एनसीईआरटी समाधान कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 अध्याय 6 पुनर्गठन का काल
एनसीईआरटी कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 भाग 1 पुनर्गठन का काल समाधान – अभ्यास के प्रश्नों के उत्तर तथा अतिरिक्त प्रश्न-उत्तर यहाँ से निशुल्क प्राप्त किए जा सकते हैं। एनसीईआरटी द्वारा सत्र 2026-27 के लिए जारी की गई नई कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग-1 की पाठ्यपुस्तक “समाज का अध्ययन: भारत और उसके आगे” का छठा अध्याय “पुनर्गठन का काल” ‘अतीत के चित्रपट’ खंड का तीसरा अध्याय है। इस अध्याय में मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद उभरे शुंग, सातवाहन, चेदि (कलिंग के खारवेल), दक्षिण भारत के चोल-चेर-पांड्य, तथा उत्तर-पश्चिम भारत में आए इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण जैसे विदेशी राजवंशों का विस्तृत वर्णन है। इसके साथ ही इस अध्याय में संगम साहित्य, शिलप्पदिकारम जैसे महाकाव्य, गांधार व मथुरा कला शैलियाँ, रेशम मार्ग (सिल्क रूट) से जुड़ा व्यापार, तथा इस काल की सबसे बड़ी विशेषता – विभिन्न संस्कृतियों के मेल से बनी ‘भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि’ — को विस्तार से समझाया गया है।
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एनसीईआरटी कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 अध्याय 6 समाधान
कक्षा 9 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 अभ्यास प्रश्न उत्तर
पेज 117 – महत्वपूर्ण प्रश्न
1. मौर्योत्तर काल को कभी-कभी ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल को ‘पुनर्गठन का काल’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि:
- राजनैतिक बदलाव: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में कई नए राज्यों (जैसे शुंग, सातवाहन, कुषाण) का उदय हुआ। पुराने साम्राज्य के ढांचे को नए सिरे से संगठित किया गया।
- सांस्कृतिक मिलन: इस दौरान विदेशी आक्रमणकारी (यवन, शक, कुषाण) आए और भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए, जिससे समाज और संस्कृति का पुनर्गठन हुआ।
- आर्थिक विकास: व्यापार और नए नगरों के उदय के साथ अर्थव्यवस्था में भी नए बदलाव आए।
2. वह कौन-से मूल्य और सिद्धांत थे जिन्होंने इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन किया?
उत्तर:
इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन करने वाले प्रमुख मूल्य और सिद्धांत थे:
- प्रजा कल्याण: राजा अपनी प्रजा की भलाई, सुरक्षा और सुख को प्राथमिकता देते थे।
- धार्मिक सहिष्णुता: अशोक, कनिष्क और सातवाहन राजाओं ने सभी धर्मों (बौद्ध, जैन, ब्राह्मण) का सम्मान और संरक्षण किया।
- न्याय और धर्म: राजा ‘धर्म’ (नैतिक कर्तव्य) के अनुसार शासन करते थे और न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास करते थे।
3. विदेशी आक्रमणकारियों ने किस प्रकार भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में योगदान दिया?
उत्तर:
विदेशी आक्रमणकारियों (जैसे इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण) ने भारतीय समाज में इस प्रकार योगदान दिया:
- घुल-मिल जाना: वे यहाँ बस गए और भारतीय नामों, धर्मों (बौद्ध, शैव) और रीति-रिवाजों को अपना लिया।
- कला और संस्कृति: उन्होंने भारतीय कला को प्रभावित किया, जैसे गांधार कला शैली, जिसमें भारतीय विषयों को ग्रीक शैली में दर्शाया गया।
- विवाह संबंध: उन्होंने भारतीय परिवारों में विवाह किए, जिससे संस्कृतियों का संगम हुआ।
पेज 118 – आइए पता लगाएँ
एक पृष्ठ पर दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. के प्रारंभिक वर्ष से लेकर तीसरी शताब्दी सा.सं. के अंतिम वर्ष तक की अवधि को चिह्नित करते हुए एक समय-रेखा बनाइए। यह अवधि कुल कितने वर्षों को सम्मिलित करती है? जैसे-जैसे हम अध्याय में आगे बढ़ेंगे, समय-रेखा पर प्रमुख व्यक्तियों, राज्यों और घटनाओं को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
- कुल अवधि की गणना:
प्रारंभिक बिंदु: दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. की शुरुआत = 200 सा.सं.पू.
अंतिम बिंदु: तीसरी शताब्दी सा.सं. का अंत = 300 सा.सं.
कुल वर्षों की गणना: 200 वर्ष (ईसा पूर्व के) + 300 वर्ष (ईसा के बाद के) = 500 वर्ष।
अतः, यह अवधि कुल 500 वर्षों को सम्मिलित करती है। - समय-रेखा के लिए प्रमुख घटनाएँ :
अध्याय के अनुसार, आप अपनी समय-रेखा पर निम्नलिखित प्रमुख घटनाओं को चिह्नित कर सकते हैं:
लगभग 185 सा.सं.पू.: मौर्य साम्राज्य का अंत और शुंग वंश की स्थापना (पुष्यमित्र शुंग द्वारा)।
लगभग 100 सा.सं.पू.: सातवाहन वंश का उदय और दक्कन में उनका विस्तार।
लगभग 100 सा.सं.पू. – 100 सा.सं.: उत्तर-पश्चिम भारत में इंडो-ग्रीक और शक शासकों का आगमन।
लगभग 78 सा.सं. – 100 सा.सं.: कुषाण वंश के सम्राट कनिष्क का शासनकाल (शकों को हराकर शक संवत की शुरुआत मानी जाती है)।
लगभग 300 सा.सं.: सातवाहन और कुषाण साम्राज्यों का पतन और नए गुप्त साम्राज्य के उदय की पृष्ठभूमि।
पेज 120 – आइए पता लगाएँ
पिछले अध्याय में आपने मौर्य साम्राज्य का मानचित्र देखा (चित्र 5.13)। चित्र 6.2 मौर्योत्तर काल का मानचित्र है। आप उस क्षेत्र में कितने राजवंशों की गणना कर सकते हैं जो पूर्व में मौर्य शासन के अधीन थे?
