एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 9 कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्?

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 कोऽरुक्? कोऽरुक्? कोऽरुक्? एनसीईआरटी समाधान में स्वास्थ्य और आहार से जुड़े महत्वपूर्ण आयुर्वेदिक सिद्धांतों को रोचक कथा के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। इस पाठ में भगवान धन्वंतरि के शुक (तोता) रूप में प्रकट होकर वैद्य वाग्भट की परीक्षा लेने की कथा है, जिसके माध्यम से ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ जैसे स्वास्थ्य के मूल नियम समझाए गए हैं। यह अध्याय विद्यार्थियों को न केवल संस्कृत भाषा का ज्ञान देता है, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली अपनाने की प्रेरणा भी प्रदान करता है।
अध्याय 9 का संस्कृत से हिंदी अनुवाद

एनसीईआरटी कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 9 के प्रश्न उत्तर

अभ्यासात् जायते सिद्धिः

1. अधोलिखितान् प्रश्नान् एकपदेन उत्तरत –

(क) शकुरूपं कः धृतवान्?
(ख) धन्वन्तरिः (शकुः) कुत्र उपविश्य ध्वनिम् अकरोत्?
(ग) अन्ते शकुः कस्य आश्रमस्य समीपं गतवान्?
(घ) ऋतवः कति सन्ति?
(ङ) वाग्भटः शकस्य रहस्यं केभ्यः उक्तवान्?
उत्तर:
(क) धन्वन्तरिः
(ख) वृक्षे
(ग) वाग्भटस्य
(घ) षट्
(ङ) शिष्येभ्यः

2. पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 2 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 2 के उत्तर का चित्र

3. अधोलिखितानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 3 का चित्र

उत्तर:
(क) मधुरां वाणीं श्रुत्वा चिकित्सानिरतः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य सर्वतः अपश्यत्।
(ख) वाग्भटः झटिति तस्मै विहगाय मधुराणि फलानि समर्पितवान्।
(ग) छात्राः अपृच्छन् यत् शकुः “कोऽरुक्” इति किमर्थं वदति इति।
(घ) भगवान् धन्वन्तरिः अस्माकं कृते स्वास्थ्यरक्षणाय सूत्ररूपेण उपदेशं प्रदत्तवान्।
(ङ) ऋषयः नित्यं “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः” इति प्रार्थनां कुर्वन्ति।

4. पाठात् यथोचितानि विशेषणपदानि विशेष्यपदानि वा चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 4 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 4 के उत्तर का चित्र

5. पाठं पठित्वा अधोलिखितपट्टिकातः पदानि चित्वा उचितसञ्चिकायां पूरयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 5 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 5 के उत्तर का चित्र

6. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा तेन सम्बद्धं श्लोकं पाठात् चित्वा लिखत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 9 के प्रश्न 6 का चित्र

उत्तर:
(क) सम्बद्धः श्लोकः:
व्यायामः प्रातरुत्थाय, नित्यं दन्तविशोधनम्।
स्वच्छजलेन सुस्नानं, बुभुक्षायाञ्च भोजनम्॥

(ख) सम्बद्धः श्लोकः:
तच्च नित्यं प्रयुञ्जीत, स्वास्थ्यं येनानुवर्तते।
अजातानां विकाराणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥

(ग) सम्बद्धः श्लोकः:
तस्याशिताद्यादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते।
तस्यर्तुसात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥

अध्याय 9 का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद नीचे दिया गया है ताकि विद्यार्थी इस पाठ को सरलता और स्पष्टता से समझ सकें।

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 9 का हिंदी अनुवाद

अम्ब! महती बुभुक्षा बाधते, शीघ्रं भोजनं परिवेषयतु।
हिंदी अनुवादमाँ! बहुत भूख लग रही है, शीघ्र भोजन परोसिए।

वत्से, भोजनम् अत्युष्णम् अस्ति, किञ्चित् प्रतीक्षस्व।
हिंदी अनुवादबेटे, भोजन बहुत गर्म है, थोड़ा प्रतीक्षा करो।

वत्से! मुखे दाहः भवेत्, अस्मिन् च ‘अत्युष्णं भोजनं हितकरं न भवति’ इति आयुर्वेदस्य उपदेशः।
हिंदी अनुवादबेटे! मुँह में जलन होगी, और ‘अत्यधिक गर्म भोजन हितकर नहीं होता’ यह आयुर्वेद का उपदेश है।

उष्णं भोजनं किमर्थं न ददाति?
हिंदी अनुवादगर्म भोजन क्यों नहीं देती?

