एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 3 सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु
एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 3 सुभाषितरसं पीत्वा जीवनं सफलं कुरु में सुभाषितों के माध्यम से जीवन के महत्वपूर्ण नैतिक मूल्यों का वर्णन किया गया है। इस पाठ में बताया गया है कि सुभाषित यानी अच्छे और प्रेरणादायक वचन मनुष्य को सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं। इसमें विभिन्न नीतिश्लोकों के द्वारा गुणों की पहचान, विनम्रता, परोपकार, सत्य, सत्संग और पुरुषार्थ का महत्व समझाया गया है। यह अध्याय छात्रों को आदर्श मानव बनने तथा जीवन को सफल बनाने की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करता है।
अध्याय 3 का संस्कृत से हिंदी अनुवाद
एनसीईआरटी कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 3 के प्रश्न उत्तर
अभ्यासात् जायते सिद्धिः
1. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि एकपदेन लिखत –
(क) गीतानि के गायन्ति ?
(ख) कः बलं न वेत्ति ?
(ग) कः वसन्तस्य गुणं वेत्ति ?
(घ) मषूकः कस्य बलं न वेत्ति ?
(ङ) फलोद्गमैः के नम्राः भवन्ति ?
(च) केन सह सख्यं न करणीयम् ?
(छ) केन विना दैवं न सिध्यति ?
उत्तर:
(क) देवाः।
(ख) निर्बलः।
(ग) पिकः।
(घ) सिंहस्य।
(ङ) तरवः।
(च) दुर्जनेन।
(छ) पुरुषकारेण।
2. पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखत –
(क) तरवः कदा नम्राः भवन्ति ?
(ख) समृद्धिभिः के अनुद्धताः भवन्ति ?
(ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः कीदृशः भवति ?
(घ) सत्यं कदा सत्यं न भवति ?
(ङ) दैवं कदा न सिध्यति ?
उत्तर:
(क) तरवः फलोद्गमैः नम्राः भवन्ति।
(ख) समृद्धिभिः सत्पुरुषाः अनुद्धताः भवन्ति।
(ग) सत्पुरुषाणां स्वभावः परोपकारिणां भवति।
(घ) यदा छलम् अभ्युपैति तदा सत्यं सत्यं न भवति।
(ङ) पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति।
3. स्तम्भयोः मेलनं कुरुत –

उत्तर:

4. अधः प्रदत्तमञ्जूषातः पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत –

उत्तर:

5. समुचितं विकल्पं चिनुत –
(क) “गायन्ति देवाः किल गीतकानि” – इत्यस्य श्लोकस्य मुख्यविषयः कः?
(i) वसन्तस्य सौन्दर्यम्
(ii) भारतभूमेः गौरवम्
(iii) कर्मणां फलम्
(iv) दानस्य प्रभावः
उत्तर:
(ii) भारतभूमेः गौरवम्।
(ख) “गणी गुणं वेत्ति” – इत्यत्र कः गुणं न जानाति?
(i) गुणी
(ii) निर्गुणः
(iii) पिकः
(iv) बली
उत्तर:
(ii) निर्गुणः।
(ग) “पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः” – तात्पर्यम् किम्?
(i) पिकः मधुरं गायति न वायसः
(ii) सुजन एव गुणं जानाति
(iii) वायसः अपि सरसं गानं करोति
(iv) वसन्तः निर्गुणः अस्ति
उत्तर:
(ii) सुजन एव गुणं जानाति।
(घ) “भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः” – अर्थः कः?
(i) वृक्षाणां कठोरता
(ii) सत्पुरुषाणाम् उन्नितः
(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति
(iv) परोपकारिणां दुर्बलता
उत्तर:
(iii) फलयुक्ताः वृक्षाः नम्राः भवन्ति।
(ङ) “न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः” – सभायाः महत्त्वं किम्?
(i) सभा मनोरञ्जनाय भवति
(ii) सभा धनसम्पत्तिं प्रदातुं शक्नोति
(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः
(iv) सभा केवलं राजकार्यार्थं भवति
उत्तर:
(iii) धर्मोपदेशाय ज्ञानवृद्धाः जनाः आवश्यकाः।
(च) दुर्जनेन सह सख्यं किमर्थं न कार्यम्?
