एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 रीढ़ की हड्डी
एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 समाधान – रीढ़ की हड्डी – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द अर्थ, पाठ का सारांश, व्याकरण तथा अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं। रीढ़ की हड्डी कक्षा 9 की हिंदी पाठ्यपुस्तक गंगा का छठा पाठ है। यह जगदीशचंद्र माथुर द्वारा सन् 1939 में लिखी गई एक सामाजिक एकांकी है। कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 भारतीय समाज में प्रचलित विवाह व्यवस्था की कुरीतियों, स्त्री-शिक्षा के प्रति रूढ़िवादी सोच और नारी के आत्मसम्मान पर केंद्रित है। गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी का यह पाठ अपनी व्यंग्यपूर्ण भाषा, सजीव पात्रों और समाज-सुधार के संदेश के कारण अत्यंत प्रासंगिक और महत्वपूर्ण है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 के त्वरित लिंक:
- कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 6 प्रश्न-उत्तर
- गंगा पाठ 6 लेखक परिचय
- हिंदी गंगा पाठ 6 का सारांश
- हिंदी गंगा अध्याय 6 शब्द-अर्थ
- हिंदी गंगा पाठ 6 के मुहावरे का अर्थ
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 समाधान
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
पेज 111 – रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ का शीर्षक किसका प्रतीक है?
(क) शरीर के एक आवश्यक अंग का
(ख) व्यक्ति की ऊँचाई के आधार का
(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
(घ) शारीरिक शक्ति और परिश्रम का
उत्तर:
(ग) आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का
स्पष्टीकरण:
एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ में “रीढ़ की हड्डी” केवल शरीर का अंग नहीं है, बल्कि यह हिम्मत, आत्म-सम्मान और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने की शक्ति का प्रतीक है। उमा समाज की गलत परंपराओं के सामने झुकती नहीं है और साहस के साथ अपनी बात रखती है।
जब लड़के वाले उसे वस्तु की तरह परखते हैं, तब वह चुप रहने के बजाय विरोध करती है। अंत में वह शंकर से “बैकबोन” (रीढ़ की हड्डी) होने का सवाल उठाती है, जिससे स्पष्ट होता है कि यहाँ “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ नैतिक साहस और व्यक्तित्व की दृढ़ता है, न कि केवल शारीरिक अंग।
2. ‘रीढ़ की हड्डी’ एकांकी में किस पर व्यंग्य किया गया है?
(क) पात्रों की निर्धनता और लाचारी पर
(ख) पात्रों की भाषा और हास्य पर
(ग) विवाह और अशिक्षा पर
(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
उत्तर:
(घ) समाज की अनुचित मान्यताओं पर
स्पष्टीकरण:
इस एकांकी में लेखक ने समाज की उन गलत परंपराओं और सोच पर व्यंग्य किया है, जहाँ लड़की को एक वस्तु की तरह देखा और परखा जाता है। लड़के वाले लड़की की शिक्षा, सुंदरता और व्यवहार को अपने अनुसार तय करना चाहते हैं, जबकि लड़के की कमियों को नजरअंदाज करते हैं।
उमा इस मानसिकता का विरोध करती है और यह दिखाती है कि लड़कियों का भी आत्म-सम्मान और अधिकार होते हैं। इस प्रकार यह नाटक दकियानूसी सोच, लड़का-लड़की में भेदभाव और विवाह से जुड़ी अनुचित सामाजिक मान्यताओं पर व्यंग्य करता है।
3. “घर जाकर ज़रा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” यह वाक्य शंकर की किस छवि को उजागर करता है?
(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
(ख) अनुभव और विवेक की कमी
(ग) चारित्रिक दृढ़ता और शारीरिक दुर्बलता
(घ) उदासीनता और एकाकीपन
उत्तर:
(क) नैतिक साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता
स्पष्टीकरण: उमा का यह कथन सीधे शंकर के चरित्र और साहस पर प्रश्न उठाता है। “रीढ़ की हड्डी” यहाँ प्रतीक है हिम्मत और नैतिक दृढ़ता का। शंकर पूरे प्रसंग में अपने पिता की गलत बातों का विरोध नहीं करता और चुपचाप उनकी बातों का समर्थन करता है।
इसके अलावा, उमा यह भी बताती है कि शंकर पहले गलत काम करते पकड़ा गया था और वहाँ से डरकर भाग गया, जिससे उसकी कायरता स्पष्ट होती है। इसलिए यह वाक्य शंकर की नैतिक कमजोरी, साहस की कमी और चारित्रिक दुर्बलता को उजागर करता है।
4. “जी हाँ, मैं कॉलेज में पढ़ी हूँ मैंने बी.ए. पास किया है” उमा की दृष्टि में शिक्षा प्राप्त करने का सही अर्थ है?
(क) बड़ी-बड़ी डिग्री प्राप्त करना
(ख) कॉलेज में पढ़ना और नौकरी पाना
(ग) माता-पिता और पति को प्रसन्न रखना
(घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
उत्तर:
(घ) आत्मबल और स्वतंत्र विचार रखना
स्पष्टीकरण: उमा के कथन से स्पष्ट है कि वह शिक्षा को केवल डिग्री हासिल करने या दिखावे के रूप में नहीं देखती। उसके लिए शिक्षा का सही अर्थ है सोचने-समझने की क्षमता, आत्म-सम्मान और अपने अधिकारों के लिए खड़े होने का साहस। जब वह समाज की गलत परंपराओं का विरोध करती है और निडर होकर अपनी बात रखती है, तो यह उसके स्वतंत्र विचार और आत्मबल को दर्शाता है।
इसलिए उमा की दृष्टि में शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य व्यक्ति को मजबूत, जागरूक और आत्मनिर्भर बनाना है, न कि केवल डिग्री प्राप्त करना।
5. गोपालप्रसाद और रामस्वरूप में क्या-क्या समानताएँ हैं?
