एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहति: कार्यसाधिका

एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 अल्पानामपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका में एक प्रेरणादायक कथा के माध्यम से एकता, धैर्य और सामूहिक प्रयास की महत्ता को दर्शाया गया है। इस पाठ में विद्यार्थियों को यह सिखाया गया है कि कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय बुद्धि, साहस और सहयोग से कार्य करना चाहिए। कपोतों (पक्षियों) और उनके राजा चित्रग्रीव की कथा के जरिए यह संदेश दिया गया है कि छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े से बड़े संकट को भी दूर कर सकते हैं। साथ ही, पाठ में व्याकरण के महत्वपूर्ण विषय जैसे ल्यप्-प्रत्यय और संधि-विच्छेद का भी सरल एवं व्यावहारिक ज्ञान प्रदान किया गया है।
अध्याय 2 का संस्कृत से हिंदी अनुवाद

एनसीईआरटी कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न उत्तर

अभ्यासात् जायते सिद्धि:

1. अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखत –

(क) मित्राणि ग्रीष्मावकाशे कुत्र गच्छन्ति?
(ख) सर्वत्र कः प्रसृतः?
(ग) कः सर्वान् प्रेरयन् अवदत्?
(घ) कः हितोपदेशस्य कथां श्रावयति?
(ङ) कपोतराजस्य नाम किम्?
(च) व्याधः कान् विकीर्य जालं प्रसारितवान्?
(छ) विपत्काले विस्मयः कस्य लक्षणम्?
(ज) चित्रग्रीवस्य मित्रं हिरण्यकः कुत्र निवसति?
(झ) चित्रग्रीवः हिरण्यकं कथं सम्बोधयति?
(ञ) पूर्वं केषां पाशान् छिनत्तु इति चित्रग्रीवः वदति?
उत्तर:
(क) पुण्यक्षेत्रदर्शनाय।
(ख) अन्धकारः।
(ग) नायकः।
(घ) नायकः।
(ङ) चित्रग्रीवः।
(च) तण्डुलकणान्।
(छ) कापुरुषस्य।
(ज) गण्डकीतीरे चित्रवने।
(झ) सखे इति।
(ञ) आश्रितानाम्।

2. पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखत—

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 2 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 2 के उत्तर का चित्र

3. अधोलिखितानि वाक्यानि पठित्वा ल्यप्-प्रत्ययान्तेषु परिवर्तयत—

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 3 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 3 के उत्तर का चित्र

4. उदाहरणानुसारम् उपसर्गयोजनेन क्त्वा-स्थाने ल्यप्-प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा पदानि परिवर्तयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 4 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 4 के उत्तर का चित्र

5. पाठे प्रयुक्तेन उपयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 5 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 5 के उत्तर का चित्र

6. पाठे प्रयुक्तेन ल्यप्-प्रत्ययान्तपदेन सह उपयुक्तं पदं योजयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 6 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 6 के उत्तर का चित्र

7. समासयुक्तपदेन रिक्तस्थानं पूरयत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 7 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 7 के उत्तर का चित्र

8. सार्थकपदं ज्ञात्वा सन्धिविच्छेदं कुरुत –

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 8 का चित्र

उत्तर:

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 के प्रश्न 8 के उत्तर का चित्र

अध्याय 2 का संस्कृत से हिन्दी में अनुवाद नीचे दिया गया है ताकि विद्यार्थी इस पाठ को सरलता और स्पष्टता से समझ सकें।

कक्षा 8 संस्कृत दीपकम् अध्याय 2 हिंदी अनुवाद

कानिचन मित्राणि विद्यालयस्य ग्रीष्मावकाशे पुण्यक्षेत्रे दर्शनाय देवभूमिम् उत्तराखण्डम् अगच्छन् ।
हिंदी अनुवादएक बार मित्रों ने विद्यालय की ग्रीष्मावकाश में पुण्यक्षेत्र के दर्शन के लिए देवभूमि उत्तराखंड को गए।

तदानीं वर्षाऋतुप्रारम्भकालः आसीत् ।
हिंदी अनुवादउस समय वर्षा ऋतु के आरम्भ का समय था।

सर्वेऽपि गौरीकुण्डम् नामकं स्थानं प्राप्नुवन्तः ।
हिंदी अनुवादसभी गौरीकुण्ड नामक स्थान पर पहुंचे।

