एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः)

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् के अध्याय 11 सन्निमित्ते वरं त्यागः (ख-भागः) के एनसीईआरटी समाधान में त्याग, कर्तव्य और निष्ठा का अत्यंत प्रेरणादायक वर्णन मिलता है। इस पाठ में वीरवर नामक पात्र के माध्यम से यह सिखाया गया है कि उचित कारण के लिए किया गया त्याग सर्वोत्तम होता है। कहानी में पारिवारिक समर्पण, राजा के प्रति निष्ठा तथा धर्म और कर्तव्य के पालन की महत्ता को सुंदर रूप से प्रस्तुत किया गया है। साथ ही, इस अध्याय में संस्कृत व्याकरण के वाच्य (कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, भाववाच्य) का भी सरल और उपयोगी ज्ञान दिया गया है, जो विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी है।
अध्याय 11 का संस्कृत से हिंदी अनुवाद

एनसीईआरटी कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न उत्तर

अभ्यासात् जायते सिद्धिः

1. निम्नलिखितेषु वाक्येषु रिक्तिवर्णीयानि स्थूलपदानी आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 1 का चित्र

उत्तर:
(क) वीरवरः कान् प्राबोधयत्?
(ख) ते सर्वे कुत्र गताः?
(ग) वीरवरः वर्तनस्य निस्तारं केन अकरोत्?
(घ) राजा कुत्र प्राविशत्?
(ङ) महीपतिः वीरवराय किम् अयच्छत्?

2. अधोलिखितान् प्रश्नान् उत्तरत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 2 का चित्र

उत्तर:
(क) वीरवरः अखिलराजलक्ष्मीसंवादम् अवर्णयत्।
(ख) प्राज्ञः धनानि जीवितञ्च परार्थे उत्सृजेत्।
(ग) वीरवरेण सदृशः लोके न भूतः न भविष्यति।
(घ) राजलक्ष्मी अदृश्या अभवत्।
(ङ) सपरिवारः वीरवरः स्वगृहम् गतवान्।

3. अधोलिखितेषु वाक्येषु रिक्तिवर्णीयपदानि केभ्यः पुस्तिकावाक्यानि इति उदाहरणानुसारं गुरुं लिखत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 3 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 3 के उत्तर का चित्र

4. उदाहरणानुसारं निम्नलिखितानि वाक्यानि अन्यरूपेण लिखत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 4 का चित्र

उत्तर:
(क) ते राज्यभङ्गः इदानीं न भविष्यति।
(ख) स्वकरस्थखड्गेन तेन स्वशिरः पातितम्।
(ग) तदा मम आयःशेषेण अपि राजपुत्रः वीरवरः जीवतु।
(घ) देवी तत्क्षणादेव अदर्शनं गता।
(ङ) महीपतिः तस्मै समग्रकर्णाटप्रदेशं प्रायच्छत्।
(च) मादृशाः क्षुद्रजन्तवः जायन्ते च म्रियन्ते च।

5. उदाहरणानुसारं अधोलिखितानां पदानां पदच्छेदं कुरुत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 5 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 5 के उत्तर का चित्र

6. उदाहरणानुसारं पाठगतानि पदानि अधिकृत्य सन्धियुक्तपदैः रिक्तस्थानानि पूरयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 6 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 6 के उत्तर का चित्र

7. निम्नलिखितपदानां सन्धिच्छेदं कुरुत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 7 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 7 के उत्तर का चित्र

8. अधोलिखितानि कथनानि कथायाः घटनानुसारं लिखत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 के प्रश्न 8 का चित्र

उत्तर:

  1. (घ) वीरवरो गृहं गत्वा पत्नीं पुत्रं पुत्रीं च प्राबोध्यत्, स्वाधं च वार्तां अकथयत्।
  2. (ख) पितुः वार्तां श्रुत्वा शक्तिधरः प्रसन्नत्या स्वस्य समर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
  3. (छ) वीरवरेण परिवारेण सह सर्वस्वसमर्पणम् अकरोत्।
  4. (क) स्वधं दृष्ट्वा राजा शूद्रकः अपि सर्वस्वसमर्पणार्थं सिद्धः अभवत्।
  5. (च) भगवती प्रसन्ना अभवत्। भगवत्याः कृपया सर्वे जीवितवन्तः।
  6. (ग) प्रातः राजा वीरवरम् अपृच्छत् ‘ह्यः रात्रौ किम् अभवत्’?
  7. (ङ) वीरवरेण उक्तम् – स्वामिन्! न कापि वार्ता। सा नारी अदृश्या अभवत्।

