एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 मैं और मेरा देश
एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 समाधान – मैं और मेरा देश – प्रश्न उत्तर, लेखक परिचय, सारांश, कठिन शब्दों के अर्थ तथा व्याकरण का अभ्यास सत्र 2026-27 के लिए यहाँ दिए गए हैं। मैं और मेरा देश कक्षा 9 की हिंदी पाठ्यपुस्तक गंगा का सातवाँ पाठ है। यह हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ द्वारा लिखा गया एक विचारपूर्ण और प्रेरणादायक निबंध है। कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 में व्यक्ति और राष्ट्र के अविभाज्य संबंध को गहराई से स्थापित किया गया है। इस निबंध में लेखक ने प्रश्नोत्तर शैली का अनूठा प्रयोग करके यह सिद्ध किया है कि देश का सम्मान और नागरिक का सम्मान अलग नहीं हैं। नागरिक के अधिकार, कर्तव्य, शक्ति-बोध, सौंदर्य-बोध और चुनाव जैसे महत्वपूर्ण विषयों को रोचक कहानियों और उदाहरणों से समझाया गया है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 के त्वरित लिंक:
- कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 प्रश्न-उत्तर
- गंगा पाठ 7 लेखक परिचय
- हिंदी गंगा पाठ 7 का सारांश
- हिंदी गंगा अध्याय 7 शब्द-अर्थ
- हिंदी गंगा पाठ 7 के उपसर्ग और प्रत्य
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 समाधान
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
पेज 128 – रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. “एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई”, इस पंक्ति में रेखांकित शब्द ‘दरार’ किस ओर संकेत करता है?
(क) पूर्णता के भाव की तुष्टि
(ख) पारस्परिक संबंध टूटने की स्थिति
(ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार
(घ) सुख-सुविधाओं का अभाव
उत्तर:
(ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार
स्पष्टीकरण: इस पंक्ति में ‘दरार’ का अर्थ सामान्य दरार नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक/विचारात्मक बदलाव को दर्शाता है।
यहाँ लेखक पहले अपने घर, पड़ोस और नगर में खुद को पूर्ण और संतुष्ट मानता था। लेकिन जब उसे देश की गुलामी और उससे जुड़े अपमान का एहसास होता है, तो उसकी इस “पूर्णता की भावना” टूट जाती है। यानी उसके मन में जो संतोष था, उस पर गंभीर चोट लगती है।
2. निबंध में कहा गया है कि “ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है।” लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है?
(क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
(ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का
(ग) बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों का
(घ) किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों का
उत्तर:
(क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
स्पष्टीकरण: लेखक ने स्पष्ट कहा है कि ऐसे प्रश्न “बात को खिलने का, आगे बढ़ने का अवसर देते हैं”। यानी वे प्रश्न जो विचारों को विस्तार देने और आगे बढ़ाने में मदद करते हैं, उन्हें उत्तर देने में लेखक को आनंद मिलता है।
3. “अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए”, इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में—
(क) भोजन, आवास और वस्त्र जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था।
(ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
(ग) महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी।
(घ) धार्मिक रीति-रिवाजों को मनाने पर रोक लगाई जाती थी।
उत्तर:
(ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
स्पष्टीकरण: इस वाक्य में “दीन दिनों” का अर्थ केवल गरीबी या साधनों की कमी नहीं है, बल्कि मानसिक और राष्ट्रीय अपमान की स्थिति से है।
पराधीनता में सबसे बड़ा नुकसान बाहरी सुविधाओं का नहीं, बल्कि सम्मान और स्वाभिमान का ह्रास होता है। लेखक भी यही बताना चाहते हैं कि स्वतंत्रता के बिना व्यक्ति और राष्ट्र दोनों ही हीन स्थिति में होते हैं।
4. निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि—
(क) उन्हें विदेश भ्रमण के अवसर न मिलें।
(ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
(ग) उनके नगर की शासन प्रणाली कमजोर हो।
(घ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता हो।
उत्तर:
(ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
स्पष्टीकरण: निबंध में लाला लाजपत राय के अनुभव के माध्यम से स्पष्ट किया गया है कि चाहे किसी व्यक्ति के पास कितनी भी सुविधाएँ और साधन क्यों न हों, यदि उसका देश गुलाम है तो वह सच्चा गौरव अनुभव नहीं कर सकता।
लेखक बताते हैं कि विदेशों में जाने पर भी उनके माथे पर “भारत की गुलामी का कलंक” लगा रहता था। इससे यह स्पष्ट होता है कि व्यक्तिगत साधन-संपन्नता के बावजूद राष्ट्रीय स्वतंत्रता के बिना सम्मान अधूरा है।
5. “पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है”, इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘गाँठ’ किन दो बातों को साथ बाँधती है?
(क) देश और नागरिक
(ख) देश और संविधान
(ग) देश और विदेश
(घ) व्यवसाय और आजीविका
उत्तर:
(क) देश और नागरिक
स्पष्टीकरण: इस वाक्य में “गाँठ” का अर्थ है ऐसा संबंध जो दो चीज़ों को मजबूती से जोड़ता है। निबंध में लेखक दो घटनाओं के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि हर नागरिक का व्यवहार सीधे उसके देश के सम्मान या अपमान से जुड़ा होता है। यानी नागरिक और देश अलग नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं।
6. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
(क) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था
(ख) पारिवारिक संबंधों का महत्व
(ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
(घ) देश का महत्व और व्यक्ति की उपेक्षा
उत्तर:
(ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
स्पष्टीकरण: निबंध “मैं और मेरा देश” का मूल विचार यही है कि व्यक्ति और उसका देश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हैं। लेखक बार-बार यह समझाते हैं कि नागरिक के आचरण से देश का सम्मान बढ़ता या घटता है और देश की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति पर पड़ता है।
पेज 129 के प्रश्न उत्तर
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
1. स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?