अम्ब! आयुर्वेदे बहवः आहारनियमाः सन्ति इति अस्माकं शिक्षकः अपि बोधयति।
हिंदी अनुवादमाँ! आयुर्वेद में अनेक आहार नियम हैं ऐसा हमारे शिक्षक भी बताते हैं।

सत्यम् उक्तं वत्स!
हिंदी अनुवादसत्य कहा बेटे!

आहारविषये एकः रोचकः प्रसङ्गः अस्ति। युवाम् इच्छथः चेत् श्रावयामि।
हिंदी अनुवादआहार विषय में एक रोचक प्रसंग है। तुम लोग चाहो तो सुनाती हूँ।

अस्तु अम्ब! यावत् भोजनं भोक्तुं योग्यं भवति तावत् तं श्रावयतु।
हिंदी अनुवादअच्छा माँ! जब तक भोजन खाने योग्य हो जाए तब तक वह सुनाइए।

अस्तु, श्रूयताम्।
हिंदी अनुवादअच्छा, सुनो।

‘भारतवर्षे वैद्यः हिविख्यानानां व्याधीनां शमनं करं सुवस्ति’ इति ज्ञातुं पुरा भगवान् धन्वन्तरिः मनोहरं शुकरूपं धृत्वा प्रतिग्रामम् अभ्रमत्।
हिंदी अनुवाद‘भारतवर्ष में वैद्य प्रसिद्ध रोगों का शमन करने में सक्षम हैं या नहीं’ यह जानने के लिए पुराने समय में भगवान धन्वन्तरि ने मनोहर तोते का रूप धारण करके गाँव-गाँव भ्रमण किया।

भ्रमणकाले सः बहूनां प्रख्यातवैद्यानां भवनपार्श्वस्थे वृक्षे उपविश्य ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति ध्वनिम् अकरोत्।
हिंदी अनुवादभ्रमण के समय वे अनेक प्रसिद्ध वैद्यों के घर के पास के वृक्ष पर बैठकर ‘कौन स्वस्थ है’ ‘कौन स्वस्थ है’ ‘कौन स्वस्थ है’ यह ध्वनि करते थे।

किन्तु खगस्य ‘कोऽरुक्’ इति शब्दं प्रति कस्यापि अवधानं नास्ति।
हिंदी अनुवादकिन्तु पक्षी के ‘कौन स्वस्थ है’ इस शब्द की ओर किसी का ध्यान नहीं था।

अन्ते सः वैद्यं वाग्भटस्य कुटीसमीपं गतवान्।
हिंदी अनुवादअंत में वे वैद्य वाग्भट की कुटिया के पास गए।

तत्र विशाले प्राङ्गणे स्थितं पुष्पतरुम् आरुह्य मधुरया स्वरया ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति शब्दम् अकरोत्।
हिंदी अनुवादवहाँ विशाल आँगन में स्थित पुष्पवृक्ष पर चढ़कर मधुर स्वर में ‘कौन स्वस्थ है’ ‘कौन स्वस्थ है’ ‘कौन स्वस्थ है’ यह शब्द किया।

मधुरां वाणीं श्रुत्वा किञ्चित् अनितरः वाग्भटः प्राङ्गणम् आगत्य स्वयम् उद्दिश्य अपश्यत्।
हिंदी अनुवादमधुर वाणी सुनकर कुछ उत्सुक हुए वाग्भट आँगन में आकर स्वयं देखने लगे।

क्षणात्  वाग्भटः मनोहरं तं शुकम् अपश्यत्।
हिंदी अनुवादथोड़ी देर बाद वाग्भट ने मनोहर उस तोते को देखा।

