एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ?
एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 क्या लिखूँ? समाधान – प्रश्न उत्तर, कठिन शब्द-उत्तर, सारांश तथा अभ्यास के सभी प्रश्नों के हल – सत्र 2026-27 के अनुसार संशोधित रूप में यहाँ दिए गए हैं। कक्षा 9 हिंदी की पाठ्यपुस्तक गंगा का दूसरा अध्याय ‘क्या लिखूँ?’ हिंदी साहित्य के सुप्रसिद्ध निबंधकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा रचित एक रोचक और विचारोत्तेजक निबंध है। इस निबंध में लेखक ने निबंध लेखन की प्रक्रिया को अत्यंत सरल, हास्यपूर्ण और आत्मपरक शैली में प्रस्तुत किया है। ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और ‘समाज-सुधार’ — इन दो विषयों पर आदर्श निबंध लिखने की कठिनाइयों का वर्णन करते हुए लेखक ने यह भी स्पष्ट किया है कि निबंध के लिए विषय से अधिक महत्वपूर्ण लेखक के मन के भाव होते हैं।
तिवारी अकादमी पर यहाँ सत्र 2026-27 के नवीनतम पाठ्यक्रम के अनुसार इस अध्याय की संपूर्ण सामग्री — लेखक परिचय, पाठ का सारांश, केंद्रीय भाव, कठिन शब्दार्थ, साहित्यिक विशेषताएँ, व्याकरण (समास, उपसर्ग-प्रत्यय) और परीक्षोपयोगी प्रश्न — सरल एवं स्पष्ट हिंदी में प्रस्तुत किए गए हैं।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2 प्रश्न-उत्तर
गंगा पाठ 2 लेखक परिचय
हिंदी गंगा पाठ 2 का सारांश
हिंदी गंगा अध्याय 2 शब्द-अर्थ
हिंदी गंगा पाठ 2 में व्याकरण-समास
एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 समाधान
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
पेज 35 – रचना से संवाद – मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. “हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है… असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूँटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है?
(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
(ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना
(ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना
(घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना
उत्तर:
(क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना
पाठ में लेखक ने “हैट” और “खूँटी” का उदाहरण देकर एक बहुत महत्वपूर्ण बात समझाई है:
- हैट (टोपी) → लेखक के भाव, विचार, अनुभूति
- खूँटी (हुक) → विषय
लेखक कहता है कि जैसे हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी चल सकती है, वैसे ही अपने मन के भाव व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय पर्याप्त है।
मुख्य चीज़ विषय नहीं, बल्कि लेखक के अंदर के भाव हैं।
इससे स्पष्ट होता है कि:
- निबंध में असली महत्त्व लेखक की अनुभूति और भावों का होता है,
- विषय तो केवल एक माध्यम (साधन) है।
2. “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है… उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धित लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है?
(क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना
(ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना
(ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना
(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
उत्तर:
(घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना
पंक्ति — “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है… उसका उल्लास रहता है।” – स्पष्ट करती है कि मानटेन की पद्धति में:
- लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभव, भाव और अनुभूति को महत्व देता है
- लेखन स्वच्छंद होता है, किसी कठोर नियम में बंधा नहीं
- इसमें बनावटीपन नहीं, बल्कि सच्ची अभिव्यक्ति होती है
इसलिए लेखक निर्णय लेता है कि वह भी इसी तरह अनुभव-आधारित और स्वतंत्र शैली में निबंध लिखे।
3. “तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल… वृद्धों के लिए अतीत सुखद…” यह तुलना किस पर आधारित है?
(क) तर्क और भावना
(ख) ज्ञान और शिक्षा
(ग) परिश्रम और उपलब्धि
(घ) अभिलाषा और अनुभव
उत्तर:
(घ) अभिलाषा और अनुभव
पंक्ति में कहा गया है कि:
- तरुण (युवा) भविष्य को उज्ज्वल देखते हैं → क्योंकि उनके मन में आकांक्षाएँ (अभिलाषाएँ) होती हैं, वे आगे बढ़ने और कुछ नया पाने की इच्छा रखते हैं।
- वृद्ध (बुज़ुर्ग) अतीत को सुखद मानते हैं → क्योंकि उनके पास जीवन का अनुभव होता है और वे अपनी बीती हुई यादों में संतोष पाते हैं।
इसलिए यह तुलना दो बातों पर आधारित है:
- युवाओं की अभिलाषा
- वृद्धों का अनुभव
4. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?