अध्याय 11 का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद नीचे दिया गया है ताकि विद्यार्थी इस पाठ को सरलता और स्पष्टता से समझ सकें।

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 11 का हिंदी अनुवाद

वीरवरः नाम कश्चित् राजपुरुषः राज्ञः शूद्रकस्य सेवकरूपेण नियुक्तः।
हिंदी अनुवादवीरवर नाम का कोई राजपुरुष राजा शूद्रक का सेवक के रूप में नियुक्त था।

तस्यमैव वेतनं सुवर्णशतचतुष्टयं दीयते।
हिंदी अनुवादउसी को वेतन के रूप में चार सौ स्वर्ण मुद्राएँ दी जाती थीं।

प्राप्तवेतनस्य अर्धं सः देवकार्याय नियोजयति।
हिंदी अनुवादप्राप्त वेतन का आधा वह देवकार्य के लिए लगाता था।

एकचतुराशंं दरिद्रेभ्यः वण्टयति।
हिंदी अनुवादएक चौथाई भाग गरीबों में बाँटता था।

अवशिष्टं च एकचतुराशंं स्वपत्र्याः हस्ते अर्पयति।
हिंदी अनुवादऔर शेष एक चौथाई भाग अपनी पत्नी के हाथ में सौंपता था।

स्वखड्गम् आदाय अहर्निशं राजद्वारे रक्षकरूपेण स्थित्वा सः सेवां करोति।
हिंदी अनुवादअपनी तलवार लेकर रात-दिन राजद्वार पर रक्षक के रूप में खड़े रहकर वह सेवा करता था।

एकदा रात्रौ राज्ञः आदेशेन कश्चित् करुणक्रन्दनम् अनुसृत्य सः नगराद् बहिः गच्छति।
हिंदी अनुवादएक बार रात को राजा की आज्ञा से किसी करुण क्रंदन का अनुसरण करते हुए वह नगर से बाहर जाता है।

एकां दिव्यां भरणभूषितां कामपि रोदनपरां सुन्दरीं च पश्यति।
हिंदी अनुवादएक दिव्य, आभूषणों से सुशोभित, रोने में लगी हुई किसी सुंदरी को देखता है।

तस्याः रोदनस्य कारणं पृष्ट्वा जानाति यत् सा राज्ञः शूद्रकस्य राजलक्ष्मीः अस्ति इति।
हिंदी अनुवादउसके रोने का कारण पूछकर जान जाता है कि वह राजा शूद्रक की राजलक्ष्मी है।

तस्याः वचनात् शूद्रकस्य आयुः केवलं दिनत्रयम् एव अस्ति इति ज्ञात्वा तस्य दीर्घायुषः उपायं पृच्छति।
हिंदी अनुवादउसके वचन से शूद्रक की आयु केवल तीन दिन ही है, यह जानकर उसकी दीर्घायु का उपाय पूछता है।

ततः राजलक्ष्मीः अतीव दुःसाध्यम् उपायं सूचयति।
हिंदी अनुवादतब राजलक्ष्मी अत्यंत कठिन उपाय बताती है।

तस्याः अनुसारं यदि वीरवरः स्वस्य सर्वप्रियं वस्तु देव्यमै स्वर्णमङ्गलायमै उपहाररूपेण समर्पयति, तर्हि तस्य राजा चिरं वर्षशतं जीविष्यति, राजलक्ष्मीरपि तेन सह सुखं स्थरास्यति इति।
हिंदी अनुवादउसके अनुसार यदि वीरवर अपनी सबसे प्रिय वस्तु देवी स्वर्णमङ्गला को उपहार के रूप में समर्पित करता है, तो उसका राजा चिरकाल तक सौ वर्ष जीवित रहेगा, राजलक्ष्मी भी उसके साथ सुख से रहेगी।

एवं कठिनम् उपायं संसूच्य राजलक्ष्मीः वीरवरं किं कर्तव्यमूढं कृत्वा अदृश्या भवति।
हिंदी अनुवादइस प्रकार कठिन उपाय बताकर राजलक्ष्मी वीरवर को क्या करने के लिए मूढ़ बनाकर अदृश्य हो जाती है।

गुप्ततया वीरवरम् अनुसरन् राजापि त्योः संवादं शृणोति।
हिंदी अनुवादगुप्त रूप से वीरवर का अनुसरण करते हुए राजा भी उन दोनों का संवाद सुनता है।

अथ राजपुत्रो वीरवरो स्वावासं गत्वा निद्रालसां पत्नीं पुत्रं दुहितरं च प्राबोध्य अखिलराजलक्ष्मीसंवादं च अवर्णयत्।
हिंदी अनुवादफिर राजपुत्र वीरवर अपने घर जाकर नींद में सोई हुई पत्नी, पुत्र और पुत्री को जगाकर समस्त राजलक्ष्मी-संवाद का वर्णन करता है।