(i) सः मित्रं भवति
(ii) सः धनं ददाति
(iii) सः शिक्षां ददाति
(iv) सः उष्णाङ्गारवद् हानिकरः भवति
उत्तर:
(iv) सः उष्णाङ्गारवत् हानिकारः भवति।
अध्याय 3 का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद नीचे दिया गया है ताकि विद्यार्थी इस पाठ को सरलता और स्पष्टता से समझ सकें।
कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 3 हिंदी अनुवाद
पितामहि! एकां नूतनां कथां कथयतु।
हिंदी अनुवाददादी माँ! एक नई कहानी सुनाइए।
वत्से! त्वं प्रतिदिनं तु कथां शृणोषि, अद्य नीतिश्लोकान् शृणु।
हिंदी अनुवादबेटे! तुम प्रतिदिन तो कहानी सुनते हो, आज नीति श्लोक सुनो।
नीतिश्लोकाः…?
हिंदी अनुवादनीति श्लोक…?
आम्। नीतिश्लोकाः। नीतिश्लोकाः नाम सुभाषितानि।
हिंदी अनुवादहाँ। नीति श्लोक। नीति श्लोक ही सुभाषित कहलाते हैं।
किं नाम सुभाषितानि?
हिंदी अनुवादसुभाषित क्या हैं?
सुष्ठु भाषितानि इति सुभाषितानि। अर्थात् शोभनानि वचनानि। तानि सर्वदा जनानां हिताय भवन्ति।
हिंदी अनुवादअच्छी तरह बोले गए (वचन) ही सुभाषित हैं। अर्थात् सुंदर वचन। वे सदा लोगों के हित के लिए होते हैं।
सुभाषितपठनेन कः लाभः?
हिंदी अनुवादसुभाषित पढ़ने से क्या लाभ है?
अहो सुन्दरम्। यदि एवं तर्हि अहं नूनं सुभाषितानि पठिष्यामि।
हिंदी अनुवादअहो सुंदर! यदि ऐसा है तो मैं अवश्य सुभाषितों को पढ़ूंगा।
सुभाषितपठनेन आदर्श-मानवजीवन-निर्माणाय प्रेरणा प्राप्यते।
हिंदी अनुवादसुभाषितों के पठन से आदर्श मानव जीवन के निर्माण के लिए प्रेरणा प्राप्त होती है।
मानवजीवनस्य सुखाय समृद्धये च सुभाषितानां पठनस्य आवश्यकता अस्ति।
हिंदी अनुवादमानव जीवन के सुख और समृद्धि के लिए सुभाषितों के पठन की आवश्यकता है।
यः सुभाषितानि पठित्वा कार्यक्षेत्रे तस्य ज्ञानस्य प्रयोगं करोति सः बहून् लाभान् प्राप्नोति।
हिंदी अनुवादजो सुभाषितों को पढ़कर कार्यक्षेत्र में उस ज्ञान का प्रयोग करता है, वह बहुत से लाभ प्राप्त करता है।
सुभाषितानि स्वकर्तव्यस्य अकर्तव्यस्य च विषये स्पष्टतया मार्गदर्शनं कुर्वन्ति।
हिंदी अनुवादसुभाषित अपने कर्तव्य और अकर्तव्य के विषय में स्पष्ट रूप से मार्गदर्शन करते हैं।
अतः सर्वे अवश्यं सुभाषितानि पठन्तु।
हिंदी अनुवादइसलिए सभी अवश्य सुभाषितों को पढ़ें।
तानि पठित्वा सर्वे जीवनस्य रहस्यम् अवगच्छन्तु, जीवनं सुखमयं च कुर्वन्तु।
हिंदी अनुवादउन्हें पढ़कर सभी जीवन के रहस्य को समझें और जीवन को सुखमय बनाएं।
श्लोक १
गायन्ति देवाः किल गीतिकानि ध्न्याः सुते भारतिभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्॥
हिंदी अनुवादगाते हैं देवता निश्चय से गीतों को, धन्य हैं तो वे भारत भूमि के भाग में, स्वर्ग-मोक्ष-पद-मार्ग रूप में होते हैं बार-बार मनुष्य देवत्व से।
अन्वयः भारत भूमि के भाग में (जो) होते हैं वे धन्य हैं इस प्रकार देवता गीत गाते हैं निश्चय से। स्वर्ग-मोक्ष-पद-मार्ग रूप (भारत भूमि के भाग में) तो (देवता) देवत्व से बार-बार मनुष्य (होते हैं)।
भावार्थः जो मनुष्य इस भारत भूमि में जन्म प्राप्त करते हैं वे धन्य हैं, इस प्रकार भारत भूमि का गुणगान देवता करते हैं। इसलिए हम सभी भारतीय भाग्यशाली हैं। धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष आदि की प्राप्ति के लिए मार्ग रूप इस भूखंड में देवता भी देवत्व को छोड़कर मनुष्य रूप में जन्म लेने की इच्छा रखते हैं।
श्लोक २
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणः बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वस्तुस्य गुणं न वायसः करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥
हिंदी अनुवादगुणी गुण को जानता है नहीं जानता निर्गुण; बलवान बल को जानता है नहीं जानता निर्बल; कोयल वसंत के गुण को (जानती है) नहीं कौआ; और हाथी सिंह के बल को (जानता है) नहीं चूहा।
अन्वयः गुणी गुण को जानता है। निर्गुण (गुण को) नहीं जानता। बलवान बल को जानता है, निर्बल (बल को) नहीं जानता। कोयल वसंत के गुण को (जानती है) कौआ (वसंत के गुण को) नहीं (जानता)। और हाथी सिंह के बल को (जानता है)। चूहा (सिंह के बल को) नहीं जानता।
भावार्थः गुणवान व्यक्ति दूसरों के सद्गुणों को जानने में सक्षम होता है। परन्तु गुणहीन व्यक्ति दूसरों के सुगुणों को समझने में समर्थ नहीं होता। बलवान व्यक्ति जैसे दूसरों के बल को जान सकता है वैसे बलहीन व्यक्ति दूसरों के बल को नहीं जान सकता। वसंत ऋतु के आने पर कोयल वसंत के गुण के अनुरूप कूहू-कूहू की ध्वनि करती है। परन्तु कौआ मधुर गाने में सक्षम नहीं होता। हाथी जंगल के राजा सिंह के बल को जानता है किन्तु चूहा उसके बल को जानने में समर्थ नहीं होता। इसलिए योग्य व्यक्ति ही महत्त्व को जानने में समर्थ होता है, अयोग्य नहीं।
श्लोक ३
भवन्ति नम्राः तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैषः परोपकारिणाम्॥
हिंदी अनुवादहोते हैं नम्र वृक्ष फलों के उगने से, नए जल से दूर तक झुके हुए बादल, अभिमानरहित होते हैं सज्जन समृद्धियों से, स्वभाव ही यह है परोपकारियों का।
अन्वयः वृक्ष फलों के उगने से नम्र होते हैं। बादल नए जल से दूर तक झुके हुए (होते हैं)। सज्जन समृद्धियों से अभिमानरहित (होते हैं)। परोपकारियों का ही यह स्वभाव (होता है)।
भावार्थः समय के अनुसार वृक्षों में फल पैदा होते हैं। फलों के भार से वे वृक्ष नम्र (झुके हुए) हो जाते हैं। उसी प्रकार नए जल से परिपूर्ण बादल झुके हुए होते हैं, भूमि की ओर आते हैं और वर्षा करते हैं। इस संसार में अनेक परोपकारी व्यक्ति हैं। अपनी समृद्धि के समय वे अभिमान प्रकट नहीं करते। वे हृदयवान और विनम्र होते हुए सदैव परोपकार के लिए प्रयत्नशील होते हैं। वे परोपकार को व्रत रूप में धारण करते हैं। व्यास महर्षि ने भी कहा है – परोपकार पुण्य के लिए है और दूसरों को पीड़ा देना पाप के लिए है।
श्लोक ४
यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निघर्षणच्छेदनतापताडनैः।
तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते कुलेन शीलेन गुणेन कर्मणा॥
हिंदी अनुवादजैसे चार से सोना परीक्षा किया जाता है घिसने-काटने-तपाने-पीटने से, वैसे चार से पुरुष परीक्षा किया जाता है कुल से शील से गुण से कर्म से।
अन्वयः जैसे घिसने-काटने-तपाने-पीटने से चार (उपायों) से सोने की परीक्षा की जाती है। वैसे कुल से शील से गुण से कर्म से (और) चार से पुरुष की परीक्षा की जाती है।
भावार्थः सुनार सोने की शुद्धता जानने के लिए पहले कसौटी पत्थर पर घिसता है, उसके बाद उस सोने को काटता है, फिर अग्नि से जलाता है, अंत में सोने के टुकड़े पर प्रहार करता है। इन चार प्रकारों से परीक्षा करके सोने की पूर्ण शुद्धता को जाना जा सकता है। उसी प्रकार पुरुष की भी चार उपायों से परीक्षा होनी चाहिए। जैसे – किस परिवार में यह व्यक्ति जन्मा? उसका स्वभाव कैसा है? वह कैसे गुणों से युक्त है? फिर वह किस कर्म से सर्वत्र सम्मानित होता है? इत्यादि। इन कसौटियों पर परीक्षा करके ही उसके व्यक्तित्व को जाना जा सकता है।
श्लोक ५
अष्टौ गुणाः पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