उत्तर:
स्वामी रामतीर्थ उस जापानी युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध हो गए क्योंकि उसके व्यवहार में अपने देश के प्रति गहरा प्रेम और जिम्मेदारी झलक रही थी। युवक ने फल बेचने के बजाय उन्हें सम्मानपूर्वक भेंट किया और बदले में केवल यही निवेदन किया कि स्वामी जी अपने देश जाकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। इससे स्पष्ट होता है कि वह अपने देश की छवि को लेकर अत्यंत सजग था। उसने व्यक्तिगत लाभ को महत्व नहीं दिया, बल्कि राष्ट्र के सम्मान को सर्वोपरि रखा। इतनी छोटी-सी घटना के माध्यम से उसने अपने देश का गौरव बढ़ाने का प्रयास किया। उसकी देशभक्ति, निःस्वार्थ भावना और जागरूकता ने स्वामी रामतीर्थ को प्रभावित किया, इसलिए वे उसके उत्तर से अत्यंत प्रसन्न और मुग्ध हो गए।
2. जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।
उत्तर:
जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ से फलों के मूल्य के रूप में कोई धन नहीं माँगा। उसने केवल यह निवेदन किया कि वे अपने देश लौटकर यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते। उसका उद्देश्य अपने देश की प्रतिष्ठा और सम्मान को बनाए रखना था, न कि व्यक्तिगत लाभ कमाना।
उस युवक के व्यक्तित्व की छवि एक सच्चे देशभक्त, जागरूक और निःस्वार्थ नागरिक की उभरती है। वह अपने देश की छवि के प्रति अत्यंत संवेदनशील था और छोटी-सी बात को भी राष्ट्र के सम्मान से जोड़कर देखता था। उसमें विनम्रता, जिम्मेदारी और आत्मसम्मान की भावना थी। उसका आचरण बताता है कि वह केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे देश के गौरव के लिए सोचने वाला आदर्श नागरिक था।
3. “बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।” स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
“मैं और मेरा देश दो अलग चीज़ें नहीं हैं”— इस कथन का तर्क यह है कि हर नागरिक के व्यवहार, सोच और कर्म का सीधा प्रभाव देश की छवि और स्थिति पर पड़ता है। देश कोई अलग वस्तु नहीं, बल्कि उसके नागरिकों से ही बनता है। यदि नागरिक अच्छे कार्य करेंगे तो देश का सम्मान बढ़ेगा, और गलत कार्य करेंगे तो देश की छवि खराब होगी।
उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति सार्वजनिक स्थान पर गंदगी फैलाता है, तो इससे पूरे देश की छवि खराब होती है। वहीं, यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है या किसी विदेशी के सामने अपने देश का अच्छा परिचय देता है, तो देश का सम्मान बढ़ता है। जैसे जापान के युवक ने अपने व्यवहार से अपने देश का गौरव बढ़ाया। इसलिए व्यक्ति और देश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं।
पेज 129 के प्रश्न उत्तर
मेरे अनुभव मेरे विचार
1. “देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है”, अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
इस पंक्ति का भाव है कि नागरिक और देश एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं; व्यक्ति के कार्यों का प्रभाव देश पर पड़ता है और देश की स्थिति का प्रभाव व्यक्ति पर।
उदाहरण के लिए, यदि कोई छात्र विद्यालय में अनुशासनहीनता करता है, तो उससे उसके परिवार और स्कूल की छवि खराब होती है। इसी तरह, यदि कोई नागरिक सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाता है या नियमों का पालन नहीं करता, तो देश की छवि गिरती है। दूसरी ओर, जब कोई खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में जीतता है या कोई वैज्ञानिक नई खोज करता है, तो पूरे देश का गौरव बढ़ता है।
इसी प्रकार, यदि देश विकसित और सम्मानित है, तो उसके नागरिकों को विदेशों में सम्मान मिलता है। इसलिए व्यक्ति और देश दोनों एक-दूसरे के गौरव और हीनता के भागीदार होते हैं।
2. “मुझे बहुतों की अपने लिए जरूरत पड़ती थी। मैं भी बहुतों की जरूरत का उनके लिए जवाब था”
(क) प्रात:काल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किस-किसका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।
उत्तर:
प्रातःकाल उठने से लेकर रात्रि तक मेरे अनेक कार्य दूसरों के सहयोग से पूरे होते हैं। सुबह दूधवाला दूध देता है, बिजली-पानी की व्यवस्था से दिन की शुरुआत होती है। स्कूल जाने में बस चालक और कंडक्टर सहायता करते हैं। विद्यालय में शिक्षक हमें ज्ञान देते हैं और सहपाठी पढ़ाई में सहयोग करते हैं। घर लौटकर माँ-पिता का मार्गदर्शन मिलता है। दुकानदारों से आवश्यक वस्तुएँ मिलती हैं, सफाईकर्मी वातावरण स्वच्छ रखते हैं।
इसी प्रकार मैं भी दूसरों की सहायता करता हूँ। घर में छोटे-मोटे कामों में माता-पिता का हाथ बँटाता हूँ, छोटे भाई-बहन की पढ़ाई में मदद करता हूँ। स्कूल में मित्रों को पढ़ाई समझाता हूँ और जरूरत पड़ने पर उनकी सहायता करता हूँ। आसपास स्वच्छता बनाए रखने और नियमों का पालन करने की कोशिश करता हूँ। इस तरह हम सब एक-दूसरे के सहयोग से जीवन जीते हैं।
(ख) उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द ‘बहुतों’ में कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
उपर्युक्त वाक्य में ‘बहुतों’ से आशय उन सभी लोगों से है जिनसे हमारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से संबंध होता है और जिनके सहयोग से हमारा जीवन चलता है। इसमें परिवार के सदस्य जैसे माता-पिता, भाई-बहन शामिल हैं। इसके अलावा शिक्षक, सहपाठी, मित्र, पड़ोसी भी इसमें आते हैं।
दैनिक जीवन में सहायता करने वाले लोग जैसे दूधवाला, सब्ज़ीवाला, दुकानदार, बस चालक, कंडक्टर, सफाईकर्मी, डॉक्टर, पुलिसकर्मी आदि भी ‘बहुतों’ में सम्मिलित होते हैं। ये सभी लोग अपने-अपने कार्यों के माध्यम से हमारी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं।
इस प्रकार ‘बहुतों’ शब्द में समाज के वे सभी व्यक्ति आते हैं, जिनके सहयोग से हमारा जीवन सुचारु रूप से चलता है और हम भी अपने कार्यों से उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।
(ग) रचनाकार को स्वयं के लिए दूसरे लोगों से किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी और वह दूसरों को किस प्रकार का सहयोग देता होगा, अनुमान के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
रचनाकार को स्वयं के लिए अनेक प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी। बचपन में उसे परिवार से प्रेम, पालन-पोषण और संस्कार मिले होंगे। शिक्षा के लिए उसे शिक्षकों और समाज से ज्ञान, मार्गदर्शन और अनुभव प्राप्त हुआ होगा। अपने विचारों को विकसित करने के लिए उसे समाज, पाठकों, मित्रों और विभिन्न व्यक्तियों से प्रेरणा और सहयोग मिलता होगा। साथ ही जीवन की सामान्य आवश्यकताओं—जैसे भोजन, वस्त्र, आवास—के लिए भी वह समाज पर निर्भर रहता होगा।
दूसरी ओर, रचनाकार अपने लेखन के माध्यम से समाज को महत्वपूर्ण सहयोग देता है। वह अपने विचारों, अनुभवों और ज्ञान से लोगों को जागरूक करता है, सही दिशा दिखाता है और उनमें देशभक्ति, नैतिकता तथा सामाजिक जिम्मेदारी की भावना जगाता है। इस प्रकार वह समाज के मानसिक और नैतिक विकास में योगदान देता है।
3. “सुना नहीं आपने कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता।”
(क) उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित अंश “युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” के आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं? अपने उत्तर को विस्तार देने के लिए अपने घर या पास-पड़ोस के बड़ों और अध्यापक से चर्चा करके लिखिए।
उत्तर:
“युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” का अर्थ है कि किसी भी बड़े उद्देश्य की सफलता में केवल आगे लड़ने वाले ही नहीं, बल्कि पीछे से सहयोग देने वाले सभी लोगों का योगदान आवश्यक होता है। इसी प्रकार देश की प्रगति, विकास और सुरक्षा के लिए हर नागरिक का अपना दायित्व है।
हमें अपने-अपने कार्य ईमानदारी और लगन से करने चाहिए—छात्रों को मन लगाकर पढ़ना चाहिए, ताकि वे भविष्य में देश के योग्य नागरिक बन सकें। नागरिकों को कानूनों का पालन करना, कर (टैक्स) देना, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और स्वच्छता बनाए रखना चाहिए। हमें आपसी सद्भाव बनाए रखना, जरूरतमंदों की सहायता करना और देश की एकता को मजबूत करना भी जरूरी है।
साथ ही, सही प्रतिनिधि का चुनाव करना, देश के प्रति सकारात्मक सोच रखना और गलत कार्यों का विरोध करना भी हमारा कर्तव्य है। इस प्रकार हर व्यक्ति अपने छोटे-छोटे कार्यों से देश के विकास में योगदान दे सकता है।
(ख) अपने पास-पड़ोस में विचरने वाले पशु-पक्षियों की जीवनचर्या का अवलोकन कीजिए और अपने अवलोकन के आधार पर लिखिए कि आप उनके संघर्षों को किस रूप में देखते हैं?