(क) दोनों प्रगतिशील हैं और रूढ़ियों को नकारते हैं।
(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
(ग) दोनों शिक्षा और रूढ़ियों के समर्थक हैं।
(घ) दोनों संगीत और स्वादिष्ट भोजन के प्रेमी हैं।
उत्तर:
(ख) दोनों दिखावे और परंपरा के शिकार हैं।
स्पष्टीकरण: गोपालप्रसाद और रामस्वरूप दोनों ही समाज की पुरानी, रूढ़िवादी मान्यताओं से प्रभावित हैं। गोपालप्रसाद लड़की को केवल उसकी सुंदरता और कम पढ़ाई के आधार पर परखते हैं, जबकि रामस्वरूप भी सच छिपाकर अपनी बेटी को “दिखाने” की कोशिश करते हैं। दोनों ही विवाह को एक लेन-देन या दिखावे की प्रक्रिया बना देते हैं, जहाँ लड़की की भावनाओं और व्यक्तित्व की अनदेखी होती है।
इसलिए स्पष्ट है कि दोनों पात्र दिखावे और परंपरागत सोच के दबाव में काम करते हैं, न कि सच्चे प्रगतिशील विचारों के आधार पर।
6. इस एकांकी की संवाद शैली मुख्यतः कैसी है?
(क) औपचारिक और शुष्क
(ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
(ग) काव्यात्मक और प्रश्नात्मक
(घ) भावुक और संक्षिप्त
उत्तर:
(ख) स्वाभाविक और व्यंग्यपूर्ण
स्पष्टीकरण: इस एकांकी के संवाद बिल्कुल सामान्य बोलचाल की भाषा में हैं, जिससे पात्र और परिस्थितियाँ वास्तविक लगती हैं। साथ ही, कई जगहों पर लेखक ने व्यंग्य का प्रयोग किया है—जैसे गोपालप्रसाद की बातों में, या उमा के तीखे जवाबों में—जो समाज की गलत सोच पर चोट करते हैं।
इसलिए इसकी संवाद शैली स्वाभाविक भी है और व्यंग्य से भरपूर भी, जो इस नाटक को प्रभावशाली बनाती है।
पेज 114 के प्रश्न उत्तर
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –
1. बाबू रामस्वरूप समाज में आधुनिक व्यवहार का दिखावा करते हैं, जबकि उनके विचार रूढ़िवादी हैं। इस अंतर्द्वंद्व के उदाहरण एकांकी में से खोजकर लिखिए।
(संकेत– उमा के साथ उनका व्यवहार, विवाह के लिए दिखावे करना किंतु इन प्रयासों को छिपाने की चेष्टा करना आदि।)
उत्तर:
बाबू रामस्वरूप का चरित्र बाहरी रूप से आधुनिक दिखता है, लेकिन उनके भीतर गहरी रूढ़िवादी सोच छिपी हुई है। वे एक ओर अपनी बेटी उमा को पढ़ाते-लिखाते हैं, जो आधुनिकता का संकेत है, पर दूसरी ओर विवाह के समय उसकी पढ़ाई छिपाते हैं क्योंकि लड़के वालों को ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। यह उनके अंतर्द्वंद्व को स्पष्ट करता है।
वे दिखावे के लिए घर सजाते हैं, नाश्ते की व्यवस्था करते हैं और उमा को गाना गाने व सजी-धजी होकर आने को कहते हैं, ताकि अच्छा प्रभाव पड़े। लेकिन भीतर से वे भी उसी समाज की सोच को मानते हैं, जहाँ लड़की को परखा जाता है। इस प्रकार रामस्वरूप का व्यवहार दिखावटी आधुनिकता और वास्तविक रूढ़िवादिता के बीच के संघर्ष को दर्शाता है।
2. ‘रीढ़ की हड्डी’ के संदर्भ में दो अलग-अलग पात्रों के लिए भिन्न-भिन्न अर्थों में आया है, उनकी पहचान कीजिए और लिखिए।
उत्तर:
एकांकी ‘रीढ़ की हड्डी’ में यह प्रतीक दो पात्रों के लिए अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त हुआ है—उमा और शंकर।
उमा के संदर्भ में “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ है आत्म-सम्मान, साहस और नैतिक दृढ़ता। वह समाज की गलत परंपराओं के सामने झुकती नहीं, बल्कि निडर होकर उनका विरोध करती है। उसके भीतर अपनी गरिमा की रक्षा करने की शक्ति है, जो उसकी सशक्त व्यक्तित्व को दर्शाती है।
दूसरी ओर, शंकर के लिए “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ उसकी कमी को दर्शाता है। वह अपने पिता की गलत बातों का विरोध नहीं करता और स्वयं भी कायरता दिखाता है।
इस प्रकार, उमा में जहाँ “रीढ़” मौजूद है, वहीं शंकर में उसकी कमी दिखाई गई है।
3. “मेरी समझ में तो ये पढ़ाई-लिखाई के जंजाल आते नहीं।” प्रेमा की इस सोच से उस समय की स्त्री-शिक्षा की स्थिति के विषय में क्या पता चलता है?
उत्तर:
प्रेमा के इस कथन से उस समय की स्त्री-शिक्षा की सीमित और उपेक्षित स्थिति स्पष्ट होती है। वह पढ़ाई-लिखाई को “जंजाल” मानती है, जिससे पता चलता है कि उस दौर में कई लोग, विशेषकर महिलाएँ, शिक्षा के महत्व को ठीक से नहीं समझती थीं। समाज में यह धारणा प्रचलित थी कि लड़कियों को अधिक पढ़ाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनका मुख्य कार्य घर-गृहस्थी संभालना माना जाता था।
प्रेमा स्वयं कम पढ़ी-लिखी है, इसलिए वह पुरानी सोच को ही सही मानती है और उमा की उच्च शिक्षा को अनावश्यक समझती है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उस समय स्त्रियाँ शिक्षा से वंचित थीं और उनकी सोच भी उसी अनुसार सीमित रह गई थी।
4. लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी’ शब्द को एकांकी के शीर्षक के रूप में क्यों चुना होगा? यदि आप इस एकांकी का दूसरा शीर्षक रखना चाहें, जो इसकी मुख्य बात को दर्शाए, तो वह क्या होगा और क्यों?