यदा ते श्रीकेदारक्षेत्रम् आरोहन्तः आसन् तदा लक्ष्यप्राप्तेः पूर्वं मेघेन वृष्टिः आरब्धा ।
हिंदी अनुवादजब वे श्री केदारक्षेत्र की ओर चढ़ रहे थे तब लक्ष्य की प्राप्ति से पहले बादल से वर्षा आरम्भ हो गई।

सहसा सर्वत्र अन्धकारः प्रसृतः ।
हिंदी अनुवादअचानक सभी जगह अंधकार फैल गया।

नघा: तीव्रजलमेघेन सेतुः भग्नः ।
हिंदी अनुवादबादलों ने तीव्र जल वेग से सेतु टूट गया।

पर्वतस्खलनं सञ्जातम् ।
हिंदी अनुवादपर्वत का भूस्खलन हो गया।

सर्वेऽपि उच्चस्वरेण अक्रन्दन् ईश्वरं प्रार्थयन्त च ‘हे भगवन् ! रक्ष अस्मान् रक्ष’ इति ।
हिंदी अनुवादसभी ऊँचे स्वर से रोने लगे और ईश्वर से प्रार्थना करने लगे ‘हे भगवन् ! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो’ इस प्रकार।

सर्वेषाम् अधैर्यं दृष्ट्वा नायकः सुधीरः सर्वान् सान्त्वयन् प्रेरयन्च अवदत् –
हिंदी अनुवादसबकी अधीरता देखकर नायक सुधीर ने सबको सांत्वना देते हुए और प्रेरित करते हुए कहा –

नायकः – अधुना भोः मित्राणि ! अस्मिन् विपत्काले वयं धैर्यम् अवलम्ब्य किञ्चिद् उपायं चिन्तयामः ।
हिंदी अनुवादअब हे मित्रों! इस विपत्ति के समय में हम धैर्य का सहारा लेकर कुछ उपाय सोचें।

दिनेशः – (सविषादम्) अरे भ्रातः ! किं वदसि ? अस्माकं मृत्युः एव सन्निकटे अस्ति । एवं चेत् क्वम् उपायः चिन्तनीयः ?
हिंदी अनुवाद(दुःख के साथ) अरे भाई! क्या कहते हो? हमारी मृत्यु ही निकट में है। ऐसी स्थिति में कहाँ उपाय सोचना चाहिए?

नायकः – मित्र ! विषादं मा कुरु । यदा वृष्टिः शान्ता, वातावरणं च स्वच्छं भविष्यति तदा वयं सम्भूय सेतुं, मार्गं च निर्माय पुनः स्वलक्ष्यं प्रति गमिष्यामः ।
हिंदी अनुवादमित्र! दुःख मत करो। जब वर्षा शान्त हो जाएगी, और वातावरण भी स्वच्छ हो जाएगा तब हम मिलकर सेतु और मार्ग का निर्माण करके पुनः अपने लक्ष्य की ओर जाएंगे।

सुरेशः – एतस्यां स्थितौ वयं किमेतत् अत्यन्तं दुःसाधयम्, असम्भवं च कार्यं कर्तुं शक्नुमः ?
हिंदी अनुवादइस स्थिति में हम इस अत्यन्त दुष्कर और असम्भव कार्य को कैसे कर सकते हैं?

नायकः – प्रियमित्राणि ! वयम् आत्मविश्वासबलेन इदम् असम्भवम् अपि कार्यं सम्भूय अवश्यं साधयितुं शक्नुमः ।
हिंदी अनुवादप्रियमित्रों! हम आत्मविश्वास के बल से इस असम्भव कार्य को भी मिलकर अवश्य सिद्ध कर सकते हैं।

तेन अस्माकं लक्ष्यप्राप्तिः प्राणरक्षा चापि भविष्यति ।
हिंदी अनुवादउससे हमारी लक्ष्य की प्राप्ति और प्राणों की रक्षा भी होगी।

कमलः – किम् इदं सम्भवति ?
हिंदी अनुवादयह कैसे सम्भव है?

नायकः – नून  सम्भवति मित्र ! अस्मिन् प्रसङ्गे अहं हि तोपदेशस्य एकां कथां श्रावयामि ।
हिंदी अनुवादबिल्कुल सम्भव है मित्र! इस प्रसंग में मैं हितोपदेश की एक कथा सुनाता हूँ।

सर्वेऽपि – (उत्कण्ठया) का कथा ? वद मित्र ! वद ।
हिंदी अनुवाद(उत्सुकता से) कौन सी कथा? कहो मित्र! कहो।