(क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए
(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
(ग) ढोल के महत्व को दर्शाने के लिए
(घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में
उत्तर:
(ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए
निबंध में अमीर खुसरो की कहानी इसलिए दी गई है कि:
- उन्होंने एक ही पद्य में खीर, चरखा, कुत्ता और ढोल – चारों विषयों को जोड़ दिया।
- यह उनकी अद्भुत प्रतिभा और चतुराई को दर्शाता है कि वे एक साथ कई मांगों को पूरा कर सकते थे।
- लेखक भी इसी से प्रेरित होकर सोचता है कि वह दोनों निबंध विषयों को एक ही निबंध में शामिल कर दे।
इसलिए यह उदाहरण एक साथ कई विषयों को समेटने की क्षमता दिखाने के लिए दिया गया है।
5. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है?
(क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
(ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं।
(ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं।
(घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।
उत्तर:
(क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है।
निबंध में स्पष्ट कहा गया है कि:
- मानव इतिहास में कोई ऐसा समय नहीं रहा जब सुधारों की आवश्यकता न पड़ी हो।
- हर युग में नए-नए दोष उत्पन्न होते हैं, इसलिए नए सुधार भी होते रहते हैं।
- इस तरह समाज-सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।
इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि हर समय समाज को सुधार की जरूरत रहती है।
पेज 36 के प्रश्न उत्तर
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –
1. निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
उत्तर:
(क) ए. जी. गार्डिनर के विचार:
- उनके अनुसार निबंध लिखना एक विशेष मानसिक अवस्था पर निर्भर करता है।
- जब मन में उमंग, स्फूर्ति और आवेग आता है, तो लेखन अपने आप हो जाता है।
- उस समय विषय का अधिक महत्व नहीं होता, कोई भी विषय लेकर भाव व्यक्त किए जा सकते हैं।
- यानी वे स्वतःस्फूर्त लेखन को महत्व देते हैं।
(ख) लेखक के विचार:
- लेखक मानता है कि उसे ऐसी कोई विशेष मानसिक अवस्था अनुभव नहीं होती।
- उसे निबंध लिखने के लिए सोचना, योजना बनाना और मेहनत करना पड़ता है।
- वह विषय, सामग्री और शैली पर ध्यान देता है।
- यानी उसके लिए निबंध लेखन एक परिश्रमपूर्ण और योजनाबद्ध प्रक्रिया है।
मुख्य अंतर
- गार्डिनर: भावों के आवेग से स्वतः लिखना
- लेखक: सोच-समझकर, मेहनत और योजना से लिखना
निष्कर्ष: गार्डिनर भावनात्मक और सहज लेखन को महत्व देते हैं, जबकि लेखक परिश्रम और तैयारी पर आधारित लेखन को आवश्यक मानता है।
2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
उत्तर:
लेखक के अनुसार तरुण और वृद्ध दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर कारण अलग होते हैं। तरुणों की असंतुष्टि उनकी अभिलाषाओं और सपनों से जुड़ी होती है। वे भविष्य में सफलता, परिवर्तन और नए अवसर देखना चाहते हैं, इसलिए वर्तमान उन्हें अधूरा और सीमित लगता है। दूसरी ओर, वृद्धों की असंतुष्टि उनके अनुभव और स्मृतियों से उत्पन्न होती है। वे अपने अतीत को अधिक सुखद और सरल मानते हैं तथा वर्तमान की बदलती परिस्थितियों को स्वीकार करना कठिन पाते हैं। इस प्रकार तरुण भविष्य की आशाओं के कारण और वृद्ध अतीत की यादों के कारण वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं।
3. निमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
उत्तर:
निमिता चाहती है कि लेखक “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” विषय पर निबंध लिखे, जबकि अमिता का आग्रह समाज-सुधार विषय पर निबंध लिखने का है।
इन विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को कई कठिनाइयाँ आईं। पहली कठिनाई यह थी कि उसे इन विषयों के लिए पर्याप्त सामग्री और विचार तुरंत उपलब्ध नहीं थे। “दूर के ढोल सुहावने” जैसे विषय पर पाँच पृष्ठ लिखना उसे कठिन लगा और समाज-सुधार जैसा गंभीर व व्यापक विषय भी सीमित समय में लिखना चुनौतीपूर्ण था। दूसरी समस्या यह थी कि निबंध के लिए रूपरेखा बनाना और उपयुक्त शैली चुनना भी उसके लिए आसान नहीं था। इसके अलावा, उसे कम समय में दो निबंध तैयार करने का दबाव भी था। इसलिए उसने अंत में दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाहित करने का उपाय अपनाया।
4. निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
उत्तर:
(क) निबंधशास्त्र के आचार्यों के अनुसार आदर्श निबंध के लिए कुछ प्रमुख बातें आवश्यक हैं-
- निबंध संक्षिप्त (छोटा) और सारगर्भित होना चाहिए।
- उसमें दो मुख्य अंग होते हैं: सामग्री (विचार) और शैली (प्रस्तुति)।
- लिखने से पहले विषय से संबंधित पर्याप्त सामग्री और विचार एकत्र करने चाहिए।
- निबंध की पहले से रूपरेखा बना लेनी चाहिए।
- भाषा में सरलता, स्पष्टता और प्रवाह होना चाहिए तथा वाक्य छोटे और आपस में जुड़े हों।
- आवश्यकतानुसार अलंकार, मुहावरे और लोकोक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
(ख) मेरी तैयारी (किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले):
मैं निबंध लिखने से पहले सबसे पहले विषय को ध्यान से समझता हूँ। फिर उससे जुड़े मुख्य बिंदुओं की रूपरेखा बनाता हूँ। उसके बाद अपने ज्ञान, अनुभव और पढ़ी हुई सामग्री के आधार पर विचार एकत्र करता हूँ। मैं यह भी ध्यान रखता हूँ कि निबंध की शुरुआत, मध्य और अंत स्पष्ट हों। लिखते समय सरल और प्रभावशाली भाषा का प्रयोग करता हूँ तथा अंत में पूरे निबंध को पढ़कर आवश्यक सुधार करता हूँ।
5. मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?
उत्तर:
निबंध लेखन में देखने, सुनने और अनुभव करने की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जब लेखक अपने आसपास की चीज़ों को ध्यान से देखता है, लोगों की बातें सुनता है और जीवन की घटनाओं को स्वयं अनुभव करता है, तो उसके पास वास्तविक और सजीव सामग्री एकत्र हो जाती है। इससे निबंध में सच्चाई, स्वाभाविकता और प्रभाव आता है।
अनुभव के आधार पर लिखा गया निबंध अधिक विश्वसनीय और रोचक होता है, क्योंकि उसमें बनावटीपन नहीं होता। देखने और सुनने से लेखक की समझ और दृष्टि का विस्तार होता है, जिससे वह विषय को अलग-अलग पहलुओं से प्रस्तुत कर पाता है।
इस प्रकार, ये तीनों बातें निबंध को जीवंत, प्रभावशाली और पाठक के करीब बना देती हैं।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 – कठिन शब्दों के अर्थ
