्षणम्’ — दूसरों की रक्षा करना ही वास्तविक धर्म है।
5. ‘एकचक्रम्’ रूपक के रचयिता श्रीरङ्गनाथशर्मा का संक्षिप्त परिचय देते हुए बताइए कि यह पाठ महाभारत से किस प्रकार जुड़ा है।
उत्तरम्:
रचयिता का परिचय: महामहोपाध्याय श्रीरङ्गनाथशर्मा का जन्म ७ अप्रैल १९२६ को कर्णाटक के शिवमोग्गा मण्डल के नडळल्ली ग्राम में हुआ था। उन्होंने २०१४ में देह त्याग किया। उनकी उपाधियाँ थीं — महामहोपाध्याय, विद्यावारिधि, व्याकरणशास्त्रप्रवीण। उन्हें राष्ट्रप्रशस्ति और राज्यप्रशस्ति भी प्राप्त थे। वे बेंगलुरु के चामराजेन्द्र संस्कृत महाविद्यालय में व्याकरण के प्राध्यापक रहे। उन्होंने व्याकरण, अलंकारशास्त्र और अद्वैत-वेदान्त में महारत हासिल की। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — बाहुबलिविजयम्, एकचक्रम्, कुसुमाञ्जलिः और श्रीशङ्करचरितामृतम्।
महाभारत से सम्बन्ध: रामायण और महाभारत — ये दोनों भारत के महाकाव्य हैं। महाभारत में अनेक प्रसंग हैं। उनमें से एक है — वनपर्व में बकासुर-वध। इसी प्रसंग को श्रीरङ्गनाथशर्मा ने ‘एकचक्रम्’ नामक लघु रूपक में नाट्यरूप दिया। महाभारत में जो घटना वर्णनात्मक रूप में है, वह इस रूपक में संवाद-रूप में जीवन्त हो गई। पाठ के तृतीय और चतुर्थ अंक से लिया गया यह नाट्यांश मूल महाभारत की कथा को संस्कृत नाटक के रूप में प्रस्तुत करता है।
पाठ की विशेषता: यह पाठ महाभारत की गहराई को एक लघु रूपक में समेटता है। भीम का पराक्रम, कुन्ती की धर्मनिष्ठा, युधिष्ठिर की विवेकशीलता और बकासुर का अहंकार — ये सभी पात्र और उनके गुण मूल महाभारत से लिए गए हैं।
अक्सर पूंछे जाने वाले प्रश्न
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 9 पढ़ाने की सर्वोत्तम विधि क्या है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 एक नाटक है। छात्रों में पात्र बाँटकर अभिनय-पाठ कराएँ — कुन्ती, भीम, युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव और बक। पहले पाठ का हिन्दी अनुवाद पढ़ें, फिर संस्कृत संवाद — इससे नाटकीयता और भाषा दोनों सधते हैं।
क्या कक्षा 9 संस्कृत शारदा का अध्याय 9 कठिन है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 एक रोचक नाटक है। संवाद-शैली होने से पाठ समझने में सरल है। नाट्य-प्रसंग की भाषा सजीव और रोचक है। सन्धिविच्छेद की संख्या अधिक है — उसके लिए 2-3 दिन का अभ्यास पर्याप्त है। कुल मिलाकर 5-6 दिन में पाठ भली-भाँति तैयार हो सकता है।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 9 में अच्छे अंक पाने के लिए क्या करें?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 में अच्छे अंकों के लिए –
- तीनों श्लोकों को कण्ठस्थ करें
- ‘केन/कया — कं/कां प्रति’ अभ्यास के सभी उत्तर याद रखें
- सन्धिविच्छेद के सभी उत्तर तैयार रखें
- एकपदेन और पूर्णवाक्येन दोनों अभ्यास याद करें
- वाच्यपरिवर्तन का अभ्यास करें।
कक्षा 9 संस्कृत के शारदा पाठ्यपुस्तक के पाठ 9 को एक दिन में कैसे तैयार करें?
एक दिन में — पहले हिन्दी में पूर्वकथा और पाठ का सार पढ़ें (25 मिनट), तीनों श्लोकों का अनुवाद याद करें (20 मिनट), अभ्यास 1 और 2 के उत्तर (25 मिनट), अभ्यास 3 और 5-7 (20 मिनट), सन्धिविच्छेद और वाच्यपरिवर्तन (20 मिनट)।
इस पाठ के शीर्षक ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ का क्या अर्थ है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 के शीर्षक का अर्थ है — ‘किए गए उपकार का प्रत्युपकार हो — यही सनातन धर्म है।’ ‘कृतम्’ = किया गया उपकार, ‘प्रतिकृतम्’ = उसका बदला, ‘भूयात्’ = होना चाहिए। यह पाठ का केन्द्रीय सन्देश है — जिसने हमारा उपकार किया, उसका प्रत्युपकार करना हमारा धर्म है।
कक्षा 9 शारदा का पाठ 9 किस ग्रन्थ पर आधारित है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा अध्याय 9 महाभारत के बकासुर-वध प्रसंग पर आधारित ‘एकचक्रम्’ नामक लघु रूपक से उद्धृत है। इस रूपक के रचयिता महामहोपाध्याय श्रीरङ्गनाथशर्मा हैं, जो कर्णाटक के विद्वान् थे।
कक्षा 9 संस्कृत पाठ 9 में परीक्षा में सबसे अधिक क्या पूछा जाता है?
कक्षा 9 संस्कृत शारदा पाठ 9 से परीक्षा में — एकपदेन, पूर्णवाक्येन उत्तर, ‘केन/कया — कं प्रति’ पहचान, सन्धिविच्छेद, पर्यायवाची-विपरीतार्थक, विशेषण-विशेष्य, समास, वाच्यपरिवर्तन और तीनों श्लोकों का भावार्थ सर्वाधिक पूछे जाते हैं।
