एनसीईआरटी समाधान कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 घर की याद
एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 समाधान – घर की याद – प्रश्न-उत्तर, कठिन शब्द-अर्थ, कवि परिचय, सारांश तथा अतिरिक्त प्रश्नों के उत्तर सत्र 2026-27 के लिए यहाँ से निशुल्क प्राप्त किए जा सकते हैं। कक्षा 9 की हिंदी पाठ्यपुस्तक “गंगा” के पाठ 12 में भवानीप्रसाद मिश्र की अत्यंत मार्मिक और भावपूर्ण कविता “घर की याद” संकलित है। यह कविता सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय जेल में लिखी गई थी। कारावास के एकांत में सावन की बरसात देखते हुए कवि के मन में घर और परिजनों की स्मृतियाँ एक-एक करके उमड़ने लगती हैं। परिवार की स्मृति इस कविता की केंद्रीय संवेदना है। माँ की स्नेहमयी दृढ़ता, पिता का वज्र-देह और नवनीत-सा हृदय, चार भाई और चार बहनें — सबकी अलग-अलग छवियाँ कवि के मन में तैरती रहती हैं। कविता का अनूठा पक्ष यह है कि कवि बादल को दूत बनाकर परिवार को संदेश भेज रहा है और उससे आग्रह करता है कि घर वालों को उसके जेल के कष्टों के बारे में न बताए, बल्कि उन्हें सांत्वना और धैर्य दे।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 के त्वरित लिंक:
- कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 12 प्रश्न-उत्तर
- गंगा पाठ 12 कवि परिचय
- हिंदी गंगा पाठ 12 का सारांश
- हिंदी गंगा अध्याय 12 शब्द-अर्थ
- हिंदी गंगा पाठ 12 में व्याकरण
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एनसीईआरटी कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 समाधान
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 के अभ्यास के प्रश्न उत्तर
पेज 199 – रचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
1. भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता कहाँ और क्यों लिखी?
(क) विदेश से मित्र के लिए
(ख) युद्धभूमि से जनता के लिए
(ग) जेल से परिवार के लिए
(घ) यात्रा से किसी संबंधी के लिए
उत्तर:
(ग) जेल से परिवार के लिए
स्पष्टीकरण:
इस कविता में कवि भवानीप्रसाद मिश्र अपने घर, माता-पिता, भाई-बहनों की गहरी याद और उनसे दूर होने का दर्द व्यक्त करते हैं। कविता में बार-बार “घर नजर में तिर रहा है” और परिवार के सदस्यों का भावनात्मक वर्णन यह दिखाता है कि कवि उनसे बहुत दूर और अकेले हैं। साथ ही, कविता में ऐसा संकेत मिलता है कि कवि किसी बंधन या मजबूरी में हैं, जहाँ से वे घर नहीं जा सकते। यह स्थिति जेल जैसी लगती है। इसलिए यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने यह कविता जेल में रहते हुए अपने परिवार को याद करते हुए लिखी।
2. लगातार बरसता पानी कवि के मन की किस भावना का परिचायक है?
(क) उत्साह और आवेग
(ख) भय और क्रोध
(ग) साहस और उमंग
(घ) चिंता और बेचैनी
उत्तर:
(घ) चिंता और बेचैनी
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने लगातार गिरते हुए पानी का वर्णन अपने अंदर चल रही भावनाओं के प्रतीक के रूप में किया है। “बहुत पानी गिर रहा है” और “प्राण मन घिरता रहा है” जैसी पंक्तियाँ दिखाती हैं कि उनका मन उदास, व्याकुल और चिंतित है।
बारिश यहाँ आनंद नहीं देती, बल्कि घर की याद को और बढ़ा देती है, जिससे बेचैनी और तड़प पैदा होती है। इसलिए यह स्पष्ट है कि बरसता पानी कवि की चिंता और बेचैनी को दर्शाता है।
3. कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है?
(क) कमजोर और निष्क्रिय
(ख) स्नेहमयी और दृढ़
(ग) शिक्षित और अनुशासनप्रिय
(घ) सरल और उदासीन
उत्तर:
(ख) स्नेहमयी और दृढ़
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने माँ का चित्र बहुत ही भावनात्मक और मजबूत रूप में प्रस्तुत किया है। वे कहते हैं कि माँ की गोद में सिर रखते ही दुख दूर हो जाता है—यह उनके असीम स्नेह को दर्शाता है। साथ ही, जब पिता दुखी होते हैं तो माँ उन्हें समझाती हैं और हिम्मत देती हैं। यह दिखाता है कि माँ केवल प्रेम करने वाली ही नहीं, बल्कि दृढ़ और सहनशील भी हैं। इसलिए सही उत्तर (ख) है।
4. “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पंक्ति के माध्यम से पिता के व्यक्तित्व की कैसी छवि प्रस्तुत की गई है?
(क) कर्मठ और सृजनशील
(ख) साहसी और पराक्रमी
(ग) दृढ़ और संवेदनशील
(घ) प्रसन्नचित्त और सक्रिय
उत्तर:
(ग) दृढ़ और संवेदनशील
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने “वज्र-भुज” (बहुत मजबूत भुजाएँ) और “नवनीत-सा उर” (मक्खन जैसा कोमल हृदय) जैसे शब्दों का प्रयोग किया है। इससे स्पष्ट होता है कि पिता बाहर से बहुत दृढ़ और शक्तिशाली हैं, लेकिन अंदर से उनका हृदय बहुत कोमल और भावुक है। इसलिए उनकी छवि एक साथ मजबूत और संवेदनशील व्यक्ति की बनती है।
5. “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” पंक्ति किस ओर संकेत करती है?
(क) पिता की कठोरता
(ख) पिता की भावुकता
(ग) वर्षा की तीव्रता
(घ) पिता की निर्बलता
उत्तर:
(ख) पिता की भावुकता
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र इस पंक्ति में बताते हैं कि पिता का हृदय बहुत कोमल है। “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” का अर्थ है कि ज़रा-सी बात पर उनकी आँखों से आँसू बहने लगते हैं। यह उनकी कमजोरी नहीं, बल्कि गहरी संवेदनशीलता और भावुकता को दर्शाता है। इसलिए यह पंक्ति पिता की भावुक प्रकृति की ओर संकेत करती है।
6. “बिहन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर” पंक्ति में ‘परिताप’ शब्द से क्या संकेत मिलता है?
