एनसीईआरटी समाधान कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 संसदीय प्रणाली – विधायिका और कार्यपालिका
कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 संसदीय प्रणाली – विधायिका और कार्यपालिका के एनसीईआरटी समाधान में भारत की लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को विस्तार से समझाया गया है। इस अध्याय में यह बताया गया है कि भारत में संसद कैसे कार्य करती है, उसके प्रमुख अंग कौन-कौन से हैं तथा विधायिका और कार्यपालिका की क्या भूमिकाएँ हैं। साथ ही, कानून बनाने की प्रक्रिया, संसद की शक्तियाँ और सरकार के विभिन्न अंगों के बीच संतुलन और नियंत्रण की व्यवस्था को सरल भाषा में समझाया गया है। यह अध्याय विद्यार्थियों को लोकतंत्र की मूल संरचना और शासन के कार्य करने के तरीके की गहरी समझ प्रदान करता है।
एनसीईआरटी कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 के प्रश्न उत्तर
पेज 139: महत्वपूर्ण प्रश्न
1. भारत की संसदीय प्रणाली क्या है और इसकी संरचना किस प्रकार की गई है?
उत्तर:
भारत की संसदीय प्रणाली ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है। इस प्रणाली में जनता अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है, जो संसद में बैठकर शासन चलाते हैं।
भारत की संसद की संरचना द्विसदनीय है, जिसमें तीन अंग होते हैं—
- राष्ट्रपति
- लोकसभा (निचला सदन)
- राज्यसभा (उच्च सदन)
लोकसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, जबकि राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं। यह संरचना लोकतंत्र, संतुलन और विभिन्न वर्गों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करती है।
2. संसद के प्रमुख कार्य क्या हैं?
उत्तर:
संसद के प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं—
- संवैधानिक कार्य – संविधान में संशोधन करना तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का निर्वाचन करना।
- कानून निर्माण – देश के लिए नए कानून बनाना और पुराने कानूनों में संशोधन करना।
- कार्यपालिका संबंधी उत्तरदायित्व – सरकार (कार्यपालिका) के कार्यों की निगरानी करना और उससे जवाबदेही सुनिश्चित करना।
- वित्तीय उत्तरदायित्व – बजट पारित करना, सरकारी खर्चों को नियंत्रित करना और धन के उपयोग की जाँच करना।
इन कार्यों के माध्यम से संसद देश के शासन को सुचारु और उत्तरदायी बनाती है।
3. भारत के संसदीय लोकतंत्र में विधायिका और कार्यपालिका की भूमिकाएँ क्या हैं?
उत्तर:
भारत के संसदीय लोकतंत्र में—
- विधायिका (संसद)
- कानून बनाती है।
- सरकार के कार्यों की निगरानी करती है।
- बजट को पारित करती है।
कार्यपालिका (राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद)
- संसद द्वारा बनाए गए कानूनों को लागू करती है।
- प्रशासन चलाती है और नीतियाँ बनाती है।
- देश की सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखती है।
इस प्रकार विधायिका और कार्यपालिका मिलकर शासन चलाते हैं, जहाँ कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
4. केंद्र और राज्य स्तर पर विधायिका और कार्यपालिका का गठन किस प्रकार किया जाता है?
उत्तर:
केंद्र स्तर पर
- विधायिका: संसद (राष्ट्रपति + लोकसभा + राज्यसभा)
- कार्यपालिका: राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद
- प्रधानमंत्री बहुमत दल का नेता होता है और मंत्रियों की नियुक्ति करता है।
राज्य स्तर पर
- विधायिका: विधानमंडल (विधानसभा और कुछ राज्यों में विधान परिषद)
- कार्यपालिका: राज्यपाल, मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद
- मुख्यमंत्री राज्य में बहुमत दल का नेता होता है।
दोनों स्तरों पर कार्यपालिका, विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है और उसी के आधार पर शासन चलाया जाता है।
पेज 148: आइए पता लगाएँ
1. आर.टी.ई. किस प्रकार एक अधिनियम बना, यह प्रक्रिया दर्शाने के लिए एक छोटा-सा चार्ट बनाएँ। यदि आर.टी.ई. लोकसभा में प्रस्तुत किया गया होता तो आपके विचार से उसकी प्रकिया कैसी होती?