नायकः – सावधानं शृणुवन्तु ।
हिंदी अनुवादध्यान से सुनो।

अस्ति गोदावरीतीरे एको विशालः शावृक्षतरुः।
हिंदी अनुवादगोदावरी के तट पर एक विशाल शालवृक्ष का पेड़ है।

तत्र प्रतिदिनं दूरदेशात् पक्षिणः आगत्य निवसन्ति स्म ।
हिंदी अनुवादवहाँ प्रतिदिन दूर देश से पक्षी आकर निवास करते थे।

अथ कदाचित् तत्र कश्चिद् व्याधस्तण्डुलकान् विकीर्य जालं विस्तीर्य च प्रच्छन्नो भूत्वा स्थितः ।
हिंदी अनुवादफिर एक बार वहाँ कोई व्याध चावल के दाने बिखेरकर और जाल फैलाकर छिपा हुआ खड़ा था।

तस्मिन्नेव काले चित्रग्रीवनामा कपोतराजः सपरिवारः आकाशमार्गेण गच्छन्ति स्म ।
हिंदी अनुवादउसी समय चित्रग्रीव नामक कबूतरों का राजा अपने परिवार के साथ आकाश में उड़ रहा था।

केचित् कपोताः भोजनार्थाय तण्डुलकान् अवलोक्य लोभाकृष्टाः अभवन् ।
हिंदी अनुवादकुछ कबूतर भोजन के लिए चावल के दानों को देखकर लोभ में आकर्षित हो गए।

ततो चित्रग्रीवः तण्डुलकलुब्धान् कपोतान् अवदत् – “कुतोऽत्र निर्जने वने तण्डुलकानां सम्भवः तदविरूप्यताम् । कश्चिद्व्याधोऽत्र भवेत् । सर्वथा अविचारितं कर्म न कर्तव्यम् ।”
हिंदी अनुवादतब चित्रग्रीव ने चावल के दानों के लालची कबूतरों से कहा – “इस निर्जन वन में चावल के दानों की उत्पत्ति कहाँ से हो सकती है, इसलिए रुको। यहाँ कोई व्याध हो सकता है। सभी प्रकार से बिना विचारे किया हुआ कार्य नहीं करना चाहिए।”

एतद्वचनं श्रुत्वा कश्चित् कपोतः सर्पम् अवदत् – “आः किमर्थम् एवमुच्यते ?”
हिंदी अनुवादइस वचन को सुनकर किसी कबूतर ने क्रोध से कहा – “अरे किस लिए ऐसा कहा जाता है?”

वृद्धानां वचनं ग्राह्यमाप्रत्काले ह्युपस्थिते ।
सर्वत्रैवं विचारे तु भोजनेऽप्यप्रवर्तनम् ॥ १ ॥
हिंदी अनुवादविपत्ति के समय उपस्थित होने पर वृद्धों का वचन ग्रहण करना चाहिए।
सब जगह इस प्रकार विचार करने पर भोजन में भी अरुचि नहीं होती।

तस्य वचनं श्रुत्वा चित्रग्रीवस्य च अवज्ञां कृत्वा सर्वे कपोताः भूमौ अवतीर्य तण्डुलकान् भोक्तुं प्रवृत्ताः ।
हिंदी अनुवादउसके वचन को सुनकर और चित्रग्रीव की अवज्ञा करके सभी कबूतर भूमि पर उतरकर चावल के दानों को खाने में लग गए।

अनन्तरं ते सर्वे तेन जालेन बद्धाः अभवन् ।
हिंदी अनुवादइसके बाद वे सभी उस जाल में बंध गए।

ततो यस्य वचनात् कपोतास्तत् बद्धास्तं सर्वे तिरस्कुर्वन्ति स्म ।
हिंदी अनुवादतब जिसके वचन से कबूतर बंधे थे उसे सभी तिरस्कार करने लगे।

इदं दृष्ट्वा चित्रग्रीवः अवदत् – “अयम् अस्य दोषो न । अनागतविपत्तिं को वा जातुं सर्वथः ।
हिंदी अनुवादयह देखकर चित्रग्रीव ने कहा – “यह इसका दोष नहीं है। आने वाली विपत्ति को भला कौन जान सकता है।

अतोऽस्मिन् विपत्काले अस्माभिः अस्य तिरस्कारम् अकृत्वा किञ्चन उपायचिन्तनीयः ।
हिंदी अनुवादअतः इस विपत्ति के समय हमें इसका तिरस्कार न करके कुछ उपाय सोचना चाहिए।

यतोहि विपत्काले विषमयः एव कापुरुषलक्षणम् । सत्पुरुषाणां लक्षणं तु –
हिंदी अनुवादक्योंकि विपत्ति के समय विषाद ही कायर पुरुष का लक्षण है। सज्जनों का लक्षण तो –