(क) घर का समृद्ध होना
(ख) घर की सजावट
(ग) घर में दुख का वातावरण
(घ) घर की शांति
उत्तर:
(ग) घर में दुख का वातावरण
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने “परिताप” शब्द का प्रयोग गहरे दुःख, पीड़ा और मानसिक कष्ट के अर्थ में किया है। “बिहन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर” पंक्ति से यह स्पष्ट होता है कि घर का वातावरण खुशी का नहीं, बल्कि दुख और चिंता से भरा हुआ है। इसलिए “परिताप” यहाँ घर में फैले दुःख और पीड़ा की ओर संकेत करता है।
7. “और कहना मस्त हूँ मैं” पंक्ति में कवि का ऐसा कहना किस बात की ओर संकेत करता है?
(क) कवि अपने जीवन में बहुत खुश है।
(ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है।
(ग) घर के लोगों के प्रति उदासीन है।
(घ) कवि प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत है।
उत्तर:
(ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है।
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र बार-बार यह कहते हैं—“उन्हें कहना मस्त हूँ मैं”, “मत करो कुछ शोक, कहना”। इससे स्पष्ट है कि वे अपने परिवार को यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि वे ठीक और खुश हैं। असल में कवि अंदर से दुखी और व्याकुल हैं, लेकिन वे नहीं चाहते कि उनके कारण परिवार को चिंता हो। इसलिए वे अपने दुख को छिपाकर उन्हें सांत्वना देना चाहते हैं।
8. इस कविता में किस बात को प्रमुखता से वर्णित किया गया है?
(क) घर की शांति और सुरक्षा
(ख) घर के सदस्यों के बीच का संबंध
(ग) घर के निर्माण की प्रक्रिया
(घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
उत्तर:
(घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
स्पष्टीकरण:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र पूरी कविता में अपने घर, माता-पिता, भाई-बहनों को याद करते हुए गहरी भावनाएँ व्यक्त करते हैं। लगातार बरसती बारिश उनके मन की उदासी और अकेलेपन को और बढ़ा देती है। कविता में मुख्य रूप से घर से दूर होने का दुख, परिवार की याद और अकेलेपन की पीड़ा को ही प्रमुखता से व्यक्त किया गया है।
पेज 200 के प्रश्न उत्तर
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए –
1. कविता में वर्णित पिता के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं का वर्णन कीजिए जिनसे उनका बहुआयामी रूप सामने आता है।
उत्तर:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने अपने पिता के व्यक्तित्व को अत्यंत बहुआयामी रूप में प्रस्तुत किया है। वे शारीरिक रूप से मजबूत और पराक्रमी हैं, जिसका संकेत “वज्र-भुज” शब्द से मिलता है। साथ ही उनका हृदय “नवनीत-सा” कोमल है, जिससे उनकी संवेदनशीलता और भावुकता प्रकट होती है। वे साहसी भी हैं—“मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें”—जो उनके निर्भीक स्वभाव को दर्शाता है।
पिता अनुशासनप्रिय और कर्मठ हैं, जो नियमित रूप से गीता-पाठ और व्यायाम करते हैं। इसके अलावा वे हँसमुख और जीवंत भी हैं, जो परिवार के साथ खुशियाँ बाँटते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने बच्चों से गहरा प्रेम करते हैं और उनके लिए चिंतित रहते हैं। इस प्रकार पिता का व्यक्तित्व शक्ति, साहस, संवेदनशीलता, अनुशासन और स्नेह का सुंदर संगम है।
2. “दुख डटकर ठेलता हूँ” यह कथन मनुष्य के संघर्षशील स्वभाव को उजागर करता है। कविता के आधार पर बताइए कि कठिन परिस्थितियों में कवि किस प्रकार धैर्य, साहस और त्याग का परिचय देता है?
उत्तर:
कवि जेल में रहते हुए भी परिवार को अपनी पीड़ा न बताकर धैर्य का परिचय देते हैं। “मैं मजे में हूँ” कहकर साहस दिखाते हैं। देश के लिए घर-परिवार छोड़ना उनका सबसे बड़ा त्याग है। “दुख डटकर ठेलता हूँ” उनके संघर्षशील स्वभाव की पराकाष्ठा है।
3. कविता में बार-बार वर्षा का वर्णन कवि के भावों को किस प्रकार व्यक्त करता है?
उत्तर:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र कठिन परिस्थितियों में अपने संघर्षशील स्वभाव का परिचय देते हैं। वे घर से दूर हैं और परिवार की याद में दुखी भी हैं, फिर भी वे हार नहीं मानते। “दुख डटकर ठेलता हूँ” पंक्ति से स्पष्ट है कि वे अपने दुख का सामना साहस के साथ करते हैं, उससे भागते नहीं।
कवि अपने परिवार को चिंता में नहीं डालना चाहते, इसलिए वे उन्हें संदेश देते हैं कि वे “मस्त” हैं और सब ठीक है। यह उनके त्याग को दर्शाता है, क्योंकि वे अपने दुख को छिपाकर दूसरों को सुख देना चाहते हैं। साथ ही, वे धैर्य बनाए रखते हैं और परिस्थिति को सहन करते हैं। इस प्रकार कवि धैर्य, साहस और त्याग का परिचय देते हुए जीवन की कठिनाइयों का दृढ़ता से सामना करते हैं।
4. कविता से उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए और भाव स्पष्ट कीजिए जिनसे माँ की भावनात्मक मजबूती का परिचय मिलता है।
उत्तर:
कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने माँ की भावनात्मक मजबूती को बहुत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। इसके लिए ये पंक्तियाँ उपयुक्त हैं –
“और माँ ने कहा होगा,
दुख कितना बहा होगा,
आँख में किसलिए पानी,
वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर,
और अपनापन समझकर,
गया है सो ठीक ही है,
यह तुम्हारी लीक ही है।”
इन पंक्तियों में माँ पिता को समझाती हैं और उनका दुख कम करने का प्रयास करती हैं। वे अपने बेटे के दूर जाने के दर्द को सहते हुए भी उसे सही ठहराती हैं। इससे उनकी भावनात्मक दृढ़ता, धैर्य और त्याग का परिचय मिलता है।
माँ स्वयं दुखी होने के बावजूद परिवार को संभालती हैं और दूसरों को हिम्मत देती हैं। यही उनकी सच्ची मजबूती को दर्शाता है।
5. कविता का कौन-सा अंश आपको सबसे अधिक भावनात्मक और प्रभावी लगता है और क्यों?