(संकेत– आप अपनी पाठ्यपुस्तक में दी गई कहानी ‘दो बैलों की कथा’ के मुख्य पात्रों के अनुभवों को भी आधार बना सकते हैं।)
उत्तर:
मेरे पास-पड़ोस में गाय, कुत्ते, बिल्ली, कबूतर और गौरैया जैसे कई पशु-पक्षी दिखाई देते हैं। इनके जीवन को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उनका जीवन भी निरंतर संघर्ष से भरा होता है। उन्हें रोज़ भोजन और पानी की तलाश में इधर-उधर भटकना पड़ता है। कई बार कुत्तों को आपस में भोजन के लिए लड़ते देखा है। गर्मी, सर्दी और बरसात जैसे मौसमों की मार भी उन्हें झेलनी पड़ती है, क्योंकि उनके पास सुरक्षित आश्रय नहीं होता।
पक्षियों को भी घोंसले बनाने, अपने बच्चों की रक्षा करने और भोजन जुटाने में कठिनाइयाँ आती हैं। पेड़ों की कमी के कारण उनका जीवन और कठिन हो जाता है।
‘दो बैलों की कथा’ के हीरा और मोती की तरह ये पशु भी मेहनत, सहनशीलता और संघर्ष का उदाहरण हैं। वे बिना शिकायत अपने जीवन की कठिनाइयों का सामना करते हैं, जिससे हमें धैर्य और परिश्रम की सीख मिलती है।
(ग) इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है? आप अपने घर के बड़ों से इस विषय पर चर्चा करके उनके और अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
इस निबंध में जीवन को युद्ध इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें निरंतर संघर्ष, प्रयास और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। जैसे युद्ध में केवल लड़ना ही नहीं, बल्कि योजना बनाना, सहयोग करना और धैर्य रखना भी जरूरी होता है, वैसे ही जीवन में भी सफलता के लिए कई प्रकार के प्रयास करने पड़ते हैं।
घर के बड़ों से चर्चा करने पर उन्होंने बताया कि जीवन में हमें शिक्षा, रोजगार, परिवार और समाज से जुड़ी अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों में धैर्य, परिश्रम और सही निर्णय बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि हर व्यक्ति का संघर्ष अलग-अलग होता है, लेकिन बिना संघर्ष के प्रगति संभव नहीं है।
मेरे विचार से जीवन को युद्ध कहना उचित है क्योंकि इसमें हर व्यक्ति को अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए मेहनत, साहस और संयम के साथ आगे बढ़ना पड़ता है। साथ ही, दूसरों के सहयोग और सकारात्मक सोच से ही हम इस “युद्ध” में सफल हो सकते हैं।
(घ) देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं। इसी तरह हमारे आस-पास हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्यरत हैं। ये कौन-कौन लोग हैं और उनके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
उत्तर:
देश की सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं, उसी प्रकार हमारे दैनिक जीवन को सुचारु और बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्य करते हैं। इनमें सफाईकर्मी, डॉक्टर, नर्स, शिक्षक, पुलिसकर्मी, डाकिया, दूधवाला, सब्ज़ीवाला, बस चालक, बिजली और पानी विभाग के कर्मचारी आदि शामिल हैं। ये सभी अपने-अपने कार्यों से समाज को व्यवस्थित और सुरक्षित बनाते हैं।
इन लोगों के लिए हम कई छोटे-छोटे कार्य कर सकते हैं। जैसे— उनका सम्मान करना, उनके कार्य में बाधा न डालना, समय पर भुगतान करना, स्वच्छता बनाए रखना ताकि सफाईकर्मियों का काम कम हो, नियमों का पालन करना जिससे पुलिस और प्रशासन पर बोझ न बढ़े।
इसके अलावा, उनके प्रति आभार व्यक्त करना और जरूरत पड़ने पर सहयोग करना भी हमारा कर्तव्य है। इस प्रकार हम उनके कार्यों का सम्मान कर समाज को बेहतर बनाने में अपना योगदान दे सकते हैं।
4. “अपने पड़ोस में खेलकर, पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।”
(क) उपर्युक्त पंक्ति के आधार पर लिखिए कि पास-पड़ोस के लोगों में किस तरह के पारस्परिक संबंध रहे होंगे?
उत्तर:
इस पंक्ति से स्पष्ट होता है कि पास-पड़ोस के लोगों के बीच घनिष्ठ, आत्मीय और पारिवारिक संबंध रहे होंगे। पड़ोसी केवल आसपास रहने वाले लोग नहीं थे, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी थे। बच्चों को पड़ोसियों से भी वही स्नेह और दुलार मिलता था जो परिवार से मिलता है।
ऐसे संबंधों में अपनापन, सहयोग और विश्वास की भावना होती है। लोग एक-दूसरे की मदद करते हैं, जरूरत पड़ने पर साथ खड़े रहते हैं और खुशियों को मिल-जुलकर मनाते हैं। बच्चों का पालन-पोषण भी पूरे मोहल्ले के स्नेह में होता है।
इस प्रकार, उस समय पड़ोसियों के बीच संबंध बहुत मजबूत, प्रेमपूर्ण और सहयोगात्मक थे, जिनमें सभी एक बड़े परिवार की तरह रहते थे।
(ख) वर्तमान समय में ऐसे संबंधों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं और इनके क्या कारण हो सकते हैं? लिखिए।
उत्तर:
वर्तमान समय में पड़ोसियों के बीच पहले जैसे घनिष्ठ और आत्मीय संबंध कम होते जा रहे हैं। अब लोग अधिक व्यस्त और निजी जीवन में सीमित हो गए हैं, जिससे आपसी मेल-जोल घटा है। पहले जहाँ पड़ोसी एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे, वहीं अब औपचारिकता और दूरी बढ़ गई है।
इन परिवर्तनों के कई कारण हैं। आधुनिक जीवन की भाग-दौड़, काम का दबाव, तकनीक (मोबाइल, इंटरनेट) का अधिक उपयोग और व्यक्तिगतता की बढ़ती प्रवृत्ति इसके प्रमुख कारण हैं। लोग अब सामाजिक संपर्क की बजाय डिजिटल माध्यमों में अधिक समय बिताते हैं। इसके अलावा, बड़े शहरों में स्थान परिवर्तन और सुरक्षा की चिंताओं के कारण भी लोग पड़ोसियों से कम जुड़ पाते हैं।
इस प्रकार, जीवनशैली में बदलाव के कारण पड़ोस के पारस्परिक संबंध पहले की तुलना में कमजोर हो गए हैं।
5. “क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?”