कक्षा 9 हिंदी पाठ्यपुस्तक गंगा अध्याय 2 के कठिन शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| स्फूर्ति | फुरती, उत्तेजना, कंपन, मन में प्रकट होना |
| आवेग | बिना सोचे-विचारे कुछ कर बैठने की अंतःप्रेरणा, उतावली |
| यथार्थता | सत्य, प्रकृत, उचित |
| उत्थित | उठा हुआ, उत्पन्न, ऊँचा, फैलाया हुआ |
| रहस्य | गुप्तभेद, गोपनीय विषय, मर्म |
| विज्ञ/विज्ञ | जानकार, समझदार, विद्वान |
| सम्मति | सहमति, स्वीकृति, अनुमति, सम्मान |
| अनुसंधान | अन्वेषण, खोज, जाँच-पड़ताल, प्रयत्न |
| विश्वकोश | वह ग्रंथ जिसमें संसार के सारे विषयों का विवरण हो |
| दुर्बोधता | जो शीघ्र समझ में न आए, गूढ़ |
| गांभीर्य | गंभीरता, गहराई, चित्त की स्थिरता, जटिलता |
| गुत्थी | उलझन, कठिनाई, गाँठ |
| अज्ञों/अज्ञ | ज्ञानरहित, नासमझ, अचेतन |
| पद्धति | प्रथा, परिपाटी, मार्ग, प्रणाली |
| पाश्चात्य | पश्चिम का, पश्चिमी, पिछला हिस्सा |
| आख्यायिका | सिलसिलेवार कहानी या वृतांत, शिक्षा देने वाली कल्पित कथा |
| उदात्त | ऊँचा, महान, श्रेष्ठ, उदार, प्रसिद्ध |
| अभिव्यक्ति | व्यक्त, प्रकट होना, प्रकाशन |
| अनुसरण | पीछे चलना, अनुकरण, अनुकूल आचरण |
| समावेश | साथ रहना, शामिल होना, मिलना, एकत्र होना |
| कोलाहल | बहुत से लोगों के एक साथ बोलने से होने वाला शोर, हंगामा |
| विषाद | अवसाद, उदासी, तंद्रा |
| कलरव | मधुर ध्वनि, कोमल |
| अंकित | लिखित, चिह्नित, चित्रित, गिना हुआ |
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2 लेखक परिचय
लेखक परिचय – पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी (कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2)
जीवन-परिचय
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| पूरा नाम | पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी |
| जन्म | सन् 1894 |
| जन्म-स्थान | खैरागढ़, राजनंदगाँव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) |
| निधन | सन् 1971 |
| भाषा | हिंदी |
| विधा | निबंध, कविता, कहानी, आलोचना |
| विशेष पहचान | कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार, हास्य-व्यंग्यकार |
साहित्यिक परिचय
पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी हिंदी साहित्य में निबंध लेखन के लिए विशेष रूप से स्मरणीय हैं। उनके साहित्यिक जीवन की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- उनके लेखन में अध्यात्म, समाज-सुधार और लोकजीवन को प्रमुखता दी गई है।
- उन्होंने अपने निबंधों में भारतीय कृषि एवं सामाजिक संबंधों का तार्किक मूल्यांकन किया है।
- उनकी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांतों का सामंजस्य देखने को मिलता है।
- उन्होंने सरस्वती और छाया जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं का संपादन भी किया।
- उनकी निबंध-शैली आत्मपरक है – जिसमें लेखक स्वयं पाठकों से सीधा संवाद करता है।
प्रमुख रचनाएँ
- निबंध संग्रह: पंच-पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने
- काव्य: अश्रुदल, शतदल
- कहानी संग्रह: झलमला, त्रिवेणी
- आलोचना: विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2 का चरण-दर-चरण संक्षिप्त सारांश
पाठ का सारांश – क्या लिखूँ?