उत्तर:
मुझे कवि भवानीप्रसाद मिश्र की कविता का यह अंश सबसे अधिक भावनात्मक और प्रभावी लगता है—
“माँ कि जिसकी गोद में सिर,
रख लिया तो दुख नहीं फिर,”
यह पंक्ति माँ के असीम प्रेम और स्नेह को बहुत सरल लेकिन गहरे रूप में व्यक्त करती है। इसमें बताया गया है कि माँ की गोद में ऐसा सुकून मिलता है, जहाँ सारे दुख अपने आप दूर हो जाते हैं।
यह अंश इसलिए भी प्रभावी है क्योंकि यह हर व्यक्ति के जीवन के सच्चे अनुभव से जुड़ा है। जब हम परेशान होते हैं, तो माँ का साथ हमें सबसे अधिक शांति देता है। कवि ने कम शब्दों में बहुत गहरी भावना व्यक्त की है, जिससे यह अंश हृदय को छू जाता है और पाठक को अपने परिवार की याद दिलाता है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 12 कवि परिचय
कवि परिचय – भवानीप्रसाद मिश्र
- जन्म और काल:
भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। सन् 1985 में उनका निधन हो गया। - स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी:
साहित्य के साथ-साथ स्वाधीनता आंदोलन में जिन कवियों की सक्रिय भागीदारी थी, उनमें भवानीप्रसाद मिश्र प्रमुख हैं। उन्होंने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय रूप से भाग लिया जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष के लिए कारावास का दंड दिया। - प्रमुख रचनाएँ:
उनकी मुख्य रचनाएँ हैं — गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, कवितांतर, शतदल, गांधी-पंचशती, त्रिकाल संध्या। “बुनी हुई रस्सी” (कविता संग्रह) पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। - संपादन कार्य:
भवानीप्रसाद मिश्र ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में कार्य किया और सन् 1952–55 तक हैदराबाद से प्रकाशित हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका “कल्पना” का संपादन किया। सन् 1955–58 के बीच वे आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से संबद्ध रहे। उन्होंने संपूर्ण गांधी वाङ्मय का भी संपादन किया। - पाठ का संदर्भ:
1942 के स्वाधीनता आंदोलन के समय जेल में रहते हुए उन्होंने ‘घर की याद’ कविता लिखी। कवि सावन के बादल द्वारा परिवार को संदेश भेज रहा है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 12 का संक्षिप्त सारांश
कक्षा 9 हिंदी गंगा पाठ 12 का सारांश
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
यह कविता सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय जेल में लिखी गई। कवि को ब्रिटिश सरकार ने तीन वर्ष के लिए कारावास दिया था। जेल की एकांत रात में सावन की बरसात देखते हुए परिजनों की स्मृतियाँ उमड़ने लगती हैं।
- प्रथम खंड — वर्षा और घर की याद
कविता का आरंभ सावन की रात में जेल की कोठरी में होता है। रात भर पानी गिरता रहा, प्राण और मन घिरते रहे। सबेरा कब हुआ — कवि को ठीक से पता नहीं चला। बादल की अँधेरी अभी भी घनी है, रात की चुप्पी अभी भी है। “गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर।” यह ध्वन्यात्मक वर्षा-चित्रण कवि की व्याकुलता को और गहरा करता है। बहुत पानी गिरने पर घर आँखों में तिरने लगता है — वह घर जो दूर है, जो खुशी का पूर है। - द्वितीय खंड — परिवार की स्मृति
कवि के परिवार में चार भाई और चार बहनें हैं। बहिन मायके आई है — “बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर!” यह पंक्ति अत्यंत करुण है — बेटे के जेल में होने पर बाप का घर परिताप का घर बन गया है।
आज का दिन सामान्य दिन नहीं है — “एक छिन सौ बरस है रे।” घर में चार भाई, चार बहनें, पिता और माँ सब जुड़े हैं। - तृतीय खंड — माँ की छवि
माँ बिन-पढ़ी हैं, दुख में गढ़ी हैं। माँ की गोद में सिर रख लो तो फिर दुख नहीं। उनकी स्नेह-धारा यहाँ जेल तक भी पसारा करती है। परंतु उन्हें लिखना नहीं आता इसलिए पत्र नहीं आ सकता। - चतुर्थ खंड — पिता की छवि
“पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — पिता की भुजाएँ वज्र की तरह कठोर और मजबूत हैं परंतु हृदय नवनीत (मक्खन) जैसा कोमल है। बुढ़ापा उन पर नहीं आया — वे अभी भी दौड़ सकते हैं और खिलखिला सकते हैं। मौत से नहीं हिचकते, शेर से नहीं बिचकते। गीता-पाठ करके, दो सौ साठ दंड लगाकर, मुगदर हिलाकर जब वे नीचे आए होंगे तो आँखें जल से भर आई होंगी। - पंचम खंड — पाँचवें पुत्र की पीड़ा
पिताजी कवि को “सोने पर सुहागा” कहते रहे हैं — वे पाँचवें और प्रिय पुत्र हैं। आज वे रो पड़े होंगे पाँचवें का नाम लेकर। कवि स्वयं को “अभागा” कहता है — जो जेल में बंद बैठा है। - षष्ठ खंड — माँ की कल्पित बातें
माँ ने कहा होगा — “आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी।” माँ समझती हैं कि बेटा अपने मन और अपनेपन से गया है — “यह तुम्हारी लीक ही है।” जो पाँव पीछे हटाता, वह माँ की कोख को लजाता। “इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेंगे और बच्चे।” - सप्तम खंड — पिता की कल्पित बातें
पिताजी ने कहा होगा — “कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ, धीर मैं खोता, कहाँ हूँ।” पर आज पानी गिर रहा है, भवानी याद आता है जिसे बरसात प्यारी थी। खुले सिर नंगे बदन वह घूमता फिरता था, बड़े बाड़े में जाता, लौकी के बीज लगाता। पिताजी ने कहा होगा “मैं न रोऊँगा” — परंतु फिर पानी बहा होगा। - अष्टम खंड — परिवार का दृश्य
“भाई पागल, बहिन पागल, और अम्मा ठीक बादल।” शर्म से रो भी नहीं पा रहे, खूब भीतर छटपटा रहे हैं। - नवम खंड — पानी थमने के बाद
पानी थम गया है, मन निहायत नम हो गया है। बादल जमे हैं, आकाश में फैले हैं। वे ऐसे लग रहे हैं जैसे माँ आँगन लीप दे। एक पंछी बोलता है, उर के घाव खोलता है। - दशम खंड — पिता का विस्तृत चित्रण
“देह एक पहाड़ जैसे, मन कि बड़ का झाड़ जैसे” — एक पत्ता टूट जाए तो धारा फूट जाए, एक हल्की चोट लगे तो दूध की नदी उमग ले। उनकी चिंता और ध्यान की डालें जितनी, जड़ें उतनी। - अंतिम खंड — बादल को संदेश
“हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन।” कवि बादल से कहता है — तुम बरसो, वे न बरसें — पाँचवें को वे न तरसें। “मैं मजे में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है।” किंतु यह “बस” बड़ा बस है। बादल से आग्रह — उन्हें धीर देना, जेल के कष्ट न बताना। उन्हें कहना — लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, काम करता हूँ, नाम करता हूँ, मस्त हूँ, वजन सत्तर सेर है, भोजन ढेर है, कूदता हूँ खेलता हूँ। “योों न कहना अस्त हूँ मैं” — यह मत कहना कि मैं टूट गया हूँ।
पंक्तियों का भावार्थ
- “आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात-भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है।”
भावार्थ: जेल की रात में सावन का पानी रात भर बरसता रहा। यह केवल बाहर का पानी नहीं — कवि के प्राण और मन भी भावनाओं से घिरते रहे। बाहरी वर्षा कवि की आंतरिक व्याकुलता का प्रतीक बन गई है। - “गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर।”
भावार्थ: यह पंक्ति अत्यंत संगीतात्मक है। पानी का झरना, पत्तों का हिलना, हवा का बहना — ये प्राकृतिक ध्वनियाँ कवि के काँपते हुए प्राणों की व्याकुलता को और गहरा करती हैं। यहाँ अनुप्रास और ध्वन्यात्मकता का सुंदर प्रयोग है। - “घर कि मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो।”
भावार्थ: वह घर जो अभी कवि से दूर है, खुशियों से भरा-पूरा है। जेल में बंद कवि अपने सुखी घर को आँखों में तैरते हुए देखता है। यहाँ “पूर” शब्द में अनेक अर्थ हैं — पूर्ण, भरपूर, बाढ़। - “बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर!”