अपने घर/विद्यालय के आस-पास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?
उत्तर:
हम अपने घर, विद्यालय और आसपास के वातावरण की स्वच्छता एवं सौंदर्य बनाए रखने के लिए कई छोटे-छोटे प्रयास करते हैं। घर में हम कूड़ा निर्धारित स्थान पर डालते हैं और प्लास्टिक का कम उपयोग करने की कोशिश करते हैं। विद्यालय में हम कक्षा को साफ रखते हैं, डस्टबिन का उपयोग करते हैं और दीवारों या फर्नीचर को गंदा नहीं करते।
सार्वजनिक स्थानों पर हम इधर-उधर कूड़ा नहीं फैलाते, पेड़ों की देखभाल करते हैं और दूसरों को भी स्वच्छता के प्रति जागरूक करते हैं। ऐतिहासिक महत्व के स्थानों पर हम वहाँ की साफ-सफाई का ध्यान रखते हैं, दीवारों पर कुछ नहीं लिखते और नियमों का पालन करते हैं।
इसके अलावा, हम स्वच्छता अभियानों में भाग लेते हैं और लोगों को समझाते हैं कि साफ-सुथरा वातावरण ही सुंदर और स्वस्थ जीवन का आधार है। इस प्रकार हम सभी मिलकर अपने आसपास की सुंदरता और स्वच्छता को बनाए रखने में योगदान देते हैं।
6. “मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे।” देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें?
अपने-अपने समूह में इसकी चर्चा कीजिए और चर्चा से उभरे बिंदुओं को प्रात:कालीन सभा में पढ़कर सुनाइए।
उत्तर:
आप इसे प्रातःकालीन सभा में पढ़ने के लिए इस तरह प्रस्तुत कर सकते हैं—
देश के सम्मान की रक्षा के लिए हमें क्या करना चाहिए—
- अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन करना।
- कानूनों और नियमों का पालन करना।
- सार्वजनिक संपत्ति (स्कूल, सड़क, पार्क आदि) की रक्षा करना।
- स्वच्छता बनाए रखना और दूसरों को भी प्रेरित करना।
- देश के प्रति सकारात्मक सोच रखना और उसकी उपलब्धियों पर गर्व करना।
- सही प्रतिनिधियों का चुनाव करना और जागरूक नागरिक बनना।
- सभी धर्मों और लोगों का सम्मान करना, एकता बनाए रखना।
हमें क्या नहीं करना चाहिए—
- गंदगी फैलाना या सार्वजनिक स्थानों को नुकसान पहुँचाना।
- देश की नकारात्मक छवि फैलाना या गलत अफवाहें फैलाना।
- नियमों का उल्लंघन करना या भ्रष्टाचार में शामिल होना।
- आपसी झगड़े, भेदभाव और नफरत फैलाना।
इस प्रकार, छोटे-छोटे अच्छे कार्यों और सही व्यवहार से हम अपने देश के सम्मान को बनाए रख सकते हैं।
पेज 131 के प्रश्न उत्तर
मेरे प्रश्न
“ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है”
निबंध के उपर्युक्त संदर्भ से आपके लिए दो प्रश्न बनाए गए हैं—
(क) रचनाकार को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद आता है?
(ख) आपको किस तरह के प्रश्नों को बूझना रोचक लगता है?
अब इस निबंध के आलोक में नीचे दी गई सामग्री को पढ़कर तीन प्रश्न बनाइए और लिखिए।
यह सोचना एकदम निराधार है कि केवल संपन्न व्यक्ति ही देश की प्रगति और विकास में योगदान दे सकते हैं। देश की सुरक्षा का विषय हो अथवा ऐश्वर्य व संपन्नता का, सभी नागरिकों का अपनी ही तरह से योगदान होता है। हम सब नागरिक अपने देश का प्रतिनिधित्व करते हैं। हम यदि कुछ भी गलत करते हैं तो उससे अपनी छवि ही धूमिल नहीं होती अपितु अपने देश की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
उत्तर:
(क) रचनाकार को उन प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद आता है जो विचारों को आगे बढ़ाते हैं, बात को विस्तार देते हैं और किसी विषय को गहराई से समझने का अवसर प्रदान करते हैं।
(ख) मुझे ऐसे प्रश्नों को बूझना रोचक लगता है जो सोचने पर मजबूर करें, नए दृष्टिकोण दें और जिनसे किसी विषय की गहराई को समझने का अवसर मिले।
दिए गए अनुच्छेद के आधार पर तीन उपयुक्त प्रश्न इस प्रकार बनाए जा सकते हैं—
- क्या केवल संपन्न व्यक्ति ही देश की प्रगति और विकास में योगदान दे सकते हैं? स्पष्ट कीजिए।
- सभी नागरिक अपने-अपने स्तर पर देश के विकास और सुरक्षा में किस प्रकार योगदान दे सकते हैं?
- किसी नागरिक के गलत कार्यों का देश की छवि पर क्या प्रभाव पड़ता है?