पाठ का संक्षिप्त परिचय
यह निबंध आत्मपरक शैली में लिखा गया है। लेखक को अपनी दो छात्राओं, निमता और अमिता, के लिए दो विषयों पर आदर्श निबंध लिखने हैं। यही इस पूरे निबंध की केंद्रीय समस्या है और इसी के इर्द-गिर्द लेखक ने निबंध-लेखन की समस्त प्रक्रिया को हास्यपूर्ण ढंग से उजागर किया है।
भाग 1 – लिखने की मानसिक स्थिति और समस्या
- अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंध लेखक ए.जी. गार्डिनर का मत है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है – उस समय मन में उमंग उठती है, हृदय में स्फूर्ति आती है और विषय की चिंता नहीं रहती।
- हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह मन के भावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट – खूँटी नहीं।
- लेखक को गार्डिनर साहब के कथन में संदेह नहीं, परंतु उनकी कठिनाई यह है कि उन्होंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव नहीं किया जिसमें भाव अपने आप उठ जाते हैं।
- लेखक को सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है — तब कहीं जाकर वे एक निबंध लिख सकते हैं।
- आज उन्हें निमता के लिए ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और अमिता के लिए ‘समाज-सुधार’ विषय पर आदर्श निबंध लिखने हैं।
भाग 2 – निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति
- लेखक ने सोचा कि पहले निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति ले लें – पहले समझ लें कि आदर्श निबंध क्या है और वह कैसे लिखा जाता है।
- एक विद्वान का कथन है – निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती।
- उन्हीं आचार्य महोदय का कथन है कि निबंध के दो प्रधान अंग हैं – सामग्री और शैली।
- सामग्री के लिए – विचार-समूह संचित करना होगा, मनन करना होगा।
- शैली के लिए – भाषा में प्रवाह होना चाहिए, वाक्य छोटे-छोटे हों पर एक-दूसरे से संबद्ध।
- लेखक ने कठिनाई बताई – विद्वता का प्रदर्शन करने के लिए वाक्य आधे पृष्ठ में समाप्त होने चाहिए, जैसे बाणभट्ट ने कादंबरी में लिखे हैं।
- अस्पष्टता भी चाहिए क्योंकि यह गांभीर्य लाती है – जैसे श्रीहर्ष ने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुत्थियाँ डाली हैं जो अज्ञों से न सुलझ सकें।
- तब क्या किया जाए – अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी आवश्यक बताया जाता है।
भाग 3 – अंग्रेजी निबंधकारों की पद्धति और अमीर खुसरो की कहानी
- अंग्रेजी के निबंधकारों ने एक अलग पद्धति अपनाई है। उनके निबंध आचार्यों की कसौटी पर खरे न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान है।
- इस पद्धति के जन्मदाता मानटेन समझे जाते हैं। उन्होंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया।
- ऐसे निबंधों की विशेषता है – उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति, सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति और उसका उल्लास रहता है।
- रूपरेखा बनाने की समस्या – गार्डिनर को अपने लेखों का शीर्षक बनाने में सबसे अधिक कठिनाई होती थी। वे लेख लिखते और शीर्षक देने का भार मित्र पर छोड़ देते थे।
- शेक्सपीयर को नाटक लिखने में उतनी कठिनाई न हुई होगी, जितनी नाटकों के नामकरण में हुई होगी – इसीलिए उन्होंने एक नाटक का नाम रखा ‘जैसा तुम चाहो’।
- लेखक ने निर्णय लिया – मानटेन की पद्धति का अनुसरण करते हुए दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाविष्ट कर देंगे।
- इसके लिए उन्हें अमीर खुसरो की एक कहानी याद आई – एक कुएँ के पास चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर एक ने
- खीर पर कविता माँगी, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर। खुसरो ने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी –
खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला।
आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।
भाग 4 – ‘दूर के ढोल सुहावने’ का विश्लेषण
- दूर के ढोल सुहावने होते हैं – क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती।
- जब ढोल के पास बैठे लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।
- दूर बैठा व्यक्ति ढोल की ध्वनि के साथ किसी विवाहोत्सव का चित्र अपने हृदय में अंकित कर लेता है – किसी लज्जाशील नव-वधू की कल्पना करता है।
- सच तो यह है कि ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत – ये तीनों मिले रहते हैं।