भावार्थ: बहन मायके आई है — यह सामान्यतः खुशी की बात होती है। परंतु बेटा जेल में है, इसलिए बाप का घर परिताप (अत्यधिक दुख और ताप) का घर बन गया है। यह पंक्ति अत्यंत करुण और मार्मिक है। - “माँ कि जिसकी गोद में सिर, रख लिया तो दुख नहीं फिर।”
भावार्थ: माँ की गोद सबसे बड़ा आश्रय और सांत्वना है — उनकी गोद में सिर रखते ही सारे दुख दूर हो जाते हैं। यह माँ के स्नेह और सुरक्षा का अत्यंत मार्मिक चित्रण है। - “पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर।”
भावार्थ: पिता का व्यक्तित्व दो विरोधी गुणों का संगम है — “वज्र-भुज” अर्थात् वज्र जैसी कठोर और बलशाली भुजाएँ (बाहरी कठोरता और पराक्रम), परंतु “नवनीत-सा उर” अर्थात् ताजे मक्खन जैसा कोमल हृदय (आंतरिक संवेदनशीलता)। यह विरोधाभास पिता के बहुआयामी चरित्र को जीवंत करता है। - “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए, एक हल्की चोट लग ले, दूध की नदी उमग ले।”
भावार्थ: पिता की भावुकता का यह सबसे सुंदर चित्रण है। वे बड़ के विशाल वृक्ष के समान हैं — जिसमें एक पत्ता भी टूटे तो आँसुओं की धारा फूट पड़े, जरा-सी चोट लगे तो दूध जैसी ममता की नदी उमग पड़े। पिता की विशाल देह और कोमल हृदय का यह अनूठा बिंब है। - “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें।”
भावार्थ: कवि सावन के बादल से कहता है — हे मेरे पुण्य और पावन सावन! तुम खूब बरसो, परंतु घर में परिवार के नेत्र न बरसें — वे पाँचवें बेटे (कवि) के लिए आँसू न बहाएँ। यह पंक्ति संबोधन, करुणा और परिवार-प्रेम का सुंदर संगम है। - “मैं मजे में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है, किंतु यह बस बड़ा बस है, इसी बस से सब विरस है।”
भावार्थ: कवि कहता है — मैं मजे में हूँ, केवल घर नहीं हूँ — बस यही एक बात है। परंतु यह “बस” (केवल) बहुत बड़ा “बस” है। इसी एक बात से सब कुछ नीरस हो गया है। घर का न होना इतनी बड़ी कमी है कि बाकी सब व्यर्थ लगता है। - “और कहना मस्त हूँ मैं, कातने में व्यस्त हूँ मैं, वजन सत्तर सेर मेरा, और भोजन ढेर मेरा।”
भावार्थ: कवि बादल से आग्रह करता है कि परिवार को बताए — मैं मस्त हूँ, कातने (चरखे पर सूत कातने) में व्यस्त हूँ, सत्तर सेर वजन है, खाना भरपूर है। यह सब झूठ नहीं — यह परिवार को चिंता से बचाने की कोशिश है। “कातना” गांधी के स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक है।
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 के कठिन शब्दों के अर्थ
कठिन शब्द और उनके अर्थ
| कठिन शब्द | सरल अर्थ |
|---|---|
| घनेरा/घना | गाढ़ा, घना, जिसके अवयव पास-पास सटे हों |
| तिर/तिरना | तैरना, उतराना, पार होना |
| परिताप | अत्यधिक दुख, शोक, बहुत गर्मी |
| चतुर्दिक् | चारों ओर, चौखूँट |
| वज्र | बहुत कठोर, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े |
| उर | हृदय, श्रेष्ठ, उत्तम, मन |
| झंझा | तेज हवा, आँधी-पानी, झंकार |
| लरजता/लरजना | काँपना, हिलना-डुलना, दहल जाना |
| धीर | जिसका चित्त विकारजनक कारणों के रहते भी विचलित न हो, दृढ़, गंभीर |
| झारी | पानी परसने के लिए काम में लाया जाने वाला टोटीदार बर्तन |
| बेला | एक सुगंधित फूल, मोगरा |
| फलानी/फलाना | कोई आदिष्ट (व्यक्ति या वस्तु), अमुक |
| क्षितिज | वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिले दिखाई देते हैं |
| तृषा | तीव्र इच्छा, अभिलाषा, प्यास |
| विरस | नीरस, अप्रिय, जी उबाने वाला |
| अस्त | डूबा हुआ, समाप्त, पतन, अंत |
कक्षा 9 हिंदी गंगा अध्याय 12 में व्याकरण
व्याकरण – ध्वन्यात्मक शब्द
इस कविता की सबसे बड़ी भाषाई विशेषता इसकी ध्वन्यात्मकता है। शब्दों का ऐसा चयन किया गया है कि पढ़ने पर ध्वनि स्वयं चित्र बनाती है।
- झरा-झर — पानी के तेज बहाव की ध्वनि
- हरा-हर — पत्तों के हिलने की आवाज
- सर-सर — हवा के बहने की आवाज
- थर-थर — काँपने की ध्वनि
“गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर।”
इस पंक्ति में प्रकृति की चार ध्वनियाँ और कवि की भावनाएँ एक साथ व्यक्त हुई हैं।
व्याकरण – शब्दों की व्याकरणिक पहचान
- “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा”
- ‘बुढ़ापा’ शब्द है — संज्ञा (भाववाचक)
- ‘व्यापा’ शब्द है — क्रिया
- ‘जिनको’ शब्द है — सर्वनाम
- “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह”
- ‘खुले’ शब्द है — विशेषण
- ‘वह’ शब्द है — सर्वनाम
- ‘बदन’ शब्द है — संज्ञा
- ‘फिरता’ शब्द है — क्रिया
- “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए”
- ‘एक’ शब्द है — संख्यावाचक विशेषण
- ‘फूट जाए’ है — क्रिया
- ‘पत्ता’ शब्द है — संज्ञा
- “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन”
- ‘सजीले’ शब्द है — विशेषण
- ‘मेरे’ शब्द है — सर्वनाम
- ‘सावन’ शब्द है — संज्ञा
परीक्षा के लिए अतिरिक्त प्रश्न उत्तर
अति लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर:
भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। - “घर की याद” कविता किस अवसर पर और कब लिखी गई?