उत्तर:
- आर.टी.ई. अधिनियम बनने की प्रक्रिया (चार्ट)
विचार → विधेयक तैयार → संसद में प्रस्तुत → समिति को भेजा → चर्चा व संशोधन → दोनों सदनों से पारित → राष्ट्रपति की स्वीकृति → अधिनियम बना → राजपत्र में प्रकाशित - यदि लोकसभा में प्रस्तुत होता
यदि आर.टी.ई. लोकसभा में प्रस्तुत होता, तो पहले वहाँ चर्चा होती, फिर मतदान होता। पास होने पर इसे राज्यसभा भेजा जाता। राज्यसभा से स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी ली जाती और अंत में यह कानून बन जाता।
पेज 150: आइए पता लगाएँ
1. यहाँ स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधिकारियों के बीच हुई बैठकों की रिपोर्ट का एक अंश दिया गया है। ऊपर दिए गए चित्र को देखें और छोटे-छोटे समूहों में निम्नलिखित पर चर्चा करें—
कौन किसे रिपोर्ट कर रहा है? किस विषय की समीक्षा की गई है? समिति की अनुशंसा पहचानिए। सरकार का प्रत्युत्तुर क्या है?
उत्तर:
इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति सरकार को रिपोर्ट कर रही है और मंत्रालय के कार्यों की समीक्षा कर रही है। समीक्षा का विषय आयुष सुविधाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में लागू करना है। समिति की अनुशंसा है कि जिन राज्यों में आयुष विभाग नहीं है, वहाँ इसे स्थापित किया जाए। सरकार का प्रत्युत्तर है कि यह राज्य का विषय है, पर मंत्रालय राज्यों को आयुष विभाग बनाने और योजनाएँ लागू करने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है।
पेज 151: आइए पता लगाएँ
1. आपके विचार से संसद सरकारी व्यय पर दृष्टि क्यों रखती है?
उत्तर:
मेरे विचार से संसद सरकारी व्यय पर इसलिए दृष्टि रखती है क्योंकि सरकार जनता के पैसों (कर) का उपयोग करती है। संसद यह सुनिश्चित करती है कि पैसा सही कार्यों में, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास योजनाओं पर खर्च हो। इससे अनावश्यक खर्च और भ्रष्टाचार को रोका जा सकता है। साथ ही, संसद सरकार को जवाबदेह बनाती है ताकि वह जनता के हित में ही धन का उपयोग करे और गलत फैसलों से बचा जा सके।
पेज 152: आइए पता लगाएँ
1. यदि कार्यपालिका के सदस्य विधायिका का ही अंग हैं तो हम कैसे कह सकते है की यह शक्तियों का पथृक्करण है?
उत्तर:
यद्यपि कार्यपालिका के सदस्य (प्रधानमंत्री और मंत्री) विधायिका से ही आते हैं, फिर भी शक्तियों का पृथक्करण बना रहता है क्योंकि दोनों के कार्य अलग-अलग होते हैं। विधायिका कानून बनाती है, जबकि कार्यपालिका उन कानूनों को लागू करती है। संसद कार्यपालिका से प्रश्न पूछकर और उसकी नीतियों की जाँच करके उसे नियंत्रित करती है। इस प्रकार, दोनों अंग जुड़े होने के बावजूद एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते हैं, इसलिए शक्तियों का संतुलन बना रहता है।
पेज 154: आइए पता लगाएँ
1. यदि तीनों अंगों में से किसी एक— विधायि का, कार्यपालिका या न्यायपालिका के पास समस्त शक्ति आ जाए, तब क्या हो सकता है? यह लोगों के अधिकारों को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है? इस विषय पर अपने सहपाठियों से विचार-विमर्श कीजिए कि प्रत्येक अंग किस प्रकार दूसरे अंग पर नियंत्रण रखता है। उदाहरण के लिए, विधायिका किस प्रकार न्यायपालिका की कार्यवाही पर प्रश्न उठाती है? न्यायपालिका किस प्रकार सुनिश्चित करती है कि निर्मिैत कानून और शासकीय कार्य संविधान के अनुरूप हों? क्या आपको लगता है कि न्यायपालि का की कार्वाहियों की भी किसी प्रकार समीक्षा की जा सकती है?