उत्तर:
मानचित्र 6.2 (मौर्योत्तर काल) और मानचित्र 5.13 (मौर्य साम्राज्य) की तुलना करने पर, हम उन क्षेत्रों में निम्नलिखित प्रमुख राजवंशों को देख सकते हैं जो पहले मौर्य शासन के अधीन थे:
- शुंग वंश: यह वंश मौर्य साम्राज्य के केंद्र (पाटलिपुत्र और मध्य भारत) में ही स्थापित हुआ था। पुष्यमित्र शुंग ने मौर्यों के बाद यहाँ शासन किया।
- सातवाहन वंश: दक्कन का क्षेत्र, जो पहले मौर्यों के अधीन था, वहाँ सातवाहनों ने एक शक्तिशाली राज्य स्थापित किया।
- चेदि वंश: कलिंग (ओडिशा) का क्षेत्र, जिसे अशोक ने जीता था, मौर्यों के बाद स्वतंत्र हो गया और वहाँ चेदि वंश (राजा खारवेल) का शासन स्थापित हुआ।
- शक और इंडो-ग्रीक: उत्तर-पश्चिमी भारत (जैसे तक्षशिला और गांधार), जो पहले मौर्य साम्राज्य का हिस्सा था, वहाँ अब इंडो-ग्रीक और शकों का शासन था।
इस प्रकार, मौर्य साम्राज्य के विघटन के बाद उसके विशाल क्षेत्र में कम से कम 4 से 5 प्रमुख नए राजवंशों और शक्तियों का उदय हुआ।
पेज 124 – आइए पता लगाएँ
नीचे भरहुत स्तूप की एक पट्टिका का चित्र है। दाहिने तरफ की दोनों आकृतियों को ध्यानपूर्वक देखिए। वे क्या कर रही हैं? क्या आप उनके व्यवसाय का अनुमान लगा सकते हैं? उनके परिधानों पर ध्यान दीजिए। यह हमें उनके बारे में क्या बता रहे हैं? पट्टिका में आपको जो अन्य विवरण दिखे, उन्हें सूचीबद्ध कर कक्षा में उन पर चर्चा कीजिए।

उत्तर:
क्रियाकलाप (वे क्या कर रही हैं): चित्र में दाहिनी ओर की आकृतियाँ आनंद उत्सव मनाती हुई दिख रही हैं। एक व्यक्ति नृत्य की मुद्रा में है (नाच रहा है) और उसके पीछे वाला व्यक्ति संभवतः कोई वाद्य यंत्र (जैसे बाँसुरी) बजा रहा है।
व्यवसाय: उनके हाव-भाव और वाद्य यंत्रों से अनुमान लगाया जा सकता है कि वे संगीतकार और नर्तक हैं।
परिधान और आभूषण: उन्होंने धोती पहनी हुई है और सिर पर एक विशेष प्रकार की पगड़ी बाँधी है। उनके शरीर पर भारी आभूषण हैं, जैसे- कानों में बड़े कुंडल, गले में मोटे हार और हाथों में कड़े। यह बताता है कि शुंग काल के लोग, चाहे वे कलाकार ही क्यों न हों, अच्छी वेशभूषा और आभूषणों के प्रति बहुत जागरूक और शौकीन थे।
अन्य विवरण: पट्टिका पर कमल के फूल और लताओं की बहुत ही सुंदर नक्काशी की गई है, जो उस समय की उन्नत शिल्पकला को दर्शाती है।
चित्र 6.6 के कोलाज में चित्रों को ध्यान से देखिए। कपड़ों, आभूषणों और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं पर अपने विचार लिखिए।

उत्तर:
चित्र 6.6 को देखकर शुंग कालीन जीवन के बारे में निम्नलिखित बातें पता चलती हैं-
- कपड़े: उस समय स्त्री और पुरुष दोनों ही धोती जैसा निचला वस्त्र पहनते थे। सिर पर विस्तृत पगड़ी या शिरोवस्त्र पहनने का बहुत प्रचलन था।
- आभूषण: लोग आभूषणों के अत्यधिक शौकीन थे। चित्रों में मनकों के हार, सोने की परत चढ़ी काँसे की चूड़ियाँ और भारी कर्णफूल दिखाई देते हैं।
- दैनिक उपयोग की वस्तुएँ: हाथी दाँत से बना बारीक कंघा और पकी मिट्टी के खिलौने या मूर्तियाँ यह दर्शाती हैं कि समाज समृद्ध था और शिल्पकार बहुत कुशल थे। लोग सौंदर्य प्रसाधन और कला पर ध्यान देते थे।
पेज 126 – आइए विचार करें
आपके अनुसार राजा के नाम के आरंभ में उसकी माँ का नाम लिखने की परंपरा का क्या अर्थ है?
उत्तर:
सातवाहन राजाओं में एक विशेष परंपरा थी कि वे अपने नाम के साथ अपनी माता का नाम जोड़ते थे, जैसे- गौतमीपुत्र श्री शातकर्णी (गौतमी का पुत्र) या वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (वशिष्ठी का पुत्र)।
अर्थ: इस परंपरा का अर्थ है कि सातवाहन समाज में, विशेषकर राजपरिवार में, महिलाओं और माताओं को बहुत ऊँचा और सम्मानजनक स्थान प्राप्त था। यह दर्शाता है कि वे अपनी पहचान में माँ की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते थे, हालाँकि सत्ता (सिंहासन) पिता से पुत्र को ही मिलती थी (पितृसत्तात्मक)।
पेज 126 – आइए विचार करें
उपर्युक्त अंकों की श्रृंखला में से कौन-से अंक कुछ-कुछ हमारे आधुनिक अंकों जैसे दिखते हैं? कौन-से नहीं?