शक्तिधरः – (तच्छ्रुत्वा सानन्दम्) हे पितः! जानाम्यहं भवतः सर्वप्रियं वस्तु। तद् अहमेव भवतः प्रियतमः इति सर्वविदितः।
हिंदी अनुवादशक्तिधर – (यह सुनकर प्रसन्नता से) हे पिताजी! मैं जानता हूँ आपकी सबसे प्रिय वस्तु। वह मैं ही हूँ जो आपका सबसे प्रिय हूँ, यह सबको विदित है।

यद्यहं स्वामिनो जीवितरक्षार्थं यदि विनियुक्तः। तत् कोऽयुना विलम्बस्तात?
हिंदी अनुवादयदि मैं स्वामी के जीवन की रक्षा के लिए नियुक्त किया गया हूँ, तो फिर क्यों विलम्ब है, पिताजी?

एवंविधे कर्मणि राष्ट्रस्य राज्च हिताय मम सर्वस्वविनियोगः परमश्लाघ्यः।
हिंदी अनुवादइस प्रकार के कर्म में राष्ट्र और राज्य के हित के लिए मेरे सर्वस्व का विनियोग परम प्रशंसनीय है।

यतः — धनानि जीवितञ्चैव परार्थे प्राज्ञ उत्सृजेत्।
सन्निमित्ते वरं त्यागो विनाशे नियते सति॥१॥
हिंदी अनुवादक्योंकि — धन और जीवन को भी परोपकार के लिए बुद्धिमान को त्याग देना चाहिए।
उचित कारण होने पर त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि विनाश तो निश्चित ही है॥१॥

वेदरता – यद्येवम् असमत्कुलोचितं नाचरितव्यं तर्हि गृहीतस्वामिवर्तनस्य कथं निस्तारो भवेत्?
हिंदी अनुवादवेदरता – यदि ऐसा है तो हमारे कुल के अनुचित आचरण से कैसे बचा जा सकता है? ग्रहण किए हुए स्वामी के वचन से कैसे मुक्ति होगी?

वीरवती – धन्याह यस्या ईदृशो जनको भ्राता च। तत् कथं विलम्ब्यते? एष एव गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारस्य उपायः।
हिंदी अनुवादवीरवती – जब मैं उस (परिवार की) हूँ जिसके ऐसे पिता और भाई हैं, तो फिर विलम्ब क्यों? यही ग्रहण किए हुए स्वामी के वचन की मुक्ति का उपाय है।

(तत्स्थाने स्वे स्वमङ्गलदेव्याः आयतनं गत्वाः)
हिंदी अनुवाद(उसी समय अपनी स्वमङ्गला देवी के मंदिर में जाकर)

वीरवरः – (देवीपूजनं विधाय) भगवति! प्रसीद, विजयतां महाराजः शूद्रकः, गृह्यतामेष मद्दत्त उपहारः।
हिंदी अनुवादवीरवर – (देवी की पूजा करके) हे भगवती! प्रसन्न हों, महाराज शूद्रक विजयी हों, यह मेरे द्वारा दिया गया उपहार स्वीकार करें।

वीरवरः – (स्वगतम्) कृतो मया गृहीतस्वामिवर्तनस्य निस्तारो स्वपुत्रसमर्पणेन। अयुना पुत्रवियुक्तस्य मे जीवनं निष्फलम्।
हिंदी अनुवादवीरवर – (अपने मन में) मैंने अपने पुत्र के समर्पण से ग्रहण किए हुए स्वामी के वचन से मुक्ति पा ली है। अब पुत्र से रहित मेरा जीवन निष्फल है।

(ततः सः आत्मघातनमपि देव्यमै समर्पयित्वान्। ततस्तस्य पत्न्या दुहित्रा च देव्याश्चरितम्।)
हिंदी अनुवाद(तब वह आत्महत्या भी देवी को समर्पित कर देता है। फिर उसकी पत्नी और पुत्री ने भी देवी के सामने वैसा ही किया।)

राजा शूद्रकोऽपि सर्वेषां  स्वमितदृष्ट्वा आचरितम् दिदृक्षया एव लोकयत्।
हिंदी अनुवादराजा शूद्रक भी उनके स्वयं के द्वारा किए गए आचरण को देखने की इच्छा से ही देख रहे थे।