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 लेखक परिचय
लेखक परिचय – कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
| नाम: | कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ |
|---|---|
| जन्म: | सन् 1906 ई. |
| स्थान: | सहारनपुर जिला, उत्तर प्रदेश |
| निधन: | सन् 1995 |
मुख्य कार्यक्षेत्र: पत्रकारिता। उन्होंने “नया जीवन” और “विकास” पत्रों का संपादन किया।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: प्रारंभ से ही स्वतंत्रता संग्राम एवं सामाजिक कार्यों में भाग लेने के कारण अनेक बार जेल-यात्रा भी करनी पड़ी।
पुरस्कार: उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के लिए “पद्म श्री” से सम्मानित।
प्रमुख रचनाएँ: उनके संस्मरणात्मक निबंध-संग्रह हैं – दीप जले शंख बजे, जिंदगी मुसकरायी, बाजे पायलिया के घुँघरू, जिंदगी लहलहाई, क्षण बोले कण मुसकाए, कारवाँ आगे बढ़े, माटी हो गई सोना, महके आँगन चहके द्वार और आकाश के तारे धरती के फूल।
साहित्यिक विशेषता: प्रभाकर जी ने राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संबंध रखने वाले अनेक निबंध लिखे। उनके निबंध गहन मानवतावादी दृष्टिकोण और जीवन-दर्शन के परिचायक हैं। उनकी भाषा सहज, संवादात्मक और हृदयग्राही है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 का संक्षिप्त सारांश
पाठ का सारांश
- पहला भाग – पूर्णता का भ्रम:
लेखक बताता है कि वह अपने घर, पड़ोस और नगर में जीवन जीते हुए स्वयं को पूर्ण मानुष समझने लगा था। नगर के ज्ञान-भंडार का उपयोग करते हुए और अपनी सेवाएँ देते हुए वह सोचता था – “मेरा घर, मेरा पड़ोस, मेरा नगर और मैं – कैसी सुंदर, संगठित और पूर्ण है मेरी स्थिति।” लेकिन एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई। - दूसरा भाग – लाला लाजपत राय का अनुभव और मानसिक भूकंप:
वह “मानसिक भूकंप” था पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय का अनुभव। वे संसार के कई देशों में घूमे और अपना सारा अनुभव एक वाक्य में कह दिया – “मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।” इस अनुभव ने लेखक की पूर्णता की भावना को अपूर्णता की कसक से भर दिया। - तीसरा भाग – नागरिक का कर्तव्य और अधिकार:
इस अनुभव की छाया में लेखक सोचता है कि उसका कर्तव्य है कि वह कोई ऐसा काम न करे जिससे देश की स्वतंत्रता और सम्मान को धक्का पहुँचे। साथ ही नागरिक के रूप में उसका अधिकार है कि देश के सम्मान का पूरा-पूरा भाग उसे मिले। वह कहता है – “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।” - चौथा भाग – साधारण नागरिक भी देश के लिए क्या कर सकता है:
लेखक प्रश्न उठाता है कि एक साधारण व्यक्ति जो केवल अपनी दाल-रोटी की फिक्र में लगा हो, देश के लिए क्या कर सकता है? इसके उत्तर में लेखक कहता है कि जीवन एक युद्ध है और युद्ध में केवल लड़ना ही काम नहीं होता – किसान रसद उगाता है, दर्शक तालियाँ बजाता है। इसी तरह हर नागरिक अपने तरीके से देश के काम आ सकता है। वह कहावत “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” को सौ फीसदी झूठ बताता है। - पाँचवाँ भाग – जापान के युवक की कहानियाँ:
निबंध में दो कहानियाँ हैं। पहली कहानी में स्वामी रामतीर्थ ने जापान में यह कहा कि “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।” एक जापानी युवक ने यह सुन लिया, दूर से फल लाकर दिए और कहा – “इसका मूल्य यह है कि आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।” दूसरी कहानी में एक विदेशी विद्यार्थी ने जापानी पुस्तकालय की किताब से दुर्लभ चित्र निकाल लिए। जापानी विद्यार्थी ने सूचना दी, पुलिस ने तलाशी ली और पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया कि उस देश का कोई नागरिक प्रवेश नहीं कर सकता। पहले युवक ने देश का सिर ऊँचा किया, दूसरे ने कलंक लगाया। - छठा भाग – भावना का महत्व, कमालपाशा और भारतीय किसान:
लेखक कहता है कि महत्व कार्य की विशालता में नहीं, उसके पीछे की भावना में है। तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा ने एक देहाती बूढ़े किसान का पाव-भर शहद वाला उपहार स्वीकार किया और उसे शाही कार से गाँव भेजा। इसी तरह भारत में एक किसान ने रंगीन सुतलियों से बुनी खाट पं. नेहरू को दी और उन्होंने दस्तखती फोटो देकर उसकी भावना का सम्मान किया। - सातवाँ भाग – शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध:
लेखक कहता है कि देश को दो चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत है – शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। यदि कोई नागरिक देश की दूसरे देशों से हीन तुलना करता है तो वह शक्ति-बोध को नष्ट करता है। इसके लिए महाभारत के शल्य का उदाहरण दिया है जो महाबली कर्ण का सारथी था और बार-बार अर्जुन की अजेयता का उल्लेख करके उसके आत्मविश्वास में संदेह की तरेड़ डाल देता था। इसी तरह यदि नागरिक केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकता है, घर का कूड़ा बाहर फेंकता है, गंदे शब्दों में गंदे भाव प्रकट करता है तो सौंदर्य-बोध को ठेस पहुँचाता है। - आठवाँ भाग – चुनाव: देश की उच्चता और हीनता की कसौटी:
देश की उच्चता और हीनता की कसौटी है – चुनाव। जिस देश के नागरिक ठीक व्यक्ति को मत देते हैं वह देश उच्च है और जहाँ गलत लोगों के प्रभाव में मत दिए जाते हैं वह देश हीन है। लेखक का कर्तव्य है – ठीक मनुष्य को मत देना, और अधिकार है – बिना मत लिए कोई भी अधिकार की कुर्सी पर न बैठ सके।
निबंध विधा की विशेषताएँ
गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के सातवें अध्याय में निबंध विधा की निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ हैं –
- विषय-केंद्रीयता: पूरा निबंध “व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध” नामक एक ही विषय पर केंद्रित है।
- प्रश्नोत्तर/संवादात्मक शैली: गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी पाठ 7 की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि पूरा निबंध प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है। लेखक स्वयं प्रश्न पूछता है और स्वयं उत्तर देता है। जैसे – “क्या कोई भूकंप आया था?” – “जी हाँ, एक भूकंप आया था।”
- वैयक्तिकता: लेखक “मैं” के रूप में अपने व्यक्तिगत अनुभव और विचार साझा करता है।
- तार्किकता: हर तर्क को उदाहरण, कहानी और ऐतिहासिक संदर्भ से सिद्ध किया गया है।
- प्रेरणात्मकता: स्वामी रामतीर्थ, जापानी युवक, कमालपाशा और भारतीय किसान की कहानियाँ पाठक को प्रेरणा देती हैं।
- सजीवता/चित्रात्मकता: “भूकंप”, “दरार”, “गाँठ” जैसे प्रतीकों से निबंध में सजीवता आती है।
- साहित्यिक सौंदर्य: “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” जैसी कहावतों का सटीक उपयोग और शल्य के उदाहरण से साहित्यिक सौंदर्य है।
- संक्षिप्तता और स्पष्टता: विचार स्पष्ट और सीधे हैं। कोई अनावश्यक विस्तार नहीं।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 के कठिन शब्दों के अर्थ
कठिन शब्द और उनके अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संचित | इकट्ठा किया हुआ, जमा किया हुआ |
| तेजस्वी | तेजवाला, प्रतापी, शक्तिशाली |
| ठसक | चाल-ढाल का बनावटीपन, ऐंठ, शान |
| रसद | अनाज, खाने का सामान, राशन |
| दाद देना | न्यायोचित प्रशंसा करना |
| लांछित | दोषयुक्त, कलंकित |
| हँडिया | एक प्रकार का मिट्टी का बर्तन |
| सुतली | सन या पटसन के रेशों से बटकर बनाई हुई डोरी |
| चौपाल | खुली या छायी हुई मंडपाकार बैठक |
| अपूर्णता | जिसमें कमी हो, अधूरापन |
| भामाशाह | मेवाड़ का प्रसिद्ध दानी जिसने महाराणा प्रताप की मदद की |
| पराधीनता | दूसरे के अधीन होना, गुलामी |
| भाव-मुग्ध | भाव में खो जाना, भावनाओं में डूब जाना |
| कसौटी | परखने का मानदंड |
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 व्याकरण – उपसर्ग और प्रत्य
उपसर्ग और प्रत्यय
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 में उपसर्ग और प्रत्यय का विशेष अभ्यास दिया गया है। परीक्षा में इस पर प्रश्न अवश्य आते हैं।
उपसर्ग: वे शब्दांश जो किसी शब्द के आरंभ में जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं।
प्रत्यय: वे शब्दांश जो किसी शब्द के अंत में जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं।
निबंध में “अपूर्णता” शब्द में “अ” उपसर्ग और “ता” प्रत्यय दोनों हैं।
| शब्द | उपसर्ग + मूल शब्द | प्रत्यय |
|---|---|---|
| अपूर्णता | अ + पूर्ण | ता |
| अलौकिक | अ + लौकिक | – |
| निरक्षरता | निर् + अक्षर | ता |
| सम्मानित | सम् + मान | इत |
| अनावश्यक | अन् + आवश्यक | – |
| अपमानित | अप + मान | इत |
| अभिमानी | अभि + मान | ई |
शब्द-युग्म
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 में मिलते-जुलते भाव वाले शब्द-युग्म भाषा में सजीवता लाते हैं।
- ममता-दुलार – प्रेम और लाड़-प्यार (पड़ोसियों की ममता-दुलार पा, बड़ा हुआ था।)
- भरा-पूरा – संपूर्ण (एक मनुष्य से भरा-पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।)
- दाल-रोटी – साधारण जीविका (जो बेचारा अपनी दाल-रोटी की फिक्र में लगा हो।)
- ऊँच-नीच – जीवन के उतार-चढ़ाव, विषमताएँ
- पुनरुक्त शब्द-युग्म – पूरा-पूरा, धीरे-धीरे, छोटी-छोटी, बड़ी-बड़ी
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “मैं और मेरा देश” निबंध के लेखक कौन हैं?