उत्तर:
चित्र में 1 से 10 तक के प्राचीन ब्राह्मी अंक दिए गए हैं।
आधुनिक अंकों जैसे दिखने वाले: अंक 1, 2, 4 और 6 की बनावट काफी हद तक आज के हिंदी या अंग्रेजी अंकों (1, 2, 4, 6) से मिलती-जुलती है।
नहीं दिखने वाले: अंक 7, 9 और 10 की बनावट आज के अंकों से काफी अलग है। विशेषकर ’10’ के लिए एक अलग चिह्न (α जैसा) प्रयोग किया गया है, जबकि आज हम ‘1’ और ‘0’ का प्रयोग करते हैं।
पेज 127 – आइए विचार करें
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की इस मूर्ति के हाथ पर एक लेख उत्कीर्ण है – ‘कन्हणदासेन हीरामकारेना काट’ जिसका अर्थ है— ‘कन्हणदास नामक स्वर्णकार द्वारा निर्मित’। क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
हाँ, यह बहुत रोचक है कि एक सुनार (स्वर्णकार) ने पत्थर की मूर्ति बनाई। इससे हमें उस समय के लोगों और व्यवसायों के बारे में निम्नलिखित बातें पता चलती हैं:
- बहुमुखी प्रतिभा : उस समय के कारीगर केवल एक ही काम तक सीमित नहीं थे। वे विभिन्न कलाओं और शिल्पों में कुशल थे। एक सुनार होते हुए भी कन्हणदास को पत्थर तराशने का ज्ञान था।
- व्यवसायों में लचीलापन : व्यवसायों के बीच कोई कठोर दीवार नहीं थी। लोग अपनी रुचि और कौशल के अनुसार अलग-अलग माध्यमों (सोना, पत्थर) में काम कर सकते थे।
- कला के प्रति सम्मान: समाज में कला का बहुत महत्व था और कारीगरों को अपने काम पर गर्व होता था, इसलिए उन्होंने अपना नाम मूर्ति पर खुदवाया।
पेज 129 – आइए विचार करें
लगभग दो सहशताब्दी पूर्व के इन शैलकृत कक्षों की समरूपता पर ध्यान दीजिए। शिल्पकारों को केवल छेनी और हथौड़ी से अद्भुत दक्षता कैसे प्राप्त हुई होगी। कल्पना कीजिए कि आप उस युग में एक शिल्पी हैं और अपने कौशल से पत्थर को कला में रूपांतरित कर रहे हैं। आप किन उपकरणों का प्रयोग करेंगे।
उत्तर:
केवल छेनी और हथौड़ी से पत्थर को इतनी बारीकी और समरूपता से तराशना वास्तव में आश्चर्यजनक है। उन्हें यह दक्षता निम्नलिखित तरीकों से मिली होगी:
- कठोर प्रशिक्षण: यह कौशल पीढ़ी-दर-पीढ़ी पिता से पुत्र या गुरु से शिष्य को सिखाया जाता था। बचपन से ही उन्हें पत्थर की प्रकृति को समझने का अभ्यास कराया जाता था।
- लोहे के उन्नत औजार: इस काल (मौर्योत्तर काल/दूसरी शताब्दी सा.सं.पू.) तक लोहे की तकनीक बहुत विकसित हो चुकी थी। शिल्पकारों के पास मजबूत लोहे की छैनियाँ थीं जो कठोर चट्टानों को भी काट सकती थीं।
- ज्यामिति और योजना: कमरों को एक समान बनाने के लिए वे अवश्य ही माप-तोल के लिए रस्सियों, धागों और ज्यामितीय गणनाओं का उपयोग करते होंगे।
- धैर्य: एक छोटी सी गलती पूरी मेहनत बेकार कर सकती थी, इसलिए वे अत्यंत धैर्य और एकाग्रता से काम करते थे।
अगर मैं 2000 साल पहले का एक शिल्पी होता और पत्थर को कला में बदल रहा होता, तो मैं निम्नलिखित उपकरणों का प्रयोग करता:
विभिन्न आकार की छैनियाँ:
नुकीली छेनी – पत्थर पर प्रारंभिक खुदाई और रूपरेखा बनाने के लिए।
चपटी छेनी – सतह को समतल और चिकना करने के लिए।
हथौड़ी:
लोहे की हथौडा – कठोर प्रहार के लिए।
लकड़ी की हथौड़ी (मोगरी): छेनी पर नियंत्रित और हल्के चोट मारने के लिए, ताकि पत्थर टूटे नहीं।
मापने के उपकरण:
साहुल – एक धागे में पत्थर बाँधकर, जिससे यह जाँचा जा सके कि दीवार बिल्कुल सीधी खड़ी है या नहीं।
रस्सी – सीधी रेखाएँ खींचने और नाप लेने के लिए।
अंकन सामग्री:
कोयला – पत्थर पर डिजाइन का खाका बनाने के लिए।
फिनिशिंग के औजार:
रेती और पानी – मूर्ति या दीवार बनने के बाद पत्थर को चिकना और चमकदार बनाने के लिए रेत और पानी से घिसाई करना।
पेज 132 – आइए विचार करें
राजा की मूर्ति देखिए। इस मूर्ति में राजा को कैसे दर्शाया गया है? उनकी देह-मुद्रा, वस्त्र और मुख-मुद्रा उनके सामर्थ्य एवं प्रतिष्ठा के विषय में क्या संकेत देते हैं?
उत्तर:
राजा करिकाल की इस प्रतिमा में उन्हें एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रतिष्ठित शासक के रूप में दर्शाया गया है:
- देह-मुद्रा: राजा एक विशाल हाथी पर सवार हैं। हाथी पर बैठना ही अपने आप में राजसी ठाठ और सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है। उनकी मुद्रा सीधी और आत्मविश्वास से भरी है, जो एक निडर नेता को दर्शाती है।
- वस्त्र और आभूषण: उन्होंने राजसी वस्त्र और मुकुट पहना हुआ है, जो उनकी समृद्धि और राजा होने की पहचान है।
- मुख-मुद्रा: उनके चेहरे पर गंभीरता और दृढ़ संकल्प का भाव है। यह संकेत देता है कि वे एक दूरदर्शी और मजबूत इरादों वाले शासक थे, जिन्होंने कावेरी नदी पर बाँध बनाने जैसा महान कार्य किया।
- संकेत: यह मूर्ति यह संदेश देती है कि राजा करिकाल केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि एक ‘जननायक’ भी थे, जिनका सामर्थ्य हाथी जैसा विशाल और प्रतिष्ठा बहुत ऊँची थी।
पेज 133 – आइए विचार करें
क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहासकार कई शताब्दियों पहले सुदूर स्थित दो राज्यों के बीच व्यापारिक संबंधों का पता कैसे लगाते हैं? आइए, इस पर विचार-विमर्श करें कि यह जानकारी कैसे प्राप्त की जाती होगी।
उत्तर:
इतिहासकार हजारों साल पुराने व्यापारिक संबंधों का पता लगाने के लिए कई तरह के सबूतों और सुरागों का इस्तेमाल करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे जासूस किसी केस को सुलझाते हैं। यहाँ कुछ मुख्य तरीके दिए गए हैं:
- सिक्के: यह सबसे बड़ा सबूत होता है। अगर भारत के किसी तटीय शहर (जैसे अरिकमेडु) में रोमन साम्राज्य के सोने के सिक्के मिलते हैं, तो इसका मतलब है कि वहां रोमन व्यापारी आते थे और सामान खरीदते थे।
- मिट्टी के बर्तन: कई बार खुदाई में विदेशी डिजाइन वाले बर्तन मिलते हैं। उदाहरण के लिए, रोमन शराब के विशेष बर्तन (एम्फोरा) भारत में मिले हैं, जो बताते हैं कि शराब का व्यापार होता था।
- विदेशी यात्रियों के वृत्तांत: प्राचीन काल में कई यात्री (जैसे प्लिनी, पेरिप्लस का लेखक) अपनी यात्राओं और व्यापार का वर्णन अपनी किताबों में करते थे। वे बताते थे कि किस बंदरगाह से क्या खरीदा और बेचा जाता था।
- साहित्यिक साक्ष्य: स्थानीय साहित्य (जैसे तमिल का संगम साहित्य) में भी विदेशी व्यापारियों (यवन) के आने और उनके जहाजों का ज़िक्र मिलता है।
- सामान की उपस्थिति: अगर भारतीय मसाले, हाथी दांत या मलमल रोम या मिस्र के पुराने खंडहरों में मिलते हैं, तो यह पक्का सबूत है कि भारत से वहां सामान भेजा जाता था।
पेज 134 – आइए विचार करें
1. पांड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था। आपके विचार में मोती उस समय व्यापार की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण था?
