एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 12 सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते
कक्षा 8 के संस्कृत पाठ्यपुस्तक दीपकम् के द्वादश अध्याय सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते के एनसीईआरटी समाधान में शुद्ध उच्चारण के महत्व को अत्यंत सरल और रोचक ढंग से समझाया गया है। इस अध्याय में कथा, श्लोक तथा उदाहरणों के माध्यम से बताया गया है कि शब्दों के सही उच्चारण से ही सही अर्थ निकलता है, जबकि थोड़ी-सी गलती भी अर्थ को पूरी तरह बदल सकती है। साथ ही, एक आदर्श पाठक के गुण, दोष तथा संस्कृत भाषा के वेदांगों का भी वर्णन किया गया है, जिससे विद्यार्थियों में सही पठन कौशल और भाषा के प्रति जागरूकता विकसित होती है।
अध्याय 12 का संस्कृत से हिंदी अनुवाद
एनसीईआरटी कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 12 के प्रश्न उत्तर
अभ्यासात् जायते सिद्धिः
1. पाठे विद्यमानानां श्लोकानां उच्चारणं स्मरणं लेखनं च कुरुत।
उत्तर:
यह प्रश्न स्वाध्याय हेतु है।
छात्र श्लोकों का शुद्ध उच्चारण कंठस्थ (स्मरण), सुंदर लेखन स्वयं अभ्यास करें।
2. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तराणि लिखत।

उत्तर:
(क) वर्णानाम्
(ख) व्याकरणम्
(ग) सम्यग्वर्णप्रयोगेण
(घ) षट्
(ङ) पाठकानाम्
3. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् पूर्णवाक्येन उत्तराणि लिखत।

उत्तर:
(क) व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् नयति।
(ख) वर्णाः न अव्यक्ताः न च पीडिताः, सम्यक् प्रयोक्तव्याः।
(ग) माधुर्यम्, अक्षरव्यक्तिः, पदच्छेदः, सुस्वरः, धैर्यम्, लयसमर्थता।
(घ) गीती, शीघ्री, शिरःकम्पी, लिखितपाठकः, अनर्थज्ञः, अल्पकण्ठः अधमाः पाठकाः भवन्ति।
(ङ) ‘स्वजनः’ = अपना/बंधु,
‘श्वजनः’ = कुत्ता।
(च) ‘सकलं’ = सम्पूर्ण,
‘शकलं’ = खण्ड/टुकड़ा।
4. अधोलिखितानि लक्षणानि पाठकस्य गुणाः वा दोषाः वा इति विभजत।

उत्तर:

5. श्लोकानुसारं रिक्तस्थानानि उचितैः शब्दैः पूरयत।

उत्तर:

6. अधोलिखितानि वाक्यानि सत्यम् वा असत्यम् वा इति लिखत।

उत्तर:

अध्याय 12 का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद नीचे दिया गया है ताकि विद्यार्थी इस पाठ को सरलता और स्पष्टता से समझ सकें।
कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 12 का हिंदी अनुवाद
नमस्ते आचार्य ! अद्य वयम् एकां कथां श्रोतुम् इच्छामः । कृपया कथां श्रावयतु वा महोदय !
हिंदी अनुवादनमस्कार आचार्य! आज हम एक कथा सुनना चाहते हैं। कृपया कथा सुनाइए महोदय!
नमस्ते छात्रवाः ! भव्वां मनोरञ्जनवार्थम् आदौ कथां श्रवणम् । अनन्तरं पाठनम् ।
हिंदी अनुवादनमस्कार छात्रों! आपके मनोरंजन के लिए पहले कथा का श्रवण करेंगे। उसके बाद पाठ पढ़ेंगे।
तत्थ सावधानं शृणुतु ।
हिंदी अनुवादतो ध्यान से सुनो।
देवानां राजा इन्द्रः, असुराणां च राजा आसीत् वृत्रासुरः । देवानाम् असुराणां च मध्ये सर्वदा वैरभावः भवत् एव ।
हिंदी अनुवाददेवताओं का राजा इंद्र था और असुरों का राजा वृत्रासुर था। देवताओं और असुरों के बीच सदा वैर का भाव होता ही था।
स्वस्य बलं वर्धयितुम् इन्द्रं जेतुं च वृत्रासुरः यज्ञं कारितवान् ।
हिंदी अनुवादअपनी शक्ति बढ़ाने के लिए और इंद्र को जीतने के लिए वृत्रासुर ने यज्ञ कराया।
यज्ञे आहुतिमन्त्रः आसीत् — ‘इन्द्रशत्रुर्वर्धस्व’ इति ।
हिंदी अनुवादयज्ञ में आहुति का मंत्र था – ‘इन्द्र का शत्रु बढ़े’ ऐसा।
यज्ञवासाने वृत्रासुरो बली भूत्वा जनानां पीडयति स्म इति विचार्य ऋत्विजः मन्त्रे स्वरं परिवर्त्य वदन्तः ।
हिंदी अनुवादयज्ञ के अंत में वृत्रासुर बलवान होकर लोगों को पीड़ित करेगा ऐसा सोचकर पुरोहितों ने मंत्र में स्वर बदल दिया।
स्वरपरिवर्तनेन अर्थः परिवर्तितः ।
हिंदी अनुवादस्वर के परिवर्तन से अर्थ बदल गया।
परिणामः वृत्रासुरस्य स्थाने इन्द्रस्य बलं वर्धितम् ।
हिंदी अनुवादपरिणाम यह हुआ कि वृत्रासुर के स्थान पर इंद्र की शक्ति बढ़ गई।
बलवान् इन्द्रः वज्रेण वृत्रासुरं मारितवान् ।
हिंदी अनुवादबलवान इंद्र ने वज्र से वृत्रासुर को मार दिया।
बहु सुन्दरी कथा महोदय !
हिंदी अनुवादबहुत सुंदर कथा महोदय!
तर्हि वयमपि पठनकाले भाषणकाले च स्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कुर्मः ।
हिंदी अनुवादइसलिए हमें भी पढ़ते और बोलते समय स्पष्ट और शुद्ध उच्चारण करें।
त्वं यथार्थं भाषसे हिमवति ! शुद्धोच्चारणस्य सन्दर्भे एव अधुना एतं विषयं पठामः ।
हिंदी अनुवादतुम क्या कहते हो हिमवत! शुद्ध उच्चारण के संदर्भ में ही अब हम इस विषय को पढ़ते हैं।
यद्यपि बहु न अधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् ।
स्वजनः श्वजनो माभूत् सकलं शकलं सकृत् शकृत् ॥ १ ॥
हिंदी अनुवादयद्यपि बहुत अधिक न पढ़ते हो, तो भी हे पुत्र व्याकरण अवश्य पढ़ो।
जिससे स्वजन (बंधु) कहीं श्वजन (कुत्ता) न हो जाए, सकल (पूर्ण) शकल (टुकड़ा) न हो, और सकृत् (एक बार) शकृत् (विष्ठा) न हो॥
पदच्छेद: यद्यपि बहु न अधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् स्वजनःश्वजनः मा अभूत् सकलम् शकलम् सकृत् शकृत् ।
अन्वय: पुत्र ! यद्यपि बहु न अधीषे तथापि व्याकरणं पठ । येन स्वजनः श्वजनः (इति) सकलं शकलं (इति) सकृत् शकृत् (इति) च मा अभूत् ।
हिंदी अनुवादभावार्थ: अरे पुत्र! यद्यपि आप बहुत विषयों को पढ़ने में समर्थ नहीं हो, तो भी व्याकरण अवश्य पढ़ो। जिससे उच्चारण के समय स्वजन (अर्थात् बंधु) के स्थान पर श्वजन (अर्थात् कुत्ता) न हो जाए। इसी प्रकार सकृत् (अर्थात् एक बार) के स्थान पर शकृत् (अर्थात् विष्ठा), सकलम् (पूर्ण) के स्थान पर शकलं (खंड) – ऐसा दोषपूर्ण उच्चारण न हो। अतः स्वजनः इत्यादि के उदाहरण द्वारा यह दिखाया गया है कि एक वर्ण के उच्चारण के दोष से कैसे संपूर्ण पद का अर्थ बदल जाता है।