उत्तर:
“मैं और मेरा देश” के लेखक कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ हैं जो हिंदी के प्रसिद्ध निबंधकार और पत्रकार थे। - लेखक के “आनंद की दीवार में दरार” किसने डाली?
उत्तर:
पंजाब-केसरी लाला लाजपत राय के उस अनुभव ने जो उन्होंने विदेश-भ्रमण के बाद एक वाक्य में व्यक्त किया था। - लाला लाजपत राय का वह एक वाक्य क्या था जिसने लेखक को हिला दिया?
उत्तर:
“मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और संसार के दूसरे देशों में भी घूमा, पर जहाँ भी मैं गया, भारतवर्ष की गुलामी की लज्जा का कलंक मेरे माथे पर लगा रहा।” - “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” कहावत के बारे में लेखक का क्या मत है?
उत्तर:
लेखक इस कहावत को सौ फीसदी झूठ मानता है। उसके अनुसार इतिहास साक्षी है कि बहुत बार अकेले चने ने ही भाड़ फोड़ा है। - स्वामी रामतीर्थ ने जापान में क्या कहा था?
उत्तर:
रेल में खाने को फल न मिलने पर उनके मुँह से निकला – “जापान में शायद अच्छे फल नहीं मिलते।” - जापानी युवक ने फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा?
उत्तर:
उसने कहा – “आप अपने देश में जाकर किसी से यह न कहिएगा कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।” - पुस्तकालय प्रसंग में जापानी पुस्तकालय ने क्या किया?
उत्तर:
जिस देश के विद्यार्थी ने पुस्तक से चित्र चुराए थे, पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया कि उस देश का कोई नागरिक प्रवेश नहीं कर सकता। - कमालपाशा कौन थे और उनसे जुड़ी घटना क्या है?
उत्तर:
कमालपाशा तुर्की के राष्ट्रपति थे। उन्होंने एक देहाती बूढ़े किसान का पाव-भर शहद वाला उपहार स्वीकार किया और उसे शाही कार से गाँव भेजा। - भारतीय किसान ने पंडित नेहरू को क्या उपहार दिया?
उत्तर:
भारतीय किसान ने रंगीन सुतलियों से बुनी एक खाट रेल में रखकर दिल्ली लाया और पंडित नेहरू को उपहार में दी। - देश की उच्चता और हीनता की कसौटी क्या है?
उत्तर:
निबंध के अनुसार देश की उच्चता और हीनता की कसौटी है – चुनाव। जहाँ नागरिक ठीक व्यक्ति को मत देते हैं, वह देश उच्च है। - देश को किन दो चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत है?
उत्तर:
देश को सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरत है – शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। - शल्य का उदाहरण निबंध में किस संदर्भ में दिया गया है?
उत्तर:
शल्य महाबली कर्ण का सारथी था। वह बार-बार अर्जुन की अजेयता का उल्लेख करके कर्ण के आत्मविश्वास में संदेह डालता था। यह उदाहरण शक्ति-बोध नष्ट करने के संदर्भ में दिया गया है। - “भामाशाह की तरह” यह उदाहरण किस संदर्भ में आया है?
उत्तर:
लेखक कहता है कि कोई बड़ा धनपति भामाशाह की तरह समय पर अपना धन देश के लिए त्याग करके काम आ सकता है। - कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया?
उत्तर:
उन्हें उत्कृष्ट साहित्यिक रचनाओं के लिए “पद्म श्री” से सम्मानित किया गया। - निबंध की लेखन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
उत्तर:
निबंध की लेखन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रश्नोत्तर/संवादात्मक शैली है जिसमें लेखक स्वयं प्रश्न पूछता है और स्वयं उत्तर देता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं” – इस कथन का आशय क्या है?
उत्तर:
लेखक का मानना है कि नागरिक और देश का संबंध अविभाज्य है। जैसे नागरिक अपने लाभ और सम्मान के लिए छोटी-छोटी बातों पर ध्यान देता है, वैसे ही देश के लिए भी ध्यान देना उसका कर्तव्य है। देश का सम्मान नागरिक का सम्मान है और नागरिक की हीनता देश की हीनता। - “जीवन एक युद्ध है” – इस उदाहरण से लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
लेखक यह कहना चाहता है कि साधारण नागरिक भी देश के लिए महत्वपूर्ण काम कर सकता है। युद्ध में केवल लड़ना ही काम नहीं होता – किसान रसद उगाता है, दर्शक तालियाँ बजाता है, हर काम का महत्व है। इसी तरह हर नागरिक अपने तरीके से देश-सेवा कर सकता है। - जापानी युवक की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर:
जापानी युवक ने स्वामी रामतीर्थ को फल देकर देश के बारे में गलत बात न कहने का अनुरोध किया। इससे शिक्षा मिलती है कि एक साधारण नागरिक भी अपने छोटे-से कार्य से अपने देश का गौरव बढ़ा सकता है। देश-प्रेम के लिए बड़े पद या धन की जरूरत नहीं। - पुस्तकालय वाली घटना से क्या सीख मिलती है?
उत्तर:
उस विदेशी विद्यार्थी ने पुस्तक से चित्र चुराकर अपने पूरे देश को कलंकित कर दिया। जापानी पुस्तकालय ने उस देश के सभी नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दी। इससे स्पष्ट है कि एक नागरिक की गलती का दंड पूरे देश को भुगतना पड़ता है। - “शक्ति-बोध” और “सौंदर्य-बोध” को नुकसान पहुँचाने वाले कौन-कौन से कार्य हैं?