उत्तर:
मोती उस समय के व्यापार में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, जिसके प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- विलासिता और प्रतिष्ठा का प्रतीक : प्राचीन रोम और पश्चिमी देशों में मोती को बहुत कीमती और दुर्लभ माना जाता था। धनी और कुलीन वर्ग के लोग इसे आभूषणों के रूप में पहनते थे। यह उनकी प्रतिष्ठा और अमीर होने का प्रतीक था।
- उच्च माँग: रोम में मोतियों की इतनी जबरदस्त माँग थी कि वे इसे ‘सफेद सोना’ मानते थे और इसके बदले भारत को भारी मात्रा में असली सोना देते थे।
- आर्थिक समृद्धि: मोतियों के निर्यात से पांड्य राज्य को अपार धन प्राप्त होता था, जिससे वह एक समृद्ध और शक्तिशाली राज्य बन सका। खारवेल के अभिलेख में भी पांड्य राज्य से प्राप्त मोतियों का विशेष उल्लेख है।
- दुर्लभता: अच्छी गुणवत्ता वाले मोती केवल कुछ ही जगहों पर (जैसे मन्नार की खाड़ी, जहाँ पांड्य राज्य था) मिलते थे, इसलिए इनका मूल्य बहुत अधिक था।
पेज 135 – आइए पता लगाएँ
आपके विचार में कुछ इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं के चित्र अंकित होने का क्या अर्थ रहा होगा?
उत्तर:
इंडो-ग्रीक (हिंद-यवन) शासकों द्वारा अपने सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं के चित्र अंकित करवाने का गहरा अर्थ है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हो सकते हैं:
- सांस्कृतिक घुलन-मिलन: इंडो-ग्रीक शासक विदेशी थे, लेकिन भारत आने के बाद वे यहाँ की समृद्ध संस्कृति से बहुत प्रभावित हुए। सिक्कों पर भारतीय देवताओं को जगह देना यह दिखाता है कि वे भारतीय समाज और संस्कृति का हिस्सा बनना चाहते थे।
- जनता का विश्वास जीतना: किसी भी राजा के लिए अपनी प्रजा का समर्थन पाना जरूरी होता है। स्थानीय देवताओं (जैसे वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी) का सम्मान करके, इन शासकों ने यह संदेश दिया कि वे बाहरी आक्रमणकारी नहीं हैं, बल्कि वे भी भारतीय परंपराओं का आदर करते हैं। इससे जनता उन्हें अपना राजा मानने लगी होगी।
- धार्मिक सहिष्णुता: यह उनकी उदार सोच को दर्शाता है। यद्यपि वे ग्रीक धर्म को मानते थे, लेकिन उन्होंने भारतीय धर्मों को भी समान महत्व दिया। यह एक मिश्रित संस्कृति के विकास का संकेत है।
- वैधता प्राप्त करना: उस समय सिक्के सत्ता का प्रतीक होते थे। भारतीय प्रतीकों का उपयोग करके उन्होंने अपने शासन को भारतीय लोगों की नज़रों में वैध और स्वीकार्य बनाने का प्रयास किया।
पेज 136 – आइए पता लगाएँ
इस विशाल मूर्ति (1.85 मीटर ऊँची) को ध्यान से देखिए। इसके वस्त्र, आयुध और जूतों को देखिए। इनसे इस आकृति के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर:
कनिष्क की इस प्रसिद्ध सिरविहीन मूर्ति को देखकर हमें निम्नलिखित बातें पता चलती हैं:
- मूल स्थान : राजा ने घुटनों तक लंबा चोगा (कोट) और पैरों में भारी जूते पहने हुए हैं। यह वेशभूषा गर्म भारतीय जलवायु की नहीं, बल्कि मध्य एशिया की है, जहाँ बहुत ठंड पड़ती है। इससे पता चलता है कि कुषाण मूल रूप से मध्य एशिया से आए थे।
- योद्धा छवि : मूर्ति ने कमर में एक लंबी और भारी तलवार (आयुध) धारण कर रखी है। यह दर्शाता है कि कनिष्क एक योद्धा राजा थे और उनका शासन सैन्य शक्ति पर आधारित था।
- शक्ति और अधिकार: उनकी दृढ़ मुद्रा और शाही वस्त्र उनके आत्मविश्वास और शक्ति का प्रतीक हैं।
इन सिक्कों को ध्यान से देखिए। सम्राट के अतिरिक्त और कौन इस मुद्रा पर अंकित है?

उत्तर:
सम्राट कनिष्क के अलावा इन सिक्कों पर अलग-अलग देवी-देवताओं के चित्र अंकित हैं:
- महात्मा बुद्ध: चित्र में बीच वाले सिक्के के पीछे की तरफ बुद्ध की आकृति खड़ी है।
- भगवान शिव और नंदी: दाएं तरफ वाले सिक्के पर भगवान शिव (चार भुजाओं वाले) और उनके वाहन नंदी (बैल) का चित्र बना है।
- अन्य देवता: बाएं तरफ के सिक्के पर ईरानी या ग्रीक देवता (मिहिर या हेलियोस) का अंकन है जो सूर्य का प्रतीक हैं।
- निष्कर्ष: यह दर्शाता है कि कनिष्क धार्मिक रूप से बहुत उदार थे और उनके राज्य में बौद्ध, हिंदू, ग्रीक और जरथुस्त्र सभी धर्मों का सम्मान किया जाता था।
पेज 137 – आइए विचार करें
क्या आप जानते हैं कि गांधार कहाँ है? क्या यह आपको महाकाव्य महाभारत के किसी पात्र की याद दिलाता है?