हिंदी अनुवादआठ गुण पुरुष को प्रकाशित करते हैं – प्रज्ञा और कुलीनता और संयम और शास्त्र ज्ञान। और पराक्रम और कम बोलना और दान यथाशक्ति और कृतज्ञता।
अन्वयः प्रज्ञा, कुलीनता, संयम, शास्त्र ज्ञान, पराक्रम और कम बोलना, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता (ये सब) आठ गुण पुरुष को प्रकाशित करते हैं।
भावार्थः आठ गुणों से युक्त मनुष्य सदा समाज में सम्मान प्राप्त करता है। विशेष ज्ञान, कुलीनता, संयम, वेद आदि शास्त्रों का ज्ञान, पराक्रम, कम बोलना, सामर्थ्य के अनुसार दानशीलता, और कृतज्ञता – ये आठ गुण हैं। मनुष्य उत्तम गुणों के आधार पर सम्मानित होता है। इसलिए कहा गया है – गुणवान व्यक्ति की पूजा होती है।
श्लोक ६
न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धाः वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।
धर्मः स नो यत्र न सत्यमस्ति सत्यं न तद्यच्छलमभ्युपैति॥
हिंदी अनुवादनहीं वह सभा जहाँ नहीं हैं वृद्ध, वृद्ध नहीं वे जो नहीं बोलते धर्म को, धर्म वह नहीं जहाँ नहीं सत्य है, सत्य नहीं वह जो छल को प्राप्त करता है।
अन्वयः हिंदी: वह सभा नहीं (है), जहाँ वृद्ध नहीं हैं। वे वृद्ध नहीं (हैं), जो धर्म नहीं बोलते। वह धर्म भी नहीं (है), जहाँ सत्य नहीं है। वह सत्य नहीं (है), जो छल को प्राप्त करता है।
भावार्थः इस संसार में विभिन्न सभाएं होती हैं। सभाओं में लोगों का समागम होता है। बहुत बातचीत चलती है। उससे सफलता नहीं मिलती। वास्तव में वही सभा सफल होती है जहाँ अनुभवी और ज्ञानी व्यक्ति हों। फिर भी वे ज्ञानी व्यक्ति धर्म के विषय में बोलें। धर्म से सम्बंधित चर्चा में सत्य ही बोलना चाहिए जो सत्य तथ्ययुक्त हो न कि छल से युक्त।
श्लोक ७
दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिं चापि न कारयेत्।
उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम्॥
हिंदी अनुवाददुर्जन के साथ मित्रता प्रीति को भी नहीं करना चाहिए, गर्म जलाता है और अंगारा ठंडा काला कर देता है हाथ को।
अन्वयः दुर्जन के साथ मित्रता और प्रीति भी नहीं करनी चाहिए। गर्म अंगारा जलाता है और ठंडा हाथ को काला कर देता है।
भावार्थः दुर्जन के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए। क्योंकि दुर्जन विश्वास के योग्य नहीं होता। दुर्जन के साथ बंधुता और प्रीति नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उस दुर्जन के मुख में मधुरता होती है परन्तु हृदय में कपटता होती है। अंगारा गर्म होता है तो ताप से हाथ को जलाता है। फिर यदि वह अंगारा ठंडा है तो भी हाथ को मैला कर देता है। उसी प्रकार दुर्जन सदा ही अनिष्ट करता है और कराता भी है। इसलिए विद्या से अलंकृत होने पर भी दुर्जन का त्याग करना चाहिए।
श्लोक ८
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥
हिंदी अनुवादजैसे निश्चय से एक पहिये से नहीं रथ की गति होती, वैसे पुरुषार्थ के बिना भाग्य नहीं सिद्ध होता।
अन्वयः जैसे निश्चय से एक पहिये से रथ की गति नहीं होती वैसे पुरुषार्थ के बिना भाग्य सिद्ध नहीं होता।
भावार्थः रथ की गति दो पहियों से ही ठीक से होती है। एक पहिये से रथ का चलना संभव नहीं होता। रथ की गति सुगम होती है। पुरुषार्थ के बिना फल सिद्ध नहीं होता। भाग्य के होने पर भी परिश्रम से ही फल प्राप्त होता है। यहाँ अनुभव किया जाता है कि प्रयत्न और भाग्य मानव रूपी रथ के दो पहिये हैं। कहा भी गया है – परिश्रम से ही कार्य सिद्ध होते हैं न कि मनोरथों से।