उत्तर:
शक्ति-बोध को नुकसान पहुँचाते हैं – देश को अन्य देशों से हीन बताना, देश की बुराई करना। सौंदर्य-बोध को नुकसान पहुँचाते हैं – केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकना, घर का कूड़ा बाहर फेंकना, गंदे शब्दों में गंदे भाव प्रकट करना, ऐतिहासिक स्थानों को गंदा करना। - कमालपाशा और भारतीय किसान की घटनाओं में क्या समानता है?
उत्तर:
दोनों घटनाओं में उपहार मामूली थे – एक में पाव-भर शहद और दूसरे में रंगीन सुतलियों से बुनी खाट। लेकिन दोनों में उपहार देने वाले की भावना अत्यंत शुद्ध और ईमानदार थी। दोनों नेताओं ने भावना का सम्मान किया। संदेश एक ही है – महत्व कार्य की विशालता में नहीं, भावना में है। - “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” कहावत को झूठ बताकर लेखक क्या कहना चाहता है?
उत्तर:
लेखक यह कहना चाहता है कि यह सोचना गलत है कि एक साधारण व्यक्ति कुछ नहीं कर सकता। इतिहास में अनेक बार एक अकेले व्यक्ति ने बड़े बदलाव किए हैं। इसलिए हर नागरिक को यह सोचकर निराश नहीं होना चाहिए कि उससे क्या होगा। हर छोटा कदम महत्वपूर्ण है। - निबंध की प्रश्नोत्तर शैली इसे कैसे विशेष बनाती है?
उत्तर:
कक्षा 9 गंगा पाठ 7 की प्रश्नोत्तर शैली पाठक को निबंध में शामिल करती है। पाठक लगता है कि वह लेखक से सीधे बातचीत कर रहा है। इससे जटिल विचार भी सरल और रोचक लगते हैं। पाठक स्वयं प्रश्नकर्ता बन जाता है और उत्तर स्वाभाविक रूप से मन में उतरते हैं। - चुनाव को देश की उच्चता और हीनता की कसौटी क्यों माना गया है?
उत्तर:
चुनाव वह माध्यम है जिसके द्वारा नागरिक अपने देश के नेतृत्व को तय करते हैं। यदि नागरिक सोच-समझकर योग्य व्यक्ति को चुनते हैं तो देश की प्रगति होती है। यदि गलत लोगों के प्रभाव में मत दिए जाते हैं तो देश का पतन होता है। इसलिए चुनाव नागरिक चेतना का सबसे बड़ा प्रमाण है। - लाला लाजपत राय के अनुभव ने लेखक की सोच में क्या बदलाव लाया?
उत्तर:
लाला लाजपत राय के अनुभव से पहले लेखक अपने घर, पड़ोस और नगर की सीमाओं में ही स्वयं को पूर्ण मनुष्य मानता था। उनके अनुभव ने स्पष्ट कर दिया कि जब तक देश गुलाम है, व्यक्ति के पास चाहे कुछ भी हो, वह सम्मान से नहीं जी सकता। तब से उसने देश को अपने से अलग नहीं माना।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “मैं और मेरा देश” में लेखक ने व्यक्ति और देश के संबंध को किस प्रकार स्थापित किया है?
उत्तर:
कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ ने व्यक्ति और देश के संबंध को अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली तरीके से स्थापित किया है। लेखक की यात्रा व्यक्तिगत से राष्ट्रीय की ओर जाती है। पहले वह घर, पड़ोस और नगर की सीमाओं में स्वयं को पूर्ण मानता था। लाला लाजपत राय के अनुभव ने बताया कि गुलाम देश का नागरिक चाहे कितना भी संपन्न हो, वह गौरव का अनुभव नहीं कर सकता। इसीलिए लेखक ने कहा – “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।” दो जापानी कहानियों से उसने सिद्ध किया कि एक नागरिक का कार्य उसके पूरे देश की पहचान बन जाता है। देश का गौरव नागरिक का गौरव है और नागरिक का कलंक देश का कलंक। यही इस निबंध का केंद्रीय संदेश है। - लेखक ने “शक्ति-बोध” और “सौंदर्य-बोध” के बारे में क्या कहा है? इन्हें नष्ट करने वाले कार्यों का उल्लेख कीजिए।
उत्तर:
लेखक ने कहा है कि देश को दो चीजों की सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरूरत है – शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध। शक्ति-बोध का अर्थ है देश की शक्ति पर विश्वास रखना। जो नागरिक रेल में, मुसाफिरखानों में, क्लबों में या चौपालों पर देश की हीन तुलना दूसरे देशों से करते हैं, वे देश के सामूहिक मानसिक बल को नष्ट करते हैं। इसके लिए महाभारत के शल्य का उदाहरण दिया है जो कर्ण के आत्मविश्वास में संदेह डालता था। सौंदर्य-बोध का अर्थ है स्वच्छता, सुरुचि और सांस्कृतिक मर्यादा। केला खाकर छिलका रास्ते में फेंकना, घर का कूड़ा बाहर फेंकना, गंदे शब्दों का प्रयोग, ऐतिहासिक स्थानों पर पीक थूकना – ये सब सौंदर्य-बोध को नष्ट करते हैं। दोनों की रक्षा करना हर नागरिक का कर्तव्य है। - “महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं, उस कार्य के करने की भावना में है” – इस कथन को उदाहरणों सहित सिद्ध कीजिए।
उत्तर:
लेखक ने इस विचार को अनेक उदाहरणों से सिद्ध किया है। पहला उदाहरण जापानी युवक का है जिसने स्वामी रामतीर्थ को मुफ्त में फल दिए और उसका मूल्य यह माँगा कि देश के बारे में गलत बात न कहें। यह छोटा-सा कार्य था लेकिन भावना अत्यंत उच्च थी। दूसरा उदाहरण तुर्की के देहाती बूढ़े का है जो तीस मील पैदल चलकर कमालपाशा को पाव-भर शहद लेकर आया। शहद मामूली था लेकिन भावना में शुद्ध प्रेम था। तीसरा उदाहरण भारतीय किसान का है जिसने रंगीन सुतलियों से बुनी खाट पंडित नेहरू को दी। इन सभी उदाहरणों में उपहार छोटे थे लेकिन भावना महान थी और इसीलिए उन्हें महत्व मिला। इसके विपरीत, जिस विदेशी विद्यार्थी ने पुस्तकालय से चित्र चुराए, उसने एक छोटी-सी गलती से अपने पूरे देश को कलंकित कर दिया। - पाठ की प्रश्नोत्तर शैली और निबंध विधा की विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
“मैं और मेरा देश” निबंध विधा का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। इसकी सबसे अनूठी विशेषता इसकी प्रश्नोत्तर/संवादात्मक शैली है। लेखक स्वयं प्रश्न पूछता है जैसे “क्या कोई भूकंप आया था?”, “मानस में भूकंप उठा था?” और स्वयं उत्तर देता है। यह शैली पाठक को निबंध में शामिल करती है और जटिल विचारों को सहज बनाती है। निबंध विधा की दृष्टि से इसमें विषय-केंद्रीयता है क्योंकि पूरा निबंध एक ही विचार – व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध – पर टिका है। तार्किकता के साथ-साथ कहानियों और उदाहरणों से प्रेरणात्मकता भी है। “भूकंप”, “दरार”, “गाँठ” जैसे प्रतीक चित्रात्मकता देते हैं। शल्य और महाभारत का संदर्भ साहित्यिक सौंदर्य जोड़ता है। वैयक्तिकता इस निबंध की आत्मा है – “मैं” का प्रयोग पूरे निबंध में है। - “मैं और मेरा देश” निबंध एनईपी 2020 की दृष्टि से और आज के संदर्भ में किस प्रकार प्रासंगिक है?