सार्थक मानुषध्वनिं सुस्वरं शुकं दृष्ट्वा विस्मितः वाग्भटः चिन्तितवान् – “नायं लौकिकः खगः। एषः निश्चयेन खगश्च न देवविशेषः अस्ति”।
हिंदी अनुवादएक सार्थक  की मानवीय ध्वनि और सुस्वर वाले तोते को देखकर आश्चर्यचकित हुए वाग्भट ने सोचा – “यह सामान्य पक्षी नहीं है। यह निश्चित ही पक्षी नहीं बल्कि कोई देवता विशेष है”।

सः झटिति तस्मै विहगाय मधुरासि फलानि समर्पितवान् परन्तु सः खगः फलानि न गृहीत्वा पुनरपि तस्मै एव ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ ‘कोऽरुक्’ इति प्रश्नवाचकेण शब्दमकरोत्।
हिंदी अनुवादउन्होंने तुरंत उस पक्षी को मधुर फल समर्पित किए परन्तु वह पक्षी फलों को न लेकर पुनः उन्हीं से ‘कौन स्वस्थ है’ ‘कौन स्वस्थ है’ ‘कौन स्वस्थ है’ यह प्रश्नवाचक शब्द किया।

अथ वैद्यः वाग्भटः अचिन्तयत् यत् यावत् खगः स्वप्रश्नस्य नाम् उत्तरासि न प्राप्नोति तावत् अयं भोजनं न वाञ्छति इति।
हिंदी अनुवादतब वैद्य वाग्भट ने सोचा कि जब तक पक्षी अपने प्रश्न का उत्तर प्राप्त नहीं करता तब तक यह भोजन नहीं चाहता।

ततः सः अचिरादेव स्रोतरूपासि त्रीसि उत्तरासि प्रददात् – ‘हितभुक्’ ‘मितभुक्’ ‘ऋतुभुक्’ इति।
हिंदी अनुवादतब उन्होंने तुरंत ही सूत्र रूप में तीन उत्तर दिए – ‘हितभुक्’ ‘मितभुक्’ ‘ऋतुभुक्’।

समुचितम् उत्तरं श्रुत्वा अत्यन्तं प्रीतः सः शुकः वाग्भटेन समर्पितानि फलानि खादितवान्।
हिंदी अनुवादउचित उत्तर सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुआ वह तोता वाग्भट द्वारा समर्पित फलों को खा गया।

ततः शुकरूपः धन्वन्तरिः वाग्भटम् उक्तवान् – “वत्स! अहं धन्वन्तरिः अस्मि। उत्तम्यं वैद्यं अन्वेषणाय भारतवर्षे सर्वत्र परिभ्रमन् अत्र समागतः।
हिंदी अनुवादतब तोते के रूप में धन्वन्तरि ने वाग्भट से कहा – “बेटे! मैं धन्वन्तरि हूँ। उत्तम वैद्य की खोज में भारतवर्ष में सर्वत्र भ्रमण करते हुए यहाँ आया हूँ।

तव उत्कृष्टेन आयुर्वेदज्ञानेन अहम् अतीव सन्तुष्टः अस्मि। त्वम् अवश्यमेव आयुर्वेद-अष्टाङ्गविचार-सारभूतं तन्त्रं विरचयेः”
हिंदी अनुवादतुम्हारे उत्कृष्ट आयुर्वेद ज्ञान से मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। तुम अवश्य ही आयुर्वेद-अष्टांग विचार-सार भूत ग्रंथ की रचना करो”

एतद् उक्त्वा सः अन्तर्हितः।
हिंदी अनुवादयह कहकर वे अन्तर्धान हो गए।

एतत् सर्वं दूरतः पश्यतः विस्मिताः शिष्याः आचार्यस्य वाग्भटस्य समीपम् आगत्य अपृच्छन् –
हिंदी अनुवादयह सब दूर से देख रहे आश्चर्यचकित शिष्य आचार्य वाग्भट के पास आकर पूछने लगे –

“गुरुवर! शुकः ‘कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्’ इति उक्तवान्, तस्य कोऽर्थः? अपि च भवान् किम् उत्तरं दत्तवान्?”
हिंदी अनुवाद“गुरुवर! तोते ने ‘कौन स्वस्थ है कौन स्वस्थ है कौन स्वस्थ है’ ऐसा कहा, उसका क्या अर्थ था? और आपने क्या उत्तर दिया?”