उत्तर:
यह कविता सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय जेल में लिखी गई। कारावास में सावन की बरसात देखते हुए घर की याद आई। - भवानीप्रसाद मिश्र को साहित्य अकादमी पुरस्कार किस रचना पर मिला?
उत्तर:
उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार “बुनी हुई रस्सी” कविता संग्रह पर मिला। - “परिताप” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“परिताप” शब्द का अर्थ है — अत्यधिक दुख, शोक, भय, बहुत गर्मी, अत्यधिक ताप। - “नवनीत” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“नवनीत” शब्द का अर्थ है — ताजा मक्खन। कविता में पिता के हृदय को नवनीत (मक्खन) जैसा कोमल बताया गया है। - कवि परिवार में कुल कितने भाई-बहन हैं?
उत्तर:
कवि के परिवार में चार भाई और चार बहनें हैं। कवि भवानीप्रसाद पाँचवें संतान हैं। - “वज्र” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“वज्र” शब्द का अर्थ है — बहुत कठोर, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े। पिता की भुजाएँ वज्र जैसी कठोर और बलशाली बताई गई हैं। - कविता में कवि ने किसे दूत (संदेशवाहक) बनाया है?
उत्तर:
कविता में कवि ने सावन के बादल को दूत बनाया है और उसके माध्यम से परिवार को संदेश भेजने का आग्रह किया है। - “अभागा” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“अभागा” शब्द का अर्थ है — भाग्यहीन। कविता में कवि स्वयं को “पाँचवाँ मैं हूँ अभागा” कहकर पिता के प्रिय होने के बावजूद जेल में होने की विडंबना व्यक्त करता है। - “धीर” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“धीर” शब्द का अर्थ है — जिसका चित्त विकारजनक कारणों के रहते हुए भी विचलित न हो, दृढ़, गंभीर। - कवि पाँचवाँ पुत्र है — पिताजी उसे क्या कहते रहे हैं?
उत्तर:
पिताजी कवि को “सोने पर सुहागा” कहते रहे हैं — यानी उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी और उनका सबसे प्रिय पुत्र। - “विरस” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“विरस” शब्द का अर्थ है — नीरस, अप्रिय, जी उबाने वाला, कष्टकर। “इसी बस से सब विरस है” — केवल घर न होने से सब कुछ नीरस हो गया। - कविता में “कातने” का क्या संदर्भ है?
उत्तर:
“कातना” का अर्थ है चरखे पर सूत कातना। गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन में चरखा प्रतीक था। जेल में स्वतंत्रता सेनानी चरखा चलाते थे। - “बड़” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“बड़” शब्द का अर्थ है — बरगद, वट वृक्ष। कविता में पिता के मन की तुलना “बड़ के झाड़” से की गई है। - “चतुर्दिक्” शब्द का क्या अर्थ है?
उत्तर:
“चतुर्दिक्” शब्द का अर्थ है — चारों ओर, चौखूँट। “घर चतुर्दिक् घिर रहा है” — घर चारों ओर से घेरता जा रहा है।
लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पंक्ति में पिता के व्यक्तित्व का कौन-सा पहलू उभरता है?
उत्तर:
इस पंक्ति में पिता के व्यक्तित्व के दो विरोधी परंतु पूरक पहलू उभरते हैं। “वज्र-भुज” — उनकी भुजाएँ वज्र जैसी कठोर और बलशाली हैं, बाहरी रूप से वे अत्यंत दृढ़ और निर्भीक हैं। “नवनीत-सा उर” — परंतु उनका हृदय ताजे मक्खन जैसा कोमल और संवेदनशील है। यह विरोधाभास पिता के बहुआयामी, मानवीय और प्रेमपूर्ण स्वभाव को एक साथ व्यक्त करता है। - कविता में वर्षा किस प्रकार कवि के भावों का प्रतीक बनती है?
उत्तर:
इस कविता में बाहर की वर्षा कवि की आंतरिक व्याकुलता का प्रतीक बन जाती है। जितनी अधिक वर्षा, उतनी गहरी घर की याद। “बहुत पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है” — यह सीधा संबंध स्थापित करता है। पानी थमने पर “मन निहायत नम गया है” — बाहर वर्षा रुकती है परंतु मन में भावनाओं की नमी बनी रहती है। यह बाह्य प्रकृति और आंतरिक मन का अद्भुत संयोजन है। - “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन” — इस पंक्ति में बादल को “पुण्य पावन” क्यों कहा गया है?
उत्तर:
बादल को “पुण्य पावन” इसलिए कहा गया है क्योंकि वह कवि के लिए एकमात्र संदेशवाहक है। बंद जेल में जब कोई अन्य माध्यम नहीं, तब बादल ही वह पवित्र माध्यम है जो घर तक संदेश पहुँचा सकता है। साथ ही सावन प्राकृतिक रूप से पवित्र और जीवनदायी है। “पुण्य” शब्द बादल की इस दूत-भूमिका के प्रति कवि की गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता है। - कविता में माँ की कौन-सी विशेषताएँ उभरती हैं?