- दूर रहने से यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता – यही कारण है कि दूर की चीजें सुंदर लगती हैं।
भाग 5 – ‘समाज-सुधार’ का विश्लेषण
- जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा मनमोहक प्रतीत होता है।
- जो वृद्ध हो गए हैं – उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है।
- तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं।
- तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक।
- इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसीलिए वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।
- मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल नहीं हुआ जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।
- भारत के इतिहास में – बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और
- महात्मा गांधी – सुधारकों की गणना यहाँ भी समाप्त नहीं होती।
- न दोषों का अंत है और न सुधारों का। जो कभी सुधार था, वही आज दोष हो गया और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।
भाग 6 – निबंध का उपसंहार
- हिंदी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माताओं को लगता है कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है।
- परंतु कुछ ही समय बाद यह साहित्य भी अतीत का स्मारक बन जाएगा।
- आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।
- उनके स्थान पर नए तरुणों का दल आ जाएगा जो भविष्य का स्वप्न देखेगा।
- दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।
कक्षा 9 गंगा पाठ 2 का केंद्रीय भाव
इस निबंध में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने दो मूल विचार प्रस्तुत किए हैं:
- निबंध-लेखन की प्रक्रिया के संबंध में:
विषय से अधिक महत्वपूर्ण लेखक के मन के भाव होते हैं। निबंध लिखने के लिए कोई एक आदर्श नियम नहीं है – सामग्री, शैली, रूपरेखा सब मिलकर निबंध बनाते हैं, परंतु इन सबसे ऊपर है लेखक की सच्ची अनुभूति। - ‘दूर के ढोल सुहावने’ के संबंध में:
दूरी से यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। इसीलिए –- तरुणों को भविष्य सुंदर लगता है
- वृद्धों को अतीत सुखद लगता है
- दोनों वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं
और इसीलिए समाज-सुधार की प्रक्रिया अनादि काल से चली आ रही है और चलती रहेगी
निबंध में उल्लिखित प्रमुख साहित्यकार एवं उनका योगदान
| साहित्यकार | देश/भाषा | योगदान / संदर्भ |
|---|---|---|
| ए.जी. गार्डिनर | इंग्लैंड | निबंध लेखन की मानसिक स्थिति का वर्णन |
| मानटेन | फ्रांस | अनुभव-आधारित स्वच्छंद निबंध-पद्धति के जन्मदाता |
| बाणभट्ट | भारत (संस्कृत) | कादंबरी में लंबे और जटिल वाक्यों के लिए प्रसिद्ध |
| श्रीहर्ष | भारत (संस्कृत) | जान-बूझकर काव्य में जटिल गुत्थियाँ डालने के लिए |
| अमीर खुसरो | भारत | एक पद्य में चार विषयों की पूर्ति करने की प्रतिभा |
| शेक्सपीयर | इंग्लैंड | नाटक के नामकरण में कठिनाई – ‘जैसा तुम चाहो’ |
| सेनापति | भारत | दुर्बोध कविता लिखने का संदर्भ |
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 2 समास, विग्रह तथा पहचान
कक्षा 9 हिंदी पाठ 2 से समास के उदाहरण
| सामासिक पद | समास विग्रह | समास का नाम |
|---|---|---|
| निबंधशास्त्र | निबंध का शास्त्र | तत्पुरुष समास |
| निबंध-रचना | निबंध की रचना | तत्पुरुष समास |
| समाज-सुधार | समाज का सुधार | तत्पुरुष समास |
| लोकजीवन | लोक का जीवन | तत्पुरुष समास |
| विवाहोत्सव | विवाह का उत्सव | तत्पुरुष समास |
| जीवन-संग्राम | जीवन का संग्राम | तत्पुरुष समास |
| नव-वधू | नई है जो वधू | कर्मधारय समास |
| अतीत-गौरव | अतीत का गौरव | तत्पुरुष समास |
परीक्षोपयोगी अतिरिक्त प्रश्न
लघु तथा दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
ए.जी. गार्डिनर और लेखक के निबंध-लेखन संबंधी विचारों में क्या अंतर है?
उत्तर:
| आधार | ए.जी. गार्डिनर | पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी |
|---|---|---|
| लेखन की प्रक्रिया | एक विशेष मानसिक स्थिति में अपने आप लिखा जाता है | सोचना, चिंता करना और परिश्रम करना पड़ता है |
| विषय का महत्व | कोई भी विषय उपयुक्त है – भाव ही प्रमुख हैं | विषय की चिंता होती है |
| शीर्षक | शीर्षक देने का भार मित्र पर छोड़ देते थे | शीर्षक और रूपरेखा की समस्या है |
| दृष्टिकोण | सहज और स्वाभाविक | प्रयासपूर्ण और परिश्रमसाध्य |
‘हैट और खूँटी’ के उदाहरण से लेखक क्या समझाना चाहते हैं?