उत्तर:
“मैं और मेरा देश” आज के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। सन् 1939 में लिखे इस निबंध के विचार आज भी उतने ही सटीक हैं। स्वच्छ भारत अभियान की सफलता नागरिकों के सौंदर्य-बोध पर निर्भर करती है – जिसकी बात इस निबंध में की गई है। सोशल मीडिया पर देश की बुराई करना शक्ति-बोध को नष्ट करता है – यह आज की सबसे बड़ी समस्या है। चुनाव में जागरूक मतदान का संदेश लोकतंत्र की मजबूती के लिए आज भी उतना ही जरूरी है। एनईपी 2020 में नागरिक मूल्यों, संविधान और राष्ट्रीय चेतना को पाठ्यक्रम में महत्व दिया गया है। यह निबंध इन सभी मूल्यों को जीवंत उदाहरणों के साथ प्रस्तुत करता है। जापानी युवक और भारतीय किसान की कहानियाँ यह सिखाती हैं कि देश-प्रेम केवल भाषण में नहीं, छोटे-छोटे दैनिक कार्यों में भी होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
“मैं और मेरा देश” किस कक्षा की किस पुस्तक में है और यह किस विधा की रचना है?
मैं और मेरा देश” कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 है। यह एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तक “गंगा” में सम्मिलित है जो एनइपी 2020 के अनुसार सत्र 2026 से लागू है। विधा की दृष्टि से यह एक निबंध है। “निबंध” का शाब्दिक अर्थ है “भली-भाँति बँधा हुआ” (नि+बंध)। गद्य की इस विधा में रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार और भावनाओं को तार्किक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप में प्रस्तुत करता है।
कक्षा 9 गंगा पाठ 7 से परीक्षा में कौन-से प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 से परीक्षा में प्रायः पूछे जाने वाले विषय हैं – लाला लाजपत राय के वाक्य का भाव, जापानी युवक की कहानी का संदेश, “दरार” और “गाँठ” शब्दों का प्रतीकात्मक अर्थ, “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” कहावत पर लेखक का मत, शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध का अर्थ, उपसर्ग-प्रत्यय की पहचान और निबंध की प्रश्नोत्तर शैली की विशेषता।
कक्षा 9 गंगा अध्याय 7 को जल्दी याद कैसे करें?
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 याद करने का सबसे अच्छा तरीका है निबंध को तीन हिस्सों में बाँटना। पहला – लेखक का पूर्णता का भ्रम और लाला लाजपत राय का भूकंप। दूसरा – जापान की दो कहानियाँ, कमालपाशा और किसान के उदाहरण। तीसरा – शक्ति-बोध, सौंदर्य-बोध और चुनाव। गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के इस अध्याय की प्रश्नोत्तर शैली को पहचानें और मुख्य प्रश्नों के उत्तर अपनी भाषा में बोलकर याद करें।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 बच्चों को क्या सिखाता है?
गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी का यह सातवाँ अध्याय बच्चों को अनेक महत्वपूर्ण नागरिक मूल्य सिखाता है। देश को अपना हिस्सा मानना और उसके सम्मान की चिंता करना, सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता रखना, देश की बुराई न करना बल्कि उसकी शक्तियों पर विश्वास रखना, चुनाव में जागरूक मतदान का महत्व समझना और यह जानना कि हर नागरिक चाहे छोटा हो या बड़ा, देश के लिए योगदान दे सकता है। ये सभी मूल्य आज की पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
बच्चों को कक्षा 9 गंगा पाठ 7 घर पर कैसे पढ़ाएँ?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 को घर पर पढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका है कि लाला लाजपत राय के बारे में, स्वामी रामतीर्थ के बारे में और कमालपाशा के बारे में थोड़ी जानकारी देकर निबंध पढ़वाएँ। फिर बच्चों से पूछें कि उन्होंने कभी ऐसा कोई कार्य किया है जो देश का नाम रोशन करे या करे। जापानी कहानियों की तुलना आज की परिस्थितियों से करें। इससे गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी पाठ 7 का भाव बच्चों के मन में गहराई से उतरेगा।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 को कक्षा में रोचक ढंग से कैसे पढ़ाएँ?
कक्षा 9 गंगा अध्याय 7 पढ़ाने का सबसे प्रभावशाली तरीका है कि निबंध की प्रश्नोत्तर शैली का अभिनय करें। एक छात्र प्रश्न पूछे और दूसरा उत्तर दे। जापानी युवक और स्वामी रामतीर्थ की कहानी का नाट्य-रूपांतरण कराएँ। छात्रों से पूछें कि उन्होंने कभी ऐसा कोई काम किया है जिससे उनके स्कूल या परिवार का नाम रोशन हुआ। इससे गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के इस अध्याय का भाव स्वाभाविक रूप से समझ में आएगा।
कक्षा 9 गंगा अध्याय 7 पर आधारित प्रोजेक्ट कार्य कौन-से दिए जा सकते हैं?
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 7 पर एनसीईआरटी ने स्वयं अनेक गतिविधियाँ सुझाई हैं। शिक्षक इन्हें प्रोजेक्ट के रूप में दे सकते हैं – “देश मात्र एक भौगोलिक सीमा क्षेत्र नहीं है” विषय पर परिचर्चा और रिपोर्ट, ब्रेल लिपि में पुस्तकें मँगवाने के लिए प्रधानाध्यापक को पत्र, योग्य उम्मीदवार चुनने के लिए आकर्षक विज्ञापन बनाना, देश के विकास में योगदान देने वालों के लिए कृतज्ञता-ज्ञापन लिखना और स्वच्छता पर सार्वजनिक चर्चा आयोजन। गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के इस अध्याय के “साथ-साथ पढ़ें” में निर्मल जीत सिंह सेखों पर भी चर्चा का अवसर है।
कक्षा 9 गंगा पाठ 7 का मूल्यांकन किन बिंदुओं पर किया जाना चाहिए?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 7 का मूल्यांकन इन प्रमुख बिंदुओं पर होना चाहिए – निबंध विधा की समझ और उसकी विशेषताओं की पहचान, व्यक्ति और देश के संबंध को अपनी भाषा में समझाने की क्षमता, जापानी कहानियों और अन्य उदाहरणों से निष्कर्ष निकालना, उपसर्ग-प्रत्यय की सही पहचान, शब्द-युग्म और संदर्भ में शब्द का प्रयोग, शक्ति-बोध और सौंदर्य-बोध की व्यावहारिक समझ और चुनाव में जागरूक मतदान के महत्व की समझ। गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के इस अध्याय की गतिविधियों जैसे परिचर्चा, पत्र-लेखन और विज्ञापन-निर्माण पर भी अंक दिए जाने चाहिए।