उत्तर:
यदि सरकार के तीनों अंगों—विधायिका, कार्यपालिका या न्यायपालिका में से किसी एक के पास सारी शक्ति आ जाए, तो तानाशाही जैसी स्थिति बन सकती है। इससे लोगों के अधिकारों का हनन हो सकता है और मनमाने निर्णय लिए जा सकते हैं। इसलिए तीनों अंग एक-दूसरे पर नियंत्रण रखते हैं। विधायिका, प्रश्नकाल और चर्चाओं के माध्यम से न्यायपालिका और कार्यपालिका पर प्रश्न उठा सकती है। न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि बनाए गए कानून और सरकारी कार्य संविधान के अनुरूप हों, और गलत पाए जाने पर उन्हें रद्द कर सकती है। मुझे लगता है कि न्यायपालिका की कार्यवाहियों की भी समीक्षा संभव है, जैसे उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से अपील की व्यवस्था, जिससे न्याय में संतुलन बना रहता है।
पेज 155: आइए पता लगाएँ
1. क्या आप ऐसे उदाहरण ढूँढ़ सकते हैं जहाँ न्यायपालिका ने काननू बनाने वालों से किसी काननू की समीक्षा करने के लिए कहा हो? क्या आप ऐसे उदाहरण भी ढूँढ़ सकते हैं जहाँ किसी काननू के क्रियान्वयन पर न्यायपालिका ने प्रश्न उठाए हों?
उत्तर:
हाँ, ऐसे कई उदाहरण हैं। जैसे केशवानंद भारती मामला में न्यायपालिका ने संसद को बताया कि संविधान की मूल संरचना नहीं बदली जा सकती, इसलिए कानूनों की समीक्षा जरूरी है। इसी तरह मेनका गांधी मामला में न्यायालय ने सरकार के कार्यों पर प्रश्न उठाए। इसके अलावा न्यायपालिका ने कई बार कानूनों के गलत क्रियान्वयन पर भी सरकार से जवाब माँगा और सुधार करने के निर्देश दिए।
पेज 157: आइए पता लगाएँ
1. आपके राज्य में किस प्रकार की विधायिका है?
उत्तर:
मैं दिल्ली में रहता हूँ, जहाँ एकसदनीय विधायिका है। यहाँ केवल एक ही सदन होता है, जिसे विधान सभा कहा जाता है। दिल्ली में विधान परिषद (उच्च सदन) नहीं है। इसलिए यहाँ कानून बनाने का कार्य केवल विधान सभा द्वारा ही किया जाता है। इस प्रकार, हमारे राज्य/केंद्र शासित प्रदेश में विधायिका सरल और एकसदनीय व्यवस्था पर आधारित है, जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया अपेक्षाकृत तेज होती है।
पेज 159: आइए पता लगाएँ
1. एक लघु समूह परियोजना के रूप में कार्य कीजिए। अपने राज्य या संघ शासित प्रदेश में विधायिका की कार्यप्रणाली से संबंधित आँकड़े संकलित कीजिए।
उत्तर:
(1) आर.टी.ई. अधिनियम बनने की प्रक्रिया (चार्ट)
विचार → विधेयक तैयार → संसद में प्रस्तुत → समिति को भेजा → चर्चा व संशोधन → दोनों सदनों से पारित → राष्ट्रपति की स्वीकृति → अधिनियम बना → राजपत्र में प्रकाशित
(2) यदि लोकसभा में प्रस्तुत होता
यदि आर.टी.ई. लोकसभा में प्रस्तुत होता, तो पहले वहाँ चर्चा होती, फिर मतदान होता। पास होने पर इसे राज्यसभा भेजा जाता। राज्यसभा से स्वीकृति मिलने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी ली जाती और अंत में यह कानून बन जाता।
2. किसी विधायक से समय लेकर भेंट कीजिए और राज्य विधानमंडल से संबंघित चुनौतियों के बारे में जानकारी एकत्रित कीजिए।
उत्तर:
मैंने एक विधायक से भेंट कर राज्य विधानमंडल की चुनौतियों के बारे में जानकारी प्राप्त की। उन्होंने बताया कि सबसे बड़ी समस्या सत्रों का कम समय और बार-बार होने वाला व्यवधान है, जिससे महत्वपूर्ण विषयों पर पूरी चर्चा नहीं हो पाती। कई बार सदस्यों की अनुपस्थिति भी कामकाज को प्रभावित करती है। इसके अलावा, राजनीतिक मतभेदों के कारण सहयोग की कमी रहती है। उन्होंने यह भी बताया कि जनता की अपेक्षाएँ बहुत अधिक होती हैं, जिन्हें पूरा करना चुनौतीपूर्ण होता है। संसाधनों की कमी और योजनाओं के सही क्रियान्वयन में भी कठिनाइयाँ आती हैं। इन चुनौतियों के बावजूद विधायक जनता के हित में कार्य करने का प्रयास करते हैं।
पेज 161: प्रश्न और क्रियाकलाप
1: पता लगाइए कि आपके राज्य से संसद के प्रत्येक सदन में कितने प्रतिनिधि हैं।
उत्तर:
मेरे राज्य से संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में प्रतिनिधि भेजे जाते हैं। लोकसभा के सदस्य सीधे जनता द्वारा चुने जाते हैं, इसलिए इनकी संख्या राज्य की जनसंख्या पर निर्भर करती है। वहीं राज्यसभा के सदस्य अप्रत्यक्ष रूप से चुने जाते हैं और उनकी संख्या भी राज्यों की जनसंख्या के आधार पर निर्धारित होती है। उदाहरण के लिए, बड़े राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश से लोकसभा और राज्यसभा दोनों में अधिक प्रतिनिधि होते हैं, जबकि छोटे राज्यों से कम। यह व्यवस्था देश में संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करती है, जिससे सभी राज्यों की आवाज संसद में सुनी जा सके। इस प्रकार संसद वास्तव में पूरे देश का प्रतिनिधित्व करती है।
2. वे कौन-से तत्व हैं जो भारतीय संसद को ‘जनता की आवाज’ बनाते हैं? यह कैसे सुनिश्चित करती है कि विभिन्न विचारों को सुना जाए?
उत्तर:
भारतीय संसद को ‘जनता की आवाज’ बनाने वाले मुख्य तत्व हैं— निर्वाचित प्रतिनिधि, सार्वभौमिक मताधिकार और विविधता का प्रतिनिधित्व। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनती है, जो उनकी समस्याएँ और विचार संसद में रखते हैं। संसद में विभिन्न राजनीतिक दलों और क्षेत्रों के लोग शामिल होते हैं, जिससे अलग-अलग विचार सामने आते हैं। प्रश्नकाल, बहस और समितियाँ यह सुनिश्चित करती हैं कि सभी मुद्दों पर चर्चा हो। इस प्रकार संसद सभी वर्गों की आवाज सुनती है और लोकतंत्र को मजबूत बनाती है।
3. आपके विचार से संविधान ने कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी क्यों बनाया?
उत्तर:
मेरे विचार से संविधान ने कार्यपालिका को विधायिका के प्रति उत्तरदायी इसलिए बनाया ताकि सरकार जनता के प्रति जिम्मेदार बनी रहे। विधायिका जनता द्वारा चुनी जाती है, इसलिए वह कार्यपालिका के कार्यों की निगरानी करती है। इससे कार्यपालिका मनमाने निर्णय नहीं ले सकती और उसे अपने कार्यों का हिसाब देना पड़ता है। प्रश्नकाल, चर्चा और अविश्वास प्रस्ताव जैसे साधनों से विधायिका कार्यपालिका को नियंत्रित करती है। इस व्यवस्था से पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकतंत्र मजबूत होता है तथा जनता के हितों की रक्षा होती है।
4. आपके अनुसार केंद्र स्तर पर द्विसदनीय विधायिका क्यों चुनी गई?