उत्तर:
लेखक ने ‘रीढ़ की हड्डी’* शीर्षक इसलिए चुना है क्योंकि यह पूरे एकांकी की मुख्य भावना को दर्शाता है। यहाँ “रीढ़ की हड्डी” का अर्थ केवल शरीर का अंग नहीं, बल्कि साहस, आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता है। उमा समाज की गलत परंपराओं के सामने डटकर खड़ी होती है, जबकि शंकर में यह दृढ़ता नहीं है। इसलिए यह शीर्षक दोनों पात्रों के स्वभाव का अंतर स्पष्ट करता है।
यदि दूसरा शीर्षक रखना हो, तो वह “आत्म-सम्मान की आवाज़” हो सकता है। यह शीर्षक इसलिए उपयुक्त है क्योंकि पूरी कहानी में उमा अपने आत्म-सम्मान के लिए आवाज उठाती है और समाज की गलत सोच का विरोध करती है। यही इस एकांकी का मुख्य संदेश है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 6 लेखक परिचय
लेखक परिचय – जगदीशचंद्र माथुर
| नाम: | जगदीशचंद्र माथुर |
| जन्म: | सन् 1917 |
| स्थान: | शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश |
| निधन: | सन् 1978 |
| शिक्षा: | इलाहाबाद विश्वविद्यालय से |
प्रशासनिक कार्य: इंडियन सिविल सर्विस में चयनित। बिहार राज्य के शिक्षा सचिव, आकाशवाणी के महानिदेशक और सूचना व प्रसारण मंत्रालय के संयुक्त सचिव के पद पर कार्य किया। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच आजीवन साहित्य-सृजन में सक्रिय रहे।
साहित्यिक यात्रा: प्रयाग में अध्ययन के दौरान ही लेखन आरंभ कर दिया था। उस समय की चर्चित पत्रिकाओं “चाँद” और “रूपाभ” में उनके नाटक-एकांकी छपने लगे थे। हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास में उनके एकांकी व नाटकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
प्रमुख रचनाएँ: भोर का तारा, कोणार्क, ओ मेरे सपने, शारदीया, पहला राजा, दस तस्वीरें, जिन्होंने जीना जाना। इनकी संपूर्ण रचनाएँ “जगदीशचंद्र माथुर रचनावली” (चार खंड) में संकलित हैं। “कोणार्क” उनका सर्वाधिक चर्चित और मंचित नाटक है।
साहित्यिक विशेषता: ऐतिहासिक नाटकों के साथ-साथ सामाजिक समस्याओं से जुड़े एकांकी-नाटक भी लिखे। उनकी भाषा सहज, व्यंग्यपूर्ण और बोलचाल के अत्यंत निकट है।
पात्र परिचय
- उमा – एकांकी की सबसे सशक्त और केंद्रीय पात्र। बी.ए. पास, पढ़ी-लिखी, आत्मसम्मानी युवती। वह स्त्री-शिक्षा और नारी के अधिकारों का प्रतिनिधित्व करती है।
- रामस्वरूप (बाबू) – उमा के पिता। समाज में आधुनिक दिखने का दिखावा करते हैं लेकिन भीतर से रूढ़िवादी हैं। बेटी की शिक्षा छिपाकर विवाह तय कराने की कोशिश करते हैं।
- प्रेमा – उमा की माँ। परंपरावादी सोच वाली महिला जो स्त्री-शिक्षा को जंजाल मानती है और बेटी की बजाय घरेलू कामों को प्राथमिकता देती है।
- गोपालप्रसाद – लड़के का पिता। वकील हैं, पढ़े-लिखे हैं लेकिन स्त्री-शिक्षा के कट्टर विरोधी हैं। चालाक, अनुभवी और पाखंडी व्यक्तित्व के धनी।
- शंकर – गोपालप्रसाद का बेटा। मेडिकल कॉलेज में पढ़ता है। झुकी कमर, पतली आवाज और खिसियाहट उसकी खासियत है। चरित्र से कमजोर व्यक्ति।
- रतन – रामस्वरूप का घरेलू सहायक। हास्यपूर्ण पात्र। एकांकी के अंत में “मक्खन” लेकर आता है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 6 का चरण-दर-चरण संक्षिप्त सारांश
पाठ का सारांश
- पहला भाग – तैयारी का प्रसंग:
रामस्वरूप अपने घर में कमरे को सजाने में व्यस्त हैं। आज गोपालप्रसाद और उनका बेटा शंकर लड़की देखने आने वाले हैं। प्रेमा से नोक-झोंक होती है। रामस्वरूप चिंतित हैं कि उमा मुँह फुलाए बैठी है और पाउडर लगाने से मना कर रही है। वे प्रेमा को समझाते हैं कि गोपालप्रसाद दकियानूसी विचारों के हैं और कम पढ़ी-लिखी लड़की चाहते हैं। इसलिए उमा की बी.ए. की डिग्री को छिपाकर केवल मैट्रिक बताने की योजना बनाई गई है। - दूसरा भाग – गोपालप्रसाद और रामस्वरूप की बातचीत:
गोपालप्रसाद और शंकर आते हैं। गोपालप्रसाद की आँखों से लोक-चतुराई टपकती है और शंकर खीस निपोरने वाला नवयुवक है जिसकी कमर झुकी हुई है। चाय-नाश्ते के बीच दोनों बुजुर्गों की पुराने जमाने की बातें होती हैं। फिर गोपालप्रसाद साफ कहते हैं कि उन्हें ज्यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए – अधिकतम मैट्रिक पास। वे कहते हैं – “मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं।” रामस्वरूप हाँ-में-हाँ मिलाते रहते हैं। - तीसरा भाग – उमा का आगमन:
उमा पान की तश्तरी लेकर आती है। सादे कपड़े, गर्दन झुकी हुई। जब वह पान देती है तो चेहरा ऊपर उठता है और नाक पर सोने की रिम वाला चश्मा दिखता है। बाप-बेटे चौंककर एक साथ बोल पड़ते हैं – “चश्मा!” रामस्वरूप सकपकाते हुए कहते हैं कि आँखें दुखने के कारण थोड़े दिनों के लिए चश्मा है। - चौथा भाग – लड़की की परीक्षा:
उमा से गाने को कहा जाता है। वह मीरा का प्रसिद्ध भजन “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” गाती है। गाते-गाते उसकी तल्लीनता इतनी बढ़ जाती है कि मस्तक उठ जाता है और उसकी आँखें शंकर की झेंपती आँखों से मिल जाती हैं – वह एकदम रुक जाती है। फिर गोपालप्रसाद पेंटिंग और सिलाई के बारे में पूछते हैं। रामस्वरूप बताते हैं कि घर की सारी सिलाई उमा के जिम्मे है। जब इनाम के बारे में पूछा जाता है तो उमा चुप रहती है। - पाँचवाँ भाग – उमा का विद्रोह:
गोपालप्रसाद के बार-बार पूछने पर उमा हल्की लेकिन मजबूत आवाज में बोलती है – “क्या जवाब दूँ, बाबूजी! जब कुर्सी-मेज बिकती है तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है।” फिर वह पूछती है – “क्या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्या उन्हें चोट नहीं लगती? क्या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं जिन्हें कसाई देख-भालकर खरीदते हैं?” गोपालप्रसाद भड़कते हैं। तब उमा तेज आवाज में कहती है कि फरवरी में शंकर लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द क्यों घूम रहे थे और वहाँ से कैसे भगाए गए थे। यह सुनकर शंकर “बाबूजी, चलिए” कह देता है। गोपालप्रसाद क्रोध में उठकर जाने लगते हैं। तब उमा का अंतिम प्रहार – “जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए! लेकिन घर जाकर जरा यह पता लगाइएगा कि आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं – यानी बैकबोन, बैकबोन!” दोनों बाहर चले जाते हैं। उमा की खामोशी सिसकियों में बदल जाती है। अंत में रतन मक्खन लेकर आता है और परदा गिरता है।
एकांकी विधा की विशेषताएँ
गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के छठे अध्याय में एकांकी विधा के सभी प्रमुख तत्व उपस्थित हैं –
- एकांकी का नाम: रीढ़ की हड्डी
- लेखक का नाम: जगदीशचंद्र माथुर
- पात्र: एकांकी में कुल छह पात्र हैं – उमा, रामस्वरूप, प्रेमा, शंकर, गोपालप्रसाद और रतन।
- परिवेश/देश-काल: सन् 1939 का भारतीय मध्यवर्गीय समाज जहाँ स्त्री-शिक्षा और विवाह की रूढ़िवादी व्यवस्था का बोलबाला था।
- रंग-निर्देश/मंच-निर्देश: एकांकी की शुरुआत में “मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा” जैसे निर्देश हैं जो मंच-सज्जा और वातावरण का बोध कराते हैं। पात्रों के हाव-भाव जैसे “खीस निपोरते हैं”, “सकपकाकर”, “ताव में आकर” आदि रंग-निर्देश हैं।
- संवाद-निर्देश: पात्रों की मनःस्थिति बताने वाले निर्देश जैसे “(जरा तेज आवाज में)”, “(दबी आवाज में)”, “(हल्की लेकिन मजबूत आवाज में)” आदि।
- समस्या: स्त्री-शिक्षा का विरोध, विवाह में लेन-देन और लड़कियों की गरिमा का हनन।
- मुख्य विचार: शिक्षित स्त्री आत्मसम्मान की हकदार है और विवाह में लड़की को वस्तु की तरह नहीं देखा जाना चाहिए।
- व्यंग्यपूर्ण संवाद: पूरी एकांकी में तीखा व्यंग्य है। गोपालप्रसाद का “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” जैसा संवाद और रामस्वरूप का “हँ-हँ-हँ” दोनों व्यंग्य के शिखर हैं।
- समाधान/परिणाम: उमा का विद्रोह एकांकी का परिणाम है। वह चुपचाप बैठी लड़की नहीं बल्कि अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाली सशक्त महिला है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 – कठिन शब्दों के अर्थ
कठिन शब्द और उनके अर्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अधेड़ | आधी उम्र का, ढलती उम्र का |
| तख्त | लकड़ी की बड़ी चौकी, सिंहासन |
| गंदुमी | गेहुँए रंग का |
| जंजाल | झंझट, झमेला, संसार का बखेड़ा |
| दकियानूसी | पुराने विचार का, रूढ़िवादी |
| खीस निपोरना | दाँत दिखाकर बेढंगी हँसी हँसना |
| खासियत | विशेषता, गुण, स्वभाव |
| तकल्लुफ़ | बनावट, शिष्टाचार |
| मुखातिब | संबोधन करने वाला |
| निहायत | अत्यधिक, बहुत ज्यादा |
| बालाई | मलाई, ऊपर का हिस्सा |
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 मुहावरे, उनका अर्थ तथा वाक्य-प्रयोग
व्याकरण – मुहावरे और कहावत
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 में मुहावरों और कहावत का बहुत सजीव और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है। परीक्षा में इन पर प्रश्न अवश्य आते हैं।
पाठ में आए प्रमुख मुहावरे
- भीगी बिल्ली की तरह:
अर्थ – डरा हुआ, सहमा हुआ, बिना आवाज के।
पाठ में प्रयोग – “उनके पीछे-पीछे भीगी बिल्ली की तरह रतन आ रहा है – खाली हाथ।”
वाक्य प्रयोग – परीक्षा हॉल में घुसते ही वह भीगी बिल्ली की तरह चुपचाप बैठ गया। - मुँह फुलाना:
अर्थ – नाराज होना, रूठ जाना।
पाठ में प्रयोग – “लेकिन वह तुम्हारी लाडली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।”
वाक्य प्रयोग – छोटी बात पर मुँह फुलाना समझदारी नहीं है। - किस मर्ज की दवा होना:
अर्थ – किसी काम का न होना, बेकार होना।
पाठ में प्रयोग – “और तुम उसकी माँ, किस मर्ज की दवा हो?”