ततोऽस्रौ व्यञ्चितयत् —
जायन्ते च म्रियन्ते च मादृशाः क्षुद्रजन्तवः।
अनेन दृशो लोके न भूतो न भविष्यति॥२॥
हिंदी अनुवादतब आँसुओं से भरकर बोले —
मेरे जैसे तुच्छ प्राणी जन्म लेते हैं और मर जाते हैं।
इस जैसा (वीरवर जैसा) संसार में न कभी हुआ है न कभी होगा॥२॥

तदेततपरित्यक्तेन मम राज्ये नापि किं प्रयोजनम्।
हिंदी अनुवादऐसे (वीरवर) को त्याग देने पर मेरे राज्य से भी क्या प्रयोजन है।

(देवीं प्रति प्रकटयन्) हे मातः! सर्वमङ्गले! गृहाण मे सर्वस्वम्। नेष्टं मे राज्यं न च जीवितं वा।
हिंदी अनुवाद(देवी के सामने प्रकट करते हुए) हे माता! सर्वमङ्गले! मेरा सर्वस्व ग्रहण करो। न तो मुझे राज्य चाहिए और न ही जीवन।

देवी – (ततः प्रत्यक्षीभूत्या भक्तयाः स्वमङ्गलया राज्ञः करं धृत्वा) वत्स! प्रसन्ना भवामि तवैव, अलं साहसेन। नेदानीं राज्यभङ्गस्ते भविष्यति।
हिंदी अनुवाददेवी – (तब प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होकर भक्त स्वमङ्गला राजा का हाथ पकड़कर) वत्स! मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, साहस मत करो। अब तुम्हारे राज्य का नाश नहीं होगा।

राजा – (स्वाष्टाङ्गं प्रणिपत्य) भगवति! न मे प्रयोजनं राज्ये न जीवितेन वा। यदि मय्यि कृपा भगवत्या जाता, तदा ममायुःशेषेणापि प्रत्यावर्तयेत राजपुत्रो वीरवरः सह पुत्रेण पत्न्या दुहित्रा च। अन्यथा मया यथाप्राप्ता गतिर्गन्तव्या जगदम्ब!
हिंदी अनुवादराजा – (पूरे शरीर से प्रणाम करके) हे भगवती! न तो मुझे राज्य से प्रयोजन है और न ही जीवन से। यदि आपकी मुझ पर कृपा है, तो मेरी आयु के शेष से भी राजपुत्र वीरवर अपने पुत्र, पत्नी और पुत्री के साथ लौट आए। नहीं तो मैं जो गति प्राप्त की है वही गति प्राप्त करूँगा, हे जगदम्बे!

देवी – वत्स! अनेन ते सत्वोत्कर्षेण भृत्यवात्सल्येन च परं प्रीतास्मि। तद् गच्छ, विजयी भव। अयमपि सपरिवारो जयतु राजपुत्र आदर्शचरितो वीरवरः।
हिंदी अनुवाददेवी – वत्स! तुम्हारे इस सत्वगुण की पराकाष्ठा से और भृत्य के प्रति वात्सल्य भाव से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ। तो जाओ, विजयी हो। यह भी परिवार सहित जीवित रहे, आदर्श चरित्र वाला राजपुत्र वीरवर।

ततो देवी गताऽदर्शनम्। ततो वीरवरः सपरिवारो सानन्दं स्वगृहं गतः।
हिंदी अनुवादतब देवी अदृश्य हो गईं। फिर वीरवर परिवार सहित प्रसन्नतापूर्वक अपने घर गया।

नृपतिरपि स्वयेषामदृश्य एव स्वप्रासादं प्राविशत्।
हिंदी अनुवादराजा भी उनसे अदृश्य रहकर ही अपने महल में प्रवेश कर गए।

अन्येद्युः वीरवरोऽपि पुनः द्वारि सेवानि रतोऽभवत्।
हिंदी अनुवाददूसरे दिन वीरवर भी फिर से द्वार पर सेवा में लगा रहा।

राजा – (तं वीक्ष्य ) का वार्ता राजपुत्र!
हिंदी अनुवादराजा – (उसे देखकर) क्या बात है राजपुत्र!

वीरवरः – देव! सा रोदनपरा नारी मद्दर्शनादादृश्यतां गता। न हि कापि वार्ताऽन्या स्वामिन्!
हिंदी अनुवादवीरवर – देव! वह रोती हुई नारी मेरे दर्शन से अदृश्य हो गई। और कोई बात नहीं है, स्वामी!

ततः परमां प्रीतिं गतो महीपतिस्तस्यमै प्रायच्छत् समग्रकर्णाटप्रदेशं राजपुत्राय वीरवराय।
हिंदी अनुवादतब परम प्रसन्न होकर महाराज ने उसे संपूर्ण कर्णाट प्रदेश राजपुत्र वीरवर को प्रदान किया।