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि वाक्पटुता युद्धे विक्रमः ।
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥ २ ॥
हिंदी अनुवादविपत्ति में धैर्य, उन्नति में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में विक्रम, यश में अभिरुचि और शास्त्र में व्यसन – यह महात्माओं का स्वाभाविक गुण है।

अतोऽधुना अस्माभिः धैर्यमवलम्ब्य प्रतीकारचिन्तयताम् ।
हिंदी अनुवादअतः यहाँ हमें धैर्य का सहारा लेकर प्रतिकार का विचार करना चाहिए।

प्रियमित्राणि ! लघूनाम् अपि वस्तूनां संहतिः कार्यसाधिका भवति इति नीतिवचनं लोकसिद्धम् ।
हिंदी अनुवादप्रिय मित्रों! छोटी-छोटी वस्तुओं की एकता भी कार्य को सिद्ध करने वाली होती है, यह नीति का वचन लोक में सिद्ध है।

अतः अस्माभिः सर्वैः एकचित्तीभूय जालमादाय उड्डीयताम् ।”
हिंदी अनुवादअतः हम सबको एक मन होकर जाल को उठाकर उड़ना चाहिए।”

एवं विचार्य सर्वे पक्षिणः जालमादाय उत्पतिताः ।
हिंदी अनुवादइस प्रकार विचार करके सभी पक्षियों ने जाल को उठाकर उड़ान भरी।

अनन्तरं स व्याधः सुदूरात् जालापहारकान् तान् अवलोक्य पश्चात् अधावत् परं तस्य दृष्टिप्रान्तात् दूरं गतेषु पक्षिषु स व्याधो निवृत्तः ।
हिंदी अनुवादइसके बाद वह व्याध बहुत दूर से जाल को ले जाने वालों को देखकर पीछे दौड़ा परन्तु उसकी दृष्टि की सीमा से दूर चले जाने पर पक्षियों में से वह व्याध लौट गया।

अथ व्याधं निवृत्तं दृष्ट्वा कपोताः उक्तवन्तः – “स्वामिन् ! किमिदानीं कर्तुम् उचितम् ?”
हिंदी अनुवादफिर व्याध को लौटा हुआ देखकर कबूतरों ने कहा – “स्वामी! अब क्या करना उचित है?”

चित्रग्रीव उवाच – “प्रियकपोताः ! अस्माकं मित्रं हि हिरण्यको नाम मूषकराजः गण्डकीतीरे चित्रवने निवसति ।
हिंदी अनुवादचित्रग्रीव ने कहा – “प्रिय कबूतरों! हमारा मित्र हिरण्यक नामक चूहों का राजा गण्डकी के तट पर चित्रवन में रहता है।

सोऽस्माकं पाशान् दन्तबलेन छेत्स्यति ।”
हिंदी अनुवादवह हमारे बंधनों को दांत के बल से काट देगा।”

एतत् आलोच्य सर्वे हिरण्यकस्य निवरस्थानं गताः ।
हिंदी अनुवादइस पर विचार करके सभी हिरण्यक के रहने के स्थान पर गए।

हिरण्यकश्च सर्वदा अनिष्टशङ्कया शतद्वारं निवरं कृत्वा निवसति ।
हिंदी अनुवादऔर हिरण्यक सदा अनिष्ट की आशंका से सौ द्वारों वाला घर बनाकर रहता है।

ततो हिरण्यकः कपोतानाम् अवपातभयात्च चकितस्तूष्णीं स्थितः ।
हिंदी अनुवादतब हिरण्यक कबूतरों के गिरने के भय से और घबराकर चुप खड़ा रहा।

चित्रग्रीवउवाच – “सखे हिरण्यक ! किम् अस्माभिः सह न सम्भाषसे ?”
हिंदी अनुवादचित्रग्रीव ने कहा – “सखे हिरण्यक! क्या हमारे साथ बात नहीं करते?”

ततो हिरण्यकस्तद्वचनं प्रत्यभिज्ञाय आनन्देन त्वरया बहिः निःसृत्य अब्रवीत् – “आः ! पुण्यवान् अस्मि, मम प्रियसुहृत् चित्रग्रीवः स्वागतः ।”
हिंदी अनुवादतब हिरण्यक ने उस वचन को पहचानकर आनन्द से शीघ्रता से बाहर निकलकर कहा – “आह! मैं धन्य हूँ, मेरा प्रिय मित्र चित्रग्रीव स्वागत है।”

पाशबद्धान् कपोतान् दृष्ट्वा सविषमयं कृपां स्थित्वा अवदत् – “सखे ! किमेतत् ?”
हिंदी अनुवादजाल में बंधे कबूतरों को देखकर दुःख के साथ करुणा करके कहा – “सखे! यह क्या है?”

