एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 5 गीता सुगीता कर्तव्या
कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 5 गीता सुगीता कर्तव्या एनसीईआरटी समाधान में श्रीमद्भगवद्गीता के महत्वपूर्ण श्लोकों के माध्यम से विद्यार्थियों को जीवन के नैतिक मूल्यों, आत्मसंयम, क्रोध-नियंत्रण, ज्ञान प्राप्ति तथा भक्ति के महत्व के बारे में सरल और प्रभावशाली तरीके से समझाया गया है। इस पाठ में अर्जुन और भगवान श्रीकृष्ण के संवाद के जरिए यह बताया गया है कि मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी स्थिर बुद्धि, सकारात्मक सोच और सदाचार का पालन करना चाहिए। यह अध्याय न केवल परीक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास के लिए भी अत्यंत उपयोगी है।
अध्याय 5 का संस्कृत से हिंदी अनुवाद
एनसीईआरटी कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 5 के प्रश्न उत्तर
अभ्यासात् जायते सिद्धिः
1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत –
(क) श्रद्धावान् जनः किं लभते ?
(ख) कस्मात् सम्मोहः जायते ?
(ग) सम्मोहात् किं जायते ?
(घ) अर्जुनाय गीतां कः उपदिष्टवान् ?
(ङ) हर्षामर्षभयोद्वेगैः मुक्तः नरः कस्य प्रियः भवति ?
उत्तर:
(क) ज्ञानम्।
(ख) क्रोधात्।
(ग) स्मृतिविभ्रमः।
(घ) श्रीकृष्णः।
(ङ) भगवतः।
2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत –
(क) कीदृशं वाक्यं वाङ्मयं तपः उच्यते ?
(ख) कीदृशः जनः स्थितधीः उच्यते ?
(ग) जनः कथं प्रणश्यति ?
(घ) जनः कथम् उत्तमां शान्तिं प्राप्नोति ?
(ङ) उपदेशप्राप्तये त्रयः उपायाः के भवन्ति ?
उत्तर:
(क) यत् वाक्यं अनुद्वेगकरं सत्यं प्रियं हितं च भवति, तत् वाङ्मयं तपः उच्यते।
(ख) यः दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः भवति, सः स्थितधीः उच्यते।
(ग) क्रोधात् सम्मोहः, सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः, स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः, बुद्धिनाशात् जनः प्रणश्यति।
(घ) श्रद्धावान् संयतेन्द्रियः जनः ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण परां शान्तिं प्राप्नोति।
(ङ) प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया च।
3. कोष्ठके दत्तानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत –

उत्तर:

4. अधोलिखितानि पदानि उपयुज्य वाक्यानि रचयत –

उत्तर:
(क) उच्यते – सः स्थितधीः उच्यते।
(ख) च – सत्यं प्रियं हितं च वक्तव्यम्।
(ग) न – जनः क्रोधं न कुर्यात्।
(घ) लब्ध्वा – ज्ञानं लब्ध्वा शान्तिं प्राप्नोति।
(ङ) कुर्यात् – विद्यार्थीः स्वाध्यायं कुर्यात्।
5. पाठानुसारं समुचितेन पदेन श्लोकं पूरयत –

उत्तर:

6. उदाहरणानुसारं पदानि स्त्रीलिङ्गे परिवर्तयत –

उत्तर:

7. समुचितेन पदेन सह स्तम्भौ मेलयत –

उत्तर:

8. श्रीमद्भगवद्गीतायाः विषये पञ्च वाक्यानि लिखत –

उत्तर:
(क) श्रीमद्भगवद्गीता भगवतः श्रीकृष्णस्य उपदेशग्रन्थः अस्ति।
(ख) गीता महाभारतस्य भीष्मपर्वणि वर्णिता अस्ति।
(ग) गीतायां अष्टादश अध्यायाः सन्ति।
(घ) गीतायां सप्तशतं श्लोकाः सन्ति।
(ङ) गीता मानवजीवनस्य मार्गदर्शिका अस्ति।
अध्याय 5 का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद नीचे दिया गया है ताकि विद्यार्थी इस पाठ को सरलता और स्पष्टता से समझ सकें।
कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 5 का हिंदी अनुवाद
कुरुक्षेत्रे श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सवः आचरितः।
हिंदी अनुवादकुरुक्षेत्र में श्रीगीता-जयन्ती-महोत्सव मनाया गया।
तत्र बहवः जनाः अगच्छन्।
हिंदी अनुवादवहाँ बहुत से लोग गए।
रमेशः अपि स्वजनैः सह तत्र गतवान्।
हिंदी अनुवादरमेश भी अपने परिवारजनों के साथ वहाँ गया।
कथावाचकः गीतायाः विषये वर्णयति स्म –
हिंदी अनुवादकथावाचक गीता के विषय में वर्णन कर रहे थे –
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्रविस्तरैः।
हिंदी अनुवादगीता को अच्छी तरह से गाना चाहिए, अन्य शास्त्रों के विस्तार से क्या लाभ?
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता॥
हिंदी अनुवादजो स्वयं पद्मनाभ (भगवान विष्णु) के मुखकमल से निकली है॥
इदं श्रुत्वा रमेशः पितरम् अपृच्छत् – “पितः! गीता का? कथं सुगीता कर्तव्या?”
हिंदी अनुवादयह सुनकर रमेश ने पिता से पूछा – “पिताजी! गीता क्या है? उसे अच्छी तरह से कैसे गाया जाए?”
पिता – पुत्र! बहुभिः वर्षैभ्यः पूर्वं कुरुक्षेत्रे कौरवाणां पाण्डवानां च मध्ये संग्रामः अभवत्।
हिंदी अनुवादपिता – पुत्र! बहुत वर्षों पहले कुरुक्षेत्र में कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध हुआ।
तस्मिन् युद्धे स्वबान्धवान् दृष्ट्वा अर्जुनः युद्धं कर्तुं न इच्छति स्म।
हिंदी अनुवादउस युद्ध में अपने सगे-संबंधियों को देखकर अर्जुन युद्ध करना नहीं चाहते थे।
तदा भगवान् श्रीकृष्णः युद्धविमुखम् अर्जुनं कर्तव्यपालनार्थम् उपदिशवान्।
हिंदी अनुवादतब भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध से विमुख अर्जुन को कर्तव्यपालन के लिए उपदेश दिया।
श्रीकृष्णस्य उपदेशः एव श्रीमद्भगवद्गीता अस्ति।
हिंदी अनुवादश्रीकृष्ण का उपदेश ही श्रीमद्भगवद्गीता है।
गीतायाम् अमृततुल्याः उपदेशाः सन्ति।
हिंदी अनुवादगीता में अमृत के समान उपदेश हैं।
रमेशः – तर्हि सुगीता कर्तव्या इत्यस्य कः आशयः?
हिंदी अनुवादरमेश – तो फिर ‘सुगीता कर्तव्या’ इसका क्या अर्थ है?
पिता – अस्य आशयः अस्ति यत् गीतायाः अभ्यासः सम्यक् रूपेण क्रियतीयः।
हिंदी अनुवादपिता – इसका अर्थ है कि गीता का अभ्यास अच्छी तरह से करना चाहिए।
गीता उत्तमभावेन पठितव्या।
हिंदी अनुवादगीता को उत्तम भाव से पढ़ना चाहिए।
कार्यक्षेत्रे जीवनक्षेत्रे च गीतायाः उपदेशाः अनुपालनीयाः।
हिंदी अनुवादकार्यक्षेत्र में और जीवन क्षेत्र में गीता के उपदेशों का पालन करना चाहिए।
अस्मिन् पाठे वयं श्रीमद्भगवद्गीतायाः काञ्चन श्लोकान् पठामः।
हिंदी अनुवादइस पाठ में हम श्रीमद्भगवद्गीता के कुछ श्लोकों को पढ़ते हैं।
वयं श्लोकान् मिलित्वा गायामः अपि।
हिंदी अनुवादहम श्लोकों को मिलकर गाते भी हैं।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
हिंदी अनुवाददुःखों में जिसका मन विचलित नहीं होता और सुखों में जो आसक्तिरहित है।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥
हिंदी अनुवादराग, भय और क्रोध से रहित, स्थिरबुद्धि वाला व्यक्ति मुनि कहलाता है॥
पदच्छेद और अन्वय
दुःखेषु अनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः वीत-राग-भय-क्रोधः स्थितधीः मुनिः उच्यते।
हिंदी अनुवाददुःखों में अविचलित मन वाला, सुखों में इच्छारहित, राग-भय-क्रोध से रहित, स्थिरबुद्धि वाला मुनि कहलाता है।
भावार्थ
यः मनुष्यः आपत्कालेषु उद्वेगं न अनुभवति।
हिंदी अनुवादजो मनुष्य विपत्ति के समय में उद्वेग का अनुभव नहीं करता।
यः सुखप्राप्तौ अपि निस्पृहः (इच्छारहितः) भवति।
हिंदी अनुवादजो सुख की प्राप्ति पर भी इच्छारहित रहता है।
यः इच्छा, आसक्तिः, भयः, क्रोधः, इत्येतेभ्यः मुक्तः भवति।
हिंदी अनुवादजो इच्छा, आसक्ति, भय, क्रोध – इन सबसे मुक्त है।
सः मौनी पुरुषः स्थितप्रज्ञः भवति।
हिंदी अनुवादवह मौन रहने वाला पुरुष स्थितप्रज्ञ होता है।
क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
हिंदी अनुवादक्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
हिंदी अनुवादस्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है, बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है॥
पदच्छेद और अन्वय
क्रोधात् भवति सम्मोहः सम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।
हिंदी अनुवादक्रोध से मोह होता है, मोह से स्मृति का भ्रम होता है, स्मृति के नाश से बुद्धि का नाश होता है, बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
भावार्थ
संस्कृत: मानवस्य यदा क्रोधः भवति तदा क्रोधात् अविवेकः उत्पद्यते।
हिंदी अनुवादमनुष्य में जब क्रोध होता है तब क्रोध से अविवेक उत्पन्न होता है।
अविवेकात् आत्मानं विस्मरति।
हिंदी अनुवादअविवेक से वह अपने आप को भूल जाता है।
किं योग्यं किञ्च अयोग्यम् इति अविचिनत्य क्रोधात् व्यामोहं प्राप्नोति।
हिंदी अनुवादक्या योग्य है और क्या अयोग्य है, यह न सोचकर क्रोध से व्यामोह को प्राप्त होता है।
यदा अधिकः व्यामोहः भवति तदा मनुष्यस्य स्मृतिः निष्क्रिया नष्टा च भवति।
हिंदी अनुवादजब अधिक मोह होता है तब मनुष्य की स्मृति निष्क्रिय और नष्ट हो जाती है।
स्मृतेः नाशात् बुद्धिः नश्यति। बुद्धेः नाशात् सः मनुष्यः विनाशं प्राप्नोति।
हिंदी अनुवादस्मृति के नाश से बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि के नाश से वह मनुष्य विनाश को प्राप्त होता है।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
हिंदी अनुवादउस ज्ञान को प्रणिपात (नमस्कार) से, प्रश्न पूछने से और सेवा से जानो।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥
हिंदी अनुवादतत्त्वदर्शी ज्ञानीजन तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे॥
पदच्छेद और अन्वय
तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् ज्ञानिनः तत्त्वदर्शिनः।
हिंदी अनुवादउस ज्ञान को प्रणिपात से, परिप्रश्न (प्रश्न पूछने) से और सेवा से जानो, वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी तुम्हें ज्ञान का उपदेश देंगे।
भावार्थ
भगवान् श्रीकृष्णः अर्जुनम् उपदिशति – हे अर्जुन! भवान् गुरोः समीपं गत्वा यथार्थज्ञानं प्राप्तुं प्रयासं करोतु।
हिंदी अनुवादभगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं – हे अर्जुन! आप गुरु के समीप जाकर यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करें।
भवान् विनीतः जिज्ञासुः च भूत्वा गुरोः सेवां करोतु।
हिंदी अनुवादआप विनम्र और जिज्ञासु होकर गुरु की सेवा करें।
तत्त्वज्ञानी गुरुः भवते ज्ञानं प्रदास्यति।