उत्तर:
गांधार प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था। वर्तमान में यह क्षेत्र उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान (पेशावर और रावलपिंडी के आसपास) और पूर्वी अफगानिस्तान में स्थित है। यह वही क्षेत्र है जहाँ बाद में भारतीय और ग्रीक (यूनानी) संस्कृतियों का मिलन हुआ और प्रसिद्ध ‘गांधार कला शैली’ का विकास हुआ।
हाँ, ‘गांधार’ का नाम हमें महाभारत के दो बहुत ही महत्वपूर्ण पात्रों की याद दिलाता है:
गांधारी: हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र की पत्नी और कौरवों की माता। चूँकि वह गांधार नरेश की पुत्री थीं, इसलिए उनका नाम ‘गांधारी’ पड़ा।
शकुनि: गांधारी के भाई और दुर्योधन के मामा। वे गांधार के राजा थे, इसलिए उन्हें अक्सर ‘गांधार-राज शकुनि’ कहकर पुकारा जाता था।
पेज 140 – आइए पता लगाएँ
अब आप मथुरा और गांधार कला शैलियों की मूल विशेषताओं से परिचित हो चुके हैं। अगले पृष्ठ पर चित्र 6.27 में दी गई कलाकृतियों को देखिए और पहचानिए। क्या आप बता सकते हैं कि चित्र में दी गई प्रत्येक कलाकृति किस कला शैली से संबंधित है? अपने विचार कारण सहित लिखिए और सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।
उत्तर:
चित्र 6.27 में दी गई कलाकृतियों को उनकी विशेषताओं के आधार पर इस प्रकार पहचाना जा सकता है:
चित्र 1, 2, 6 (गांधार कला शैली):
पहचान: ये मूर्तियाँ गांधार शैली की हैं।
कारण: इनमें बुद्ध या बोधिसत्व के वस्त्रों में यूनानी (Greek) प्रभाव दिखाई देता है (जैसे भारी सिलवटें)। इनका चेहरा अपोलो देवता जैसा दिखता है और ये अक्सर स्लेटी या नीले पत्थर (Grey Schist) से बनी होती हैं।
चित्र 3, 4, 5 (मथुरा कला शैली):
पहचान: ये मूर्तियाँ मथुरा शैली की हैं।
कारण: ये लाल बलुआ पत्थर (Red Sandstone) से बनी हैं। इनमें शरीर को गठीला और मांसल दिखाया गया है। भारतीय देवताओं (जैसे शिव, कुबेर, यक्ष) का चित्रण भारतीय परंपरा के अनुसार (जैसे धोती पहने हुए) किया गया है।
चित्र 6.26 – मथुरा कला शैली में बनी कुबेर (धन के देवता) की मूर्ति। क्या आपने इनकी मूँछों को देखा?
हाँ, इस मूर्ति में कुबेर की मोटी मूँछें दिखाई गई हैं। मथुरा कला शैली में पुरुष आकृतियों, विशेषकर यक्षों और कुबेर को अक्सर मूँछों के साथ, गठीले शरीर और पेट निकले हुए (तुंदिल) रूप में दर्शाया जाता था, जो समृद्धि और पौरुष का प्रतीक था।
पेज 143 – प्रश्न और क्रियाकलाप
1. मौर्योत्तर काल को ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है?
उत्तर:
मौर्योत्तर काल को ‘पुनर्गठन का काल’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में कई बड़े और महत्वपूर्ण बदलाव हुए:
- नए राज्यों का उदय: मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद शुंग, कण्व, सातवाहन, चेदि जैसे नए राजवंश उभरे।
- विदेशी आगमन: इंडो-ग्रीक, शक, और कुषाण जैसे विदेशी शासक आए, जो धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए।
- सांस्कृतिक विकास: कला (जैसे गांधार और मथुरा शैली), धर्म और व्यापार के नए तरीकों का विकास हुआ। राजनीतिक शक्ति और समाज को नए सिरे से संगठित किया गया।
2. संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
उत्तर:
संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य माना जाता है। यह मुख्यतः तमिल भाषा में लिखा गया है और इसमें अनेक कवियों की रचनाएँ शामिल हैं। ‘संगम’ शब्द का अर्थ है—कवियों की सभा या सम्मेलन। इस साहित्य में उस समय के समाज, संस्कृति, जीवन-शैली और परंपराओं का सुंदर वर्णन मिलता है।
संगम साहित्य में प्रेम, वीरता, उदारता और नैतिक मूल्यों को बहुत महत्व दिया गया है। इसमें राजा, सैनिक, व्यापारी और सामान्य लोगों के जीवन का भी चित्रण मिलता है। यह साहित्य हमें चोल, चेर और पांड्य जैसे राजवंशों के बारे में भी जानकारी देता है।
इतिहासकारों के लिए संगम साहित्य एक महत्वपूर्ण स्रोत है, क्योंकि इससे हमें उस काल के सामाजिक और आर्थिक जीवन की जानकारी मिलती है। इस प्रकार, संगम साहित्य हमारे इतिहास और संस्कृति को समझने में बहुत सहायक है।
3. इस अध्याय में उल्लिखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया?
उत्तर:
इस अध्याय में सातवाहन वंश के शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया। इसके प्रमुख उदाहरण हैं—गौतमीपुत्र श्री शातकर्णी (गौतमी का पुत्र) और वशिष्ठीपुत्र पुलुमावी (वशिष्ठी का पुत्र)।
कारण: इतिहासकारों के अनुसार, ऐसा करने का मुख्य कारण अपनी माता के प्रति सम्मान और आदर व्यक्त करना था। यह दर्शाता है कि सातवाहन समाज में, विशेषकर राजपरिवार में, माताओं और महिलाओं का स्थान बहुत ऊँचा और महत्वपूर्ण था।
4. इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों का एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौन-से राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है।
उत्तर:
कुषाण साम्राज्य: सांस्कृतिक मिलन का केंद्र
कुषाण साम्राज्य भारत के इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है। मुझे यह राज्य सबसे रोचक लगा क्योंकि यह केवल युद्ध और विजय तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने विभिन्न संस्कृतियों को जोड़ने का काम किया।
कुषाण मूल रूप से मध्य एशिया की एक जनजाति (यूची) से आए थे। उन्होंने धीरे-धीरे उत्तर-पश्चिम भारत में एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया। इस वंश का सबसे महान शासक कनिष्क था, जिसने ‘राजाधिराज’ और ‘देवपुत्र’ जैसी उपाधियाँ धारण कीं। उसकी दो राजधानियाँ थीं—पेशावर (पुरुषपुर) और मथुरा।
कुषाणों की सबसे बड़ी उपलब्धि ‘रेशम मार्ग’ पर नियंत्रण करना था। यह मार्ग चीन से लेकर रोम तक जाता था। इस पर नियंत्रण से भारत को व्यापार में बहुत लाभ हुआ और भारी मात्रा में सोना प्राप्त हुआ।
सांस्कृतिक रूप से, कुषाण काल में कला का अद्भुत विकास हुआ। कनिष्क ने बौद्ध धर्म को संरक्षण दिया और उसके समय में गांधार कला शैली (जिसमें बुद्ध को ग्रीक देवताओं जैसा दिखाया गया) और मथुरा कला शैली (भारतीय शैली) फली-फूली। उनके सिक्कों पर भारतीय, ग्रीक और ईरानी देवी-देवताओं के चित्र मिलते हैं, जो उनकी धार्मिक उदारता को दर्शाते हैं।
5. कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौन-सी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में एक लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य, नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
उत्तर:
- मेरा राज्य: सूर्योदय प्रदेश
- राजचिह्न: मैं ‘उगता हुआ सूर्य और खुली किताब’ को अपना राजचिह्न चुनूँगा। सूर्य नई उम्मीद और ऊर्जा का प्रतीक है, जबकि किताब ज्ञान और शिक्षा का प्रतीक है।
- उपाधि: मैं ‘प्रजा-सेवक’ की उपाधि धारण करूँगा क्योंकि शासक का असली काम जनता की सेवा करना है, न कि उन पर राज करना।
मूल्य और नियम:
- समानता: मेरे राज्य में सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे, चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों।
- पर्यावरण रक्षा: हर नागरिक को साल में कम से कम 5 पेड़ लगाने होंगे। नदियों को साफ रखना सबका कर्तव्य होगा।
- शिक्षा और स्वास्थ्य: शिक्षा और इलाज पूरी तरह मुफ्त होगा।
- शांति: हम युद्ध के बजाय बातचीत से मसले सुलझाएंगे।
6. आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लिखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।
उत्तर:
छात्र भारत के मानचित्र पर निम्नलिखित स्थानों को चिह्नित करें:
- भरहुत: मध्य प्रदेश (स्तूप के लिए प्रसिद्ध)।
- साँची: मध्य प्रदेश (महान स्तूप और तोरण द्वार)।
- अमरावती: आंध्र प्रदेश (सातवाहन कालीन भव्य स्तूप)।
- मथुरा: उत्तर प्रदेश (मथुरा कला शैली और कुषाण केंद्र)।
- कार्ले: महाराष्ट्र (चट्टानों को काटकर बनाए गए चैत्य और गुफाएँ)।
- उदयगिरि: ओडिशा (राजा खारवेल की गुफाएँ)।
- गांधार: वर्तमान पाकिस्तान (गांधार कला शैली का केंद्र)।
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान अध्याय 6 से परीक्षा के लिए अतिरिक्त प्रश्न उत्तर
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 पर आधारित अतिलघुउत्तरीय प्रश्न उत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न
1. पुनर्गठन का काल किसे कहा जाता है?
