कक्षा 9 इतिहास एनसीईआरटी समाधान अध्याय 5

कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान इतिहास के लिए एनसीईआरटी समाधान अध्याय 5 आधुनिक विश्व में चरवाहे के अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर तथा अभ्यास के प्रश्न उत्तर सीबीएसई सत्र 2022-2023 के लिए यहाँ से प्राप्त किए जा सकते हैं। 9वीं कक्षा इतिहास के ये समाधान पीडीएफ तथा ऑनलाइन प्रारूप में दिए गए हैं और इन्हें मुफ़्त में डाउनलोड किया जा सकता है। कक्षा 9 इतिहास के अध्याय 5 के अतिरिक्त प्रश्न उत्तर भी दिए गए हैं ताकि विद्यार्थी परिक्षाओं में इसकी मदद ले सकें।

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कक्षा 9 इतिहास के लिए एनसीईआरटी समाधान अध्याय 5

कक्षा 9 इतिहास अध्याय 5 आधुनिक विश्व में चरवाहे के प्रश्न उत्तर

स्पष्ट कीजिए कि घुमंतू समुदायों को बार-बार एक जगह से दूसरी जगह क्यों जाना पड़ता है? इस निरंतर आवागमन से पर्यावरण को क्या लाभ हैं?

घुमंतू समुदायों को नए चरागाहों की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने की आवश्यकता है। जब एक विशेष भाग में घास समाप्त हो जाती है और मौसम बिना शर्त हो जाता है, तो घुमंतू समुदायों किसी अन्य क्षेत्र में चली जाती हैं। घुमंतू समुदायों का मौसमी आंदोलन पर्यावरण के लिए फायदेमंद है। यह चरागाह में घास की प्राकृतिक पुन: वृद्धि की अनुमति देता है।

इस बारे में चर्चा कीजिए कि औपनिवेशिक सरकार ने निम्नलिखित कानून क्यों बनाए? यह भी बताइए कि इन कानूनों से चरवाहों के जीवन पर क्या असर पड़ा: परती भूमि नियमावली, वन अधिनियम, अपराधी जनजाति अधिनियम, चराई कर
    • परती भूमि नियमावली
      यह कानून उस भूमि को नियंत्रित करने के लिए लाया गया था जो खेती के अधीन नहीं थी। अधिशेष भूमि का उपयोग खेती के तहत क्षेत्र को बढ़ाने के लिए और भूमि राजस्व बढ़ाने के लिए भी किया जा सकता है। यह नियम चरागाह को सिकोड़ देता है जो पहले उपलब्ध था।
    • वन अधिनियम
      इन अधिनियमों को उन वनों पर नियंत्रण पाने के लिए पेश किया गया था, जिनमें व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण पेड़ थे। इसके अलावा, इन कार्यों का उपयोग चरागाहों से कुछ राजस्व एकत्र करने के लिए भी किया जाता था। नए वन अधिनियमों के कारण देहाती लोगों का आंदोलन बुरी तरह प्रतिबंधित था। मौसम के अनुसार अपने आंदोलन की योजना बनाने के बजाय, देहाती लोगों को अब नए नियमों के अनुसार चलना पड़ा।
    • अपराधी जनजाति अधिनियम
      इस अधिनियम को घुमंतू समुदायों को एक व्यवस्थित जीवन के लिए मजबूर करने के लिए पेश किया गया था। घुमंतू लोगों से कर एकत्र करना मुश्किल था क्योंकि उनके पास स्थायी पता नहीं था। इस अधिनियम ने घुमंतू समुदायों की छवि को धूमिल किया। इसने किसानों और अन्य मुख्यधारा के समुदायों के साथ उनके संबंधों को परेशान किया। इससे उनकी कमाई भी बुरी तरह प्रभावित हुई।
    • चराई कर
      कर के जाल को विस्तृत करने के लिए चराई कर की शुरुआत की गई थी। इस कर ने देहातियों पर एक नया बोझ डाला।
मसाई समुदाय के चरागाह उससे क्यों छीन गए? कारण बताएं।

मसाई समुदाय को ब्रिटिश और जर्मन प्रदेशों में 1885 में विभाजित किया गया था। नई अंतर्राष्ट्रीय सीमा ने मसाई समुदाय के आंदोलन को प्रतिबंधित कर दिया। इसके अलावा, खेल के मैदानों में चरागाह की एक विशाल पथ की घोषणा ने भी मसाई के लिए चरागाह को कम कर दिया।

आधुनिक विश्व ने भारत और पूर्वी अफ़्रीकी चरवाहा समुदायों के जीवन में जिन परिवर्तनों को जन्म दिया उनमें कई समानताएं थीं। ऐसे दो परिवर्तनों के बारे में लिखिए जो भारतीय चरवाहों और मसाई गड़रियों, दोनों के बीच सामान रूप से मौजूद थे।

कुछ क्षेत्रों को आरक्षित वनों के रूप में घोषित करने के नाम पर उनका पारंपरिक चरागाह उनसे लिया गया था। दूसरा, उन्हें खेती के विस्तार के नाम पर कई चरागाहों से बाहर कर दिया गया।

कक्षा 9 इतिहास अध्याय 5 अतिरिक्त प्रश्न उत्तर

घुमंतू लोग कौन होते हैं और इनका आजीविका का मुख्य साधन क्या है?