हिंदी अनुवादतत्त्वज्ञानी गुरु आपको ज्ञान प्रदान करेगा।
यतः ये सत्यस्य दर्शनं कृतवन्तः ते एव यथार्थज्ञानिनः भवन्ति।
हिंदी अनुवादक्योंकि जिन्होंने सत्य का दर्शन किया है, वे ही यथार्थ ज्ञानी होते हैं।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
हिंदी अनुवादश्रद्धावान्, तत्पर और संयमित इंद्रियों वाला व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥
हिंदी अनुवादज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त होता है॥
पदच्छेद और अन्वय
संयतेन्द्रियः तत्परः श्रद्धावान् (मनुष्यः) ज्ञानं लभते। तथा ज्ञानं लब्ध्वा (सः) अचिरेण परां शान्तिम् अधिगच्छति।
हिंदी अनुवादसंयमित इंद्रियों वाला, तत्पर, श्रद्धावान व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। और ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शांति को प्राप्त करता है।
भावार्थ
यः श्रद्धालुः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्तुं निरन्तरं प्रयासं करोति।
हिंदी अनुवादजो श्रद्धालु मनुष्य दिव्यज्ञान प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयास करता है।
तथैव यः मनुष्यः इन्द्रियाणि सर्वेषु कृतवान्।
हिंदी अनुवादऔर जो मनुष्य इंद्रियों को वश में कर लिया है।
सः मनुष्यः दिव्यज्ञानं प्राप्स्यति।
हिंदी अनुवादवह मनुष्य दिव्यज्ञान को प्राप्त करेगा।
तादृशं दिव्यं ज्ञानं प्राप्य सः पुरुषः जीवने अनन्तम् आनन्दं प्राप्नोति।
हिंदी अनुवादऐसे दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके वह पुरुष जीवन में अनंत आनंद प्राप्त करता है।
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
हिंदी अनुवादसभी प्राणियों से द्वेषरहित, मित्रतापूर्ण और करुणावान।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥
हिंदी अनुवादममताहीन, अहंकाररहित, सुख-दुःख में समान और क्षमाशील॥
पदच्छेद और अन्वय
(यः) सर्व भूतानाम् अद्वेष्टा मैत्रः च करुणः एव निर्ममः निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी (अस्ति, सः एव मम प्रियः भवति।)
हिंदी अनुवादजो सभी प्राणियों से द्वेषरहित, मित्रतापूर्ण, करुणावान, ममताहीन, अहंकाररहित, सुख-दुःख में समान और क्षमाशील है, वही मेरा प्रिय होता है।
भावार्थ
हे अर्जुन! यः कस्यामपि परिस्थितौ विचलितः न भवति।
हिंदी अनुवादहे अर्जुन! जो किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता।
यः ईर्ष्यारहितः समस्तप्राणिनां कृते मित्रभावयुतः दयालुः च भवति।
हिंदी अनुवादजो ईर्ष्यारहित, सभी प्राणियों के प्रति मित्रभाव युक्त और दयालु होता है।
यः ममत्वरहितः, अहङ्कारविहीनः, सुखदुःखेषु समभावयुतः क्षमाशीलः च भवति तादृशः पुरुषः भगवतः अत्यन्तं प्रियः भक्तः भवति।
हिंदी अनुवादजो ममता रहित, अहंकारहीन, सुख-दुःख में समभाव वाला और क्षमाशील होता है, ऐसा पुरुष भगवान का अत्यंत प्रिय भक्त होता है।
सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।
हिंदी अनुवादसदा संतुष्ट योगी, संयमित आत्मा वाला, दृढ़ निश्चयी।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥
हिंदी अनुवादजिसने मुझे मन और बुद्धि अर्पित कर दिया है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय है॥
पदच्छेद और अन्वय
यः योगी सततं सन्तुष्टः यतात्मा दृढनिश्चयः मयि (च) अर्पितमनोबुद्धिः (भवति) सः मद्भक्तः मे प्रियः (भवति)।
हिंदी अनुवादजो योगी सदा संतुष्ट, संयमित आत्मा वाला, दृढ़ निश्चयी और मुझे मन-बुद्धि अर्पित करने वाला होता है, वह मेरा भक्त मुझे प्रिय होता है।