उत्तर देखेंमौर्य साम्राज्य के पतन के बाद (लगभग 200 ई.पू. से 300 ई.स. तक) नए राज्यों और सांस्कृतिक बदलावों के दौर को पुनर्गठन का काल कहते हैं।
2. शुंग वंश की स्थापना किसने की?
उत्तर देखेंशुंग वंश की स्थापना अंतिम मौर्य सम्राट के सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने लगभग 185 ईसा पूर्व में की थी।
3. खारवेल किस धर्म का अनुयायी था?
उत्तर देखेंकलिंग नरेश खारवेल जैन धर्म का अनुयायी था, जैसा कि हाथीगुंफा अभिलेख से पता चलता है।
4. सातवाहन वंश को और किस नाम से जाना जाता है?
उत्तर देखेंपुराणों में सातवाहन वंश को ‘आंध्र’ या ‘आंध्र भृत्य’ के नाम से भी जाना जाता है।
5. ‘महराजा राजाधिराज देवपुत्र’ की उपाधि किसने धारण की थी?
उत्तर देखेंयह उपाधि कुषाण वंश के महानतम शासक कनिष्क ने धारण की थी।
6. संगम का क्या अर्थ है?
उत्तर देखेंसंगम का अर्थ है कवियों और विद्वानों की सभा या गोष्ठी, जहाँ तमिल साहित्य की रचना हुई।
7. गांधार कला की प्रमुख विशेषता क्या थी?
उत्तर देखेंगांधार कला में भारतीय विषयों (बौद्ध धर्म) को यूनानी-रोमन कला शैली और तकनीकों के साथ प्रस्तुत किया गया था।
8. मथुरा कला शैली में बनी मूर्तियों की एक विशेषता बताइए।
उत्तर देखेंमथुरा शैली की मूर्तियां लाल बलुआ पत्थर से बनी होती थीं और उनमें भारतीयता का पुट अधिक था।
9. रेशम मार्ग क्या था?
उत्तर देखेंयह चीन से शुरू होकर मध्य एशिया होते हुए पश्चिम तक जाने वाला एक प्राचीन और महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग था।
10. कनिष्क के सिक्कों पर किन देवताओं के चित्र मिलते हैं?
उत्तर देखेंकनिष्क के सिक्कों पर बुद्ध, शिव, और ग्रीक व ईरानी देवताओं के चित्र मिलते हैं।
11. कल्लनई (ग्रैंड एनीकट) का निर्माण क्यों किया गया था?
उत्तर देखेंइसका निर्माण कावेरी नदी के जल को सिंचाई के लिए नहरों में मोड़ने और बाढ़ रोकने के लिए किया गया था।
12. पांड्य राज्य किस वस्तु के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था?
उत्तर देखेंपांड्य राज्य अपने उच्च कोटि के मोतियों के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
13. नानेघाट अभिलेख किस वंश से संबंधित है?
उत्तर देखेंनानेघाट अभिलेख सातवाहन वंश से संबंधित है, जिसमें रानी नागनिका द्वारा दिए गए दान का वर्णन है।
14. इंडो-ग्रीक शासकों का भारतीय संस्कृति पर क्या प्रभाव पड़ा?
उत्तर देखेंउन्होंने भारतीय कला, सिक्का निर्माण और खगोल विज्ञान को प्रभावित किया और स्वयं भारतीय धर्मों को अपनाया।
15. किस सातवाहन रानी ने अपने पुत्र के नाम से शासन किया?
उत्तर देखेंरानी गौतमी बलश्री ने अपने पुत्र गौतमीपुत्र शातकर्णी की उपलब्धियों का उल्लेख नासिक अभिलेख में किया है।
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 पर आधारित लघुउत्तरीय प्रश्न उत्तर
लघु उत्तरीय प्रश्न
1. मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत की राजनीतिक स्थिति में क्या बदलाव आया?
उत्तर देखेंमौर्यों के पतन के बाद कोई एक केंद्रीय सत्ता नहीं रही। उत्तर में शुंग और कण्व, दक्षिण में सातवाहन, और कलिंग में चेदि वंश का उदय हुआ। साथ ही, उत्तर-पश्चिम से इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण जैसे विदेशी आक्रमणकारियों ने अपने राज्य स्थापित किए।
2. सातवाहन शासकों की धार्मिक नीति कैसी थी?
उत्तर देखेंसातवाहन शासक स्वयं हिंदू (वैदिक) धर्म के अनुयायी थे और यज्ञ करते थे, लेकिन वे धार्मिक रूप से सहिष्णु थे। उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं और विहारों को भी भारी मात्रा में भूमि और धन दान में दिया।
3. कनिष्क को एक महान शासक क्यों माना जाता है?
उत्तर देखेंकनिष्क न केवल एक महान विजेता था जिसने विशाल साम्राज्य बनाया, बल्कि वह कला और धर्म का संरक्षक भी था। उसने रेशम मार्ग को नियंत्रित किया, बौद्ध धर्म (महायान) को बढ़ावा दिया और गांधार व मथुरा कला शैलियों को प्रोत्साहित किया।
4. संगम साहित्य से हमें तत्कालीन समाज के बारे में क्या जानकारी मिलती है?