उत्तर:
मेरे अनुसार केंद्र स्तर पर द्विसदनीय विधायिका इसलिए चुनी गई ताकि कानून बनाने की प्रक्रिया अधिक सोच-समझकर और संतुलित हो। एक सदन (लोकसभा) जनता का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि दूसरा सदन (राज्यसभा) राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है। इससे जल्दबाजी में गलत कानून बनने से रोका जा सकता है। राज्यसभा पुनः समीक्षा का अवसर देती है और विभिन्न राज्यों के हितों की रक्षा करती है। इस प्रकार द्विसदनीय व्यवस्था से बेहतर चर्चा, संतुलन और संघीय ढाँचे को मजबूती मिलती है।
5. हाल ही में संसद में परित किसी विधेयक की पूरी प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। जानिए कि वह विधेयक सबसे पहले किस सदन में प्रस्तुत किया गया था। क्या उस पर कोई बड़ी चर्चा या विरोध हुआ था? इस विधेयक को काननू बनने में कितना समय लगा? इसके लिए आप समाचार-पत्ररों की पूरीनी खबरें, सरकारी वेबसाइटें और लोकसभा की चर्चाएँ देख सकते हैं। आवश्यकता हो तो अपने शिक्षक से सहायता लीजिए।
उत्तर:
मैंने हाल ही में पारित वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 की प्रक्रिया का अध्ययन किया।
यह विधेयक सबसे पहले लोकसभा में 8 अगस्त 2024 को प्रस्तुत किया गया था।
इसके बाद इसे समिति को भेजा गया, जहाँ संशोधन सुझाए गए। फिर अप्रैल 2025 में इस पर चर्चा हुई और लोकसभा ने 3 अप्रैल 2025 को इसे पारित कर दिया।
इसके बाद यह राज्यसभा में गया और 4 अप्रैल 2025 को वहाँ भी पारित हुआ।
इस विधेयक पर कुछ विरोध और बहस भी हुई, क्योंकि इसके प्रावधानों पर अलग-अलग मत थे।
अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति 5 अप्रैल 2025 को मिली और यह कानून बन गया।
इस प्रकार इसे कानून बनने में लगभग 8 महीने लगे।
6. संसद द्वारा हाल ही में पारित किसी काननू का चयन कीजिए। कक्षा को अलग-अलग समूह में बाँटिए— कुछ विद्यार्थी लोकसभा और राज्सभा के सांसद बनें, कुछ मंत्री बनें जो प्रश्नों के उत्तर दें और कोई राष्ट्रपति की भमिू का निभाए। सभी मिलकर एक लघु नाटिका तैयार करें जिसमें दर्शाया जाए कि एक विधेयक संसद में कैसे प्रस्तुत होता है, कैसे उस पर चर्चा होती है, वह पारित होता है और अंत में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने पर काननू बन जाता है। एक ‘मॉडल संसद’ का मंचन कीजिए।
उत्तर:
एक लघु नाटिका (मॉडल संसद) दी गई है—
विषय: एक विधेयक से कानून बनने की प्रक्रिया
(उदाहरण: शिक्षा सुधार विधेयक)
पात्र
► लोकसभा अध्यक्ष
► सांसद (2–3)
► मंत्री
► राज्यसभा सभापति
► राष्ट्रपति
दृश्य 1: लोकसभा में विधेयक प्रस्तुत
अध्यक्ष: सदन की कार्यवाही शुरू होती है।
मंत्री: मैं “शिक्षा सुधार विधेयक” प्रस्तुत करता हूँ।
सांसद 1: हम इसका समर्थन करते हैं।
सांसद 2: कुछ संशोधन चाहिए।
दृश्य 2: मतदान
अध्यक्ष: अब मतदान होगा।
(सभी “हाँ/ना” बोलें)
अध्यक्ष: विधेयक पारित हुआ।
दृश्य 3: राज्यसभा
सभापति: विधेयक पर चर्चा होगी।
(संक्षिप्त बहस और फिर मतदान)
सभापति: विधेयक पारित।
दृश्य 4: राष्ट्रपति की स्वीकृति
राष्ट्रपति: मैं इस विधेयक को स्वीकृति देता हूँ।
अब यह कानून बन गया।
समापन संवाद
सभी मिलकर:
“इस प्रकार संसद में विधेयक चर्चा, मतदान और स्वीकृति के बाद कानून बनता है।”
7. महिला आरक्षण विधेयक, 2023 व्यापक समर्थन के साथ पारित हुआ। इतने लंबे समय तक चर्चा के बाद भी इस विधेयक को पारित होने में 25 वर्ष से अधिक समय क्यों लगा?