उत्तर:
माँ बिन-पढ़ी परंतु दुख में गढ़ी हैं — यह उनकी व्यावहारिक दृढ़ता है। उनकी गोद में सिर रखने पर दुख नहीं रहता — यह उनकी असीम ममता है। वे कहती हैं — “आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी” — यह उनकी भावनात्मक मजबूती है। “पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता” — यह उनका असाधारण देशप्रेम और नैतिक साहस है। - “गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर” — इन पंक्तियों में कौन-सा काव्य-गुण है?
उत्तर:
इन पंक्तियों में “नाद सौंदर्य” या “ध्वन्यात्मकता” का अत्यंत सुंदर प्रयोग है। “झरा-झर” में पानी के बहाव की ध्वनि, “हरा-हर” में पत्तों के हिलने की आवाज, “सर-सर” में हवा की सरसराहट, “थर-थर” में काँपने की ध्वनि सुनाई देती है। साथ ही “झ-झ”, “ह-ह”, “स-स”, “थ-थ” वर्णों की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार भी है। - “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” — इस पंक्ति में क्या बिंब है?
उत्तर:
इस पंक्ति में एक अत्यंत मार्मिक बिंब है। पिता “मन कि बड़ का झाड़” (बरगद) जैसे हैं — विशाल, दृढ़, असंख्य डालियों वाले। जैसे बरगद का एक पत्ता टूटे तो दूध जैसा रस बह जाता है — वैसे ही पिता के मन में बेटे की जरा-सी चोट की खबर लगते ही आँसुओं की धारा फूट जाती है। यह पिता की गहरी संवेदनशीलता और पुत्र-प्रेम का सुंदर चित्रण है। - कवि बादल से क्या-क्या बातें परिवार को बताने के लिए कहता है?
उत्तर:
कवि बादल से कहता है कि परिवार को बताए — मैं लिख रहा हूँ, पढ़ रहा हूँ, काम कर रहा हूँ, लोग मुझे चाहते हैं, मस्त हूँ, कातने में व्यस्त हूँ, वजन सत्तर सेर है, भोजन ढेर है, कूदता हूँ खेलता हूँ। परंतु यह नहीं बताना — जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ, मौन हूँ, अस्त हूँ। - “और माँ बिन-पढ़ी मेरी, दुख में वह गढ़ी मेरी” — इन पंक्तियों में “बिन-पढ़ी” और “गढ़ी” में क्या भाव है?
उत्तर:
“बिन-पढ़ी” — माँ शिक्षित नहीं हैं, इसलिए पत्र नहीं लिख सकतीं और न पढ़ सकती हैं। यह एक यथार्थ स्थिति है। “गढ़ी” — परंतु वे दुखों से गढ़ी हुई हैं — जीवन के कठिन अनुभवों ने उन्हें एक अटूट और मजबूत व्यक्तित्व बनाया है। “बिन-पढ़ी” और “गढ़ी” का यह जोड़ माँ के बाहरी सादेपन और भीतरी दृढ़ता को एक साथ व्यक्त करता है। - “मैं मजे में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है” — इन पंक्तियों की विशेषता क्या है?
उत्तर:
इन पंक्तियों में कवि की वास्तविक मनःस्थिति और वह दिखावा जो वह परिवार के लिए करना चाहता है — दोनों एक साथ व्यक्त होते हैं। “मजे में हूँ” — परिवार को यही बताना है। “घर नहीं हूँ” — यह सच्चाई है। “किंतु यह बस बड़ा बस है” — यह एक छोटी-सी बात नहीं, जीवन की सबसे बड़ी कमी है। यहाँ “बस” शब्द का अनेकार्थी प्रयोग कविता की सबसे मार्मिक भाषाई विशेषता है। - कविता में किस प्रसंग से पिता की पुत्र के प्रति भावनाओं का पता चलता है?
उत्तर:
कविता में पिता की भावनाओं के अनेक प्रसंग हैं। “गिर रहा है आज पानी, याद आता है भवानी” — पिता को बरसात में बेटा याद आता है। “रो पड़े होंगे बराबर, पाँचवें का नाम लेकर” — पिता रो पड़ते हैं। “मैं न रोऊँगा — कहा होगा, और फिर पानी बहा होगा” — रोने से रोकते हैं परंतु आँसू बह जाते हैं। यह पिता का वह प्रेम है जो मुखर नहीं होना चाहता परंतु आँसुओं में बह जाता है।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर
- “घर की याद” कविता में पिता के चरित्र का विस्तृत विश्लेषण कीजिए।
उत्तर:
“घर की याद” कविता में भवानीप्रसाद मिश्र ने अपने पिता का जो चित्र खींचा है वह हिंदी कविता में पिता के चरित्र-चित्रण के सबसे मार्मिक उदाहरणों में से एक है।
शारीरिक दृढ़ता: “देह एक पहाड़ जैसे” — पिता शारीरिक रूप से एक पहाड़ की तरह विशाल और दृढ़ हैं। “वज्र-भुज” — उनकी भुजाएँ वज्र जैसी कठोर और बलशाली हैं।
अदम्य साहस: “मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें” — वे मृत्यु और शेर से भी नहीं घबराते। “बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता” — उनकी वाणी में बादल जैसी गर्जना और काम में आँधी जैसी शक्ति है।
अनुशासन और दिनचर्या: “आज गीता-पाठ करके, दंड दो सौ साठ करके, खूब मुगदर हिला लेकर” — यह उनकी नियमित और अनुशासित दिनचर्या है जो बुढ़ापे में भी नहीं बदली।
बाल-सुलभ प्रसन्नता: “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, जो अभी भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खिलखिलाएँ।” — बुढ़ापे में भी उनमें बच्चों जैसी ऊर्जा और उमंग है।
कोमल हृदय: “नवनीत-सा उर” — उनका हृदय मक्खन जैसा कोमल है। “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” — जरा-सी बात पर आँसुओं की धारा बह जाती है।
पुत्र-प्रेम: “सोने पर सुहागा” — वे कवि को अपना सबसे प्रिय और श्रेष्ठ पुत्र मानते हैं। “रो पड़े होंगे बराबर, पाँचवें का नाम लेकर” — परंतु बेटे की जेल की खबर पर रो पड़ते हैं।
प्रकृति-प्रेम: “गिर रहा है आज पानी, याद आता है भवानी, उसे थी बरसात प्यारी” — पिता को बेटे की बरसात प्रेम की याद है। “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह” — बरसात में बेटे को याद करते हैं। - कविता में कवि ने बादल को दूत क्यों बनाया? इस संदेश-परंपरा का महत्व क्या है?