उत्तर देखेंसंगम साहित्य से हमें दक्षिण भारत के सामाजिक जीवन, राजाओं (चोल, चेर, पांड्य) की वीरता, व्यापार, प्रेम, युद्ध और नैतिक मूल्यों के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है। यह तमिल लोगों की संस्कृति का दर्पण है।
5. हेलियोडोरस स्तंभ भारतीय संस्कृति में विदेशियों के समावेशन को कैसे दर्शाता है?
उत्तर देखेंहेलियोडोरस एक ग्रीक राजदूत था, लेकिन उसने विदिशा में भगवान वासुदेव (विष्णु) के सम्मान में गरुड़ ध्वज स्थापित किया और स्वयं को ‘भागवत’ कहा। यह दिखाता है कि विदेशी लोग भारतीय धर्म और संस्कृति को अपना रहे थे।
6. कुषाण काल में व्यापार की क्या स्थिति थी?
उत्तर देखेंकुषाण काल व्यापार के लिए स्वर्णिम युग था। सिल्क रूट पर नियंत्रण होने के कारण भारत का व्यापार चीन, मध्य एशिया और रोमन साम्राज्य के साथ बढ़ा। मसाले, वस्त्र और विलासिता की वस्तुओं का निर्यात होता था और सोना भारत आता था।
7. गांधार और मथुरा कला शैली में मुख्य अंतर क्या है?
उत्तर देखेंगांधार कला उत्तर-पश्चिम में विकसित हुई, जिस पर यूनानी प्रभाव था और इसमें स्लेटी पत्थर का उपयोग हुआ। मथुरा कला विशुद्ध भारतीय शैली थी, जिसमें लाल बलुआ पत्थर का उपयोग हुआ और देवी-देवताओं को भारतीय रूप में दर्शाया गया।
8. राजा खारवेल की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखेंहाथीगुंफा अभिलेख के अनुसार, खारवेल एक पराक्रमी राजा था। उसने मगध और दक्षिण के राजाओं को हराया, अपने राज्य में नहरों का निर्माण कराया और वह जैन धर्म का संरक्षक होने के साथ-साथ सभी धर्मों का आदर करता था।
9. शक संवत का ऐतिहासिक महत्व क्या है?
उत्तर देखें78 ईस्वी में कनिष्क द्वारा शुरू किया गया शक संवत भारतीय इतिहास की कालगणना में महत्वपूर्ण है। यह कुषाणों के प्रभाव को दर्शाता है और आज भी भारत सरकार द्वारा इसे आधिकारिक राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में उपयोग किया जाता है।
10. प्राचीन भारत में रानियों की भूमिका के बारे में सातवाहन अभिलेख क्या बताते हैं?
उत्तर देखेंसातवाहन अभिलेख, जैसे नानेघाट और नासिक अभिलेख, दिखाते हैं कि रानियाँ (जैसे नागनिका और गौतमी बलश्री) न केवल धार्मिक अनुष्ठान करती थीं बल्कि प्रशासन और दान देने में भी सक्रिय भूमिका निभाती थीं। राजा अपनी माता के नाम का उपयोग गर्व से करते थे।
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान पाठ 6 पर आधारित दीर्घउत्तरीय प्रश्न उत्तर
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
1. “मौर्योत्तर काल को भारतीय इतिहास में ‘पुनर्गठन का काल’ क्यों कहा जाता है?” विस्तार से समझाइए।
उत्तर देखेंमौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भारत में राजनीतिक विकेंद्रीकरण हुआ, लेकिन इसे अंधकार युग नहीं बल्कि पुनर्गठन का काल माना जाता है। राजनीतिक रूप से, नए क्षेत्रीय राजवंश (शुंग, सातवाहन, चेदि) उभरे और विदेशी शासकों (इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण) ने अपने राज्य स्थापित किए। सांस्कृतिक रूप से, विदेशियों का भारतीय समाज में विलय हुआ। आर्थिक रूप से, व्यापार और वाणिज्य, विशेषकर रोम के साथ और सिल्क रूट के माध्यम से, नई ऊंचाइयों पर पहुंचा। कला के क्षेत्र में गांधार और मथुरा जैसी नई शैलियों का विकास हुआ। इस प्रकार, यह राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्गठन का दौर था।
2. सातवाहन साम्राज्य की प्रमुख विशेषताओं और उनकी उपलब्धियों का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखेंसातवाहन दक्कन भारत का पहला बड़ा साम्राज्य था। उनकी प्रमुख विशेषताएँ थीं:
1) प्रशासन: उन्होंने मौर्यों के प्रशासनिक ढांचे को अपनाया लेकिन स्थानीय सामंतों को भी महत्व दिया।
2) समाज: माताओं को उच्च सम्मान दिया जाता था (मातृनामों का प्रयोग)।
3) धर्म: वे वैदिक धर्म को मानते थे लेकिन बौद्ध धर्म को भी संरक्षण दिया (अमरावती और नागार्जुनकोंडा स्तूप)।
4) अर्थव्यवस्था: व्यापार बहुत उन्नत था, विशेषकर रोमन साम्राज्य के साथ। उन्होंने सीसे, तांबे और चांदी के सिक्के चलाए।
5) कला: उन्होंने चट्टानों को काटकर चैत्य और विहार बनवाए (जैसे कार्ले और नासिक की गुफाएं)।
3. कुषाण शासक कनिष्क के शासनकाल में भारतीय कला और संस्कृति के विकास पर प्रकाश डालिए।
उत्तर देखेंकनिष्क का शासनकाल भारतीय कला और संस्कृति के लिए एक स्वर्णिम अध्याय था।
1) धर्म: उसने बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजाश्रय दिया और चौथी बौद्ध संगीति का आयोजन किया।
2) कला: उसके समय में मूर्ति कला की दो प्रमुख शैलियां विकसित हुईं- गांधार शैली (यूनानी प्रभाव) और मथुरा शैली (भारतीय प्रभाव)। बुद्ध की पहली मानव रूपी मूर्तियां इसी काल में बनीं।
3) साहित्य: अश्वघोष जैसे विद्वान उसके दरबार में थे।
4) विज्ञान: चरक जैसे चिकित्सक भी इसी काल से संबंधित माने जाते हैं।
5) मुद्रा: उसने शुद्ध सोने के सिक्के भारी मात्रा में जारी किए।
4. संगम युग के दौरान दक्षिण भारत की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति का वर्णन करें।
उत्तर देखेंसंगम युग (लगभग 300 ई.पू. से 300 ई.स.) में दक्षिण भारत में तीन राजवंश- चोल, चेर और पांड्य शासन कर रहे थे।
राजनीतिक: राजा सर्वोच्च था लेकिन कवियों और विद्वानों का सम्मान करता था। राज्यों के बीच अक्सर युद्ध होते थे।
सामाजिक: समाज में कवियों, योद्धाओं और व्यापारियों का सम्मान था। स्त्रियां शिक्षित होती थीं (जैसे अव्वैयार)।
आर्थिक: कृषि और व्यापार मुख्य पेशे थे। मुजिरिस और पुहार जैसे बंदरगाहों से रोम और पश्चिम एशिया के साथ मसालों, मोतियों और वस्त्रों का भारी व्यापार होता था। संगम साहित्य इस समृद्ध संस्कृति का दर्पण है।
5. प्राचीन भारत में विदेशी आक्रमणकारियों के भारतीयकरण की प्रक्रिया को उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर देखेंमौर्योत्तर काल में इंडो-ग्रीक, शक और कुषाण जैसे विदेशी शासक भारत आए। वे विजेता के रूप में आए लेकिन धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए।
1) धर्म: कई शासकों ने भारतीय धर्म अपनाए। इंडो-ग्रीक हेलियोडोरस ने वैष्णव धर्म अपनाया। कनिष्क ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया।
2) नाम और उपाधियां: उन्होंने भारतीय नाम और उपाधियां धारण कीं।
3) विवाह: अंतरजातीय विवाहों ने उन्हें समाज का अंग बना दिया।
4) प्रशासन: उन्होंने भारतीय शासन प्रणालियों को अपनाया।
मनुस्मृति में उन्हें ‘व्रात्य क्षत्रिय’ का दर्जा देकर वर्ण व्यवस्था में शामिल कर लिया गया। यह भारतीय संस्कृति की ग्रहणशीलता को दर्शाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 का अध्याय 6 “पुनर्गठन का काल” किन-किन राजवंशों के किस समय को बताता है?