उत्तर:
महिला आरक्षण विधेयक, 2023 को पारित होने में 25 वर्ष से अधिक समय इसलिए लगा क्योंकि इस पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति नहीं बन पा रही थी। कुछ दलों ने इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग की, जबकि कुछ को सीटों के पुनर्वितरण पर आपत्ति थी। इसके अलावा, कई बार संसद में हंगामा और विरोध के कारण विधेयक आगे नहीं बढ़ सका। बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और मतभेदों के कारण यह लंबे समय तक लंबित रहा, लेकिन अंततः व्यापक सहमति से पारित हो गया।
8. कभी-कभी संसद बाधित हो जाती है और जितने दिनों तक इसे कार्य करना चाहिए, उतना कार्य नहीं कर पाती। आपको क्या लगता है कि इसका कानूनों की गणुवत्ता और लोगों के अपने प्रतिनिधियों के प्रति विश्वास पर क्या प्रभाव पड़ता है?
उत्तर:
मेरे विचार से जब संसद बाधित होती है, तो कानूनों की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है क्योंकि पर्याप्त चर्चा और विचार-विमर्श नहीं हो पाता। इससे जल्दबाजी में कानून बन सकते हैं, जिनमें कमियाँ रह जाती हैं। साथ ही, जब प्रतिनिधि ठीक से काम नहीं कर पाते, तो लोगों का उन पर विश्वास कम हो जाता है। जनता को लगता है कि उनके मुद्दों पर सही ध्यान नहीं दिया जा रहा। इससे लोकतंत्र कमजोर पड़ सकता है। इसलिए संसद का सुचारु रूप से चलना बहुत जरूरी है।
9. क्या आप विद्यार्थियों के बीच हित समूह बनाकर किसी नीति से संबंधित प्रश्नों की एक सूचि तैयार कर सकते हैं, जिन्हें आप अपने सांसद या विधायक से पूछना चाहेगें? यही प्रश्न विधायक के स्थान पर सांसद से पूछें जाएँ तो उनमें क्या अंतर होगा? और यदि सांसद की जगह विधायक से पूछेंगे तो प्रश्न कैसे भिन्न होंगे?
उत्तर:
हम विद्यार्थियों का एक हित समूह बनाकर किसी नीति (जैसे शिक्षा या स्वच्छता) से जुड़े प्रश्न तैयार कर सकते हैं, जैसे—
* हमारे क्षेत्र के स्कूलों में सुविधाएँ कब सुधरेंगी?
* नई योजनाओं का लाभ छात्रों तक कैसे पहुँचेगा?
* बजट का उपयोग कैसे किया जा रहा है?
यदि यही प्रश्न सांसद से पूछें, तो वे राष्ट्रीय स्तर की नीतियों, कानूनों और पूरे देश के बजट पर उत्तर देंगे।
लेकिन यदि इन्हें विधायक से पूछें, तो वे राज्य या स्थानीय स्तर की समस्याओं, जैसे स्कूलों की स्थिति, सड़क, पानी आदि पर जवाब देंगे।
इस प्रकार, सांसद के प्रश्न व्यापक (देश स्तर) होते हैं, जबकि विधायक के प्रश्न अधिक स्थानीय और क्षेत्रीय होते हैं।
10. भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की क्या भूमिका है? यदि हमारे पास स्वतंत्र न्यायपालिका न हो तो क्या हो सकता है?
उत्तर:
भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है। यह कानूनों की व्याख्या करती है, विवादों का समाधान करती है और लोगों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करती है। न्यायपालिका यह भी सुनिश्चित करती है कि सरकार के सभी कार्य संविधान के अनुसार हों। यदि स्वतंत्र न्यायपालिका न हो, तो सरकार मनमाने निर्णय ले सकती है और लोगों के अधिकारों का हनन हो सकता है। इससे अन्याय बढ़ेगा और लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा। इसलिए निष्पक्ष और स्वतंत्र न्यायपालिका लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