उत्तर:
“घर की याद” कविता में भवानीप्रसाद मिश्र ने सावन के बादल को अपने परिवार का दूत बनाया है। यह भारतीय साहित्य की एक पुरानी और समृद्ध परंपरा से जुड़ा है।
बादल को दूत बनाने के कारण:
पहला कारण — माँ बिन-पढ़ी हैं, पत्र नहीं पढ़ सकतीं। जेल में पत्र लिखने पर भी प्रतिबंध थे। इसलिए बादल ही एकमात्र माध्यम बचता है। दूसरा कारण — बादल घर तक पहुँचता है, सबको भिगोता है, सबके हृदय को छूता है। तीसरा कारण — यह काव्यात्मक युक्ति कविता को सुंदर, भावपूर्ण और संगीतमय बनाती है। चौथा कारण — बादल प्राकृतिक और निःस्वार्थ है — वह संदेश ले जाएगा परंतु किसी को नहीं बताएगा।
संदेश-परंपरा का महत्व:
भारतीय साहित्य में प्रकृति को संदेशवाहक बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है। कालिदास के “मेघदूत” में यक्ष अपनी प्रियतमा को संदेश भेजने के लिए मेघ को दूत बनाता है। ठीक वैसे ही भवानीप्रसाद मिश्र ने भी सावन के बादल को परिवार का दूत बनाया है। इस परंपरा की विशेषता यह है कि यह मानव और प्रकृति के बीच एक गहरे आत्मीय संबंध को व्यक्त करती है। प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि एक सक्रिय भागीदार बन जाती है।
बादल को दिया गया संदेश:
कवि बादल से कहता है — परिवार को बताओ कि मैं मस्त हूँ, व्यस्त हूँ, वजन और भोजन ठीक है। परंतु यह मत बताना कि मैं टूट गया हूँ, जागता हूँ, अकेला हूँ। यह संदेश प्रेम, त्याग और परिवार-रक्षा की भावना का प्रतीक है। - “घर की याद” कविता की भाषा-शैली की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
“घर की याद” कविता भाषा की सहजता और काव्यात्मक सौंदर्य का अनूठा संगम है।
ध्वन्यात्मकता (नाद सौंदर्य):
“गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर।” यहाँ शब्दों का चयन ऐसा है कि पढ़ते ही वर्षा, हवा और काँपने की ध्वनि सुनाई देती है। यह इस कविता की सबसे विशिष्ट भाषाई विशेषता है।
लोकभाषा की सहजता:
“आज सबका मन चुआ होगा” — “चुआ” मध्य प्रदेश की क्षेत्रीय भाषा का शब्द है। “एक छिन सौ बरस है रे” — “छिन” और “रे” लोक-प्रयोग हैं। इन शब्दों से कविता में एक घरेलू और आत्मीय वातावरण बनता है।
पंक्तियों का दोहराव:
“बहुत पानी गिर रहा है” और “घर नजर में तिर रहा है” जैसी पंक्तियों की पुनरावृत्ति एक संगीतात्मक लय बनाती है और घर की याद की तीव्रता को और गहरा करती है।
आलंकारिक प्रयोग:
“वज्र-भुज नवनीत-सा उर” — विरोधाभास और उपमा। “देह एक पहाड़ जैसे, मन कि बड़ का झाड़ जैसे” — उपमा। “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” — अत्यंत सुंदर बिंब।
संबोधनात्मकता:
“हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन।” बादल को सीधे संबोधित करना कविता को संवादात्मक और भावपूर्ण बनाता है। - 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में “घर की याद” कविता का महत्व क्या है?
उत्तर:
“घर की याद” केवल एक व्यक्तिगत स्मृति की कविता नहीं है — यह एक ऐसी कविता है जो स्वतंत्रता आंदोलन के मानवीय पक्ष को अत्यंत गहराई से उजागर करती है।
ऐतिहासिक संदर्भ:
1942 में गांधीजी ने “भारत छोड़ो” का नारा दिया। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों को जेल हुई। भवानीप्रसाद मिश्र को तीन वर्ष कारावास मिला। जेल की एकाकी रात में सावन की बरसात और घर की याद ने यह कविता जन्म दी।
स्वतंत्रता सेनानी का मानवीय पक्ष:
इतिहास की पुस्तकों में स्वतंत्रता सेनानी महान वीर के रूप में चित्रित होते हैं — परंतु यह कविता उनके मानवीय पहलू को सामने लाती है। देश के लिए लड़ते हुए वे परिवार से दूर थे, घर की याद सताती थी, माँ की ममता और पिता की भावुकता की याद आती थी। यह कविता इस मानवीय संघर्ष का प्रमाण है।
परिवार का बलिदान:
यह कविता यह भी बताती है कि स्वतंत्रता संग्राम में केवल सेनानी नहीं, उनके परिवार भी बलिदान देते थे। माँ जो भीतर से टूट रही हैं परंतु कह रही हैं — “यह तुम्हारी लीक ही है।” पिता जो रोना नहीं चाहते परंतु आँसू बह जाते हैं।
गांधी-दर्शन का प्रभाव:
“कातने में व्यस्त हूँ मैं” — गांधीजी के चरखे का प्रतीक। “वजन सत्तर सेर” — जेल में भी स्वस्थ और प्रसन्न रहना। यह गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा का जीवंत उदाहरण है। - “घर की याद” कविता में ‘घर’ केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि भावनाओं और संबंधों का केंद्र है। इस कथन की विस्तारपूर्वक समीक्षा कीजिए।
उत्तर:
“घर की याद” कविता में “घर” शब्द बार-बार आता है परंतु हर बार एक नया और गहरा अर्थ लेकर आता है।
घर और परिजनों की स्मृति: “घर नजर में तिर रहा है” — जेल की दीवारों के पार आँखों में घर की छवि तैरती है। यह घर केवल एक मकान नहीं — माँ की गोद, पिता की गर्जना, भाई-बहनों की हँसी — इन सबका संगम है।
घर और सुरक्षा का भाव: “घर कि मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो” — घर खुशियों से भरा-पूरा है। जेल में अकेले बैठे कवि के लिए घर एक सुरक्षित और खुशहाल संसार का प्रतीक है।
घर और रिश्ते: “घर कि घर में चार भाई, मायके में बहिन आई” — घर में रिश्तों की गर्माहट है। चार भाई, चार बहनें, माँ, पिता — हर रिश्ता घर को जीवंत बनाता है।
घर का अभाव: “मैं मजे में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है, किंतु यह बस बड़ा बस है” — घर का न होना इतनी बड़ी कमी है कि बाकी सब नीरस हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ: आज एकल परिवारों के बढ़ते चलन में “घर” का भाव बदल रहा है। परंतु यह कविता याद दिलाती है कि घर की वास्तविक पहचान उसकी ईंटों में नहीं, उसमें रहने वाले संबंधों और भावनाओं में है। जहाँ माँ की ममता, पिता का प्रेम और भाई-बहनों का स्नेह हो — वही सच्चा घर है।
अक्सर पूंछे जाने वाले प्रश्न
यह कविता काफी लंबी और भावनात्मक रूप से गहरी है – इसे कक्षा में किस प्रकार पढ़ाएँ ताकि विद्यार्थी उसके भाव महसूस कर सकें?