वाक्य प्रयोग – जो दोस्त मुश्किल में साथ न दे, वह किस मर्ज की दवा है। - सिर चढ़ाना:
अर्थ – बहुत लाड़-प्यार देकर शेखी करने देना, स्वच्छंद कर देना।
पाठ में प्रयोग – “तुम्हीं ने उसे पढ़ा-लिखाकर इतना सिर चढ़ा रखा है।”
वाक्य प्रयोग – बच्चों को जरूरत से ज्यादा सिर चढ़ाने से वे जिद्दी हो जाते हैं। - सब-कुछ उगलना:
अर्थ – सारी बातें बता देना, राज खोल देना।
पाठ में प्रयोग – “मगर तुम तो अभी से सब-कुछ उगले देती हो।”
वाक्य प्रयोग – पूछताछ में उसने सारी बातें उगल दीं। - काँटों में घसीटना:
अर्थ – किसी को मुश्किल में डालना, परेशानी में फँसाना।
पाठ में प्रयोग – “यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे।”
वाक्य प्रयोग – उसकी बातों ने मुझे बेकार में काँटों में घसीट दिया। - इज्जत उतारना:
अर्थ – अपमान करना, बेइज्जती करना।
पाठ में प्रयोग – “बाबू रामस्वरूप, आपने मेरी इज्जत उतारने के लिए मुझे यहाँ बुलाया था?”
वाक्य प्रयोग – सबके सामने इज्जत उतारना किसी को भी पसंद नहीं। - मुँह छिपाकर भागना:
अर्थ – शर्म से भाग जाना, पकड़े जाने पर छिप जाना।
पाठ में प्रयोग – “इनसे पूछिए कि ये किस तरह अपना मुँह छिपाकर भागे थे।”
वाक्य प्रयोग – गलती करने के बाद मुँह छिपाकर भागने की बजाय माफी माँगना बेहतर है। - खीस निपोरना:
अर्थ – दाँत दिखाकर बेढंगी हँसी हँसना, चापलूसी से हँसना।
पाठ में प्रयोग – “(शंकर और रामस्वरूप खीस निपोरते हैं।)”
वाक्य प्रयोग – बिना मतलब खीस निपोरते रहना उसकी आदत बन गई थी।
पाठ में आई कहावत
बाप सेर है तो लड़का सवा सेर
अर्थ – जब पिता ही किसी बुराई या विशेषता में बड़ा हो तो पुत्र उससे भी बड़ा होता है।
पाठ में प्रयोग – रामस्वरूप ने यह कहावत गोपालप्रसाद और शंकर की नकारात्मक प्रवृत्ति के संदर्भ में नकारात्मक अर्थ में प्रयोग की। गोपालप्रसाद दकियानूसी हैं और शंकर उनसे भी बढ़कर कायर और चरित्रहीन है।
सकारात्मक प्रयोग – यह कहावत सकारात्मक अर्थ में भी प्रयोग होती है। जैसे – “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर” – रमेश के पिता अच्छे खिलाड़ी थे और रमेश ने राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीता।
अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “रीढ़ की हड्डी” एकांकी के लेखक कौन हैं और इसकी रचना कब हुई?
उत्तर:
“रीढ़ की हड्डी” एकांकी के लेखक जगदीशचंद्र माथुर हैं। इसकी रचना सन् 1939 में की गई थी। - एकांकी में रामस्वरूप ने उमा की शिक्षा के बारे में क्या झूठ बोला?
उत्तर:
रामस्वरूप ने गोपालप्रसाद को बताया कि उमा केवल मैट्रिक तक पढ़ी है, जबकि वास्तव में उमा बी.ए. पास थी। - गोपालप्रसाद किस व्यवसाय से जुड़े थे?
उत्तर:
गोपालप्रसाद वकील थे। वे पढ़े-लिखे थे और सभा-सोसाइटियों में भी जाते थे, फिर भी स्त्री-शिक्षा के विरोधी थे। - शंकर की शारीरिक विशेषताएँ क्या थीं?
उत्तर:
शंकर की आवाज पतली और खिसियाहट-भरी थी। झुकी हुई कमर उसकी खासियत थी जो उसकी चारित्रिक कमजोरी की प्रतीक थी। - उमा का चश्मा देखकर बाप-बेटे ने क्या प्रतिक्रिया दी?
उत्तर:
सोने की रिम वाला चश्मा देखकर गोपालप्रसाद और शंकर एक साथ चौंककर “चश्मा!!!” बोल पड़े, क्योंकि चश्मा पढ़ाई का संकेत था। - उमा ने कौन-सा गीत गाया?
उत्तर:
उमा ने मीरा का प्रसिद्ध भजन “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई” सितार के साथ गाया। - “रीढ़ की हड्डी” शीर्षक का प्रतीकात्मक अर्थ क्या है?
उत्तर:
“रीढ़ की हड्डी” आत्म-सम्मान और नैतिक दृढ़ता का प्रतीक है। उमा में यह है जबकि शंकर में नहीं। - गोपालप्रसाद ने स्त्री-शिक्षा के विरोध में कौन-सा तर्क दिया?
उत्तर:
गोपालप्रसाद ने कहा कि “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।” यानी उच्च शिक्षा केवल पुरुषों के लिए है। - प्रेमा स्त्री-शिक्षा के बारे में क्या सोचती थीं?
उत्तर:
प्रेमा का मानना था कि पढ़ाई-लिखाई जंजाल है। वे कहती हैं कि “आ-ई” पढ़ लो, गिनती सीख लो और बहुत हुआ तो “स्त्री-सुबोधिनी” पढ़ लो – यही काफी है। - शंकर के बारे में उमा ने क्या रहस्योद्घाटन किया?
उत्तर:
उमा ने बताया कि पिछली फरवरी में शंकर लड़कियों के हॉस्टल के इर्द-गिर्द घूम रहे थे और वहाँ से भगाए गए थे। - एकांकी में रतन की क्या भूमिका है?
उत्तर:
रतन हास्यपूर्ण पात्र है जो घरेलू सहायक है। उसकी भूल-भटकन और अंत में “बाबूजी, मक्खन!” कहना व्यंग्य को गहरा करता है। - उमा ने कुर्सी-मेज वाला उदाहरण किस संदर्भ में दिया?
उत्तर:
जब उमा से बार-बार जवाब माँगा गया तो उसने कहा कि जब कुर्सी-मेज बिकती है तो दुकानदार उनसे नहीं पूछता, खरीदार को दिखाता है। इसी तरह लड़कियों को भी वस्तु की तरह परखा जाता है। - एकांकी में “बैकबोन” शब्द का क्या महत्व है?