व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत् । भीता पतनभेदाभ्यां तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् ॥ २ ॥
हिंदी अनुवादजैसे बाघिन अपने दाँतों से बच्चों को उठाती है परंतु पीड़ा नहीं देती। गिरने और छिन्न होने के भय से – उसी प्रकार वर्णों का प्रयोग करना चाहिए॥
पदच्छेद: व्याघ्री यथा हरेत् पुत्रान् दंष्ट्राभ्यां न च पीडयेत् भीता पतनभेदाभ्याम् तद्वद् वर्णान् प्रयोजयेत् ।
अन्वय: यथा पतनभेदाभ्यां भीता व्याघ्री दंष्ट्राभ्यां पुत्रान् हरेत् न च पीडयेत् तद्वत् (जनः) वर्णान् प्रयोजयेत् ।
हिंदी अनुवादभावार्थ: बाघिन अपने शिशु को दाँतों से ले जाती है। उसके दाँत अत्यंत तीक्ष्ण होते हैं। अतः वह शिशु को जोर से नहीं पकड़ती, जिससे शिशु को चोट लगे। इसी प्रकार जोर से न पकड़ने से शिशु गिर जाए। वर्णों का उच्चारण भी वैसे ही करना चाहिए। वर्णों का उच्चारण अत्यधिक कठोर रूप से या अत्यधिक शिथिल रूप से नहीं करना चाहिए।
एवं वर्णाः प्रयोक्तव्या नाव्यक्ता न च पीडिताः ।
सम्यग्वर्णप्रयोगेण ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३ ॥
हिंदी अनुवादइस प्रकार वर्णों का प्रयोग करना चाहिए – न अस्पष्ट और न ही पीड़ित।
सम्यक् वर्ण प्रयोग से ब्रह्मलोक में सम्मानित होता है॥
पदच्छेद: एवं वर्णाःप्रयोक्तव्याः न अव्यक्ताः न च पीडिताः सम्यक् वर्णप्रयोगेण ब्रह्म लोके महीयते ।
अन्वय: एवम् अव्यक्ताः पीडिताः च वर्णाः न प्रयोक्तव्याः । सम्यक् वर्णप्रयोगेण (सः) ब्रह्म लोके महीयते ।
हिंदी अनुवादभावार्थ: वर्णों के उच्चारण के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि वर्ण स्पष्ट और स्वाभाविक रूप से उच्चारित किए जाएं। ये न सुनने वाले को भारी लगें और न ही समझने में कठिनाई हो। इस प्रकार सावधानीपूर्वक उच्चारण करने वाला समाज में सम्मान प्राप्त करता है।
माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदस्तु सुस्वरः ।
धैर्यं लयसमर्थं च षडेते पाठका गुणाः ॥ ४ ॥
हिंदी अनुवादमाधुर्य, अक्षरों की स्पष्टता, पदच्छेद, अच्छा स्वर।
धैर्य और लय की क्षमता – ये छः पाठक के गुण हैं॥
पदच्छेद: माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वरः धैर्यं लयसमर्थं च षट् एते पाठकाः गुणाः ।
अन्वय: माधुर्यम् अक्षरव्यक्तिः पदच्छेदः तु सुस्वरः धैर्यं लयसमर्थं च एते षट् पाठकाः गुणाः (भवन्ति) ।
हिंदी अनुवादभावार्थ: मधुर और स्पष्ट उच्चारण, अपेक्षित स्थान पर पदच्छेद, सभी को श्रवण योग्य उचित स्वर से पढ़ना, संदेह के बिना पढ़ने का धैर्य, विषय में तल्लीनता – ये उत्तम पाठक के छः गुण हैं। पठन का कौशल प्राप्त करने के लिए हम इन गुणों को बढ़ाएं।
संस्कृत: गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः । अनर्थज्ञोऽल्पकण्ठश्च षडेते पाठकाधमाः ॥ ५ ॥
हिंदी अनुवादगाने की तरह पढ़ने वाला, जल्दी पढ़ने वाला, सिर हिलाने वाला और लिखकर पढ़ने वाला। अर्थ न जानने वाला और धीमे स्वर वाला – ये छः निकृष्ट पाठक हैं॥
पदच्छेद: गीती शीघ्री शिरःकम्पी तथा लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च षट् एते पाठकाधमाः।
अन्वय: गीती शीघ्री शिरःकम्पी लिखितपाठकः अनर्थज्ञः अल्पकण्ठः च एते षट् पाठकाधमाः भवन्ति।
हिंदी अनुवादभावार्थ: जो व्यक्ति गीत गाने की तरह पढ़ता है, शीघ्रता-शीघ्रता से वेग के साथ पढ़ता है, मस्तक को हिलाते हुए पढ़ता है, जो व्यक्ति लिख-लिखकर पढ़ता है, अर्थ का बोध किए बिना पढ़ता है, मंद स्वर से पढ़ता है – वह अधम पाठक कहा जाता है। अतः पढ़ने के समय हम इन दोषों को दूर करके पढ़ें तो आदर्श पाठक बन सकते हैं।