उत्तर:
‘हैट और खूँटी’ के उदाहरण के माध्यम से लेखक यह समझाना चाहते हैं कि हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है – असली वस्तु हैट है, खूँटी नहीं। उसी प्रकार मन के भावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है – असली वस्तु भाव हैं, विषय नहीं। अर्थात् निबंध में विषय की अपेक्षा लेखक के भाव और अनुभव अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।
‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ – इस लोकोक्ति की व्याख्या पाठ के आधार पर कीजिए।
उत्तर:
ढोल के पास बैठे लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं – वह उन्हें कर्कश लगता है। परंतु दूर किसी नदी के तट पर बैठे व्यक्ति के कानों में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं क्योंकि दूरी से कर्कशता नहीं पहुँचती। यह बात जीवन के सभी पहलुओं पर लागू होती है – तरुणों को भविष्य सुंदर लगता है और वृद्धों को अतीत – क्योंकि जो दूर है, वह वास्तविक कठोरता से परे है। इसीलिए दूर की चीजें सदा सुंदर लगती हैं।
तरुण और वृद्ध दोनों वर्तमान से क्यों असंतुष्ट रहते हैं?
उत्तर:
- तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर होते हैं, इसलिए उन्हें भविष्य उज्ज्वल और मनमोहक लगता है। वे भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और क्रांति के समर्थक होते हैं।
- वृद्ध अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, इसलिए उन्हें अतीत की स्मृति सुखद लगती है। वे अतीत को वर्तमान में देखना चाहते हैं और अतीत-गौरव के संरक्षक होते हैं।
- दोनों को वर्तमान से असंतोष है – और इसीलिए वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है तथा सुधारों की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है।
‘क्या लिखूँ?’ निबंध में मानटेन की पद्धति और परंपरागत निबंधशास्त्र में क्या अंतर है? लेखक ने किस पद्धति को अपनाया और क्यों?
उत्तर:
| आधार | परंपरागत निबंधशास्त्र | मानटेन की पद्धति |
|---|---|---|
| निबंध का आकार | छोटा होना चाहिए | कोई निश्चित नियम नहीं |
| सामग्री | विचार-समूह संचित करना | देखा, सुना, अनुभव किया – वही लिखा |
| शैली | भाषा में प्रवाह, छोटे वाक्य | स्वच्छंद, मन की रचनाएँ |
| रूपरेखा | पहले रूपरेखा बनाना आवश्यक | कोई रूपरेखा नहीं |
| शीर्षक | विषय के अनुसार | बाद में दूसरों की सहायता से |
| विशेषता | ज्ञान, कल्पना और तर्क की गरिमा | सच्ची अनुभूति, सच्चे भाव, उल्लास |
लेखक ने मानटेन की पद्धति को अपनाने का निर्णय लिया – क्योंकि परंपरागत नियम परस्पर विरोधी और भ्रमित करने वाले थे। मानटेन की पद्धति में लेखक की सच्ची अनुभूति प्रमुख होती है जो निबंध को प्राणवान बनाती है। इसी पद्धति के अनुसार लेखक ने अमीर खुसरो की कहानी की तर्ज पर दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाविष्ट करने का निर्णय लिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न – कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2
‘क्या लिखूँ?’ निबंध किसने लिखा है और यह किस विधा की रचना है?
‘क्या लिखूँ?’ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी द्वारा लिखा गया है। यह आत्मपरक निबंध विधा की रचना है जिसमें लेखक स्वयं पाठकों से सीधा संवाद करते हैं। यह कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ्यपुस्तक का दूसरा अध्याय है और सत्र 2026-27 के पाठ्यक्रम में सम्मिलित है।
कक्षा 9 हिंदी में गंगा पाठ्यपुस्तक अध्याय 2 ‘क्या लिखूँ?’ निबंध का मुख्य विषय क्या है?