भावार्थ
संस्कृत: हे पार्थ! यः निरन्तरं सन्तुष्टः भवति।
हिंदी अनुवादहे पार्थ! जो निरंतर संतुष्ट रहता है।
अर्थात् कस्यापि वस्तुनः अभावात् कदापि असन्तुष्टः न भवति।
हिंदी अनुवादअर्थात् किसी भी वस्तु के अभाव से कभी भी असंतुष्ट नहीं होता।
यः मनः इन्द्रियाणि च विजित्य संयमी भवति।
हिंदी अनुवादजो मन और इंद्रियों को जीतकर संयमी होता है।
यः स्वबुद्ध्या परमेश्वरस्य स्वरूपं स्थिरीकरोति।
हिंदी अनुवादजो अपनी बुद्धि से परमेश्वर के स्वरूप को स्थिर करता है।
यश्च मनः बुद्धिं च ईश्वरे समर्पयति।
हिंदी अनुवादऔर जो मन और बुद्धि को ईश्वर में समर्पित कर देता है।
सः मनुष्यः मम अतीव प्रियतमः भक्तः भवति।
हिंदी अनुवादवह मनुष्य मेरा अत्यंत प्रियतम भक्त होता है।
यस्मान्न उद्विजते लोकः लोकान्न उद्विजते च यः।
हिंदी अनुवादजिससे संसार उद्विग्न नहीं होता और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥
हिंदी अनुवादहर्ष, अमर्ष (क्रोध), भय और उद्वेग से मुक्त जो है, वह मुझे प्रिय है॥
पदच्छेद और अन्वय
यस्मात् लोकः न उद्विजते, यः च लोकात् न उद्विजते, यः च हर्ष-अमर्ष-भय-उद्वेगैः मुक्तः सः मे प्रियः (भवति)।
हिंदी अनुवादजिससे संसार उद्विग्न नहीं होता, और जो संसार से उद्विग्न नहीं होता, और जो हर्ष-क्रोध-भय-उद्वेग से मुक्त है, वह मुझे प्रिय होता है।
भावार्थ
हे अर्जुन! यस्मात् मनुष्यात् कोऽपि मनुष्यः प्राणी वा उद्विग्नः न भवति।
हिंदी अनुवादहे अर्जुन! जिस मनुष्य से कोई भी मनुष्य या प्राणी उद्विग्न नहीं होता।
यश्च मनुष्यः अन्यस्मात् जनात् प्राणिनः वा उद्विग्नः न भवति।
हिंदी अनुवादऔर जो मनुष्य दूसरे किसी व्यक्ति या प्राणी से उद्विग्न नहीं होता।
यश्च हर्षेण, ईर्ष्यया, भीतया, चिन्तया च रहितः भवति।
हिंदी अनुवादऔर जो हर्ष, ईर्ष्या, भय और चिंता से रहित होता है।
सः मम अतीव प्रियः भक्तः भवति।
हिंदी अनुवादवह मेरा अत्यंत प्रिय भक्त होता है।
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
हिंदी अनुवादजो वचन उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी हो।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥
हिंदी अनुवादऔर स्वाध्याय का अभ्यास, यह वाणी का तप कहलाता है॥
पदच्छेद और अन्वय
अनुद्वेगकरम् वाक्यम् सत्यम् प्रियहितम् च यत् स्वाध्यायाभ्यसनम् च एव वाङ्मयम् तपः उच्यते।
हिंदी अनुवादजो वाक्य उद्वेग रहित, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, और स्वाध्याय का अभ्यास, यह वाचिक तप कहलाता है।
भावार्थ
यत् अनुद्वेगकरं (भयं उद्वेगं न जनयेत्), सत्यं, प्रियकरं, हितकरं, च भाषणं स्यात्, तत् वाङ्मयं तपः इति कथ्यते।
हिंदी अनुवादजो भाषण उद्वेग रहित (भय और उद्वेग पैदा न करे), सत्य, प्रियकर और हितकर हो, वह वाचिक तप कहलाता है।
शास्त्रादीनां स्वाध्यायः, तेषाम् अभ्यासः च वाचिकं तपः कथ्यते।
हिंदी अनुवादशास्त्रों आदि का स्वाध्याय और उनका अभ्यास वाचिक तप कहलाता है।
तथा स्वाध्यायः अभ्यासश्चापि यथाविधि वाङ्मयं तपः इति उच्यते।
हिंदी अनुवादऔर स्वाध्याय तथा अभ्यास भी यथाविधि वाचिक तप कहलाता है।
अतः विद्यार्थिभिः स्मरणीयं यत् –
हिंदी अनुवादइसलिए विद्यार्थियों को याद रखना चाहिए कि –
प्रियवाक्प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः,
हिंदी अनुवादप्रिय वचन देने से सभी प्राणी संतुष्ट हो जाते हैं,
तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचनेन का दरिद्रता।
हिंदी अनुवादइसलिए वही बोलना चाहिए, वचन में क्या दरिद्रता है।