इस कविता को पढ़ाने का सबसे प्रभावशाली तरीका है — पहले ऐतिहासिक संदर्भ (1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, जेल का माहौल) बताएँ। फिर कविता को धीरे-धीरे भावपूर्ण स्वर में पढ़कर सुनाएँ। विद्यार्थियों से पूछें — “क्या आपने कभी घर से दूर रहने पर घर की याद महसूस की है?” यह व्यक्तिगत जुड़ाव कविता को जीवंत बनाता है। कविता को प्रसंगों में बाँटें — वर्षा, माँ की याद, पिता की याद, बादल को संदेश। प्रत्येक प्रसंग पर रुककर चर्चा करें।
परीक्षा में कक्षा 9 हिंदी गंगा के पाठ 12 से किस प्रकार के प्रश्न सबसे अधिक पूछे जाते हैं?
इस पाठ से परीक्षा में प्रमुखतः निम्नलिखित प्रश्न आते हैं — “वज्र-भुज नवनीत-सा उर” और “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” जैसी पंक्तियों का भावार्थ, पिता और माँ के चरित्र पर प्रश्न, ध्वन्यात्मक शब्दों (झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर) की विशेषता, कविता में बादल का दूत के रूप में प्रयोग, भवानीप्रसाद मिश्र का संक्षिप्त कवि परिचय और बहुविकल्पीय प्रश्न।
इस कविता को पढ़ाते समय 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का इतिहास किस सीमा तक बताना उचित होगा?
हिंदी पाठ में विस्तृत इतिहास की आवश्यकता नहीं, परंतु इतना अवश्य बताएँ — “भारत छोड़ो” गांधीजी का नारा था, 1942 में यह आंदोलन चरम पर था, अनेक स्वतंत्रता सेनानी जेल गए। भवानीप्रसाद मिश्र भी उन्हीं में से थे। जेल में गांधी दर्शन के अनुसार चरखा चलाना (“कातने में व्यस्त हूँ मैं”) सामान्य था। बस इतना जानने से कविता का पूरा संदर्भ समझ में आ जाता है।
कविता में “कातने में व्यस्त हूँ मैं” और “वजन सत्तर सेर मेरा” जैसी पंक्तियों का क्या अर्थ है — विद्यार्थी इन्हें सीधे अर्थ में लेते हैं?
“कातने में व्यस्त हूँ मैं” — चरखे पर सूत कातना गांधी के स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था। जेल में स्वतंत्रता सेनानी चरखा चलाते थे। यह सच भी हो सकता है और परिवार को सांत्वना देने के लिए कहा भी जा सकता है। “वजन सत्तर सेर” — एक सेर लगभग एक किलो होता है, सत्तर सेर यानी लगभग 70 किलो। कवि परिवार को बताना चाहता है कि वह कमज़ोर नहीं हुआ। ये पंक्तियाँ परिवार को चिंतामुक्त करने की कोशिश हैं — यह संदेश विद्यार्थियों को समझाएँ।
कक्षा 9 हिंदी गंगा कविता 12 बहुत लंबी है और इसमें बहुत से कठिन शब्द हैं – छात्र घर पर इसे कैसे पढ़े?
घर पर इस कविता को समझने का सबसे अच्छा तरीका — पहले पाठ्यपुस्तक में दी गई “शब्द-संपदा” सूची पढ़ें। फिर कविता को प्रसंगों में बाँटें — वर्षा का वर्णन, माँ की याद, पिता का चित्रण, बादल को संदेश। प्रत्येक प्रसंग अलग-अलग दिन पढ़ें। सबसे महत्वपूर्ण पंक्तियाँ — “वज्र-भुज नवनीत-सा उर”, “एक पत्ता टूट जाए…”, “हे सजीले हरे सावन…” — इन्हें भावपूर्वक पढ़ने से अर्थ स्वतः स्पष्ट हो जाता है।
परीक्षा में भवानीप्रसाद मिश्र के बारे में क्या-क्या लिखना होता है?
कवि परिचय के लिए पाँच बातें ज़रूरी हैं — जन्म (1913, होशंगाबाद/नर्मदापुरम, मध्य प्रदेश), स्वतंत्रता आंदोलन में भागीदारी (1942 भारत छोड़ो आंदोलन, तीन वर्ष कारावास), प्रमुख रचनाएँ (गीत-फ़रोश, बुनी हुई रस्सी), पुरस्कार (साहित्य अकादमी पुरस्कार — बुनी हुई रस्सी पर), निधन (1985)। साथ ही यह जोड़ें कि ‘घर की याद’ कविता उन्होंने जेल में लिखी थी।
“नाद सौंदर्य” और “ध्वन्यात्मकता” परीक्षा में कैसे लिखनी चाहिए?
परीक्षा में इसे इस प्रकार लिखें — “इस कविता में ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग किया गया है जिससे नाद सौंदर्य उत्पन्न होता है। ‘गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर’ — इन पंक्तियों में झरा-झर, हरा-हर, सर-सर, थर-थर जैसे शब्दों से वर्षा, हवा और काँपने की ध्वनि का यथार्थ अनुभव होता है। इससे कविता आकर्षक और जीवंत बनती है।” बस इतना लिखना पर्याप्त है।
परीक्षा में “कविता का भाव” या “केंद्रीय संवेदना” पूछें तो क्या लिखें?
इस कविता की केंद्रीय संवेदना “परिवार की स्मृति और घर के प्रति गहरा प्रेम” है। परीक्षा में इस प्रकार लिखें — “यह कविता 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय जेल में लिखी गई थी। कारावास में बंद कवि सावन की बरसात देखते हुए घर और परिजनों को याद करता है। माँ की स्नेहमयी दृढ़ता, पिता का वज्र-देह और कोमल हृदय, भाई-बहनों की याद — सब एक-एक करके उभरते हैं। कवि बादल को दूत बनाकर परिवार को यह संदेश भेजना चाहता है कि वह ठीक है — यह परिवार के प्रति गहरे प्रेम की अभिव्यक्ति है।”