तदा वाग्भटः छात्राणां जिज्ञासाम् उपशमयन् कथयति – “छात्राः, शृणुत! एषः शुकः वदति यत् कः अरुक् अर्थात् कः स्वस्थः नीरोगः वा वर्तते?
हिंदी अनुवादतब वाग्भट छात्रों की जिज्ञासा शांत करते हुए कहते हैं – “छात्रों, सुनो! यह तोता कहता है कि कौन स्वस्थ अर्थात् कौन स्वस्थ या निरोग है?

तदा मया उक्तम् – ‘यः हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् च, सः एव सर्वदा स्वस्थः भवति’।”
हिंदी अनुवादतब मैंने कहा – ‘जो हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक् है, वही सदा स्वस्थ रहता है’।”

छात्राः पुनः जिज्ञासया अपृच्छन् “आचार्य! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ इति – एतेषां कः आशयः?”
हिंदी अनुवादछात्र पुनः जिज्ञासा से पूछने लगे “आचार्य! ‘हितभुक्, मितभुक्, ऋतुभुक्’ – इनका क्या आशय है?”

वाग्भटः वदति – “शिष्याः! महर्षेः चरकस्य नाम भवन्तः श्रुतवन्तः स्युः। सः हितभुक्-विषये कथयति —
हिंदी अनुवादवाग्भट कहते हैं – “शिष्यों! महर्षि चरक का नाम आप लोगों ने सुना होगा। वे हितभुक् के विषय में कहते हैं —

तच्च हितं प्रयुञ्जीत स्वास्थ्यं येनानुवर्तते। अजातानामथवा हि कर्माणामनुत्पत्तिकरं च यत्॥ १॥
हिंदी अनुवादऔर उस हितकर आहार का सेवन करना चाहिए जिससे स्वास्थ्य बना रहे। अथवा जो (रोगों का) जो पैदा नहीं हुए हैं उनकी उत्पत्ति न करने वाला हो॥ १॥

अर्थात् यस्य आहारस्य सेवनेन स्वास्थ्यस्य रक्षणं भवेत्, न जातानाम् अर्थात् अनुत्पन्नानां विकाराणाम् उत्पत्तिः न भवेत्, तादृशः आहारः सेवनीयः।
हिंदी अनुवादअर्थात् जिस आहार के सेवन से स्वास्थ्य की रक्षा हो, जो उत्पन्न नहीं हुए अर्थात् जिन रोगों की उत्पत्ति नहीं हुई है उनकी उत्पत्ति न हो, वैसा आहार सेवन करना चाहिए।

अल्पेऽदाने गुरूणां च लघूनां चाति सेवने। मात्राकारणमुद्दिष्टं द्रव्याणां गुरुलाघवे॥ २॥
हिंदी अनुवादथोड़े (परिमाण) में खाने पर गुरु (पदार्थों की) और हल्के (पदार्थों) के अधिक सेवन में। द्रव्यों के गुरु-लाघव में मात्रा का कारण बताया गया है॥ २॥

अर्थात् गरिष्ठद्रव्यासि अपि अल्पमात्रं सेवनेन सुपाच्यानि भवन्ति, लघुद्रव्यासि च अतिमात्रं सेवनेन हानिकरासि जायन्ते। अतः मात्रानुसारम् एव खादितव्यम्।
हिंदी अनुवादअर्थात् गुरु (भारी) पदार्थ भी थोड़ी मात्रा में सेवन करने से सुपाच्य होते हैं, और लघु पदार्थ अधिक मात्रा में सेवन करने से हानिकारक हो जाते हैं। अतः मात्रा के अनुसार ही खाना चाहिए।

एवमेव ऋतुभुक्-विषये उच्यते —
हिंदी अनुवादइसी प्रकार ऋतुभुक् के विषय में कहा जाता है —

तस्याहितादाहारात् बलं वर्णश्च वर्धते। तस्तु स्वात्म्यं विदितं चेष्टाहारव्यपाश्रयम्॥ ३॥
हिंदी अनुवादउसके हितकर आहार से बल और वर्ण बढ़ते हैं। उसका स्वात्म्य (अनुकूलता) जानी गई है इच्छा-आहार पर निर्भर॥ ३॥