इस अध्याय में कई राजवंशों को शामिल किया गया है, जिन्हें दो भागों में बाँटा जा सकता है – उपमहाद्वीप के भीतर के राजवंश (शुंग, सातवाहन, चेदि/कलिंग, चोल, चेर, पांड्य) तथा उपमहाद्वीप के बाहर से आए राजवंश (इंडो-ग्रीक, शक/इंडो-सीथियन, कुषाण)। पुष्यमित्र शुंग द्वारा स्थापित शुंग वंश, गौतमीपुत्र शातकर्णी वाला सातवाहन वंश, कलिंग के खारवेल, संगम युग के चोल-चेर-पांड्य, तथा सिकंदर की विरासत से जुड़े इंडो-ग्रीक और कनिष्क जैसे शक्तिशाली कुषाण शासक – इन सबका चित्र 6.28 की समय-रेखा के आधार पर क्रमबद्ध अध्ययन इस अध्याय में कराया गया है।
क्या कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 का अध्याय 6 आसान है या कठिन?
यह अध्याय अपेक्षाकृत चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि इसमें एक साथ कई राजवंश (शुंग, सातवाहन, चेदि, चोल-चेर-पांड्य, इंडो-ग्रीक, शक, कुषाण) और उनके शासक आते हैं, जिससे नाम व घटनाएँ आपस में मिश्रित हो सकती हैं। हालाँकि, यदि विद्यार्थी इसे दो भागों में बाँट कर पढ़े – पहले उत्तर व दक्षिण भारत के देशी राजवंश, फिर उत्तर-पश्चिम से आए विदेशी आक्रमणकारी – और चित्र 6.28 की समय-रेखा को साथ रखकर समझे, तो यह अध्याय व्यवस्थित और तर्कसंगत बन जाता है। कला शैलियों (गांधार बनाम मथुरा) की तुलना भी विषय को रोचक बनाती है, बशर्ते चित्रों के साथ ध्यान से पढ़ा जाए।
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 के अध्याय 6 में अच्छे अंक कैसे प्राप्त करें?
अच्छे अंक प्राप्त करने के लिए सबसे पहले सभी राजवंशों को उनके क्षेत्र, प्रमुख शासक और राजधानी सहित एक तालिका बनाकर याद करें, जैसे शुंग-पाटलिपुत्र/मध्य भारत, सातवाहन-दक्कन, इंडो-ग्रीक व कुषाण-उत्तर-पश्चिम। संगम साहित्य और शिलप्पदिकारम (कण्णगी की कथा) को अच्छी तरह समझें, क्योंकि इससे 150 शब्दों का लेख पूछा जा सकता है। गांधार और मथुरा कला शैलियों के बीच अंतर (सामग्री, प्रभाव, विषय-वस्तु) स्पष्ट रूप से याद रखें, क्योंकि इससे तुलनात्मक व चित्र-पहचान प्रश्न बनते हैं। अध्याय के अंत में दिए गए प्रश्न 2, 3, 4 और 6 दीर्घ-उत्तरीय व मानचित्र-आधारित प्रश्नों के अभ्यास के लिए विशेष रूप से उपयोगी हैं।
कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 अध्याय 6 में ‘भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि’ की जो अवधारणा दी गई है, वह क्या है और परीक्षा के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
अध्याय के अनुसार इस पूरे काल में एक समान बात यह देखी गई कि लगभग हर शासक – चाहे वह खारवेल हों, कनिष्क हों या पांड्य नरेश — अपने-आपको सभी धर्मों और दर्शन-परंपराओं (बौद्ध, जैन, वैदिक आदि) का संरक्षक व सम्मानकर्ता घोषित करता था। इसे ही पाठ्यपुस्तक ने ‘भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि’ कहा है – यानी विविधता में एकता और सहिष्णुता की परंपरा। यह विषय परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह अध्याय 5 (अशोक की सहिष्णु नीति) से जुड़ी एक निरंतरता है और इससे “इस अध्याय की सबसे उल्लेखनीय बात क्या है” या “यह काल भारत की सांस्कृतिक विरासत को कैसे प्रभावित करता है” जैसे विश्लेषणात्मक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
क्या कक्षा 7 सामाजिक विज्ञान भाग 1 अध्याय 6 को एक ही बैठक में पूरा तैयार किया जा सकता है, या इसे कई दिनों में पढ़ना बेहतर है?
चूँकि यह अध्याय काफी लंबा है और इसमें छह से अधिक राजवंश, कई मानचित्र (चित्र 6.2, 6.3, 6.14, 6.25) और दो अलग-अलग कला शैलियाँ शामिल हैं, इसलिए इसे एक ही बैठक में पूरी तरह समझना कठिन होगा। बेहतर रणनीति यह है कि इसे दो-तीन भागों में बाँट कर पढ़ा जाए – पहले दिन शुंग व सातवाहन, दूसरे दिन चेदि व दक्षिण भारत के राजवंश (संगम युग), और तीसरे दिन इंडो-ग्रीक, शक व कुषाण तथा कला शैलियाँ। रिवीजन के समय केवल चित्र 6.28 की समय-रेखा और “आगे बढ़ने से पहले” वाले सार-बिंदुओं को दोहराने से भी अध्याय जल्दी याद हो जाता है।