घुमंतू ऐसे लोग होते हैं जो किसी एक जगह टिक कर नहीं रहते बल्कि रोज़ी-रोटी के जुगाड़ में यहाँ से वहाँ घूमते रहते हैं। देश के कई हिस्सों में हम घुमंतू चरवाहों को अपने जानवरों के साथ आते-जाते देख सकते हैं। चरवाहों की किसी टोली के पास भेड़-बकरियों का रेवड़ या झुंड होता है तो किसी के पास ऊँट या अन्य मवेशी रहते हैं।

गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग कहाँ पाए जाते हैं?

जम्मू और कश्मीर के गुज्जर बकरवाल समुदाय के लोग भेड़-बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ रखते हैं। इस समुदाय के अधिकतर लोग अपने मवेशियों के लिए चरागाहों की तलाश में भटकते-भटकते उन्नीसवीं सदी में यहाँ आए थे। जैसे-जैसे समय बीतता गया वे यहीं के होकर रह गए; यहीं बस गए। इसके बाद वे सर्दी-गर्मी के हिसाब से अलग-अलग चरागाहों में जाने लगे।

जाड़ों में जब ऊँची पहाड़ियाँ बर्फ से ढक जातीं तो वे शिवालिक की निचली पहाड़ियों में आकर डेरा डाल लेते। जाड़ों में निचले इलाके में मिलने वाली सूखी झाड़ियाँ ही उनके जानवरों के लिए चारा बन जातीं। अप्रैल के अंत तक वे उत्तर दिशा में जाने लगते गर्मियों के चरागाहों के लिए। इस सफर में कई परिवार काफिला बना कर साथ-साथ चलते हैं।

हिमाचल प्रदेश में घुमंतू जाति के लोगों को क्या कहा जाता है और इनका प्रवास कहाँ होता है?

हिमाचल प्रदेश के इस समुदाय को गद्दी कहते हैं। ये लोग भी मौसमी उतार-चढ़ाव का सामना करने के लिए इसी तरह सर्दी-गर्मी के हिसाब से अपनी जगह बदलते रहते थे। वे भी शिवालिक की निचली पहाड़ियों में अपने मवेशियों को झाड़ियों में चराते हुए जाड़ा बिताते हैं। अप्रैल आते-आते वे उत्तर की तरफ चल पड़ते और पूरी गर्मियाँ लाहौल और स्पीति में बिता देते। जब बर्फ पिघलती और ऊँचे दर्रे खुल जाते तो उनमें से बहुत सारे ऊपरी पहाड़ों में स्थित घास के मैदानों में जा पहुँचते थे। सितंबर तक वे दोबारा वापस चल पड़ते।

बुग्याल किसे कहा जाता है?

बुग्याल शब्द का अर्थ है घास के मैदान, उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में जहाँ पेड़ों की पक्तियां समाप्त हो जाती है वहां से आगे और बर्फीले हिस्से से नीचे जो विषम घास के मैदान होते हैं वे बुग्याल कहलाते हैं। गर्मियों में गुज्जर समुदाय के लोग अपने जानवरों को चराने के लिए इन मैदानों का रुख करते हैं। जबकि सर्दी शुरू होने से पहले तराई के इलाके में आ जाते हैं।

देश के दूसरे हिस्सों में कौन-कौन सी घुमंतू जातियां पाई जाती हैं?

उत्तर के हिमालयी क्षेत्रों के अलावा देश के अन्य भागों में भी अनेक घुमंतू जातियां पाई जाती हैं। जिनमे से कुछ जातियों का विवरण इस प्रकार है: धंगर महाराष्ट्र का एक जाना-माना चरवाहा समुदाय है। बीसवीं सदी की शुरुआत में इस समुदाय की आबादी लगभग 4, 67, 000 थी। उनमें से ज़्यादातर गड़रिये या चरवाहे थे हालाँकि कुछ लोग कम्बल और चादरें भी बनाते थे जबकि कुछ भैंस भी पालते थे। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में भी सूखे मध्य पठार घास और पत्थरों से अटे पड़े थे।

इनमें मवेशियों, भेड़-बकरियों और गड़रियों का ही बसेरा रहता था। यहाँ गोल्ला समुदाय के लोग गाय-भैंस पालते थे जबकि कुरुमा और कुरुबा समुदाय भेड़-बकरियाँ पालते थे और हाथ के बुने कम्बल बेचते थे। चरवाहों में एक जाना-पहचाना नाम बंजारों का भी है। बंजारे उत्तर प्रदेश, पंजाब, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कई इलाकों में रहते थे। राजस्थान के रेगिस्तानों में राइका समुदाय रहता था। राइकाओं का एक तबका ऊँट पालता था जबकि कुछ भेड़-बकरियाँ पालते थे।

औपनिवेशिक शासन का चरवाहों की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ा?