अर्थात् ग्रीष्मः, वर्षा, शरद्, शिशिरः, हेमन्तः, वसन्तः चेति षट् ऋतवः भवन्ति।
हिंदी अनुवादयानी, ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, शिशिर, हेमन्त और वसन्त ये छः ऋतुएं होती हैं।

यः पुरुषः ऋतूनाम् अनुकूलं स्वास्थ्यप्रदम् आहारसेवनं जानाति तदनुसारम् आचरणं च करोति तस्य जनस्य अशितम् अर्थात् भुक्तं पीतं च सर्वमपि बलवर्धकं, वर्णरुचास्तिजनकं, सुखवर्धकम्, आयुर्वर्धकश्च भवति।
हिंदी अनुवादजो पुरुष ऋतुओं के अनुकूल स्वास्थ्यप्रद आहार सेवन को जानता है और तदनुसार आचरण करता है, उस व्यक्ति का खाया हुआ अर्थात् भोजन-पान सब कुछ बल बढ़ाने वाला, वर्ण और रुचि उत्पन्न करने वाला, सुख बढ़ाने वाला और आयु बढ़ाने वाला होता है।

अतः ऋतोः अनुसारं भोक्तव्यम् इति। नियमितरूपेण समयानुसारं सात्त्विकं भोजनम् आवश्यकमिति ऋतुभुक्-पदेन ज्ञायते।”
हिंदी अनुवादअतः ऋतु के अनुसार खाना चाहिए। नियमित रूप से समय के अनुसार सात्त्विक भोजन आवश्यक है यह ऋतुभुक् शब्द से ज्ञात होता है।”

एतत् सर्वं श्रुत्वा कश्चन छात्रः वाग्भटम् अपृच्छत् – “आचार्य! हितभुगादिविषये वयं तु ज्ञातवन्तः, किन्तु किं सः शुकः सन्तुष्टः अभवत्”?
हिंदी अनुवादयह सब सुनकर किसी छात्र ने वाग्भट से पूछा – “आचार्य! हितभुक् आदि के विषय में तो हम जान गए, किन्तु क्या वह तोता संतुष्ट हुआ?”

तदा वाग्भटः शुकस्य रहस्यम् उक्तवान् – “प्रियशिष्याः! अयं विहगः न सामान्यविहगः, अपि तु आयुर्वेदस्य पूज्यः देवः भगवान् धन्वन्तरिः एव स्वयं शुकरूपेण अत्र आगच्छत्।
हिंदी अनुवादतब वाग्भट ने तोते का रहस्य बताया – “प्रिय शिष्यों! यह पक्षी सामान्य पक्षी नहीं, अपितु आयुर्वेद के पूज्य देव भगवान धन्वन्तरि ही स्वयं तोते के रूप में यहाँ आए थे।

अस्माकं कृतेसंकल्पेण स्वास्थ्यरक्षणाय स्रोतरूपेण सन्देशं च प्रदत्तवान्, भवन्तः अपि शृणवन्तु स्मरन्तु च —
हिंदी अनुवादहमारे लिए संकल्प से स्वास्थ्य रक्षा के लिए सूत्र रूप में सन्देश भी दिया, आप लोग भी सुनो और याद रखो —

व्यायामः प्रातरुत्थानं, हितं दन्तधावनम्। स्वच्छजले सुस्नानं, बुभुक्षायां च भोजनम्॥ ४॥
हिंदी अनुवादव्यायाम, प्रातः उठना, हितकर दांतों का धोना। स्वच्छ जल में स्नान और भूख लगने पर भोजन॥ ४॥

अस्माकम् ऋषयः नित्यं प्रार्थनाम् अपि कुर्वन्ति। वयमपि स्मरामः —
हिंदी अनुवादहमारे ऋषि नित्य प्रार्थना भी करते हैं। हम भी याद रखें —

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥ ५॥
हिंदी अनुवादसभी सुखी हों, सभी निरोग हों। सभी भलाई देखें, कोई भी दुःख का भागी न हो॥ ५॥