उत्तर:
“बैकबोन” यानी रीढ़ की हड्डी का अर्थ है नैतिक साहस और दृढ़ता। उमा ने शंकर को यह ताना मारा कि उसमें बैकबोन है ही नहीं। - रामस्वरूप का “हँ-हँ-हँ” क्या दर्शाता है?
उत्तर:
रामस्वरूप का “हँ-हँ-हँ” उनकी चापलूसी, कायरता और दोहरे चरित्र का प्रतीक है। वे भीतर से सहमत नहीं हैं लेकिन बाहर से हाँ-में-हाँ मिलाते रहते हैं। - एकांकी का अंत किस प्रकार होता है?
उत्तर:
गोपालप्रसाद और शंकर क्रोध में चले जाते हैं, उमा सिसकती है, रामस्वरूप कुर्सी पर धम से बैठते हैं और तभी रतन मक्खन लेकर आता है – इस व्यंग्यपूर्ण दृश्य पर परदा गिरता है।
लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- रामस्वरूप के चरित्र में कौन-सा अंतर्द्वंद्व दिखाई देता है?
उत्तर:
रामस्वरूप बाहर से आधुनिक और उदार दिखते हैं लेकिन भीतर से रूढ़िवादी हैं। एक तरफ उन्होंने उमा को बी.ए. तक पढ़ाया, दूसरी तरफ उसकी शिक्षा को छिपाकर विवाह तय कराने की कोशिश की। वे गोपालप्रसाद के पाखंड को जानते हुए भी “हँ-हँ-हँ” करते रहे जो उनकी कायरता को दर्शाता है। - गोपालप्रसाद के चरित्र की विशेषताएँ क्या हैं?
उत्तर:
गोपालप्रसाद पढ़े-लिखे वकील हैं, सभा-सोसाइटियों में जाते हैं, लेकिन स त्री-शिक्षा के कट्टर विरोधी हैं। उनकी आँखों से लोक-चतुराई टपकती है। वे अनुभवी और फितरती हैं। “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” जैसे तर्क से वे अपनी रूढ़िवादी सोच को सही साबित करना चाहते हैं। - उमा की शिक्षा उसके व्यक्तित्व में किस प्रकार झलकती है?
उत्तर:
उमा पढ़ी-लिखी होने के कारण स्वाभिमानी, साहसी और स्पष्टवादी है। वह चुपचाप बैठकर परखी जाने वाली लड़की नहीं है। जब उसकी गरिमा पर आघात होता है तो वह मजबूत आवाज में अपना विरोध जताती है। शंकर की हरकत उजागर करना उसकी शिक्षा से मिले आत्मबल का परिणाम है। - प्रेमा का पात्र किस सामाजिक वास्तविकता को दर्शाता है?
उत्तर:
प्रेमा उस काल की उन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती हैं जो स्वयं भी स्त्री-शिक्षा को जंजाल मानती थीं। वे “स्त्री-सुबोधिनी” को बी.ए. से बेहतर मानती हैं। यह दर्शाता है कि रूढ़िवादी सोच की सबसे बड़ी ताकत यह होती है कि स्त्री स्वयं ही उसे आगे बढ़ाती है। - “रीढ़ की हड्डी” एकांकी का शीर्षक दो अलग-अलग संदर्भों में कैसे प्रयुक्त हुआ?
उत्तर:
पहला संदर्भ – गोपालप्रसाद अपने बेटे शंकर को कहते हैं कि “कमर सीधी करके बैठो, तुम्हारे दोस्त कहते हैं कि शंकर की बैकबोन…” – यह शारीरिक अर्थ में है। दूसरा संदर्भ – उमा जाते हुए गोपालप्रसाद को कहती है – “आपके लाडले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं” – यह नैतिक दृढ़ता के अर्थ में है। - एकांकी के अंत में रतन का “मक्खन” लेकर आना क्या व्यंग्य करता है?
उत्तर:
एकांकी के पूरे नाटक में मक्खन का न आना एक छोटी-सी घरेलू परेशानी थी। जब सारा नाटक खत्म हो जाता है, उमा रो रही है, गोपालप्रसाद चले गए हैं, तब रतन मक्खन लेकर प्रकट होता है। यह व्यंग्य करता है कि जो महत्वपूर्ण रिश्तों का सवाल था, वह तो हल नहीं हुआ – पर “मक्खन” जरूर आ गया। - कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 में “भीगी बिल्ली” उपमा का क्या प्रभाव है?
उत्तर:
एकांकी के प्रारंभ में रतन को “भीगी बिल्ली की तरह” खाली हाथ आते दिखाया गया है जो हास्य उत्पन्न करता है। यह उपमा रतन की डरी-सहमी और चुप्पी भरी स्थिति को एकदम सटीक रूप में व्यक्त करती है। इस प्रकार के सजीव मुहावरे कक्षा 9 गंगा पाठ 6 की भाषा को अत्यंत प्रभावशाली बनाते हैं। - “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” – इस कथन की आलोचना कीजिए।
उत्तर:
गोपालप्रसाद का यह तर्क अत्यंत तर्कहीन और पाखंडपूर्ण है। प्रकृति में नर-मादा के अलग-अलग गुण होना एक जैविक तथ्य है, लेकिन इससे मनुष्य की शिक्षा को जोड़ना सर्वथा अनुचित है। शिक्षा किसी एक लिंग की संपत्ति नहीं है। यह तर्क केवल स्त्री-शिक्षा के विरोध को सही ठहराने का पाखंड है। - उमा द्वारा शंकर की हरकत उजागर करना नैतिक दृष्टि से कैसे उचित था?
उत्तर:
जब शंकर के पिता कम पढ़ी-लिखी लड़की माँगकर उमा की गरिमा का हनन कर रहे थे और शंकर चुपचाप बैठा था, तब उमा ने शंकर की असली करतूत उजागर की। यह उसका अधिकार था क्योंकि जब कोई दूसरे के चरित्र पर सवाल उठाए तो अपना पक्ष रखना नैतिक रूप से उचित है। - गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी पाठ 6 में व्यंग्य की भाषा किस प्रकार प्रभावशाली है?