औपनिवेशिक शासन के दौरान चरवाहों की ज़िंदगी में गहरे बदलाव आए। उनके चरागाह सिमट गए, इधर-उधर आने-जाने पर बंदिशें लगने लगीं और उनसे जो लगान वसूल किया जाता था उसमें भी वृद्धि हुई। खेती में उनका हिस्सा घटने लगा और उनके पेशे और हुनरों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा। औपनिवेशिक शासन के दौरान चरवाहों की ज़िंदगी में गहरे बदलाव आए। उनके चरागाह सिमट गए, इधर-उधर आने-जाने पर बंदिशें लगने लगीं और उनसे जो लगान वसूल किया जाता था उसमें भी वृद्धि हुई।

खेती में उनका हिस्सा घटने लगा और उनके पेशे और हुनरों पर भी बहुत बुरा असर पड़ा। अंग्रेज़ सरकार चरागाहों को खेती की ज़मीन में तब्दील कर देना चाहती थी। इस तरह खेती के फैलाव से चरागाह सिमटने लगे और चरवाहों के लिए समस्याएँ पैदा होने लगीं। उन्नीसवीं सदी के मध्य तक आते-आते देश के विभिन्न प्रांतों में वन अधिनियम भी पारित किए जाने लगे थे। इन कानूनों की आड़ में सरकार ने ऐसे कई जंगलों को ‘आरक्षित’ वन घोषित कर दिया जहाँ देवदार या साल जैसी कीमती लकड़ी पैदा होती थी। इन जंगलों में चरवाहों के घुसने पर पाबंदी लगा दी गई।

चरवाहों ने इन बदलावों का सामना कैसे किया?

इन बदलावों पर चरवाहों की प्रतिक्रिया कई रूपों में सामने आई। कुछ चरवाहों ने तो अपने जानवरों की संख्या ही कम कर दी। अब बहुत सारे जानवरों को चराने के लिए पहले की तरह बड़े-बड़े और बहुत सारे मैदान नहीं बचे थे। जब पुराने चरागाहों का इस्तेमाल करना मुश्किल हो गया तो कुछ चरवाहों ने नए-नए चरागाह ढूँढ़ लिए। समय गुज़रने के साथ कुछ धनी चरवाहे ज़मीन खरीद कर एक जगह बस कर रहने लगे। उनमें से कुछ नियमित रूप से खेती करने लगे जबकि कुछ व्यापार करने लगे। इस सबके बावजूद चरवाहे न केवल आज भी ज़िंदा हैं बल्कि हाल के दशकों में कई जगह तो उनकी संख्या में वृद्धि भी हुई है।

अफ्रीका में कौन से चरवाहे समुदाय रहते थे और उनकी क्या स्थिति थी?

अफ्रीका में दुनिया की आधी से ज़्यादा चरवाहा आबादी रहती है। आज भी अफ्रीका के लगभग सवा दो करोड़ लोग रोज़ी-रोटी के लिए किसी न किसी तरह की चरवाही गतिविधियों पर ही आश्रित हैं। इनमें बेदुईन्स, बरबेर्स, मासाई, सोमाली, बोरान और तुर्काना जैसे जाने-माने समुदाय भी शामिल हैं। इनमें से ज़्यादातर अब अर्ध-शुष्क घास के मैदानों या सूखे रेगिस्तानों में रहते हैं जहाँ वर्षा आधारित खेती करना बहुत मुश्किल है।

यहाँ के चरवाहे गाय-बैल, ऊँट, बकरी, भेड़ व गधे पालते हैं और दूध, माँस, पशुओं की खाल व ऊन आदि बेचते हैं। कुछ चरवाहे व्यापार और यातायात संबंधी काम भी करते हैं। कुछ चरवाही के साथ-साथ खेती भी करते हैं। कुछ लोग चरवाही से होने वाली मामूली आय से गुजर नहीं हो पाने पर कोई भी धंधा कर लेते हैं।

कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान इतिहास अध्याय 5 आधुनिक विश्व में चरवाहे समाधान
कक्षा 9 के सामाजिक विज्ञान इतिहास अध्याय 5 के समाधान