चित्रग्रीवोऽवदत् – “सखे ! एतद् अस्माकं विचारहीनतायाः फलम् ।”
हिंदी अनुवादचित्रग्रीव ने कहा – “सखे! यह हमारी विचारहीनता का फल है।”

तत् श्रुत्वा हिरण्यकः चित्रग्रीवस्य बन्धनं छेत्तुं सत्वरम् उपसर्पति ।
हिंदी अनुवादवह सुनकर हिरण्यक चित्रग्रीव के बंधन को काटने के लिए शीघ्रता से पास आता है।

तदा चित्रग्रीवोऽवदत् – “मित्र ! मा मा एवम् । पूर्वं मदाश्रितानाम् एतेषां पाशान् छिनत्तु, पश्चात् मम ।”
हिंदी अनुवादतब चित्रग्रीव ने कहा – “मित्र! नहीं नहीं ऐसा मत करो। पहले मेरे आश्रित इनके बंधनों को काटो, बाद में मेरे।”

एतदाकर्ण्य हिरण्यकः प्रहृष्टमनाः पुलकितः सन् अब्रवीत् – “साधु मित्र ! साधु । अनेन आश्रितवात्सल्येन त्वं त्रैलोक्यस्यापि स्वामित्वं प्राप्तुं योग्योऽसि ।”
हिंदी अनुवादयह सुनकर हिरण्यक प्रसन्न मन से रोमांचित होकर बोला – “साधु मित्र! साधु। इस आश्रितों के प्रति स्नेह से तुम तीनों लोकों के भी स्वामित्व को प्राप्त करने योग्य हो।”

ततो हिरण्यकः सत्वरैः सह सर्वेषां कपोतानां बन्धानि छिनत्ति स्म ।
हिंदी अनुवादतब हिरण्यक ने शीघ्रता के साथ सभी कबूतरों के बंधनों को काटा।

सर्वे कपोताः पाशविमुक्ताः अभवन् ।
हिंदी अनुवादसभी कबूतर बंधनों से मुक्त हो गए।

सहस्रं पुनः उड्डीय आकाशमार्गेण गच्छन्तः सर्वे कपोताः राजानं चित्रग्रीवं प्रशंसन्ति – “भवतः नीतिशिक्षया नायकत्वेन च वयं सर्वे सुरक्षिताः । धन्याः वयम्” ।
हिंदी अनुवादहज़ार बार फिर उड़कर आकाश मार्ग से जाते हुए सभी कबूतर राजा चित्रग्रीव की प्रशंसा करते हैं – “आपकी नीति की शिक्षा से और नेतृत्व से हम सभी सुरक्षित हैं। धन्य हैं हम।”

कथां श्रावयित्वा नायकः सर्वान् सम्बोधयति – “मित्राणि ! आपद्गस्ताः कपोताः बुद्धिबलेन संघटनसामर्थ्येन च आत्मसंरक्षणं कृतवन्तः ।
हिंदी अनुवादकथा सुनाकर नायक सबको संबोधित करता है – “मित्रों! विपत्ति में फंसे कबूतरों ने बुद्धि के बल से और संगठन की सामर्थ्य से अपनी रक्षा की।

तर्हि किम्वं वयं संघटिताः भूत्वा आत्मसंरक्षणं कर्तुं न शक्नुमः ?”
हिंदी अनुवादतो क्या हम संगठित होकर अपनी रक्षा नहीं कर सकते?”

नायकस्य प्रेरकवचनैः उत्साहिताः सर्वेऽपि भयं शोकं सन्देहं च विहाय सेतुनिर्माणकार्ये संलग्नाः जाताः ।
हिंदी अनुवादनायक के प्रेरक वचनों से उत्साहित होकर सभी ने भय, शोक और संदेह को छोड़कर सेतु निर्माण के कार्य में लग गए।

भागीरथप्रयत्नैः सेतुनिर्माणं कृत्वा तैः स्वीयप्राणाः अन्येषां च प्राणाः संरक्षिताः ।
हिंदी अनुवादभागीरथ के समान प्रयत्नों से सेतु का निर्माण करके उन्होंने अपने प्राणों की और दूसरों के प्राणों की रक्षा की।