इस निबंध के दो मुख्य विषय हैं। पहला – निबंध-लेखन की प्रक्रिया और उसकी कठिनाइयाँ। दूसरा – ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ के माध्यम से यह दिखाना कि मनुष्य दूरी से यथार्थ की कठोरता नहीं समझ पाता, इसीलिए तरुण भविष्य और वृद्ध अतीत को सुंदर मानते हैं, और यही कारण है कि समाज-सुधार की प्रक्रिया अनादि काल से चली आ रही है।
निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है?
लेखक को एक साथ दो विषयों पर निबंध लिखने की समस्या थी। उन्हें अमीर खुसरो की वह कहानी याद आई जिसमें खुसरो ने एक ही पद्य में चार औरतों की चार इच्छाओं की पूर्ति कर दी थी। इसी प्रेरणा से लेखक ने निर्णय लिया कि वे भी दोनों विषयों को एक ही निबंध में समाविष्ट कर देंगे। यह उदाहरण एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा को दर्शाने के लिए आया है।
मानटेन कौन थे और उनकी निबंध-पद्धति की क्या विशेषता कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2 में है?
मानटेन फ्रांसीसी साहित्यकार थे जिन्हें अनुभव-आधारित स्वच्छंद निबंध-पद्धति का जन्मदाता माना जाता है। उनकी पद्धति की विशेषता यह है कि उन्होंने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबंधों में लेखक की सच्ची अनुभूति, सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति और उसका उल्लास रहता है। इनमें न ज्ञान की गरिमा होती है, न कल्पना की महिमा – केवल लेखक का अपना जीवन-अनुभव होता है।
‘तरुण क्रांति के समर्थक और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक’ – पाठ 2 हिंदी गंगा के अनुसार इस कथन का क्या अर्थ है?
तरुण पीढ़ी भविष्य की ओर देखती है – वे मौजूदा व्यवस्था में परिवर्तन चाहते हैं और क्रांति का समर्थन करते हैं। वृद्ध पीढ़ी अतीत की ओर देखती है – वे अपने बीते हुए दिनों को गौरवपूर्ण मानते हैं और पुरानी परंपराओं की रक्षा करना चाहते हैं। दोनों को वर्तमान से असंतोष होता है। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और समाज-सुधार की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 2 की परीक्षा में कौन-से प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं?
सत्र 2026-27 की परीक्षा की दृष्टि से निम्नलिखित बिंदु सबसे महत्वपूर्ण हैं:
- ‘हैट और खूँटी’ के उदाहरण का अर्थ और महत्व
- गार्डिनर और लेखक के विचारों की तुलना
- मानटेन की पद्धति की विशेषताएँ
- ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ की व्याख्या
- तरुण और वृद्ध की वर्तमान से असंतुष्टि के कारण
- समास के भेद और पाठ से उदाहरण
- उपसर्ग और प्रत्यय के उदाहरण
- लेखक के निबंध लेखन की प्रक्रिया का वर्णन
‘निबंध’ शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है और इसकी परिभाषा क्या है?
‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है – ‘बाँधना’ (नि+बंध), अर्थात् भली-भाँति बँधा या गठा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण और भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करते हैं। निबंध की शैली का अर्थ है – अभिव्यक्ति का ढंग।
कक्षा 9 हिंदी पाठ 2 में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की भाषा-शैली की क्या विशेषताएँ हैं?
बख्शी जी की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- आत्मपरक शैली – लेखक पाठक से सीधा संवाद करते हैं
- हास्य-व्यंग्य – कठिनाइयों का वर्णन हास्यपूर्ण ढंग से
- सरल और प्रवाहमयी भाषा – छोटे-छोटे वाक्य, एक-दूसरे से संबद्ध
- उदाहरणों और प्रसंगों का कुशल प्रयोग – खुसरो, गार्डिनर, मानटेन आदि
- लोकोक्तियों का विश्लेषणात्मक प्रयोग – ‘दूर के ढोल सुहावने’
- विचारों की क्रमबद्धता – समस्या से समाधान तक का स्पष्ट क्रम