उत्तर:
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 में व्यंग्य कई स्तरों पर है। रामस्वरूप का “हँ-हँ-हँ” उनकी चापलूसी पर व्यंग्य है। गोपालप्रसाद का “खूबसूरती पर टैक्स” वाला विनोद स्त्री को वस्तु मानने की मानसिकता पर व्यंग्य है। “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर” नकारात्मक अर्थ में प्रयोग व्यंग्यपूर्ण है। और अंत में रतन का मक्खन लाना – यह परिस्थितिजन्य व्यंग्य है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “रीढ़ की हड्डी” एकांकी के आधार पर उमा के चरित्र की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
उमा कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 की केंद्रीय और सबसे सशक्त पात्र है। उसके चरित्र में अनेक विशेषताएँ हैं। पहली – वह शिक्षित और आत्मनिर्भर है। बी.ए. पास उमा को अपनी शिक्षा पर गर्व है और वह उसे छिपाने को तैयार नहीं। दूसरी – वह आत्मसम्मानी है। पाउडर लगाने से मना करना और मुँह फुलाकर बैठना उसकी स्वाभिमान की अभिव्यक्ति है। तीसरी – वह साहसी और स्पष्टवादी है। गोपालप्रसाद जैसे प्रभावशाली व्यक्ति के सामने बिना झिझक कुर्सी-मेज का उदाहरण देकर अपनी बात रखना उसके साहस का प्रमाण है। चौथी – वह संवेदनशील है। शंकर की आँखें मिलने पर गाना रोक देना और अंत में सिसकना उसकी संवेदनशीलता दर्शाता है। पाँचवीं – उसमें न्याय-बोध है। जब शंकर के पिता उसे परख रहे थे तो उसने शंकर की हरकत उजागर कर न्याय स्थापित किया। उमा 1939 की उस भारतीय नारी का प्रतिनिधित्व करती है जो अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने की हिम्मत रखती थी। - कक्षा 9 हिंदी गंगा के छठे अध्याय में व्यंग्य की विभिन्न परतों का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी पाठ 6 “रीढ़ की हड्डी” में व्यंग्य बहुस्तरीय और प्रभावशाली है। पहला स्तर है पात्रों के माध्यम से व्यंग्य। रामस्वरूप का लगातार “हँ-हँ-हँ” करना उनकी चापलूसी और दोहरे चरित्र पर तीखा व्यंग्य है। गोपालप्रसाद खुद पढ़े-लिखे हैं लेकिन बहू अनपढ़ चाहते हैं – यह पाखंड पर व्यंग्य है। दूसरा स्तर है संवाद में व्यंग्य। “मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं” जैसा तर्क रूढ़िवादी सोच पर व्यंग्य है। “खूबसूरती पर टैक्स” स्त्री को वस्तु मानने पर व्यंग्य है। तीसरा स्तर है परिस्थिति का व्यंग्य। गंभीर संकट के बाद रतन का “बाबूजी, मक्खन!” लेकर आना हास्य-व्यंग्य का चरम है। चौथा स्तर है शीर्षक का व्यंग्य। “रीढ़ की हड्डी” वह चीज है जो शंकर में होनी चाहिए थी – पर नहीं है। यह पूरे पाठ का केंद्रीय व्यंग्य है। - “रीढ़ की हड्डी” एकांकी में स्त्री-शिक्षा को लेकर किन-किन दृष्टिकोणों का चित्रण हुआ है? कक्षा 9 गंगा पाठ 6 के आधार पर लिखिए।
उत्तर:
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 में स्त्री-शिक्षा को लेकर तीन अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते हैं। पहला दृष्टिकोण है गोपालप्रसाद का – वे स्त्री-शिक्षा के कट्टर विरोधी हैं। उनके अनुसार ऊँची तालीम केवल पुरुषों के लिए है। अधिक पढ़ी-लिखी स्त्री गृहस्थी बिगाड़ती है। दूसरा दृष्टिकोण है प्रेमा का – वे भी स्त्री-शिक्षा को जंजाल मानती हैं। उनके अनुसार “स्त्री-सुबोधिनी” पढ़ना ही पर्याप्त है। यह दर्शाता है कि कभी-कभी स्त्री स्वयं ही अपनी प्रगति में बाधक बनती है। तीसरा दृष्टिकोण है रामस्वरूप का – यह सबसे विरोधाभासी है। उन्होंने उमा को बी.ए. तक पढ़ाया लेकिन विवाह के लिए उसकी शिक्षा छिपाई। चौथा और सबसे सकारात्मक दृष्टिकोण है उमा का – वह शिक्षा को आत्मबल और आत्मसम्मान का स्रोत मानती है। उसके लिए शिक्षा पाना न पाप है न अपराध। - एकांकी विधा की विशेषताएँ “रीढ़ की हड्डी” के उदाहरणों से स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 एकांकी विधा का एक श्रेष्ठ उदाहरण है। एकांकी में एक ही अंक होता है और इसमें एकता के तीन नियम होते हैं – स्थान की एकता, समय की एकता और कार्य की एकता। गंगा पुस्तक के इस पाठ में सारी घटना एक ही कमरे में और थोड़े ही समय में घटती है। एकांकी में पात्र सीमित होते हैं – यहाँ छह पात्र हैं। संवाद संक्षिप्त और तीव्र हैं जैसे “चश्मा!!!” में सारी स्थिति व्यक्त हो जाती है। रंग-निर्देश पात्रों और वातावरण की जानकारी देते हैं। समस्या – स्त्री-शिक्षा का विरोध – का आरंभ, विकास और परिणाम सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत है। एकांकी का अंत उमा के विद्रोह से होता है जो एक प्रभावशाली और अप्रत्याशित मोड़ है। - “रीढ़ की हड्डी” एकांकी के माध्यम से जगदीशचंद्र माथुर ने किन सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किया है?
उत्तर:
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 6 “रीढ़ की हड्डी” के माध्यम से जगदीशचंद्र माथुर ने सन् 1939 के भारतीय समाज की अनेक कुरीतियों पर प्रहार किया है। पहली कुरीति है स्त्री-शिक्षा का विरोध। गोपालप्रसाद जैसे शिक्षित लोगों द्वारा भी स्त्री-शिक्षा को अनावश्यक मानना उस समय की मानसिकता थी। दूसरी कुरीति है विवाह में लड़की को वस्तु की तरह परखना। लड़की की चाल-ढाल, गाना-बजाना, सिलाई-पेंटिंग जैसी परीक्षा लेना उसे मनुष्य नहीं वस्तु मानना है। तीसरी कुरीति है पाखंड। पढ़े-लिखे, सभ्य दिखने वाले लोग भी भीतर से रूढ़िवादी हैं। चौथी कुरीति है विवाह में झूठ बोलना। रामस्वरूप ने बेटी की शिक्षा छिपाई जो सामाजिक दबाव में नैतिकता की बलि है। पाँचवीं कुरीति है चरित्र-हीन लड़कों का चरित्रवान लड़की से विवाह का दावा। शंकर का हॉस्टल के इर्द-गिर्द घूमना और उमा से विवाह की बात – यह घोर विरोधाभास है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
“रीढ़ की हड्डी” किस कक्षा की किस पुस्तक में है और यह किस विधा की रचना है?
“रीढ़ की हड्डी” कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 है। यह एनसीईआरटी की नई पाठ्यपुस्तक “गंगा” में सम्मिलित है जो एनईपी 2020 के अनुसार सत्र 2026 से लागू की गई है। विधा की दृष्टि से यह एकांकी है जो नाटक का ही एक रूप है लेकिन इसमें केवल एक ही अंक होता है, पात्र सीमित होते हैं और कथानक एक ही केंद्रीय समस्या पर टिका होता है।
कक्षा 9 गंगा पाठ 6 से परीक्षा में कौन-से प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 से परीक्षा में प्रायः पूछे जाने वाले विषय हैं – “रीढ़ की हड्डी” शीर्षक का प्रतीकात्मक अर्थ, उमा के चरित्र की विशेषताएँ, गोपालप्रसाद और रामस्वरूप की समानताएँ, मुहावरों का अर्थ और वाक्य-प्रयोग, “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर” कहावत का सकारात्मक प्रयोग, एकांकी विधा की विशेषताएँ और अंत में मक्खन प्रसंग का व्यंग्यात्मक महत्व।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 6 “रीढ़ की हड्डी” बच्चों को क्या सिखाती है?
गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी का यह छठा अध्याय बच्चों को अनेक महत्वपूर्ण जीवन-मूल्य सिखाता है। लड़कियों की शिक्षा का महत्व, आत्मसम्मान बनाए रखने की हिम्मत, पाखंड और दोहरे चरित्र को पहचानने की दृष्टि, अन्याय के सामने चुप न रहना और स्त्री-पुरुष की शिक्षा में भेदभाव का विरोध – ये सभी मूल्य उमा के माध्यम से बच्चों तक पहुँचाए गए हैं। यह पाठ लड़कियों में आत्मविश्वास और लड़कों में स्त्री-सम्मान की भावना जगाता है।
कक्षा 9 गंगा पाठ 6 में मुहावरों का इतना अधिक प्रयोग क्यों है और इन्हें कैसे पढ़ाएँ?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 एकांकी विधा की रचना है और एकांकी की भाषा में संवाद-शैली प्रमुख होती है। बोलचाल की भाषा में मुहावरे स्वाभाविक रूप से आते हैं। एनसीईआरटी ने आठ मुहावरे पहचानने और नए वाक्य बनाने का अभ्यास दिया है। शिक्षक इन्हें पढ़ाते समय पहले एकांकी से उदाहरण दिखाएँ, फिर अर्थ समझाएँ, और अंत में छात्रों से रोजमर्रा के जीवन से जुड़े वाक्य बनवाएँ। गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी पाठ 6 के मुहावरों में “भीगी बिल्ली” और “सिर चढ़ाना” सबसे अधिक परीक्षोपयोगी हैं।
कक्षा 9 गंगा पाठ 6 का मूल्यांकन किन बिंदुओं पर होना चाहिए?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 का मूल्यांकन इन प्रमुख बिंदुओं पर किया जाना चाहिए – एकांकी विधा की समझ, पात्रों के चरित्र की पहचान, “रीढ़ की हड्डी” शीर्षक की सार्थकता, मुहावरों का सही अर्थ और वाक्य-प्रयोग, “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर” का सकारात्मक प्रयोग, एकांकी के सामाजिक संदेश की समझ और उमा के व्यवहार पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखने की क्षमता। गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी पाठ 6 में दी गई “रंग-निर्देश” समझ और एकांकी-मंचन पर भी अंक दिए जा सकते हैं।
बच्चे कक्षा 9 गंगा पाठ 6 को घर पर कैसे तैयार करें?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 6 तैयार करने का सबसे अच्छा तरीका है कि पहले पूरी एकांकी को एक बार ऊँची आवाज में पढ़ें, क्योंकि यह नाट्य-रचना है। फिर प्रत्येक पात्र के चरित्र की एक-एक विशेषता नोट करें। मुहावरों को उनके अर्थ और एक वाक्य के साथ याद करें। “रीढ़ की हड्डी” शीर्षक के दो अर्थ और “बाप सेर है तो लड़का सवा सेर” का सकारात्मक प्रयोग – ये दोनों महत्वपूर्ण बिंदु हैं। अंत में एकांकी विधा के दस बिंदु भी याद कर लें।
कक्षा 9 हिंदी गंगा के पाठ 4 “ऐसी भी बातें होती हैं” और पाठ 6 “रीढ़ की हड्डी” में क्या संबंध है?
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 4 और अध्याय 6 दोनों में स्त्री के सम्मान और अधिकारों का विषय उपस्थित है। पाठ 4 में लता मंगेशकर ने अपनी प्रतिभा और स्वाभिमान से अपना नाम बनाया और किसी के आगे हाथ नहीं पसारा। पाठ 6 में उमा ने अपनी शिक्षा के बल पर अन्याय का विरोध किया। दोनों पात्र यह दर्शाते हैं कि शिक्षा और आत्मसम्मान से स्त्री अपनी पहचान बना सकती है। इस प्रकार गंगा पुस्तक कक्षा 9 हिंदी के ये दो पाठ परस्पर एक-दूसरे को पूरक हैं।
